हाल के दिनों में लड़कियां इतनी सख्ती से हिजाब नहीं पहनती थीं
प्रमुख बिंदु:
1. 19वीं सदी के दौरान भारत में मुस्लिम महिलाएं परदे में
रहती थीं।
2. 20वीं सदी में शिक्षा की बदौलत मुस्लिम लड़कियां भारत
में पर्दे से बाहर निकलीं।
3. स्कूल और कॉलेज जाने वाली लड़कियां हिजाब नहीं पहनती
थीं।
4. 90 के दशक के बाद ही मुस्लिम लड़कियों में हिजाब और नकाब
का चलन बढ़ा।
5. 21वीं सदी में मुस्लिम लड़कियों ने फिर से पर्दा डालना
शुरू कर दिया।
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न्यू एज इस्लाम स्टाफ राइटर
उर्दू से अनुवाद न्यू एज इस्लाम
29 सितंबर 2022
1020 के दशक में एक उर्दू व्यंग के शायर ने लिखा:
बेपर्दा नज़र आईं जो कल चंद बीबियाँ
अकबर ज़मीं में गिरते कौमी से गड़ गया
मैंने जो पूछा आपका पर्दा वह किया हुआ
कहने लगीं कि अक्ल पे मर्दों की पड़ गया
यह प्रसिद्ध शेअर 1920 के दशक के दौरान पर्दे पर मुस्लिम बुद्धिजीवियों की चिंता का संकेत देती है। इस दौरान मुस्लिम महिलाएं पर्दे से निकलकर स्कूलों, कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में दाखिल हुईं। यह मुसलमानों के बीच शैक्षिक पुनर्जागरण का काल था। अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय मुस्लिम लड़कों और लड़कियों दोनों को आकर्षित कर रहा था जो "अंग्रेजी शिक्षा" प्राप्त करना चाहते थे, जिसे मुहम्मद इकबाल और अकबर इलाहाबादी जैसे महान व्यक्तियों ने देखा क्योंकि उन्हें डर था कि पश्चिमी शिक्षा लड़कियों के दिमाग को भ्रष्ट कर देगी और उनकी नैतिकता को प्रभावित करेगी। यही कारण था कि सर सैयद अहमद खान को उलमा और तथाकथित मुस्लिम बुद्धिजीवियों दोनों ने ही अपना निशाना बनाया।
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नई दिल्ली, भारत में, 8 फरवरी को, अखिल भारतीय मुस्लिम छात्र संघ के सदस्यों ने शैक्षणिक संस्थानों में हिजाब प्रतिबंध
के खिलाफ दिल्ली विश्वविद्यालय में विरोध प्रदर्शन किया।
संचित खन्ना / हिंदुस्तान टाइम्स गेटी इमेज के माध्यम से
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1911 में, बेगम रुकय्या ने मुस्लिम लड़कियों की शिक्षा के लिए एक अभियान शुरू किया। उन्होंने कोलकाता में रुकय्या शाखावत मेमोरियल गर्ल्स स्कूल की स्थापना की। लेकिन माता-पिता बेपर्दा होने के जोखिम के कारण अपनी लड़कियों को स्कूल जाने की अनुमति नहीं देते थे। सुश्री रुकय्या ने बस में उचित पर्दे की व्यवस्था करने की पेशकश की ताकि पुरुष उन्हें न देख सकें। उसके बाद कुछ लड़कियों के माता-पिता में थोड़ी नरमी आई।
धीरे-धीरे माता-पिता ने प्रतिबंध हटा दिए और अधिक से अधिक लड़कियां स्कूल और कॉलेज जाने लगीं। उस काल के बांग्लादेशी क्षेत्रों सहित बंगाल के बंगाली मुसलमान शैक्षिक रूप से अधिक उन्नत थे। अधिक मुस्लिम लड़कियों ने ढाका विश्वविद्यालय में दाखिला लिया जहां लड़कियां बिना पर्दे के जाती थीं। ढाका विश्वविद्यालय की पहली महिला मुस्लिम स्नातक फजीलातुन्निसा थीं। उस दौर में लड़कियां स्कूल या कॉलेज में हिजाब या नकाब नहीं पहनती थीं। वास्तव में, केवल माताएँ ही पूरा नकाब पहनकर बाहर जाती थीं। इस सत्य का उल्लेख उपरोक्त शेअर में किया गया है। एक और शेअर नीचे दी गई है जिससे मुस्लिम बुद्धिजीवियों की चिंता व्यक्त होती है:
रशीदा चमकी न थी इंग्लिश से बेगाना थी
अब है शम ए अंजुमन पहले चरागे खाना थी
यह और उस दौर के दुसरे अशआर महिलाओं की आज़ादी की बात करते हैं। वह सामाजिक गतिविधियों में भाग ले रही थीं और अकादमिक क्षेत्र में अपनी पहचान बना रही थीं। उन्होंने पर्दा छोड़ दिया था। इसके बावजूद समाज का एक वर्ग पर्दा करने को बाध्य था, लेकिन छात्रों को हिजाब और नकाब पहनने के लिए मजबूर नहीं किया जाता था।
धार्मिक रहनुमा और यहां तक कि उदार माने जाने वाले भी पर्दे के पक्ष में थे। लेकिन दूसरे वर्ग को महिलाओं के बिना पर्दे के सार्वजनिक रूप से बाहर जाने में कोई आपत्ति नहीं थी। बंगाल में स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान एक जनसभा में, कम्युनिस्ट आयोजक चाहते थे कि एक मुस्लिम महिला मंच पर बोलें। उन्होंने श्रोताओं की अग्रिम पंक्ति में बैठे उलमा से अनुमति मांगी। उन्होंने इसे यह कहते हुए खारिज कर दिया कि एक महिला पुरुषों के सामने मंच पर नहीं आ सकती। इसके बाद आयोजकों ने सुझाव दिया कि वह कार्यक्रम स्थल से सटे एक स्कूल के कमरे से अपना भाषण दे सकती हैं। लेकिन उलमा ने कहा है कि एक महिला को अपनी आवाज का भी पर्दा करना चाहिए। उन्हें मंच से या सभा कक्ष से सटे कमरे से बोलने की अनुमति नहीं थी। इस घटना से पता चलता है कि उलमा के विरोध के बावजूद मुस्लिम महिलाओं ने बड़े पैमाने पर बिना हिजाब या नकाब के सार्वजनिक मामलों में भाग लिया।
स्वतंत्रता और विभाजन के बाद, यह देश एक धर्मनिरपेक्ष देश बन गया और धर्मनिरपेक्ष शिक्षा आम हो गई। मुस्लिम लड़कियों ने गैर-मुस्लिम लड़कियों के साथ स्कूलों और कॉलेजों में दाखला लिया। लड़कियों के लिए पर्दा अनिवार्य नहीं था। समय के साथ मुस्लिम लड़कियों ने शिक्षा के क्षेत्र में काफी तरक्की की। लड़कियों के लिए अधिक से अधिक स्कूल स्थापित किए गए। यहां तक कि लड़कों के साथ सह-शिक्षा विद्यालयों में पढ़ने वाली लड़कियों के माता-पिता ने कभी इसका विरोध या शिकायत नहीं की।
Muslim
students speak to media after they were not allowed to enter pre-university
colleges while wearing the hijab, in Udupi town, Karnataka, India, on Feb. 16.
Anadolu
Agency via Getty Images
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लेकिन 1990 के दशक के बाद और स्पष्ट रूप से 2000 के दशक के बाद से, पर्दे के पक्ष में एक वैचारिक अभियान शुरू किया गया था। विभिन्न उलमा ने युवा लड़कियों के लिए नकाब या हिजाब के इस्तेमाल की वकालत की। इस मुद्दे पर मुस्लिमों के सभी संप्रदाय एकजुट थे। उन्होंने सभी महिलाओं के लिए पूर्ण पर्दे के लिए अभियान चलाया, चाहे उनकी उम्र या वैवाहिक स्थिति कुछ भी हो। इस हिजाबी थ्योरी को प्रचारित करने के लिए संचार के सभी साधनों का इस्तेमाल किया गया। भारत, अफगानिस्तान से लेकर पाकिस्तान तक, महिलाओं और लड़कियों को घर पर रहने के लिए कहा गया और अगर उन्हें बाहर निकलना भी पड़े, तो वे पूरे पर्दे के साथ बाहर निकलें। कुछ उलमा का तो यहां तक कहना था कि महिलाएं बुर्के में एक छेद के माध्यम से देख सकती हैं, भले ही इससे वे सड़क पर गिर जाएं या दुर्घटना हो जाए।
तालिबान और अन्य चरमपंथी संगठनों के उदय ने उपमहाद्वीप के मुसलमानों के बीच हिजाबी की विचारधारा को फैलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। अफगानिस्तान में हिजाब न पहनने पर उन्हें मार दिया जाता है। ईरान में सात साल की लड़कियों को हिजाब पहनना अनिवार्य है।
20वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में इस्लामी समाज के पिछड़ेपन का कारण 20वीं शताब्दी के दौरान निर्मित इस्लामी साहित्य था। यद्यपि इस्लाम पैगंबर ए इस्लाम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के जीवनकाल में अरब व्यापारियों द्वारा भारत के दक्षिण-पश्चिमी तट तक पहुंच गया था, इस्लामी साहित्य केवल उन्नीसवीं शताब्दी के अंतिम तिहाई में संकलित किया गया था। शाह वलीउल्लाह 18वीं सदी में कुरआन का फारसी में अनुवाद करने वाले पहले व्यक्ति थे और उनके बेटे शाह अब्दुल कादिर ने 18वीं सदी के अंत में कुरआन का उर्दू में अनुवाद किया था। शाह वलीउल्लाह ने भारत में इल्मे हदीस को प्रकाशित किया और उन्हें मुहद्दिस देहलवी कहा गया। मुग़ल बादशाह औरंगज़ेब ने 18वीं शताब्दी में इस्लामी फिकह के संकलन और संपादन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
हालांकि, 19वीं शताब्दी के अंत में ही सांप्रदायिकता के प्रसार ने गति पकड़ी। इस अवधि के दौरान अधिक से अधिक मुफ़स्सेरीन, उलमा और मुहक्केकीन सामने आए और अपने अपने सिद्धांतों को बढ़ावा दिया। हालांकि, मौलाना वहीदुद्दीन खान जैसे कुछ लोगों को छोड़कर, लगभग सभी ने पर्दा पर एक कठोर रुख का प्रचार किया। इस पर्दे ने भारत में लोकप्रियता हासिल की। अब विभिन्न संस्थाएं छोटी बच्चियों के लिए भी पर्दे के अभियान चला रही हैं। नकाब की लोकप्रियता में सामाजिक और राजनीतिक परिस्थितियों ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। अब लड़कियां स्कूलों और विश्वविद्यालयों में हिजाब पहनती हैं और कामकाजी महिलाएं ऑफिस में नकाब पहनना पसंद करती हैं। यह संघर्ष और कानूनी लड़ाई का कारण बनता है।
इस प्रकार 19वीं सदी में मुस्लिम लड़कियों पर जो पर्दा मुसल्लत किया गया था, वह 21वीं सदी के प्रबुद्ध युग में फिर से लोकप्रिय हो गया
है। 20वीं शताब्दी के उत्तरार्ध
में स्वतंत्र महिलाओं का उदय हुआ जिन्होंने समाज और देश के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका
निभाई। आज सैकड़ों लड़कियां पर्दे के लिए अपना शैक्षिक भविष्य बर्बाद कर देती हैं।
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English Article: Hijab Has Come Full Circle in India
Urdu Article: Hijab Has Come Full Circle in India ہندوستان میں پھر حجاب کا دور
شروع ہو گیا
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