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Hindi Section ( 29 Apr 2021, NewAgeIslam.Com)

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Faizan Mustafa: Now Ulema Should Create Awareness Among People About The Context Of War Time Verses कानून विशेषज्ञ फैजान मुस्तफा: युद्धकाल से संबंधित आयतों के प्रसंग को बताना अब उलेमा की जिम्मेदारी

न्यू एज इस्लाम स्टाफ राइटर

कुरआन मजीद के खिलाफ अर्जी की बर्खास्तगी काफी नहीं है। बल्कि मुस्लिम उलेमा और विद्वानों को जंगी मामलों से संबंधित आयतों के बारे में पैदा किये गए संदेह और उलझन दूर करने के लिए काम करना चाहिए।

लेख में पेश किये गए महत्वपूर्ण बिंदु

१. कानून विशेषज्ञ फैजान मुस्तफा ने मुस्लिम उलेमा से जंगी मामलों से संबंधित आयतों पर विचारों का आदान-प्रदान करने की अपील की

२. उन्होंने मुस्लिम बुद्धिजीवियों से कुरआन के बारे में गलत फहमियाँ दूर करने की ताकीद की

३. वह कहते हैं कि कुरआन की मदद से हिंसा को जवाज़ नहीं बनाया जा सकता

४. आधुनिक कानूनी निजाम ऐसे मज़हबी रिवाज को ख़त्म कर सकता है जो मौजूदा वक्त के हालात के अनुसार नहीं होते हैं

वसीम रिज़वी

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भारत की सुप्रीम कोर्ट के माध्यम से कुरआन करीम की छब्बीस आयतों पर वसीम रिज़वी की अर्जी को बर्खास्त करने से मुस्लिम बिरादरी को काफी सुकून मिला है। कुरआन के खिलाफ चलाए जाने वाले गलत प्रोपेगेंडे पर यह कुरआन की फतह है। तथापि यह मामला ख़त्म नहीं हुआ है। सुप्रीम कोर्ट में पेटीशन दायर कर के, वसीम रिज़वी ने कुरआन की आयतों के बारे में गैर मुस्लिमों में संदेह पैदा कर दिया है जो अदालत की तरफ से केवल बरतरफी से दूर नहीं हो सकती हैं। इसलिए उलेमा के लिए आवश्यक है कि वह अपनी दरख्वास्त में वसीम रिज़वी के बयान किये हुए आयतों के अर्थ और प्रसंग को बयान करें। विशिष्ट कानून विशेषज्ञ फैजान मुस्तफा ने आयाते हरब (जंग के समय की आयतें) कही जाने वाली आयतों के संदर्भ और उनके अर्थ व मफहूम ब्यान करने की आवश्यकता का भी इज़हार किया है, हालांकि अदालत ने उन्हें बर्खास्त कर दिया है, क्योंकि उनकी नजर में पेटीशन की बर्खास्तगी ने मामले को हमेशा के लिए हल नहीं किया है। हम उनके कानूनी वेब सीरिज़ में प्रकाशित उनके लेक्चर के कुछ अंश को निम्न में पेश कर रहे हैं।

दिलचस्प बात यह है कि जनाब फैजान मुस्तफा का ख्याल है कि अदालत की दहलीज़ पर अर्जी को बर्खास्त करना वसीम रिज़वी की फतह है क्योंकि अगर यह अर्जी बहस के लिए कुबूल कर ली जाती तो सी बी आई के पास उनके खिलाफ जेरे समाअत तमाम मुकदमात और यूपी शिया वक्फ बोर्ड के चेयरमैन की हैसियत से उनके खिलाफ भ्रष्टाचार के तमाम आरोप जेरे बहस होते। इसलिए अदालत में पेटीशन की बर्खास्तगी ने उसे दरअसल अपमान और शर्मिंदगी से बचाया है।

यह उनका दृष्टिकोण है लेकिन एक बात जिसमें वसीम रिज़वी सफल हुए वह यह है कि उन्होंने उलेमा पर यह जिम्मेदारी डाल दी है की वह आम लोगों विशेषतः दुनिया के गैर मुस्लिमों के सामने आयतों के मफहूम और प्रसंग की वजाहत करें कि क्या अर्जी में मजकुर आयतें लोगों को वाकई हिंसा का निशाना बनाने और आतंकवाद पैदा करने की तरगीब देती हैं जैसा कि वसीम रिज़वी ने दावा किया था। मेरी वीडियो पर जो टिप्पणियाँ हुई हैं या हमारी आबादी के एक हिस्से की तरफ से जिस तरह की मुखालिफत का प्रदर्शन किया गया है उससे यह स्पष्ट होता है कि बहुत सारे लोग मौजूद हैं जो यह समझते हैं कि वसीम रिज़वी की अर्जी सहीह थी और वाकई कुरआन में छब्बीस आयतें हैं जो गैर मुस्लिमों के खिलाफ आतंकवाद और हिंसा की बात करते हैं। अब यह जिम्मेदारी मुस्लिम उलेमा पर आयद होती है कि वह लोगों को इन आयतों के संदर्भ की वजाहत करें कि आयाते जंग के नियमों से संबंधित हैं। मैंने एक वीडियो बनाई और छः आयतों के अंतर्वस्तु की वजाहत की। भविष्य में भी मैं वीडियो बनाउंगा और बकिया बीस आयतों के मवाद और उनके अर्थ की वजाहत करूंगा। मैंने यह इसलिए किया कि पहले मैंने सोचा था कि यह केवल एक थियोलौजीकल मसला है लेकिन मेरे कुछ नाज़रीन ने मुझे बताया कि चूँकि कुरआन इस्लामी कानून का स्रोत है, इसलिए यह एक कानूनी मसला भी है। इसलिए मैं कोशिश करूंगा कि वह काम जो अदालत में नहीं हुआ है मैं उसे अंजाम दूँ

अब इस ख़ास मसले को समझने की आवश्यकता है जिसे वसीम रिज़वी ने उठाया है। उन्होंने दावा किया था कि इन आयतों की वजह से मुसलमान पुरी दुनिया में आतंकवाद का प्रतिबद्ध कर रहे हैं, इसलिए आतंकवाद को रोकने के लिए इन आयतों को कुरआन मजीद से बाहर कर दिया जाना चाहिए। दरख्वास्त गुज़ार और उनके वकील को इतना यकीन नहीं था कि जब जस्टिस नरेमन ने उनसे पुछा, “क्या आप गंभीर हैं?”, तो उन्होंने यह नहीं कहा कि उपर्युक्त आयतों को कुरआन से हटाया जाना चाहिए बल्कि वह मदरसों के संबंध में बात चीत करने लगे। आपको मालूम है कि वसीम रिज़वी ने इससे पहले भी (मदरसों के खिलाफ)बहुत सी बातें कहीं हैं। दुसरे शब्दों में, दरख्वास्त गुज़ार ने दलील के शुरू ही में हार मान लिया था और अपनी दलील का रुख इस बात के एतेराफ तक ही सिमित कर दिया कि मदरसों में गलत चीजें सिखाई जा रही हैं। देखिये, दहशतगर्दी ना केवल भारत में बल्कि पूरी दुनिया में भी एक बहुत ही गंभीर मसला है। कोई मुसलमान यह नहीं कह सकता कि मैं आतंकवाद में लिप्त हूँ क्योंकि कुरआन ने मुझे इस बात की तबलीग की है, और चूँकि कुरआन ने मुझे यह शिक्षा दी है इस लिए मुझे सज़ा नहीं दी जानी चाहिए।आतंकवाद को पहले ही गंभीर अपराध करार दिया जा चुका है। तरमीम समेत कई कानून लागू किये गए जैसे टाडा, पोटा, युएपीए। इसलिए, सरकार किसी भी संगठन को आतंकवादी संगठन करार दे सकती है। जब एक आधुनिक कानूनी निजाम किसी मज़हबी सहीफे के माध्यम से किसी शिक्षा या रिवाज को स्वीकार या तस्लीम नहीं करता है, तो यह नहीं कहता है कि इसे वेदों से, उपनिषदों से, मनुस्मृति से, कुरआन से, बाइबिल वगैरा से हटा दें।ऐसा संभव नहीं है। तो फिर कानूनी निजाम क्या करता है? जैसे, हमारा कानूनी निजाम यह नहीं कहता है कि हिन्दू सहिफों से अछूत को हटा दें,। बिना ऐसे कहे ही उसने केवल सती को खत्म कर दिया। अगर कोई सती का मुशाहेदा करेगा या उसकी मदह ख्वानी करेगा तो उसे कानून के अनुसार सज़ा दी जाएगी। हमने अछूत की रोक थाम के लिए नियम बनाए हैं और एस सी/एस टी कानून को सख्त बना दिया है। इसी तरह हमारा कानून आतंकवाद और हिंसा से रोकता है। यहाँ तक कि अगर कोई मज़हबी सहीफा आतंकवाद और हिंसा की हौसला अफजाई करता है तो किसी को भी हक़ नहीं है कि वह अपने धर्म के नाम पर उसका औचित्य पेश करे। यह फौजदारी कानून का मसला है और यहाँ मज़हब असंबंधित हो जाता है।

फैजान मुस्तफा

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जनाब फैजान मुस्तफा यह भी कहते हैं कि वसीम रिज़वी को गाली देना या निशाना बनाना ठीक नहीं था क्योंकि उन्होंने केवल अपना संवैधानिक अधिकार प्रयोग किया।

“मेरी नजर में जनाब वसीम रिज़वी की गिरफ्तारी के लिए कुछ हलकों की तरफ से मुतालबात दुरुस्त नहीं थे। वसीम रिज़वी को आर्टिकल ३२ के अनुसार अदालत जाने का हक़ था और उन्होंने अपना हक़ इस्तेमाल किया। अदालत को यह हक़ था कि वह इस तरह के गैर संजीदा और विज्ञापन हित याचिका को बर्खास्त करे, इसलिए अदालत ने अपना हक़ इस्तेमाल किया। अब वसीम रिज़वी के खिलाफ बरहमी के प्रदर्शन से कोई मकसद हासिल नहीं हो सकेगा। असल काम समाज में जागरूकता पैदा करना है। पेटीशन को उच्च अदालत में हल किया गया था लेकिन इस मसले की वजाहत अवाम के दिमाग में होनी चाहिए। इसलिए उल्लेख किये गए आयतों पर बहस करने की कोशिश होनी चाहिए और आयतों के मश्मुलात पर पाए जाने वाले उलझन को दूर किया जाना चाहिए। लोगों को बताया जाना चाहिए कि इन आयतों का हुक्म आम नहीं है। यहाँ तक कि आज भी अमन के वक्त के नियमों और जंग के नियम भिन्न हैं। मेरे ख्याल में यह हमारे समाज, हमारे बुद्धिजीवियों और हमारे उलेमा की जिम्मेदारी है कि वह लोगों के शुकुक व शुबहात को दूर करें। केवल वसीम रिज़वी को निशाना बनाना और उसको गाली देना हमारे कानूनी निजाम के लिए बेहतर नहीं है।

जनाब फैजान मुस्तफा का लेक्चर हमारे उन उलेमा और बुद्धिजीवियों के लिए चश्म कुशा होना चाहिए जो कुरआन के बचाव के लिए केवल अदालतों पर निर्भर करते हैं। वह अपने सहिफे की आयतों के बारे में गैर मुस्लिमों और आम मुसलमानों के संदेह को स्पष्ट करने के लिए कुछ नहीं करते हैं। चाँदमल चोपड़ा और वसीम रिज़वी हमारे समाज के एक बड़े हिस्से की नुमाइंदगी करते हैं जो कुरआनी आयतों की गलत व्याख्या और गलत तावीलों को हवा देते हैं। हम उनकी दरख्वास्त को फर्द के तखय्युल का मजहर समझ कर अस्वीकार कर के एक बड़ी गलती करते हैं। हमारे समाज के चाँदमल और वसीम रिज़वी जैसे लोगों को कुरआन की असल शिक्षाओं की वजाहत करने की बहुत जरुरत है।

श्री फैजान मुस्तफा अपनी वेब श्रृंखला के माध्यम से कुरआन की आयतों की गलत व्याख्या की निशानदही कर रहे हैं, इसलिए उनका प्रयास सराहनीय होना चाहिए। लेकिन इस तरह के प्रयास हमारे उलेमा द्वारा किए जाने चाहिए क्योंकि उनका मुसलमानों पर बहुत प्रभाव पड़ता है। यहां यह ध्यान दिया जाना चाहिए कि कुछ समय पहले, भारत सरकार ने मुस्लिम उलेमा को मुसलमानों के बीच आतंकवाद और उग्रवाद से लड़ने के लिए YouTube चैनल बनाने के लिए आमंत्रित किया था। दुर्भाग्य से, सरकार के इस कदम को हमारे धार्मिक उलेमा ने गंभीरता से नहीं लिया। श्री फैज़ान मुस्तफ़ा की वेब श्रृंखला, जिसमें युद्ध से संबंधित आयतों की व्याख्या की गई है, निश्चित रूप से एक सकारात्मक और सराहनीय कदम है। हमें हिंसा के हर संभव रूप को रोकना चाहिए और उपलब्ध संसाधनों के साथ इस्लाम और कुरआन के बारे में गलत धारणाओं को दूर करने के लिए काम करना सीखना चाहिए। क्या हमारे उलेमा श्री फैजान मुस्तफा की सलाह पर ध्यान देंगे?

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