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Hindi Section ( 7 Jun 2013, NewAgeIslam.Com)

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We'll Hoist the Islamic Flag on Red Fort हम लाल किले पर इस्लामी परचम लहराएँगे: तालिबान का सपना


 न्यु एज इस्लाम एडिट डेस्क

27 मई, 2013 

"जहां तक ​​क़बायलियों के बीच मुजाहिदीन की मौजूदगी का सम्बंध है, हक़ीक़त ये है कि उनके लीडरों के दिलों में हिन्दुस्तान के लिए नफरत हमेशा की तरह अब भी बहुत ज़्यादा है। ये नेतृत्व भारत से नफरत और लाल किले पर इस्लामी परचम फहराने के नारे पर फली फूली है। इसलिए उनके लिए भारत के साथ हाथ मिलाने को सोचना भी सम्भव नहीं है।  इसके विपरीत उनकी हालत ऐसी है कि उन्हें हिंदुस्तान में एक आज़ाद जिहाद की तीव्र इच्छा है। हमारे प्यारे और पैगंबर (सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम) के प्यारो लोगों का खून उनके गर्दन पर है। हमें कश्मीर से केरल तक हिन्दुओं की वर्तमान पीढ़ी के साथ बहुत सारे हिसाब बराबर करने हैं।"

ये तालिबान के मुखपत्र नवाए अफगान जिहाद के 2013 के मई अंक में प्रकाशित एक लेख का अंश है। ये पाकिस्तानी सेना के हालिया बयान पर उनकी प्रतिक्रिया है जिसमें ये कहा गया है कि पाकिस्तान का असल दुश्मन आतंकवाद है, हिंदुस्तान नहीं। पाकिस्तानी सेना के द्वारा इस वास्तविक खतरे का ये एहसास तालिबान को अच्छा नहीं लगा जो ये चाहते हैं कि पाकिस्तान भारत के खिलाफ आक्रामक रवैया अपनाए। उन्होंने पाकिस्तान को ये सुझाव दिया है कि वो अपने भाइयों (तालिबान आतंकवादियों) के क़त्ल को रोकें और इसके बजाय पाकिस्तानी सेना के टैंकों का रुख भारत की ओर कर दे।  वो भारत के लाल किले पर इस्लामी परचम लहराने और कश्मीर से केरल तक भारतीय हिंदुओं के साथ हिसाब बराबर करने की ख्वाहिश में झुलस रहे हैं। ये बात बहुत दिलचस्प है कि एक तरफ तालिबान पाकिस्तान सरकार को काफिरों की  सरकार कहते हैं, लेकिन साथ ही ये भी चाहते हैं कि वो तालिबान को अपना भाई समझें और उनके साथ प्यार और स्नेह का मामला रखें जबकि वो सरकार पर और पाकिस्तान के सैन्य प्रतिष्ठानों पर लगातार आत्मघाती बमों द्वारा हमले करते रहते हैं।

मुखपत्र ने ये भी ज़हर उगला है कि पूर्व सेनाध्यक्ष और तानाशाह परवेज़ मुशर्रफ जिन्होंने तालिबान के खिलाफ और आतंकवाद के खिलाफ जंग के दौरान अमेरिका के साथ गठबंधन किया था और मदरसे में पढ़ने वालों की हत्या करते हुए लाल मस्जिद के खिलाफ सैन्य अभियान का आदेश दिया था। लेखक ने इस बात की ओर भी इशारा दिया कि जल्द ही परवेज़ को नेस्तो-नाबूद कर दिया जाएगा:

"परवेज़ का जो अंजाम होने वाला है उसे जल्द ही दुनिया देखेगी।"

एक और लेख से इस्राइल के खिलाफ तालिबानी हैकर्स की विध्वंसक गतिविधियों का पता चलता है। इसमें लिखा है कि अप्रैल 7 को इस्लामी हैकर्स ने एक बहुत बड़ा हैकिंग ऑपरेशन किया और इस्राइल को पूरे दिन अपनी इंटरनेट की गतिविधियों को बंद करने के लिए मजबूर कर दिया। हैकर्स ने इस्राइल के कई गोपनीय डेटा डाउनलोड कर लिए और इजरायली बैंकों से लाखों डॉलर अपने खाते में स्थानांतरित कर दिए।

'मैराथन - अमेरिका में तीन विस्फोट, शीर्षक से लिखे लेख में पत्रिका ने ये कहते हुए दो चेचन भाइयों के द्वारा अमेरिका में किए गए बम धमाकों की तारीफ की है कि, "इस अभियान का श्रेय उम्मत के दो बहादुर बेटों तैमूर और जौहर' के सिर जाता है। इसमें वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर होने वाले हमले में हिस्सा लेने वाले 19 पवित्र योद्धाओं की बहादुरी की तारीफ भी की गई है और इस बात की धमकी भी दी गई है कि निकट भविष्य में अमेरिका में इस तरह के कई हमलों होंगे।

'सीरिया में योद्धाओं की पेशक़दमी और उनके कामयाबियाँ' शीर्षक से लिखे लेख में लेखक ने दूसरे 15 जेहादी संगठनों सहित अलकायदा और जबहतुल नस्रह की एकता की जानकारी पेश की है। और ये कि इराक में 'दौलतुल ईराक़ इस्लामिया नामक एक काल्पनिक इस्लामी खिलाफत की स्थापना की जा चुकी है जिसका नेतृत्व अमीरुल मोमिनीन अबु बकर अलहुसैनी कर रहे हैं, (दिलचस्प बात ये है कि इस्लाम के पहले ख़लीफ़ा का नाम भी अबु बकर था)। इसी तरह की एक काल्पनिक इस्लामी खिलाफत सोमालिया, अफगानिस्तान, पाकिस्तान और यमन में भी स्थापित की गई है जहां पवित्र योद्धा इस्लाम के नाम पर मुसलमानों को उनके बच्चों और औरतें समेत क़त्ल कर रहे हैं।

लोकतंत्र और इस्लामी लोकतंत्र ऐसी अवधारणाएं हैं जो उनके अनुसार इस्लामी मूल्यों के खिलाफ हैं और वो नियमित रूप से अपने मुखपत्र में इस सिद्धांत की निंदा करते हुए लेख प्रकाशित कर रहे हैं और उन्हें कुफ्र पर आधारित व्यवस्था बता रहे हैं। इस अंक में इस्लामी लोकतंत्र पर एक लेख प्रकाशित किया गया है जिसमें ये साबित करने की कोशिश की गई है कि वो सभी लोग जो इस्लामी लोकतंत्र का समर्थन करते हैं वो नास्तिकता और साम्राज्यवादी शक्तियों के एजेंट हैं और इस्लामी सिद्धांतों से अंजान हैं। लेख में लोकतंत्र पर कुछ विद्वानों की अस्पष्ट अवधारणाओं का हवाला भी दिया गया है। चूंकि तालिबान एक ऐसी खिलाफत की स्थापना करना चाहते हैं जिसका नेतृत्व मुल्ला उमर के द्वारा किया जाएगा इसलिए वो ऐसी व्यवस्था नहीं चाहते जो आपसी परामर्श और अधिकारों के विकेन्द्रीकरण के एक व्यापक फ्रेमवर्क पर आधारित हो।

इसी तरह इस अंक में राष्ट्रवाद की अवधारणा के खिलाफ एक लेख ये विचार पेश करते हुए प्रकाशित किया गया है कि ये अमेरिकी, यूरोपीय और यहूदियों जैसी शैतानी ताक़तों का सिद्धांत है। उनकी व्याख्या के अनुसार राष्ट्रवाद और मुस्लिम क़ौम के अस्तित्व की आधुनिक कल्पना भी इस्लाम विरोधी है। उनकी तरफ से इस बात का कोई विवरण पेश नहीं किया गया है कि पूरी मुस्लिम कौम एक खिलाफत के तहत कैसे एकजुट हो सकती है। जब इकबाल के मन में भी मुस्लिम क़ौम की खिलाफत की कल्पना जागृत हुई और उन्होंने दुनिया की मुस्लिम सरकारों को एकता का प्रस्ताव पेश किया तो उसे इस नज़रिए की अनगिनत जटिलताओं के कारण इसे साकार नहीं किया जा सका। मुसलमान विभिन्न भाषाओं, स्थान, नस्लों, जातीय समूहों, जनजातियों से सम्बंध रखते हैं और वो खाने की आदतों, सांस्कृतिक प्राथमिकताओं और पूर्वाग्रहों और रीति रिवाज और दूसरे ऐतिहासिक और सामाजिक विशेषताओं के लिहाज़ से आपस में गंभीर मतभेद रखते हैं।

खुदा ने भी कुरान में फरमाया है कि उसने इंसानों को विभिन्न रंगों, नस्लों और जनजातियों में पैदा किया है। पाकिस्तान के बलूची अपने ऐतिहासिक और जातीय पृष्ठभूमि को छोड़ने और पाकिस्तानी राष्ट्रीयता में खुद को एकीकृत कर देने को तैयार नहीं हैं। पाकिस्तान के बंगाली, गैर बंगाली पाकिस्तानियों के साथ समन्वय स्थापित नहीं कर सके। फिर वो कैसे पूरी दुनिया के मुसलमानों के सभी क़ौमों और जातीय समूहों से बात की उम्मीद कर सकते हैं कि वो एक साथ जमा हो सकते हैं और एक अमीरुल मोमिनीन के नेतृत्व में धरती पर एकमात्र खिलाफत की स्थापना कर सकते हैं। यही कारण है कि इकबाल ने कमाल अतातुर्क के द्वारा खिलाफत उस्मानिया को भंग करने का स्वागत किया था बल्कि इसे इस्लामी दुनिया में एक नई शुरुआत के रूप में बयान किया था। इसलिए कि तुर्की ने पुरानी व्यवस्था और विचारों को खत्म कर दिया था और आधुनिक दुनिया की दिशा में आगे बढ़ा था।

उन्होंने भारत के अंदर हिंदुस्तानी मुसलमानों के बहुमत वाले राज्यों में एकता की सिफारिश की थी और उन्हें इसमें कुछ भी गलत नहीं लगा। पाकिस्तान का पहला वैचारिक नेता मोहम्मद असद जिन्होंने सबसे बड़े मुस्लिम देश के रूप में पाकिस्तान की हैसियत पर गर्व किया था, उन्होंने भी इस्लाम विरोधी या गैर इस्लामी देश के रूप पाकिस्तान का कोई विचार नहीं पाया।

नवाए अफगान के लेखकों ने नूह से लेकर इब्राहीम और आखरी पैगंबर मोहम्मद (सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम) तक नबियों की ज़िंदगी की मिसालें राष्ट्रवाद की अवधारणा को खारिज करने के लिए पेश की हैं। इन नबियों ने अपने देश या मातृभूमि को धर्म की खातिर छोड़ दिया था। यहां तक ​​कि पैगंबर मोहम्मद (सल्लल्हू अलैहि वसल्लम) ने तो अपने देश मक्का के खिलाफ जंग भी की। लेकिन वो इस हक़ीक़त को नज़रअंदाज कर रहे हैं कि आप सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम के ज़माने की दुनिया इस वक्त की दुनिया की तरह नहीं थी और उस वक्त तक राष्ट्रवाद की अवधारणा विकसित नहीं पाई थी। कोई भी व्यक्ति अपनी पारंपरिक जगह को छोड़ सकता था और धरती के किसी भी इलाके में पासपोर्ट या वीज़ा की परेशानी के बिना निवास कर सकता था और उस समय कोई सीमा नहीं थी।

मुस्लिम देश एकमात्र खिलाफत का गठन करने की  कोशिश करने के बजाय एक दूसरे के नागरिकों को किसी भी मुस्लिम देश में स्वतंत्र रूप से यात्रा करने और स्थायी रूप से  रहने की इजाज़त देते हुए एक लीग बनाने की कोशिश कर सकते हैं। सभी मुस्लिम देशों के मुसलमानों को अपने समाज में विभिन्न जाति और रंग के मुसलमानों को स्वीकार करने की मानसिकता भी तैयार करनी होगी और उन्हें सम्मान, गरिमा और समानता के साथ रहने की इजाज़त देनी होगी। लेकिन दुनिया भर के मुसलमानों की अलगाववादी अस्तित्व की मानसिकता को देखकर ये सम्भव नहीं लगता। दुनिया भर में मुसलमान साम्प्रदायिक, सामाजिक, जातीय और भाषाई स्तर पर बुरी तरह बंटे हुए हैं।

इन सभी बातों पर विचार करने पर ये पता चलता है कि तालिबान एक मरिचिका का पीछा कर रहे हैं। इस्लामी खिलाफत की स्थापना करने का उनका सपना कभी साकार न होने वाला केवल एक सपना है। वो कभी सच नहीं हो सकता। इस्लामी खिलाफत की स्थापना की उनकी अवधारणा उनके अलगाववादी दृष्टिकोण के बिल्कुल विपरीत है। उनका सांप्रदायिक, कट्टरपंथी और हिंसक दृष्टिकोण कभी भी एक वैश्विक इस्लामी खिलाफत की स्थापना करने में सक्षम नहीं हो सकता। दुनिया भर के सरल स्वाभाव वाले मुसलमानों का समर्थन हासिल करने के लिए वो इस तरह की काल्पनिक मिठास की गोलियों का इस्तेमाल कर रहे हैं जैसा कि उन्होंने अफगानिस्तान में सत्ता हासिल करने से पहले किया था। वो अपने हाथ में कुरान के साथ आम मुसलमानों पास जाते और कहते कि हम इस पर आधारित एक शासन की स्थापना करना चाहते हैं, इसलिए हमारा समर्थन करो। कुरान पर आधारित शासन के इस दृष्टिकोण ने सबको चकित कर दिया था। उन्होंने सोचा कि कुरान पर आधारित शासन एक आदर्श शासन होगा। और इस तरह के शासन के तहत वो अब किसी भी मुश्किल, उत्पीड़न, अन्याय या भेदभाव का सामना नहीं करेंगे। लेकिन तालिबान के सत्ता में आने के बाद उन्होंने एक ऐसी सरकार स्थापित की जो आमतौर पर क़ुरान के नज़रिए के खिलाफ थी।

इसलिए इस्लामी खिलाफत का तालिबान का नारा भी सरकार की कुर्सी तक पहुंचने के लिए, मुस्लिम जनता का भावनात्मक समर्थन हासिस करने के लिए एक काल्पनिक सपना है। हिंदुस्तान के खिलाफ सांप्रदायिक बयानबाज़ी भी इस अवास्तविक सपने का एक हिस्सा है।

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https://www.newageislam.com/urdu-section/we’ll-hoist-the-islamic-flag-on-red-fort---ہم-لال-قلعہ-پر-اسلامی-پرچم-لہرائیں-گے---طالبان-کا--خواب/d/11913

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