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Hindi Section ( 16 Jul 2012, NewAgeIslam.Com)

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The Oppressor Is Man, Not Islam ज़ालिम इंसान है, इस्लाम नहीं

 

नाज़िया जसीम

27 मई, 2012

(अंग्रेजी से अनुवाद- समीउर रहमान, न्यु एज इस्लाम)

इस्लाम ने मेरे साथ क्रूर बर्ताव किया, लेकिन अब मैं आज़ाद हूँ, आओ जश्न मनाएं' मीडिया आमतौर पर धर्म छोड़ने का चयन करने वाली महिलाओं की इस तरह की कहानियों पर लार टपकाती है और उन्हें लपकती है। इसी ने जमाना हुसैन रहीम के 22 अप्रैल, 2012 के लेख "पर्दा में हम आज़ाद रूह हैं!''  को ओपेन पेज लेख बनाकर हैरत में डाल दिया। जबकि आज़ादी पर तस्लीमा नसरीन के विचार और उसकी परिभाषा दुनिया भर में मीडिया का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करती है, लेकिन ये दुर्लभ है कि मुस्लिम महिलाओं की औरतों की आज़ादी पर परस्पर विरोधी विचारों को व्यक्त करने का अवसर दिया जाता हो  जबकि जमाना का लेख हिजाब (पर्दा) वाली महिलाओं पर लेबल लगाने के खिलाफ बोलता है। ये लेख इस बात को स्पष्ट नहीं करता है कि क्यों कई मुस्लिम महिलाएं हिजाब के बारे में बहुत जज़्बाती महसूस करती हैं।

एक पढ़ी लिखी महिला के रूप में, जो बीस साल से अधिक उम्र वाली हो, जो अपने धार्मिक विश्वास पर आधारित हिजाब का पालन करने का चयन करती हो, मैं महिला अधिकारों और जो लोग मेरी पसंद के पीछे के कारणों का अंदाज़ा नहीं लगा सकते हैं, मैं  उन लोगों की दुश्मनी और बेरहमी का निशाना रही हूँ। जबकि यातना पहुँचाने और मुस्लिम विरोधी बदकलामियों को संकीर्ण मानसिकता और भेदभाव से संबंधित कह सकती हूँ और पढ़े लिखे और तथाकथित उदार लोगों के ख़्याल में हम सभी मज़लूम लड़कियां हैं, जिनकी जीवन शैली, उनके जीवन में शामिल मर्दों के इशारे पर होती है। ये न सिर्फ निराशाजनक है बल्कि अपमानित करने वाला भी है।

हिजाब, एक धार्मिक कर्तव्य से ज़्यादा कुछ नहीं है। लोगों को ये एहसास करने की जरूरत है कि अपने अधिकार में ये आज़ादी का प्रतीक है। ये महिलाओं को आज़ादी देता है अजनबी मर्दों को सिर्फ वही हिस्सा प्रदर्शित करें जिसे वो दिखाना चाहती हैं। जी हाँ, साधारण सलवार कमीज़ और कुरती 'शालीन'  कपड़े की श्रेणी में आते हैं। लेकिन अगर मर्द महिलाओं को भौतिक वस्तु के रूप में पेश करना चाहते हैं तो हिजाब उनके लिए ऐसा करना मुश्किल कर देता है। यहां तक ​​कि मैं तो इसे महिला अधिकारों का संरक्षक कहूँगी। सशक्तिकरण करने के एक मुस्लिम औरत की परिभाषा का निर्णय सिर्फ उसके व्यक्तित्व से किया जाता है और उसकी सुंदरता की तारीफ उन पर छोड़ दी जाती है जिनके लिए इसका कोई मतलब है। वे जो बुर्के को "मध्यकाल का लिबास" कहते हैं मैं उनसे पूछना चाहती हूं किः  ऐसा क्यों है कि जब यही कपड़ा एक नन पहनती है तो सम्मान के काबिल माना जाता है जबकि बुर्के वाली एक महिला पर 'पिछड़े' होने का लेबल लगाया जाता है?

जमाना के लेख को मिली जुली प्रतिक्रिया प्राप्त हुई है। कई लोग इस बात से सहमत हैं कि ये सब निजी पसंद के तहत आता है, दूसरे लोग उचित बात कहते हैं कि कई मुसलमान लड़कियों को बुर्का पहनने के लिए मजबूर किया जाता है। एक पढ़े लिखे और खुले दिमाग वाले परिवार में पैदा होने के नाते जहां मुझे एक औरत के रूप में अपने अधिकारों से अवगत रखा गया, मुझे विशेष रूप से मुस्लिम लड़कियों की कहानी सुनकर तकलीफ होती है जिन्हें बुर्का पहनने के लिए मजबूर किया जाता है, उन्हें उनके अधिकारों से वंचित किया जाता है और गुमराह मर्दों के ज़रिए तय किए गए मानकों के अनुसार काम करना होता है। लेकिन क्या कोई एक धर्म बता सकता है जिसमें पुरुष प्रधान सोच के सबसे बुरे रूप को बढावा न दिया जाता हो?

नक़ाब (चेहरा छिपाना) पर सवाल उठते हैं कि ये न सिर्फ सिक्योरिटी के लिए खतरा है बल्कि ये एक औरत की पहचान को खत्म 'करने का कारण है। एक औरत जो हिजाब पहनती है वो हवाई अड्डों पर, बैंकों और अदालत में जब भी सुरक्षा दृष्टिकोण से आवश्यक होता है वो अपनी पहचान जाहिर करने की पाबंद है और वो इससे पूरी तरह वाकिफ है।

जहां तक ​​किसी महिला के अपनी पहचान खोने के खतरे का संबंध है तो ये समझना चाहिए कि चेहरे का पर्दा तब होता है जब वो अपने घर से बाहर कदम रख रही होती है। ये दूसरी महिलाओं के सामने और करीबी मर्द रिश्तेदारों के सामने नहीं किया जाता है। अगर अजनबी मर्दों को महिला का चेहरा देखने का अवसर नहीं होता है तो मैं, ये समझने में असमर्थ हूँ कि कैसे ये पहचान को नुकसान पहुंचाता है।

मुस्लिम महिलाओं के खिलाफ अपराधों को इस्लाम से जोड़ा नहीं जा सकता है। एक धर्म के रूप में इस्लाम सबसे पहला धर्म रहा है, जिसने महिलाओं को संपत्ति रखने का अधिकार, तलाक और दोबारा शादी (अन्य धर्मों की महिलाओं को ये अधिकार संघर्ष करने के बाद मिला) का अधिकार प्रदान किया था। लड़कियों को बोझ न समझा जाए इसे रोकने के लिए मुस्लिम महिलाएं उनमें से एक हैं जो अपने पति से महेर मांग सकती हैं। इस्लाम महिलाओं पर अत्याचार नहीं करता हैَ मर्द औरतों पर अत्याचार करते हैंَ सभी धर्मों और वर्गों में महिलाओं के शोषण के पीछे कारण एक ही है: महिलाओं को उनके अधिकारों के बारे में अंधेरे में रखा जाता है और धार्मिक पाठ की पुरुष प्रधान दृष्टिकोण से व्याख्या।

स्रोत: दि हिंदू, नई दिल्ली

URL for English article:

http://newageislam.com/islam,-women-and-feminism/the-oppressor-is-man,-not-islam/d/7460

URL for Urdu article: http://www.newageislam.com/urdu-section/man-is-tyrant,-not-islam--ظالم-انسان-ہے،-اسلام-نہیں/d/7940

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