
नव ठाकुरीया,न्यू ऐज इस्लाम
4 जुलाई 2026
बिना किसी उकसावे या किसी महत्वपूर्ण सार्वजनिक बहस के, भारत के विदेश मंत्रालय ने दक्षिण एशिया के इस देश में नागरिकता के दावे के लिए पासपोर्ट को एक अपर्याप्त दस्तावेज़ बताकर नई बहस छेड़ दी। 24 जून 2026 को मनाए गए 14वें पासपोर्ट सेवा दिवस के अवसर पर विदेश मंत्रालय (MEA) ने कहा कि भारतीय पासपोर्ट को मुख्य रूप से केवल यात्रा दस्तावेज़ के रूप में देखा जाना चाहिए। नागरिकता के लिए केवल भारतीय पासपोर्ट को ही अंतिम दस्तावेज़ नहीं माना जा सकता, क्योंकि मौजूदा कानूनों के तहत केंद्र सरकार विशेष परिस्थितियों में गैर-नागरिकों को भी भारतीय पासपोर्ट जारी कर सकती है।
यह मुद्दा सामने आते ही मुख्यधारा और सोशल मीडिया में व्यापक चर्चा शुरू हो गई। लाखों लोग यह सवाल पूछने लगे कि यदि पासपोर्ट—जो आवश्यक सत्यापन प्रक्रियाओं के बाद जारी किया जाता है—भी नागरिकता का अंतिम प्रमाण नहीं है, तो आखिर किसी भारतीय की नागरिकता किस आधार पर तय होगी? क्या आने वाले समय में देशव्यापी नागरिकता सत्यापन की दिशा में कोई नई पहल होने वाली है?

कानूनी तौर पर भारतीय नागरिकता नागरिकता अधिनियम, 1955 के तहत नियंत्रित होती है, जबकि पासपोर्ट पासपोर्ट अधिनियम, 1967 के अनुसार जारी किए जाते हैं। भारत में नागरिकता को संविधान और नागरिकता कानूनों के माध्यम से परिभाषित किया गया है। इसे जन्म, वंश, देशीयकरण, पंजीकरण अथवा किसी क्षेत्र के भारत में विलय जैसे विभिन्न आधारों पर प्राप्त किया जा सकता है। अधिकांश भारतीय जन्म से ही नागरिक होते हैं और इसलिए उन्हें अलग से नागरिकता प्रमाण-पत्र की आवश्यकता नहीं पड़ती। इसके अतिरिक्त, भारत अपने सभी नागरिकों के लिए कोई सार्वभौमिक नागरिकता प्रमाण-पत्र भी जारी नहीं करता।
रिकॉर्ड के अनुसार भारत की 1.4 अरब से अधिक आबादी में 10 प्रतिशत से भी कम लोगों के पास पासपोर्ट है। इसके बावजूद नागरिकता के दावे के लिए इसे अब भी सबसे भरोसेमंद दस्तावेज़ माना जाता है। हालांकि, पासपोर्ट अधिनियम अधिकारियों को विशेष परिस्थितियों में गैर-नागरिकों को भी पासपोर्ट जारी करने की अनुमति देता है। इसलिए हर भारतीय पासपोर्ट धारक का भारतीय नागरिक होना आवश्यक नहीं है।
सरकार पहले ही स्पष्ट कर चुकी है कि आधार, पैन, ड्राइविंग लाइसेंस और मतदाता पहचान-पत्र में से किसी को भी भारतीय नागरिकता का अंतिम प्रमाण नहीं माना जा सकता। ऐसे में संकेत यही मिलता है कि नई दिल्ली भविष्य में नागरिकता के दावे के लिए किसी विशेष दस्तावेज़ की व्यवस्था पर विचार कर सकती है, जिसे नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटिज़न्स (NRC) से मान्यता प्राप्त हो। लेकिन पूरे देश में NRC को अभी अद्यतन किया जाना बाकी है।
असम में वर्ष 2015 से 2019 के बीच NRC अद्यतन की प्रक्रिया अनेक विवादों में घिरी रही। इसमें वित्तीय अनियमितताओं से लेकर बड़ी संख्या में कथित अवैध प्रवासियों को पूर्वोत्तर राज्य के मूल निवासी के रूप में सूचीबद्ध किए जाने तक के आरोप शामिल रहे। भले ही पूरी प्रक्रिया की निगरानी सर्वोच्च न्यायालय ने की थी, फिर भी अनेक गंभीर सवाल उठे। सबसे हैरानी की बात यह है कि NRC के अंतिम मसौदे को आज तक रजिस्ट्रार जनरल ऑफ इंडिया (RGI) ने प्रमाणित नहीं किया है।
यदि पूरे देश में NRC अद्यतन की प्रक्रिया शुरू की जाती है, तो सरकार के लिए असम के अनुभवों से सीख लेना अपरिहार्य होगा। राष्ट्रीय स्तर पर आगे बढ़ने से पहले यह सुनिश्चित करना होगा कि जिन त्रुटियों, विवादों और कथित अनियमितताओं ने असम की प्रक्रिया को प्रभावित किया, वे दोबारा न दोहराई जाएँ।
विवाद तब शुरू हुआ जब 30 जुलाई 2018 को असम NRC का मसौदा (ड्राफ्ट) प्रकाशित हुआ और 31 अगस्त 2019 की आधी रात को इसकी सप्लीमेंट्री सूची जारी की गई, जिसमें 19 लाख से अधिक लोगों के नाम सूची से बाहर रह गए। इस प्रक्रिया में 3.3 करोड़ से अधिक लोगों ने हिस्सा लिया था। सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश पर असम के लिए 1951 के NRC को 25 मार्च 1971 की कट-ऑफ तिथि के आधार पर अद्यतन किया गया था, जिसका उद्देश्य अवैध नागरिकों की पहचान करना था।
इस पूरी प्रक्रिया में 50,000 से अधिक सरकारी कर्मचारी और लगभग 6,000 पार्ट-टाइम कर्मी लगाए गए, जिस पर केंद्र सरकार ने लगभग 1,600 करोड़ रुपये खर्च किए। असम-मेघालय कैडर के 1995 बैच के IAS अधिकारी प्रतीक हजेला को राज्य NRC का समन्वयक नियुक्त किया गया था। NRC की सप्लीमेंट्री सूची जारी होने के कुछ ही समय बाद, असम में अपनी सुरक्षा को लेकर पैदा हुई आशंकाओं के बीच उनका तबादला उनके गृह राज्य मध्य प्रदेश कर दिया गया। बाद में राज्य सरकार ने उन्हें स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति (VRS) लेने की अनुमति भी दे दी।
पहला बड़ा खुलासा हजेला के बाद राज्य NRC समन्वयक बने हितेश देवशर्मा ने किया। उन्होंने आरोप लगाया कि बड़ी संख्या में अवैध प्रवासियों, विशेषकर बांग्लादेशी मुस्लिम बसने वालों, को सूची में शामिल करने के उद्देश्य से सॉफ्टवेयर में छेड़छाड़ कर पूरी प्रक्रिया को प्रभावित किया गया। देवशर्मा, जो स्वयं सेवानिवृत्त IAS अधिकारी हैं, के अनुसार हजेला ने एक महत्वपूर्ण सत्यापन प्रक्रिया—फैमिली ट्री मैचिंग—से भी समझौता किया। इसी आधार पर उन्होंने हजेला और उनके सहयोगियों के विरुद्ध नेशनल इन्वेस्टिगेशन एजेंसी (NIA) तथा डायरेक्टरेट ऑफ एनफोर्समेंट (ED) से जांच कराने की मांग की।
देवशर्मा की कई शिकायतों पर असम पुलिस ने अब तक कोई मामला दर्ज नहीं किया है। हालांकि, वित्तीय अनियमितताओं को लेकर उनके आरोपों को उस समय बल मिला, जब भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) ने भी NRC अद्यतन प्रक्रिया के दौरान 260 करोड़ रुपये की वित्तीय गड़बड़ियों की ओर संकेत किया। 31 मार्च 2020 को समाप्त वर्ष की अपनी रिपोर्ट में CAG ने तत्कालीन राज्य NRC समन्वयक प्रतीक हजेला और सिस्टम इंटीग्रेटर के रूप में कार्यरत विप्रो लिमिटेड के विरुद्ध दंडात्मक कार्रवाई की भी सिफारिश की थी।
असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा भी सार्वजनिक रूप से स्वीकार कर चुके हैं कि NRC त्रुटिपूर्ण था। उनका कहना है कि दोषपूर्ण NRC राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा बन सकता है और इससे राज्य के मूल निवासियों के हित भी प्रभावित हो सकते हैं।
हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय ने NRC के व्यापक पुनर्सत्यापन की मांग वाली एक रिट याचिका स्वीकार की है। इस याचिका में हितेश देवशर्मा ने, अपनी व्यक्तिगत क्षमता और असम के बड़ी संख्या में मूल निवासियों के प्रतिनिधि के रूप में, समयबद्ध सत्यापन के माध्यम से त्रुटिरहित NRC तैयार करने की मांग की है। सर्वोच्च न्यायालय पहले ही केंद्र सरकार, असम सरकार, राज्य NRC समन्वयक और रजिस्ट्रार जनरल ऑफ इंडिया (RGI) को नोटिस जारी कर जवाब मांग चुका है।
यह घटनाक्रम उन आरोपों की गंभीरता को भी रेखांकित करता है, जो ऐसे व्यक्तियों के विरुद्ध लगाए गए हैं, जिन्होंने उस प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी, जिसका संचालन और बाद में निरीक्षण स्वयं सर्वोच्च न्यायालय की निगरानी में हुआ था। यदि भविष्य में पूरे देश में NRC लागू करने की दिशा में कदम बढ़ाया जाता है, तो असम में सामने आए इन अनुभवों और विवादों की निष्पक्ष समीक्षा किए बिना आगे बढ़ना उचित नहीं होगा।
इस लंबी प्रक्रिया के दौरान एक और गंभीर पक्ष सामने आया। डेटा एंट्री ऑपरेटर (DEO) के रूप में नियुक्त अस्थायी कर्मचारियों को आज तक कानूनी मानकों के अनुरूप पारिश्रमिक नहीं मिल सका। इन DEO को प्रति व्यक्ति 5,500 से 9,100 रुपये प्रतिमाह देने की पेशकश की गई थी, जो देश में निर्धारित न्यूनतम कानूनी मजदूरी से भी कम थी। इसके विपरीत, सिस्टम इंटीग्रेटर के रूप में कार्यरत विप्रो को प्रति DEO 14,500 रुपये प्रतिमाह का भुगतान किया गया।
सिस्टम इंटीग्रेटर के वैध कमीशन को घटाने के बाद भी हेराफेरी की गई कुल राशि एक अरब रुपये से अधिक होने का अनुमान है, जो विप्रो अथवा उसके सब-कॉन्ट्रैक्टर 'इंटीग्रेटेड सिस्टम एंड सर्विसेज' की जेब में जानी चाहिए थी। कुछ अपवादों को छोड़ दें, तो असम का अधिकांश मीडिया इस पूरी प्रक्रिया में सामने आई वित्तीय अनियमितताओं की रिपोर्टिंग से बचता रहा।
इतना ही नहीं, अधिकांश स्थानीय मीडियाकर्मी यह गलत जानकारी भी फैलाते रहे—इसके कारण वे स्वयं बेहतर जानते हैं—कि NRC की सप्लीमेंट्री सूची ही अंतिम सूची है और उसके बाद किसी प्रकार के सत्यापन की कोई गुंजाइश नहीं बची है। गुवाहाटी के कम-से-कम एक टेलीविजन होस्ट ने तो बिना किसी पुनर्सत्यापन के उसी सूची को अंतिम रूप में स्वीकार करने की खुलकर वकालत की।
बाद में सोशल मीडिया पर NRC अद्यतन प्रक्रिया के कथित लाभार्थियों में उनका नाम भी सामने आया और उनकी आलोचना हुई। हालांकि, अपने आक्रामक तेवरों के लिए पहचाने जाने के बावजूद उन्होंने उन आरोपों पर कभी कोई सार्वजनिक प्रतिक्रिया नहीं दी और आज तक मौन हैं। उन्होंने प्रतीक हजेला के कार्यों की प्रशंसा करते हुए एक पुस्तक भी लिखी, जिसमें उनके काम को बेमिसाल बताया गया। संभवतः इसका उद्देश्य टेक्नोक्रेट से ब्यूरोक्रेट बने हजेला को राष्ट्रीय स्तर पर एक अलग पहचान दिलाना भी रहा हो।
यदि इन सभी घटनाक्रमों को समग्र रूप से देखा जाए, तो यह स्पष्ट होता है कि असम में NRC अद्यतन केवल एक प्रशासनिक अभ्यास नहीं था, बल्कि ऐसी प्रक्रिया थी, जिसने अनेक गंभीर प्रश्न अनुत्तरित छोड़ दिए। वित्तीय अनियमितताओं के आरोप, सत्यापन प्रक्रिया पर उठे सवाल, CAGकी टिप्पणियाँ, राज्य सरकार की आपत्तियाँ और अब सर्वोच्च न्यायालय में लंबित पुनर्सत्यापन की मांग—ये सभी संकेत देते हैं कि इस पूरी कवायद की निष्पक्ष और व्यापक समीक्षा अभी बाकी है।
यदि नई दिल्ली वास्तव में पूरे देश में NRC लागू करने की दिशा में आगे बढ़ने पर विचार कर रही है, तो उसे सबसे पहले असम के अनुभवों से सीख लेनी होगी। किसी भी राष्ट्रीय नागरिकता सत्यापन प्रक्रिया की विश्वसनीयता केवल उसके उद्देश्य से नहीं, बल्कि उसकी पारदर्शिता, निष्पक्षता, जवाबदेही और त्रुटिरहित क्रियान्वयन से तय होगी।
असम का अनुभव यह भी बताता है कि न्यायिक निगरानी में संचालित किसी प्रक्रिया में भी विवाद और गंभीर आरोप उभर सकते हैं। इसलिए आवश्यक है कि भविष्य में अपनाई जाने वाली किसी भी व्यवस्था में ऐसी सभी कमियों को दूर किया जाए, ताकि किसी भी भारतीय नागरिक के अधिकारों से समझौता न हो और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े उद्देश्यों पर भी कोई प्रश्नचिह्न न लगे।
एक निष्पक्ष और समयबद्ध जांच ही यह स्पष्ट कर सकती है कि असम में NRC अद्यतन के दौरान वास्तव में क्या हुआ, कथित अनियमितताओं के लिए कौन जिम्मेदार था और भविष्य में ऐसी परिस्थितियों की पुनरावृत्ति कैसे रोकी जा सकती है। यदि इन प्रश्नों के संतोषजनक उत्तर नहीं मिलते, तो पूरे देश में NRC लागू करने की किसी भी संभावित पहल पर वही सवाल दोबारा खड़े होंगे, जिनका सामना असम पिछले कई वर्षों से करता आ रहा है।
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लेखक पूर्वोत्तर भारत के वरिष्ठ पत्रकार
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