नास्तिक दुर्रानी, न्यु एज इस्लाम
22 नवम्बर, 2013
नमाज़ का स्वरूप
हर धर्म ने प्रार्थना का एक विशेष स्वरूप तय किया है, जो इसके विशिष्ट अर्थ, खुदाओं के सम्मान की व्याख्या के अनुसार है। किसी धर्म ने प्रार्थना को मनन और चिंतन बनाया तो किसी ने विशिष्ट गतिविधियाँ दे दी हैं, जिसमें कुछ विशेष कलाम पढ़ा जाता है।
लेकिन प्रार्थना में खुदा या खुदाओं के सामने खड़े होना, ज़्यादातर धर्मों में प्रार्थना का स्तंभ रहा है जिसके बाद रूकू (झुकना) और फिर सज्दे की बारी आती है। सज्दा आमतौर पर मूर्ति के आगे खड़े होने के बाद किया जाता है जो सज्दा करने वाले के सम्मान का प्रतीक है। यहूदी धर्म में सही सज्दा वही है जो निर्माता और खुदा को किया जाता है, 1, जबकि इंसान को किया जाने वाला सज्दा मूर्ति पूजा से सम्बंधित है। 2,
अरबी को रुकू और सज्दे से नफरत है क्योंकि इसमें अपमान, बुराई और बेहूदगी नज़र आती है, सज्दे से तो वो विशेष रूप से घृणा करते हैं क्योंकि इसमें रुकू से अधिक बेहूदगी होती है, और इसमें पिछवाड़ा उठाना पड़ता है और पिछवाड़े को ऊपर उठाना बेहूदगी है। यही वजह थी कि अरबी के लिए नमाज़ को स्वीकार करना एक मुश्किल काम था क्योंकि इसमें रुकू और सज्दा शामिल है। जब नौ हिजरी को सक़ीफ़ का प्रतिनिधिमंडल नबी सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम के पास आया तो उन्होंने दो चीजों में छूट का अनुरोध किया: पहला, अपने हाथ से अपने बुत तोड़ना और दूसरा, नमाज़ पढ़ना, तो पैगंबर सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने फरमाया: "तुम्हारे बुतों को तुम्हारे अपने हाथों से तोड़ने से हम तुम्हें छूट देते हैं, रही नमाज़ तो जिस धर्म में प्रार्थना न हो उसमें खैर नहीं, तो उन्होंने कहा: ऐ मोहम्मद (सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम) तुम्हारे लिए ये कर लेंगे हालांकि इसमें बेहूदगी है। 3,
कुरान में हमें हर नमाज़ के रुकू व सज्दे की संख्या के बारे में कोई लेख नहीं मिलता बल्कि सिर्फ "रुकू" और "सज्दों" के बारे में रचनाएं मिलती हैं। कुरान में रुकू का सबसे पुराना उल्लेख सूरे स्वाद में मिलता हैः (अनुवाद: दाऊद (अलैहिस्सलाम) ने खयाल किया कि हमने उनका इम्तेहान लिया है तो उन्होंने अपने परवरदिगार से माफी मांगी और उसके सामने झुक गए और पश्चाताप करने लगे।) 4, सूरे स्वाद मक्की सूरतों में है, ये मक्की सूरतों में से एकमात्र सूरे है जिसमें ये शब्द आया है, दूसरे स्थानों पर जहां ये शब्द आया है वो मदनी सूरतें हैं जो मदीना में नाज़िल हुईं।
"सुजूद" (सज्दे का बहुवचन) और "सज्दा" करने वालों का उल्लेख कुरान में मक्की और मदनी दोनों सूरतों में आया है, मक्की सूरतों में इसका उल्लेख सूरे स्वाद भी पुराना है। इसके अलावा कुरान में सज्दे का उल्लेख रुकू के ज़िक्र से कहीं ज़्यादा है।
रोज़ाना की पांचों नमाज़ों में अल्लाह की तरफ ध्यान लगाने के सभी तत्व इकट्ठे किए गए हैं, जैसे वकूफ़, जुलूस, रुकू और सुजूद, सिवाय अपवाद वाली स्थितियों को छोड़कर अगर नमाज़ी मरीज़ हो तो वो क्षमता के मुताबिक़ अपने तरीके से नमाज़ अदा करेगा।
जमात के साथ नमाज़
धर्मों ने इंसान को दूसरों के साथ इबादतगाह में प्रार्थना करने के लिए बाध्य नहीं किया, यानि जमात के साथ नमाज़, लेकिन धर्मों ने सामूहिक प्रार्थना को बरकत वाला काम बताया है। और इबादतगाहों में आकर प्रार्थना करने के लिए अपने मानने वालों को प्रोत्साहित किया है, क्योंकि सामूहिक प्रार्थना एकजुटता और एकता का प्रतीक है।
जमात के साथ नमाज़ वो नमाज़ है जिसको लोगों का एक समूह एक साथ अदा करे, कुछ धर्मों ने उस संख्या पर हद लगाई है जिसे जमात कहा जा सके। इस्लाम के कुछ फ़ुक़्हा (धर्मशास्त्रियों) ने दो लोगों की उपस्थिति को जमात की हद करार दिया है, जबकि कुछ दूसरे फ़ुक़्हा ने तीन की हद रखी है जिनकी उपस्थिति से सामूहिक नमाज़ सही करार पाएगी। 5,
अगर हम जमात की परिभाषा में फ़ुक़्हा की राय पर निर्भर करें तो इस्लाम में जमात के साथ नमाज़ बहुत पुरानी है। ये उसी दिन शुरू हो जाती है जिस दिन नमाज़ फर्ज़ हुई थी। रसूलुल्लाह सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने हज़रत उम्मुल मोमिनीन ख़दीजा रज़ियल्लाहू अन्हा के साथ नमाज़ अदा की। इस तरह उनकी नमाज़ जमात के साथ नमाज़ है, फिर हज़रत ख़दीजा और हज़रत अली रज़ियल्लाहू अन्हू के साथ नमाज़ अदा की, फिर कुछ दूसरे लोगों की नमाज़ की इमामत फ़रमाई, जैसे जैसे इस्लाम में दाखिल होने वाले लोगों की संख्या बढ़ती गयी, आप सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम की उन लोगों की नमाज़ की इमामत जमात के साथ नमाज़ है, हालांकि ये जमात छोटी है। इस तादाद से बड़ी नमाज़ मदीना में अदा की गई, क्योंकि मदीना वाले इस्लाम में दाखिल हो गए थे। मदीना के लोगों ने रसूलुल्लाह सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम के मदीना आने से जमात के साथ नमाज़ अदा की थी। क्योंकि यसरब वालों में से आप सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम से बैअत करने वाले सबसे पहले लोगों को आपके निर्देशों में से नमाज़ का उसूल भी शामिल था, जबकि आप अभी मक्का में थे। उनके पूर्ववर्ती नमाज़ियों की जमात के साथ नमाज़ की इमामत करते थे। फिर जब आप वहां तशरीफ़ ले गए तब आप खुद इमामत फरमाते थे।
इस्लाम में नमाज़ की इमामत को विरासती दर्जा नहीं है। ये नमाज़ियों के विवेक पर है, वो जिसे चाहें अपनी इमामत के लिए चयन कर लें। नमाज के खत्म होने पर उसकी इमामत भी खत्म हो जाती है।
नमाज़ियों का इमाम कोई भौतिक पारितोषिक वसूल नहीं करता, क्योंकि उसकी इमामत स्वयंसेवा और अस्थायी होती है, इसलिए भी कि हर अक़्लमंद और अपने धर्म के मामलों की जानकारी रखने वाला व्यक्ति नमाज़ में दूसरों की इमामत कर सकता है।
ज़रूरत के तहत मुसलमानों को उनके धार्मिक मामलों की शिक्षा के लिए फ़ुक़्हा को चयनित किया गया। रसूलुल्लाह सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने कुछ लोगों का चुनाव किया ताकि वो इस्लाम में दखिल होने वाले लोगों को उनके नए धर्म के मामलों को सिखा सकें और उन्हें उनकी नमाज़ की इमामत की ज़िम्मेदारी सौंपी, ख़लीफ़ा ने भी नमाज़ में लोगों की इमामत और धार्मिक आदेशों की शिक्षा के लिए कुछ लोग तय किए। इन फ़ुक़्हा को मुसलमानों के माल से कुछ रक़म दी गई ताकि उनका गुज़र बसर हो सके और वो इस काम के लिए खुद को पूरी तरह से समर्पित कर सकें। यहां से नमाज़ में लोगों की इमामत इस्लामी समाज में एक आम मुलाज़िमत का रूप धारण कर गया।
पंथों के अंतर के बावजूद फिक़्ह की किताबों में नमाज़ की इमामत और उसकी शर्तों पर शोध भी मिलता है।
नमाज़ के इमाम का किरदार यहूदीवाद में "सेलेह हसबीर" (Shelih has - sibbur) नाम के किरदार से मिलता है क्योंकि नमाज़ियों की इमामत की ज़िम्मेदारी उसी के सिर होती है। 6,
संदर्भ:
1- अलतकवीन (किताबे पैदाइश), अध्याय 24, आयत 26 और 48, क़ामूस अलकिताब अलमुक़द्दस 549/1
2- दानियाल, अध्याय 3, आयत 4, क़ामूस अलकिताब अलमुक़द्दस 549/1
3- अलतिबरी 99/3 दारुल मारिफ
4- सूरे स्वाद, आयत 24
5- इब्ने इस्हाक़ अलशिराज़ी अलतंबिया 31, इब्ने माजा, अक़ामा, पांचवां अध्याय, सही मुस्लिम, किताबुल मसाजिद, हदीस 269
6- Becker, Der Islam III, 386, Mittwoch, S., 22, Shorter Ency., P. 496
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