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Hindi Section ( 25 Aug 2013, NewAgeIslam.Com)

The Rulers of Ummah उम्मत के हुक्मरान

 

नास्तिक दुर्रानी, ​​न्यु एज इस्लाम

26 अगस्त, 2013

तातारियों के लीडर हलाकू खान ने 1258 में मुसलमानों के खलीफा अलमुस्तासिम बिल्लाह को को एक खत लिखा जिसमें उसने अपने राजनयिकों के बगदाद में "अपमानित" किये जाने पर गुस्से का इज़हार किया। जो उस वक्त राजनयिक सिद्धांतों के न केवल विपरीत था बल्कि इससे मंगोलों और विशेष रूप से उनके लीडर हलाकू की शान व आतंक में कमी आई थी।

अलमुस्तासिम बिल्लाह ने हलाकू को अरबी शैली का एक धमकी भरा जवाब लिखा जिसमें कहा गया कि "अन जयूश अलखलीफता सौफा तलअन संसफीला होलाकू" यानी खलीफा की फौज हलाकू की ऐसी तैसी कर देगी और हम ये और वो कर देंगे आदि। जैसा कि हमारे शासक युद्ध से पहले और बाद में अपने जोश भरे भाषण में धमकियाँ देते हैं। हालांकि उनमें ताक़त के दम पर अपनी धमकी पर अमल करने की ज़रा सी क्षमता नहीं होती बिल्कुल जिस तरह हमारे हर दिलज़ीज़ नेता जमाल अब्दुल नासिर ने जून 1967 के युद्ध से एक सप्ताह पहले अपने एक फौजी हवाई अड्डे में जोश भरा भाषण देते हुए इजरायल को धमकी दी थी कि "एज़ा अरद्तुम अल-हरबाफअहलन वसहलन" यानी अगर तुम जंग करना चाहते हो तो हम तुम्हारा स्वागत करते हैं। इसराइल ने उनके प्रस्ताव को स्वीकार किया और सिर्फ कुछ ही घंटों में अब्दुल नासिर के न सिर्फ सभी हवाई अड्डे तबाह कर दिए बल्कि सीनाई और जोलान पर कब्ज़ा कर लिया, मगर अब्दुल नासिर की फौज उन पर एक गोली तक नहीं चला सकी?

हलाकू को अलमुस्तासिम बिल्लाह के बदतमीज़ी भरे जवाब पर बहुत गुस्सा आया, इसलिए उसने लगभग दस लाख सैनिकों के फौजी दस्ते के साथ बगदाद की तरफ़ निकल पड़ा।

अलमुस्तासिम बिल्लाह की खुफिया को इस बात की भनक लग गई और उन्होंने बगदाद में शीर्ष नेतृत्व को इस बात से समय रहते सूचित कर दिया। खलीफा के प्यारे मंत्री अलअलकमी ने एक राष्ट्रीय कांफ्रेंस बुलाई जिसमें जनरल सुलेमान शाह भी था। सुलेमान शाह ने खलीफा को सुझाव दिया कि वो बगदाद की रक्षा के लिए विशेष सैन्य बल तैयार करें। खलीफा ने सुझाव मान लिया और सुलेमान शाह ने लाखों मुसलमानों को फौज में भर्ती करने का काम शुरू कर दिया। लेकिन फिर अचानक खलीफा ये कह कर अपनी बात से फिर गया कि खिलाफत का ख़ज़ाना खाली है और वो इतनी बड़ी सेना का खर्च और वेतन बर्दाश्त नहीं कर सकते। इसलिए सारे सैनिक अपने घरों को चले गए और बगदाद की सुरक्षा के लिए सद्दामी शैली का "अलहरस अलजम्हूरी" रह गया जिसका असल काम सिर्फ खलीफा के महलों की रक्षा करना था।

हलाकू की सारी सेना एक साथ बगदाद पहुंची और शहर की सीमा पर डेरा डाल कर शहर की दीवारों पर मिंजनीक़ों (एक तरह की तोपें) से इतने वार किए कि एक बुर्ज हमले को बर्दाश्त न कर सका और ढह गया और हलाकू के कमांडो ने शहर की पूर्वी दीवारों पर क़ब्ज़ा कर लिया और इस तरह बगदाद उनके रहमो करम पर आ गया।

खलीफा अलमुस्तासिम बिल्लाह ने जब ये स्थिति देखी तो उसकी अकड़ और अक़ल दोनों ठिकाने पर आ गई। उसने अपने बेटे और उत्तराधिकारी को हलाकू से बातचीत करने भेजा। हलाकू ने उनसे मांग की कि वो हथियार डाल दें और खलीफा की सारी सेना निःशस्त्र होकर बगदाद से निकल कर उनके पास आ जाए तो उन्हें कुछ नहीं कहा जाएगा। जब ऐसा हुआ तो हलाकू अपनी बात से फिर गया और हज़ारों अफसरों और सैनिकों को बगदाद के लोगों और उत्तराधिकारी मोअज़्ज़म की आंखों के सामने क़त्ल कर दिया।

इसके बाद हलाकू खान बड़े मज़े से चॉकलेट खाते हुए बगदाद में दाखिल हुआ। खलीफा को गिरफ्तार करवा कर अपने पास बुलाया। पहले ही थप्पड़ पर खलीफा ने महल के दालान में शुद्ध सोने से भरे एक हौज़ की मौजूदगी को स्वीकार कर लिया। हमज़ानी अपने इतिहास में लिखते हैं: "संक्षेप में जो कुछ बनी अब्बास के खलीफों ने पांच सदियों में जमा किया था मंगोलों ने उसे एक दूसरे के ऊपर रखा तो वो ऐसा लग रहा था जैसे पहाड़ के ऊपर पहाड़"

दौलत के इस ढेर के बाद एक और ढेर भी खोजा गया। हलाकू ने खलीफा की पत्नियों की गिनती का हुक्म दिया तो पता चला कि ज़िल्ले इलाही की सिर्फ 750 पत्नियां हैं जबकि सेविकाओं की संख्या एक हज़ार से अधिक है ..!

हलाकू ने ये सारी औरतें अपने अफसरों और सैनिकों में बाँट दीं और खलीफा अलमुस्तासिम बिल्लाह का सिर काट कर अपने सैनिकों के हवाले कर दिया। जिन्होंने दजला नदी के किनारे उससे फुटबॉल खेला। इसके बाद हलाकू ने बगदाद में तीन दिन तक खून की होली खेली और कोई अस्सी लाख इंसानों को बगदाद की सड़कों पर क़त्ल किया। तीन दिन के बाद हलाकू खान और उसकी सेना को बगदाद से मजबूरन निकलना ही पड़ा... डर के मारे नहीं.... सड़ी हुई लाशों से उठती हुई बदबू की वजह से.......!

सच तो ये है कि हमारा शासक बेचारा विकलांग है। जिस व्यक्ति की 750 पत्नियों हों उसे पत्नियों की इस फौज के साथ सोने और हमबिस्तर होने से फुर्सत ही कहां मिलेगी कि वो किसी और चीज़ के बारे में सोचे। और फिर ये कहाँ की समझदारी है कि पांच सदियों तक जमा की गयी बाप दादा की दौलत बगदाद को बचाने के लिए सैनिकों में बाँट दी जाए? इसलिए हलाकू बगदाद में इस तरह दाखिल हुआ जिस तरह इसराइल फिलिस्तीन में दाखिल हुआ था। एक भी पटाखा चलाए बिना। यहाँ मुझे एक बेचारे पत्रकार का किस्सा याद आ रहा है। जिसने जार्डन के शाह हुसैन से ये पूछने का साहस किया था किः आप अपनी खरबों की दौलत में से एक फीसद रोटी की कीमतों में कमी लाने के लिए सब्सिडी क्यों नहीं देते? ज़िल्ले इलाही ने जवाब दियाः ये सार्वजनिक नहीं शाही परिवार की दौलत है! ज़िल्ले इलाही ने ये नहीं फरमाया कि ये दौलत कहां से आई और कैसे जमा हुई। जबकि उनका दादा अब्दुल्ला मक्का से भागकर गधे पर ओमान में दाखिल हुआ था! बहरहाल इसके बाद वो पत्रकार फिर कभी नज़र नहीं आया। इसके कुछ ही समय बाद खाड़ी देशों से वित्तीय सहायता के सम्बंध में शाह हुसैन खाड़ी देशों के दौरे पर थे जबकि रानी नूर पेरिस में शॉपिंग फरमा रही थीं। कुवैत के एक अखबार ने शीर्षक लगाया "शाह भीख मांगता घूम रहा है और रानी खरीदारी कर रही है"।

अल्लाह हमारे शासकों और उनकी पत्नियों पर रहम फरमाए और हलाकू पर अपना अज़ाब नाज़िल करे क्योंकि उसने ऐसे घर तबाह किए जिन्हें अलमुस्तासिम बिल्लाह इस्लाम और मुसलमानों के नाम पर जीतता!

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