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Hindi Section ( 30 Jul 2013, NewAgeIslam.Com)

Science from Religious Perspective साइंस मज़हब की नज़र से

 

नास्तिक दुर्रानी, न्यु एज इस्लाम

31 जुलाई, 2013

वैज्ञानिकों की भरपूर कोशिश होती है कि वो अस्तित्व से सम्बंधित अधिकांश सवालों के वास्तविक या हक़ीक़त से बहुत क़रीब जवाब दे सकें, क्योंकि इन सवालों के जवाबों को पाना इंसानियत के लिए ज़रूरी है: ब्रह्मांड कैसे अस्तित्व में आया? ज़िंदगी पहली बार कैसे शुरू हुई? हम कहाँ से आए? इस मकसद को पाने के लिए साइंस ऐसे सवाल को कोई महत्व नहीं देता कि क्या खुदा मौजूद है या नहीं?“ क्योंकि ये न ही साइंस का काम है और न ही इसकी कभी उसकी प्राथमिकता रही है। इसका सम्बंध दर्शन से है। दार्शनिक इस सवाल का जवाब देने की कोशिश करते हैं, वैज्ञानिक नहीं। लेकिन अक्सर ऐसा होता है कि कुछ वैज्ञानिक सिद्धांतों के दार्शनिक पहलू होते हैं। मिसाल के तौर पर विकास का सिद्धांत जैसा प्रत्यक्ष रूप से मज़हबी सिद्धांत से टकरा गया, क्योंकि इससे अक्सर धर्मों का रचना का सिद्धांत गलत हो जाता है। इसके बावजूद हम ये नहीं कह सकते कि चार्ल्स डार्विन अपने कई सालों के शोध के दौरान खुदा की उपस्थिति या अनुपस्थिति की पुष्टि कर रहा था। उसका सारा ध्यान केवल एक सवाल पर केंद्रित था जिसका खुदा के अस्तित्व से कोई सम्बंध नहीं था और वो सवाल थाः सजीव प्राणियों में विविधता की वजह क्या है?“ इसी तरह क्वांटम मेकेनिक्स अत्यंत महत्वपूर्ण दार्शनिक परिणाम वाला रहा। मिसाल के तौर पर क्वांटम मेकेनिक्स ने पूर्ण अभावकी अवधारणा को खारिज कर दिया। इस प्रकार साइंस के इन क्षेत्रों के कुछ परिणाम दार्शनिक अपनी विशिष्ट समस्याओं के बारे में अपने विचार नये सिरे से बनाते हैं। लेकिन हम ये नहीं कह सकते कि साइंस ईमान का दुश्मन है या उसे इसकी कोई परवाह ही है। मगर अफसोस के साथ कहना पड़ता है कि कुछ मोमिनीन इस अंतर पर ध्यान ही नहीं देते।, इसका नतीजा ये निकला के अधिकांश ने साइंस को खारिज कर दिया और साइंस के प्रति नकारात्मक रुख अख्तियार किया जो एक खतरनाक स्थिति है।

दूसरी ओर ईमान के जज़्बे को समर्पित कुछ मोमिनीन ने अपने ईमान और खुदा को बचाने के लिए एक बिल्कुल ही अछूता तरीका अपनाया। उन्होंने सोचा कि बजाय साइंस के प्रति नकारात्मक रुख अख्तियार करने के साइंस से लड़ा जाए और साइंस से लड़ने का तरीका खुद साइंस ही है। इस प्रकार ये मोमिनीन साइंस के कंटीले मैदान में अपनी कल्पनाओं को साबित करने के लिए कूद पड़े जो बुनियादी तौर पर वैज्ञानिक हैं ही नहीं और अपने अवैज्ञानिक अवधारणाओं को साबित करने के लिए तार्किक बहसों से फायदा उठाया। अब भला खुदा के होने या न होने का साइंस से क्या सम्बंध है? और अगर वैज्ञानिक रूप से किसी तरह से ये साबित हो जाए कि ब्रह्मांड का कोई निर्माता है तो क्या साइंस रुक जाएगा? और क्या निर्माता के अस्तित्व के प्रमाण मोमिनीन के लिए कोई बड़ी हैसियत रखता है? मेरे विचार से अगर वैज्ञानिक रूप से संसार का कोई निर्माता साबित हो जाता है तो इससे प्रत्यक्ष और मुख्य लाभ नास्तिकों को होगा। रही बात मोमिनीन की तो अगर वैज्ञानिक रूप से खुदा साबित हो जाता है (जो कि वास्तव में साइंस का काम है ही नहीं) तो मोमिनीन को बहरहाल उस निर्माता और अपने खुदाओं में जिन्हें वो पूजते चले आए हैं सम्बंध तलाश करना होगा जो कि उतना ही मुश्किल साबित होगा जितना कि आज खुदा के प्रमाण हैं।

साइंस के क्षेत्र में मोमिनीन का हस्तक्षेप एक अतिरिक्त समस्या पैदा करता है, जैसे कि वैज्ञानिकों को और समस्याएं कम थीं, ज़गलोल अलनिजार और हारून यह्या जैसे लोगों ने जनता में जानबूझकर तार्किक दुविधाओं का खूब प्रचार किया, साइंस के क्षेत्र में हालांकि कुछ मोमिनीन आए भी तो वो भी सिर्फ अपने नकारात्मक आलोचनात्मक भूमिका निभाने के लिए न कि साइंस को कुछ देने के लिए। ये लोग बस इस इंतजार में होते हैं कि सालों की मेहनत के बाद अगर कोई वैज्ञानिक, आगर कोई वैज्ञानिक अवधारणा पेश करे तो वो कलम के द्वारा उसे रद्द करने के लिए तैयार बैठे हों। खासकर अगर वो नई अवधारणा उनके विश्वास को प्रभावित करती हो, ऐसे आलोचनात्मक लेख मोमिनीन में बहुत लोकप्रिय होते हैं जिनमें साइंस की धज्जियां बिखेरी गई हों, इससे उन्हें एक मनोवैज्ञानिक संतोष पहुँचता है। हालांकि ऐसे आलोचनात्मक लेखों में एक भी ऐसा स्वीकार्य सत्यापित वैज्ञानिक संदर्भ मौजूद नहीं होता, ये ज्ञान के प्रमाण से बिल्कुल खाली होते हैं। आप किसी भी मोमिन से किसी वैज्ञानिक सिद्धांत पर बात कर लें, आपको तुरंत किसी इस्लामी साइट के किसी लेख का लिंक पकड़ा दिया जाएगा जिसका शीर्षक कुछ इस तरह शुरू होगा: अमुक सिद्धांत के संदेहों का अस्वीकृतिऔर अगर आप हिम्मत करके पढ़ भी लें तो कोई भी प्रमाणित वैज्ञानिक संदर्भ तलाश नहीं कर पाएंगे। मोमिनीन धर्म और साइंस की जंग को इस तरह पेश करते हैं, हैरत की बात ये है कि जंग के एक पक्ष को पता ही नहीं है कि वो किसी युद्ध में पक्षकार है और न ही उसे परवाह है!

मिसाल के तौर पर अगर आप मिलर- यूरे के परीक्षण का हवाला देकर संयोग का नियम (law of coincidence) की सटीकता की बात करें तो आपका मज़ाक़ उड़ाते हुए कहा जाएगा कि आपको साइंस की कुछ खबर ही नहीं है, इसलिए आप किसी वैज्ञानिक मुद्दे पर बात करने में सक्षम ही नहीं हैं जिसके बाद आपको खुद वैज्ञानिकों के परिचय पकड़ा दिए जाएंगे कि मिलर- यूरे के परीक्षण एक असफल परीक्षण थे, इसके बाद आप हैरत के मारे ये भी नहीं जान पाएंगे कि ऐसी बातों का क्या जवाब दिया जाए। साइंस की ये हालत हो जाती है जब इसे विश्वास के आधार पर परखा जाए और इसके साथ वो व्यवहार किया जाए जैसे कि धार्मिक विश्वासों के साथ किया जाता है। आखिर किसी वैज्ञानिक परीक्षण की नाकामी का क्या मतलब होता है? साइंस के क्षेत्र में कोई परीक्षण तब नाकाम करार दिया जाता है जब वो अवधारणा जिसके लिए परीक्षण किया गया था, साबित न हो सके। मिलर - यूरे के प्रसिद्ध परीक्षण में दोनों वैज्ञानिकों ने पृथ्वी का वो माहौल बनाने की कोशिश की जो कि संभवतः चार अरब साल पहले पृथ्वी का होना चाहिए था यानी जिस समय पहली जीवित कोशिका अस्तित्व में आई। परीक्षण का उद्देश्य ये जानना था कि पहली जीवित कोशिका कैसे अस्तित्व में आई, उन्होंने माना कि उस समय ज़मीन का वातावरण मीथेन, अमोनिया, हाइड्रोजन और पानी के मिश्रण पर आधारित था। अवधारणा इस बात पर कायम थी कि अगर ये गैसें उपलब्ध हों साथ ही अनुकूल तापमान और बिजली जो प्राकृतिक बिजली की सूरत में मौजूद होता है तो इसके नतीजे में कार्बनिक पदार्थ अस्तित्व में आएंगे जो जीवन के लिए ज़रूरी हैं। और वास्तव में दोनों वैज्ञानिकों ने कोई 26 से अधिक प्रकार के एमीनो एसिड तैयार करने में कामयाब हो गए, जो कि प्रोटीन संश्लेषणके बुनियादी ढांचा होते हैं। जबकि इससे पहले ये समझा जाता था कि एमीनो एसिड प्रयोगशाला में तौयार नहीं किया जा सकता।

उनका ये परीक्षण पृथ्वी पर जीवन की उपस्थिति को बेहतर तरीके से समझने के लिए एक बहुत बड़ी छलांग करार दिया गया लेकिन समय के साथ साथ हुई और खोजों से पता चला है कि पृथ्वी का वो वातावरण जिसकी दोनों वैज्ञानिकों ने कल्पना की थी वो किसी तरह से चार अरब साल पहले की पृथ्वी के वायुमंडल से मिलता जुलता नहीं था। वैज्ञानिकों को पता चला कि उस समय पृथ्वी के वायुमण्डल में परीक्षण में कल्पना की गई गैसों से अलग गैसें भी मौजूद थीं और जब इन गैसों को आधार बनाकर परीक्षण को दुहराया गया तो जीवन का कोई भी रूप पैदा नहीं हो सका। इसलिए उन्होंने बताया कि परीक्षण उस माहौल की छवि का निर्माण करने में नाकाम रहा जिसमें उस समय जीवन की रचना हुई थी। ज़ाहिर है कि वैज्ञानिक चार अरब साल पहले पृथ्वी के वायुमंडल के बिल्कुल समान अवधारणाओं को विकसित करने में सौ फीसद कामयाब नहीं हो सकते क्योंकि वक्त में पीछे जाकर उस वातावरण की जांच करना नामुमकिन है। इसलिए हालांकि मिलर- यूरी के परीक्षण चार अरब साल पहले पृथ्वी के वायुमंडल की सौ प्रतिशत छवि निर्माण करने में विफल रहा लेकिन उनका ख़्याल सही है क्योंकि एमीनो एसिड वास्तव में तैयार हो गए थे। उपयुक्त वातावरण की उपलब्धता पर एमिनो एसिड का स्वतः तैयार हो जाना ये साबित करता है कि संयोग का नियम सही है।

वैसे भी ये आश्चर्य का कारण होगा कि मोमिनीन और खासकर मुसलमान ऐसे किसी शोध का हिस्सा बनें जो खुदा को वैज्ञानिक आधार पर साबित करने की कोशिश की जा रही हो। क्योंकि ऐसा कोई शोध मुसलमानों के खुदाई इम्तेहान  के विश्वास के खिलाफ होगा, क्योंकि अल्लाह का लोगों से छिपा होना उनके लिए खुदाई इम्तेहान की हैसियत रखता है। और अगर मुसलमानों को अल्लाह की उपस्थिति के वैज्ञानिक और भौतिकतर्क मिल जाएं तो इससे उनकी ईमान की परीक्षा माफ हो जाएगी और वो खुदा को एक दुविधा में डाल देंगे। दूसरी तरफ ये उनके इस विश्वास से भी इंकार कर देगा जो मुख्य रूप से ईमान बिलग़ैब  (नज़र न आने वाला) पर क़ायम है। क्योंकि एक मुसलमान से ये अपेक्षा की जाती है कि वो अल्लाह पर ग़ैबी ईमान रखे और अगर साइंस खुदा को भौतिक रूप में साबित कर दे इस तरह खुदा आलम बिलग़ैब से आलमे शहादत में स्थानांतरित हो जाएगा और ईमान बिलग़ैब के ईमान की धज्जियां बिखर जाएंगी। मुसलमानों को चाहिए कि वो दुआ करें कि साइंस खुदा को वैज्ञानिक तौर पर कभी साबित न कर सके ताकि उनका विश्वास न डिगे लेकिन वो वास्तव में इसके उलट कर रहे हैं। सच तो ये है कि मोमिनीन की हालत काफी नाज़ुक है, क्योंकि खुदा की उपस्थिति के वैज्ञानिक तर्क उनके लिए शर्मिंदगी का कारण बनेंगे और वैज्ञानिक तर्क न होना भी उनके लिए शर्मिंदगी का कारण है। मोमिनीन एक ऐसे पुल सेरात पर चल रहे हैं जिसके दोनों तरफ आग है।

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