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Hindi Section ( 19 Sept 2013, NewAgeIslam.Com)

Islamic Liberalism of Taha Hussain ताहा हुसैन का इस्लामी उदारवाद

 

नास्तिक दुर्रानी, न्यु एज इस्लाम

19 सितंबर, 2013

इस्लामी उदारीकरण का अर्थ उदारीकरण के विरोधियों को अब बहुत खटकने लगा है जिसमें हमारे विचार में मुसलमानों का सारांश निहित है, खासकर अगर नीचे लिखी बातों का ख़ास ख़याल रखा जाए:

1- हमें धर्म और धार्मिक चरमपंथियों के बीच अंतर करना होगा जिन्होंने "इस्लामी उदारवाद" का भरपूर विरोध किया क्योंकि मिस्र के दार्शनिक मुराद वहबा के अनुसार धर्म "ईमान" है जबकि धार्मिक कट्टरवाद एक विरोधी "विश्वास" है।

2- ये याद रखना चाहिए कि धार्मिक कट्टरपंथी जो "इस्लामी उदारवाद" के विरोधी हैं उन्होंने ईमान को विश्वास बना लिया है जिसे वो अपने राजनीतिक, धार्मिक और वैचारिक प्रयोजनों के लिए इस्तेमाल करते हैं।

3- "इस्लामी उदारवाद" स्वयं में और मूल्यों में एक धर्म है जबकि धार्मिक कट्टरवाद इज्तेहादात, एहकामात (आदेशों) और सज़ाओं का एक घालमेल है।

4- ये भी याद रहे कि इस्लामी उदारवाद के समर्थक कुलीन वर्ग के हैं जबकि इस उदारीकरण के विरोधी आम लोग हैं और सार्वजनिक धर्म के पैरोकार हैं।

5- इस्लामी उदारवाद के पैरोकारों का उद्देश्य अच्छे लोग पैदा करना और प्यार और शांति का संदेश देना है जबकि इसके विरोधियों का मकसद आतंकवादी पैदा करना है ताकि "पूर्ण तथ्य" की रक्षा के लिए सशस्त्र संघर्ष किया जा सके। जिस पर कोई बहस नहीं की जा सकती है कि या तो आप हमारे साथ हो जाएं या मर जाएं। यही कुछ पूरे इतिहास में होता आया है। सुकरात इन्हीं पूर्ण तथ्य वाले चरमपंथियों का शिकार हुआ था जब उसने उनका सामना किया और उनका मज़ाक उड़ाया। महात्मा गांधी, इस्हाक राबिन और अनवर अलसादात भी उन्हीं लोगों का शिकार हुए थे और अब ये लोग सारी दुनिया में तबाही व बर्बादी लाने के लिए कोशिश कर रहे हैं।

6- इस्लामी उदारवादियों और इसके हिंसक विरोधियों के बीच जो तीखे मतभेद हैं वो इस बात के आसपास घूमते हैं कि उदारवादी विचार पवित्र धार्मिक ग्रंथों को इब्ने रुश्द की तरह ऐतिहासिक और आंतरिक तौर पर समझने की दावत देता है जिसके अनुसार बाहरी और दूसरा आंतरिक (आभासी) अर्थ होता है। इसी तरह एक अर्थ जनता के लिए होता है और एक कुलीन वर्ग के लिए। इस प्रकार इस्लामी उदारवादी इन पवित्र ग्रंथों को शाब्दिक रूप में पढ़ कर समझने का विरोध करते हैं।

पिछली सदी के तीस के दशक में मिस्र के ताहा हुसैन ने "अलसियासतः" अखबार में अपने कॉलमों में शिक्षा और इसके महत्व पर बहुत ज़्यादा ज़ोर दिया। शिक्षा के बारे में उनका दर्शन मुफ्त शिक्षा की उपलब्धता पर ज़ोर देता था ताकि अमीर व गरीब, काले और सफेद, मुस्लिम और गैर-मुस्लिम को शिक्षा के समान अवसर मिल सकें। इसके अलावा उन्होंने शिक्षा को लोकतंत्र से जोड़ने का प्रस्ताव रखा और कहा कि जो राज्य शिक्षा को आम नहीं करता वो एक अलोकतांत्रिक राज्य है। अपनी किताब "मुस्तक़बिल अलसकाफ़तः फी मिस्र" में वो कहते हैं कि लोकतांत्रिक राज्य को प्रारंभिक शिक्षा की उपलब्धता के लिए बाध्य होना चाहिए। वो कभी भी शिक्षा और इसके महत्व पर ज़ोर देने से बाज़ नहीं आए। अपनी विभिन्न किताबों में जैसेः रूहुल तर्बियतः, अलकस्र अलमसहूर, अहलाम शहरज़ाद, शजरतुल बऊस, अलमाज़बून फिल अर्द, और दूसरी किताबों में उन्होंने शिक्षा और इसके अनगिनत मूल्यों पर प्रकाश डाला और कहा कि पिछड़ापन, अज्ञानता और गरीबी से छुटकारा शिक्षा के बिना सम्भव नहीं। सब के लिए बिना किसी अपवाद के शिक्षा की ये दावत "इस्लामी उदारवाद" के एक महत्वपूर्ण, गहरे और बुनियादी मूल्यों में शामिल है। और इस्लाम भी दसों स्थानों और ग्रंथों में शिक्षा के महत्व को बार बार याद दिलाता है और इस पर ज़ोर देता नज़र आता है।

जब ताहा हुसैन ने अपनी किताबें: अली हामिश अलसीरत, अलशेखान, अली व बनूह, मिरातुल इस्लाम और दूसरी  प्रकाशित कीं तो इस्लामी उदारवाद के विरोधियों को लगा कि ताहा हुसैन इन किताबों को माध्यम से अपने इस उदारवाद से तौबा कर ली है और इशारों में माफी मांग रहे हैं जिसको उन्होंने अपनी पुस्तक "फिल शेर अलजाहिली" में किया था। ये विरोधी ये बात न समझ सके कि ताहा हुसैन अपनी किताबों में ये कहकर अपने विचारों के उदारीकरण को अधिक बल दे  रहे थे कि ऐतिहासिक तथ्य आवश्यक रूप से जांच पड़ताल के चरण से गुज़रने चाहिए और ये कि राजनीति को सबके लिए निष्पक्ष होना चाहिए ताकि किसी पक्ष के समर्थन में किसी दूसरे पक्ष के साथ ज़्यादती न हो जैसा कि अब्बासी दौर में या दूसरे दौर में होता रहा। आलोचक ये समझते रहे कि ताहा हुसैन अपने उदारीकरण से इंकार करने वाले हो गए हैं। इस बात का इज़हार अलबरत हूरानी ने अपनी किताब "अलफिक्र अलअरबी फी अस्र अलनहदः" में भी किया है, लेकिन इन लोगों के समझ में ये बात नहीं आई कि ताहा हुसैन अपने उदारीकरण से सीधे साधे मुसलमानों से नज़दीकी चाहते थे। जिनकी धार्मिकता, स्वाभाविक और सार्वजनिक थी ताकि अपनी विचारधारा के लिए और अधिक समर्थक जमा कर सकें जिनका सम्बंध दबे हुए वर्ग से था।

मिस्र के शोधकर्ता मुस्तफ़ा अब्दुल ग़नी अपनी किताब "ताहा हुसैन वलसियासतः" में कहते हैं कि ताहा हुसैन के इस्लामी उदारीकरण ने ये यक़ीन दिलाया कि सिर्फ अक़्ल से ही ज़िंदगी को सही डगर पर नहीं लाया जा सकता। अपनी किताब "अली हामिश अलसीरतः" में ताहा हुसैन ने साफ तौर पर और अत्यंत बहादुरी से काम लेते हुए कहते हैं: "कुछ लोगों को ये किताब अच्छी नहीं लगेगी क्योंकि वो सिर्फ अक़्ल के पैरोकार हैं और सिर्फ इसी पर यक़ीन रखते हैं, जबकि अक़्ल सब कुछ नहीं है।"

हमें ये नहीं भूलना चाहिए कि पिछली सदी के पहले आधे हिस्से में ताहा हुसैन के विरोधियों का सम्बंध तत्कालीन सरकार के न सिर्फ मिस्र बल्कि मिस्र से भी बाहर था। लेकिन ताहा हुसैन ने सभी कठिनाइयों के बावजूद अपनी दावत जारी रखी और अपने लेखों और किताबों में एक स्वतंत्र उदारवादी के रूप में दमन और अत्याचार के खिलाफ डटे रहे और आज़ादी और लोकतंत्र की ज़ोरदार तरीके से मांग जारी रखी। उनके विचार में इस बात से कोई इंकार नहीं कर सकता कि इस्लाम आज़ादी, समानता का मज़हब न सिर्फ हमेशा से था लेकिन अभी भी है और यही उदारीकरण के मूल्य हैं जिनकी तरफ इशारा करते हुए अपनी किताब "मन बईद" में कहते हैं कि: "हमें उन ज़मानों पर हसरत है जब हम जो कुछ चाहते सोच सकते थे और उसको व्यक्त भी कर सकते थे और राय और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को हम न सिर्फ ज़िंदगी की ज़रूरत बल्कि स्वतंत्र अस्तित्व की आवश्यकताओं में से मानते थे, आज हम, हमारा ये वजूद कहां है?"

आज अरब देशों विशेषकर और इस्लामी देशों में आम तौर पर लोकतंत्र और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का जो हाल है, अगर ताहा हुसैन आज जीवित होते तो पिछली सदी के पहले आधे दौर के अपने ज़माने पर गर्व करते। आज जिस कदर हमें "इस्लामी उदारीकरण " की आवश्यकता है अतीत में शायद कभी नहीं थी, क्योंकि यही एकमात्र माध्यम है जिससे इस्लामी देशों में डोलती आज़ादी व जम्हूरियत की नाव को किनारे पर लगाया जा सकता है।

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