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Hindi Section ( 28 Apr 2013, NewAgeIslam.Com)

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Boston Bomb Blast and Conspiracy Theory बोस्टन धमाके और साज़िशी थ्योरी

 

नास्तिक दुर्रानी, न्यु एज इस्लाम

28 अप्रैल, 2013

बोस्टन धमाके अभी तक वैश्विक मुद्दों पर नज़र रखने वालों की दिलचस्पी का केंद्र बने हुए हैं क्योंकि मामले का सम्बंध अमेरिका से है। इसमें शक नहीं कि कांग्रेस और व्हाइट हाउस की दीवारों के इस पार और वाशिंगटन के निर्णय करने वाले  दूसरी संस्थाओं में होने वाले माजरे सबके आकर्षण का केंद्र होते हैं, आखिर वैश्विक समुदाय में जॉर्ज वाशिंगटन के देश का अपना एक विशेष स्थान है।

हालांकि अभी तक इस घटना की जांच के अंतिम परिणाम सामने नहीं आए हैं, इसके बावजूद हर तरफ से इस घटना को लेकर अलग अलग विरोधाभासी अनुमान पेश किये जा रहे हैं और हर कोई किसी न किसी पक्ष पर इसकी ज़िम्मेदारी डालता नज़र आ रहा है, लेकिन इन सारे अनुमानों के बावजूद सभी कम से कम इस बात पर सहमत ज़रूर हैं कि बेगुनाह नागरिकों को निशाना बनाने की वजह से इस घटना की निंदा की जानी चाहिए जिनका अपने देश की अंतर्राष्ट्रीय राजनैतिक नीतियों के निर्धारण में जिन पर इस्राइली हित प्रभाव रखते हैं, कोई भूमिका नहीं है, चाहे ये हित दुनिया के दूसरी क़ौमों के हितों की कीमत पर ही क्यों न हासिल किये जाएं, खासकर मध्य पूर्व के।

नज़रिए साज़िश

राजनीतिक घटना की दलील के लिए "साज़िशी नज़रिये" पर आधारित कुछ विश्लेषण कहते हैं कि अमेरिका के भीतर ही मौजूद कुछ तत्व इन धमाकों के लिए ज़िम्मेदार हैं ताकि बाद में किसी पक्ष पर इसकी ज़िम्मेदारी डाल कर कहीं किसी जगह कोई सशस्त्र कार्रवाई करने के लिए इन्हें औचित्य बनाया जा सके।

इन साज़िशी दृष्टिकोण रखने वालों को उम्मीद है (जिनके बहुमत का ये आग्रह भी है कि नाइन इलेवन के पीछे भी वाशिंगटन का ही हाथ है) अमेरिका में जल्द इन धमाकों को अंजाम देने वालों और किसी ऐसे पक्ष को जिसका अमेरिका सफ़ाया करना चाहता के बीच, किसी सम्बंध का खुलासा किया जाएगा। जो शायद ईरान पर भी हो सकता है और सीरिया भी या कोई दूसरा देश या समूह, हालांकि इन साज़िशी दृष्टिकोण रखने वालों के लिए महत्वपूर्ण बात यही है कि सारा इल्ज़ाम खुद अमेरिकियों पर डाल दिया जाए और "राजनीतिक इस्लामी धारा" पर से ये आरोप हटा लिया जाए जिनका (उनके अनुसार) पिछले दो दशकों में पश्चिम में इस्लाम की छवि बिगाड़ने में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका है, क्योंकि वो इस्लाम को ठीक तरह से नहीं समझते।

रूसी हाथ

कुछ विश्लेषकों का मानना है कि इन खूनी घटनाओं के पीछे रूसी हाथ हो सकता है। उनकी दलील है कि चेचन भाइयों में से एक धमाके से पहले रूस गया था और वहाँ कोई छह महीने की अवधि तक रहा जिसकी कोई वजह अभी तक सामने नहीं आ सकी है।

विश्लेषकों का कहना है कि क्रेमलिन के सिंहासन पर विराजमान राष्ट्रपति पुतिन ने तुरंत ही राष्ट्रपति ओबामा को शोक संदेश भेजा और अगले साल सोची में आयोजित होने वाले ओलंपिक खेलों में सुरक्षा के हवाले से मदद करने की पेशकश की। बोस्टन की घटनाओं के संदर्भ में क्रेमलिन ने ये भी ऐलान  किया कि रूस और अमेरिका ने आतंकवाद के उन्मूलन के लिए आपसी सहयोग पर सहमति व्यक्त की है। हालांकि, अमेरिका हमेशा से चेचन्या में रूस के मानवाधिकार उल्लंघन की आलोचना करता आया है और रूस से अलगाव के इच्छुक अलगाववादियों की मदद करता रहा है, इसलिए इस संदर्भ में रूस को पहुंचने वाला फायदा इन घटनाओं में उसकी संलिप्तता के विचार को बल प्रदान करता है लेकिन ये धारणा संभावना से बाहर है क्योंकि बड़ी ताक़तें आपस की खींचतान को निपटाने के लिए इस प्रकार के ओछे हथकंडे नहीं अपनातीं।

अलक़ायदा

ज़्यादातर संदेह "अलक़ायदा" या दूसरे चरमपंथी संगठनों के आसपास ही घूम रहे हैं जो अपने विचारों को थोपने के लिए हिंसा का रास्ता अपनाना सवाब (पुण्य) का काम समझती हैं और जो सारी की सारी इस्लाम के खाते में आती हैं। इस संदेह और आशंका की एक बड़ी वजह है और वो है इन संगठनों का इस सम्बंध में पुराना खराब रिकॉर्ड। खेलों के इस मेले में बेगुनाहों को मारना इन संगठनों की नज़र में पुण्य का काम है, क्योंकि अभियुक्तों का सम्बंध भी मुसलमान चेचन्या से है, इसलिए पश्चिम की इस्लाम विरोधी ताक़तें इसी धारणा पर ज़ोर दे रही हैं।

कुछ सूत्रों का कहना है कि दोनों युवकों ने बम बनाने के लिए किचन के सामान के इस्तेमाल का जो तरीका या अंदाज़ अपनाया है, वो तरीका अलक़ायदा के "अल-मलाहम मैग्ज़ीन" में प्रकाशित हुआ था। इसी मैग्ज़ीन ने अबु मोसैब अल-सूरी नामक एक "क़ायदा से सम्बंध रखने वाले" का एक शोध भी प्रकाशित किया था, जिसमें कम से कम खर्च में अधिक जानी नुकसान और इस काम के लिए सबसे अच्छा लक्ष्य के चयन के तरीके बताए गए थे। उनके लक्ष्यों में खेल के मेले भी शामिल थे।, इस विचार के समर्थकों का कहना है कि दोनों आरोपी अल-मलाहम में प्रकाशित होने वाले इन तरीकों से प्रभावित हो सकते हैं लेकिन ये भी महज़ धारणाएं हैं और इन्हें साबित करने के लिए कोई भी भौतिक सुबूत नहीं है। सरकारी ऐलान में भी यही कहा गया है कि दोनों आरोपी और अलकायदा के बीच किसी तरह के सम्बंध का अभी तक कोई सुबूत नहीं मिला है।

मुश्किल स्थिति

अब सबसे बड़ा सवाल ये है कि अगर ये साबित हो कि इन धमाकों के पीछे कोई चरमपंथी संगठन शामिल है जिन्हें पश्चिम में "इस्लामोफ़ोबिया" के मरीज़ "इस्लामी चरमपंथी" कहते हैं तो अमेरिका क्या करेगा? ये बात अब कोई राज़ नहीं रही है कि ओबामा के नेतृत्व में डेमोक्रेट प्रशासन ने "अरब वसंत" के देशों में "इस्लामी धारा" को सत्ता तक पहुंचने में मदद की  खासकर ट्यूनीशिया और मिस्र में और अब भी उनके अत्याचार पर पर्दा डालते हुए उनकी मदद किये जा रहा है। ठीक उसी तरह जैसे पहले दोनों देशों के तानाशाहों  की मदद कर रहा था।

ऐसी स्थिति में ओबामा प्रशासन को अमेरिकी जनमत के सामने भारी मुश्किल का सामना करना पड़ेगा क्योंकि ज्यादातर अमेरिकी चरमपंथी जिहादी संगठनों जिनमें अलक़ायदा शामिल है और बाकी इस्लामी संगठनों में कोई अंतर नहीं कर सकते बल्कि अमेरिका के भेदभाव करने वाले तो सारे मुसलमानों को ही आतंकवादी समझते हैं इसलिए अंकल सैम के देश में सरकारी फैसलों और जनमत को प्रभावित करने वाले मीडिया पर हावी यहूदी लॉबी की मौजूदगी के संदर्भ में इस धुंधली तस्वीर को साफ़ करना बेहद मुश्किल नज़र आता है। तो क्या ओबामा अपने सहयोगियों से दुश्मनी मोल ले लेंगे या अरब और इस्लामी दुनिया में चरमपंथियों की बिसात लपेटने के लिए उदारवादी इस्लामी आंदोलनों का समर्थन करना जारी रखेंगे? और अगर डेमोक्रेट इसी राह पर चलते रहे तो उनके प्रतिद्वंद्वी रिपब्लिकन अगले चुनाव में उसका फायदा नहीं उठाएंगे? इन सारे सवालों के जवाबों की निर्भरता जांच के नतीजों पर है, वो भी अगर दूसरा आरोपी ज़िंदा रहता है तो।

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