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Hindi Section ( 26 May 2021, NewAgeIslam.Com)

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The Reason of Conflict between Barelwi and Deobandi – Charges and Contradictions बरेलवी देवबन्दी मे फूट का सबब – इलज़ाम तराशियाँ और विरोधाभास

नासिर मिस्बाही

उर्दू से अनुवाद, न्यू एज इस्लाम

16 अगस्त, २००९

कुछ दिनों पहले मौलाना नदीमुल वाजिदी साहब के प्रकाशित लेख को गिरफ्त में लेते हुए हकीकत को सामने लाने की कोशिश की गई थी लेकिन अफ़सोस कि इस पर गंभीरता से गौर करने के बजाए मौसूफ़ ने जवाबुल जवाब के तौर पर एक दूसरी तहरीर लिख डाली जिसमें एक मर्तबा फिर जबर्दस्त कलमी चाबुक दस्ती और मतलब निगारी की कोशिश की गई है और साथ ही साथ मेरे द्वारा बयान किये हुए सारी सच्चाइयों और सुबूतों को कलम के पीछे का भ्रम करार दे दिया गया। इल्मी बातचीत, इल्मी उस्लूब में करने की बजाए हद दर्जा बरहम भी हो गए और इस आइना दारी के लिए मुझ समेत तमाम बरेलवी उलमा को अतिवाद, उत्तेजक, तकफीर साज़ी की मुहीम चलाने वाले, मुकफ्फेरीन और ना जाने क्या क्या कह डाला। हालांकि यहाँ इस बरहमी और स्व उत्तेजक का क्या दखल? मैं यहाँ साफ़ कर दूँ कि मैंने मौसूफ़ की कुछ ही बातों पर वजाहती आलोचना किया था।अन्यथा, तथ्य यह है कि पहली छवि पूरी तरह से बहस का विषय थी। पिछले लेख में जितनी भी वास्तविक बातें कही गई थीं, वे सब बाद में तब सामने आईं जब उनका पूरा लेख दूसरी जरीदे में प्रकाशित हुआ। इस संबंध में नाचीज़ की व्याख्यात्मक आलोचना, निश्चित रूप से, बहुत छोटी थी। यह अफ़सोस की बात है कि उन्होंने इस पर ईमानदारी से कोई टिप्पणी नहीं की है। कुछ स्थानों पर उन्होंने तीव्रता की भावना व्यक्त की, जो वास्तव में उनकी तीव्र भावना का परिणाम है, और अन्य स्थानों पर, उन्होंने बरेलवियों पर तकफीरी फतवे जारी करने का आरोप लगाया, जबकि उपमहाद्वीप में, मुसलमानों के बीच अलगाववाद के लिए एकमात्र जिम्मेदार पुस्तक, तकवियतुल ईमान, की प्रशंसा की। पाठकों को याद होगा कि "शब्दों और कर्मों के विरोधाभास" में केवल दो बातों पर जोर दिया।

एक यह है कि शाह इस्माइल देहलवी और देवबंद के उलमा मुसलमानों के बीच सांप्रदायिक विभाजन के लिए जिम्मेदार हैं और दूसरा यह कि मौलाना अहमद रजा खान से पहले, कई भारतीय और अरब आलिमों ने शाह इस्माइल देहलवी की कुफ्र को उजागर किया था। इस दावे के प्रमाण में शाह इस्माइल देहलवी, मौलाना अशरफ अली थानवी, मौलाना अबुल कलाम आजाद के पिता मौलाना खैरुद्दीन, शाह अबुल हसन जैद फारूकी, मुमताज देवबंदी आलिम मौलाना मुहम्मद अहमद रजा बिजनौरी आदि की बातें और बयान भी पेश किए गए। यह बहुत स्पष्ट था। लेकिन मौलाना नदीमुल वाजिदी साहब ने कमाल की कलम दिखाई है। मौलाना अबुल कलाम आजाद के दिवंगत पिता की बातों को खुद ही मौलाना अबुल कलाम की बात समझने में गलती की और बिना किसी कारण के मुझ पर बरस पड़े कि अबुल कलाम साहब हमारे लाइन के हैं, यह उनके मुंह से यह अनकही कैसे निकल सकती है। उन्होंने मौलाना को बदनाम करने की कोशिश की।दूसरी जगह मौलाना अबुल कलाम आज़ाद की बात चीत को मौजूदा स्थिति की हिकायत करार दे कर बे वज़न करने की कोशिश की, यह भी नहीं सोचा कि यहाँ ज़माना तकवियतुल ईमान के मुसलमानों के बीच अंतर की असल सूरते हाल की वजाहत व हिकायत ही उद्देश्य है, इस तरह मौलाना अहमद रजा बिजनौरी के वास्तविकता को स्वीकार करने की भी बेफायदा तौजीह की कोशिश की, यह बिलकुल नहीं सोचा कि इस तौजीह से क्या हुआ, मौलाना बिजनौरी अफ़सोस करें या ख़ुशी मनाएं, यह बात तो बहर हाल साबित ही रही कि तकवियतुल ईमान ही की वजह से भारत के मुसलमानसुन्नीवहाबी में बट गए और मौलाना बिजनौरी को इसका एतिराफ है। मौसूफ़ ने इसी तरह कुछ न कुछ ज़हनी कोशिशों और कलमी गुल कारी दुसरे तमाम सुबूतों और हवालों पर भी कर दी और जिसके बाद भरपूर ताकत से उभर कर फिर वही बिना सुबूत का दावा कर दिया गया कि तकवियतुल ईमान मार्कतुल आरा किताब है और हिन्दू किताब है और भारत व पाक में इसके जरिये मुसलमानों के बीच अंतर का आगाज़ नहीं हुआ। मौसूफ़ से सवाल यह है कि अगर यह बोहतान है तो शाह अब्दुल अज़ीज़ देहलवी और आप के तमाम नस्बी और रूहानी फर्ज़न्दान, तमामउलमा ए देहली व रामपुर व फिरंगी महली यहाँ तक कि भारत के बटवारे से पहले के उलमा ने तकवियतुल ईमान के खिलाफ तोहफा ए इसना अशरीजैसा रद लिखने की चाहत क्यों ज़ाहिर की थी और आपके भतीजे और शागिर्द मौलाना मख्सुसुल्लाह ने तकवियतुल ईमान को मवाद के लिहाज़ से तफ़विययतुल ईमान क्यों करार दिया था और इसके रद्द में पुरी किताब ‘मुईदुल ईमान’ क्यों लिखी थी?मौलाना फजले हक़ खैराबादी ने तकवियतुल के रद्द में तहकीकुल फतवा क्यों लिखी थी और तस्दीक में देहली के 17 नुमाइंदा ए उलमा ए अहले सुन्नत ने क्यों दस्तखत किये थे? जामा मस्जिद देहली मे मुनाज़रा क्यों हुआ था, यह सब क्यों हुआ? क्या इसका सीधा सा मतलब यह नहीं हुआ कि तकवियतुल ईमान ने पुरे देश में आग लगा रखी थी, एक दो अनुयायिओं को छोड़ कर किसी ने भी इस बदनामे ज़माना किताब की हिमायत नहीं कि, यह मुसलमानों के बीच अंतर नहीं तो और क्या है? जवाबन यह बिलकुल नहीं कहा जा सकता कि यह अंग्रेजों की साजिश थी, मुसलमानों का सवादे आज़म हरगिज़ किसी की गलत साज़िश का शिकार नहीं हो सकता और हरगिज़ किसी की नाहक विरोध पर संगठित नहीं हो सकता, हाँ शाह इस्माइल देहलवी और उनके एक दो अनुयायी किसी पहलु से गलत साज़िश का शिकार हो गए हों, यह अलग बात है, हो सकता है, इसमें कोई इस्तेहाला नहीं। गर्ज़ हकीकत यही है कि तकवियतुल ईमान ही उपमहाद्वीप में मुसलमानों के बीच अंतर का वास्तविक व असली प्रारम्भ बिंदु है और यह भारत की इस्लामी इतिहास की सबसे बड़ी सच्चाई है जिसे सुबहे कयामत तक भी गलत साबित नहीं किया जा सकता। तकवियतुल ईमान के फूट का कारण होने पर पर्दा डालने के लिए सामन्यतः इस तरह भी भ्रम दिया जाता है कि उस वक्त मुसलमानों में पीर परस्ती और कब्र परस्ती की वबा अपने चरम पर थी, जिहालत और कम इल्मी के कारण मुसलमान कुरआन और सुन्नत से दूर हो गए थे और रस्म और बिदअत के दलदल में डूब गए थे, उस दौरान तकवियतुल ईमान जैसी मार्कतुल आरा किताब लिखी जो शिर्क व बिदअत के रद्द में ला जवाब किताब है।मुगालता अंगेजी की इस कोशिश में तकवियतुल ईमान के जमाने के मुसलमानों को जबर्दस्त तरीके पर शिर्क व बिदअत के दलदल में डुबो कर उस वक्त का पूरा माहौल इस तरह बना दिया जाता है गोया इस्लाम से पहले के अरब की जाहिलियत लौट आई थी और फिर अचानक इस बीच तकवियतुल ईमान को गारे हीरा का नुस्खा ए कीमिया बना कर पेश कर दिया जाता है।

हालांकि हमारे पास इस अम्र का कोई सुबूत और जवाज़ नहीं कि हम एक साथ सारे उपमहाद्वीप के उलमा, सुफिया, फुकरा और अवाम के संबंध में यह कह दें कि वह नउज़ुबिल्लाह सारे शिर्क और बिदअत में मुब्तिला थे और पहली बार शाह इस्माइल उनको हकीकी तौहीद से परिचित करा रहे थे, आखिर शाह वलीउल्लाह, शाह अब्दुल अज़ीज़ और शाह इस्माइल में कितना फासला है? क्या इस दरमियानी समय में सारा उप महाद्वीप कुफ्र व शिर्क की लपेट में आ गया था और अगर पहले से था तो खुद हकीमुल उम्मत शाह वलीउल्लाह और शाह अब्दुल अज़ीज़ ने यह तशद्दुद और जबान क्यों इस्तेमाल न फरमाई।

बल्कि हकीकत यह है कि सवादे आज़म के मसलक से हट कर यह वह पहली आवाज़ थी जो उप महाद्वीप में गूंजी शैख़ मोहम्मद बिन अब्दुल वहाब नज्दी की तहरीक की सदाए बाज़ गश्त तो यक़ीनन कहा जा सकता है मगर वलिउल्लाहीफ़िक्र और मामुलात का तर्जुमान हरगिज़ नहीं कहा जा सकता।(अन्फासुल आरेफीन मुतर्जिम मारुफ़ अदीब मोहम्मद फारुक अल कादरी सफहा १८ बाब चहारुम मक्तबा अल फलाह देवबंद) शाह इस्माइल देहलवी के बाद यह फितना खत्म भी हो सकता था मगर उस मौके पर उलमा ए देवबंद दस्तगीरी के लिए आ गए और मुसलमानों के बीच अंतर ने बराहिने कातेअ में शैतान का इल्म हुजुर अलैहिस्सलाम के इल्म से ज़्यादा बताया, मौलाना इस्माइल देहलवी ने नमाज़ में हुजुर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के ख्याल को गधे और बैल के ख्याल से बद तर लिखा, मौलाना नानौतवी साहब ने तख्दीरुन्नास में हुजुर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को खातिम यानी आखरी नबी मानने से इनकार किया और कहा कि हुजुर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के बाद अगर और भी नबी आ जाएं, तब भी खातमियते मुहम्मदी में कुछ फर्क नहीं आएगा, खातिम का अर्थ है असली नबी, हुजुर असली नबी हैं और दुसरे नबी आरज़ी नबी हैं।उलमा ए देवबंद के इन ईमान सोज़ तहरीरों की वजह से फिर इंतेशार जाग उठा और इस मर्तबा कुछ ऐसे जोर व शोर से उठा कि गोया अब इसके दवाम और हमेशगी पर मुहर लग गई।

लेखक ने बरेलवी उलमा पर तकफीर व तशद्दुद की जबान बरतने का बड़ा पुरजोर आरोप लगाया है हालांकि देवबंदी उलमा की इन्तेहाई ईमान सोज़ और फितना परवर तहरीरों को देखते हुए किसी कदर ऐसा करना जरूरी था, मशहूर देहलवी सूफी ख्वाजा हसन निजामी कहते हैं उनके विरोधी एतिराज़ करते हैं कि मौलाना की तहरीरों में सख्ती बहुत है और बहुत जल्द दूसरों पर कुफ्र का फतवा लगा देते हैं, मगर शायद उन लोगों ने मौलाना इस्माइल शहीद और उनके हवारियों की दिल आज़ार किताबें नहीं पढ़ीं हैं जिनको सालहा साल तक सूफी हज़रात बर्दाश्त करते रहे, इन किताबों में सख्त कलामी बरती गई है, इसके मुकाबले में जहां तक मेरा ख्याल है, मौलाना अहमद रजा खान साहब ने अब तक बहुत कम लिखा है, जमाते सुफिया इल्मी हैसियत से मौलाना को अपना बहादुर सफ शिकन सैफुल्लाह समझती है और इन्साफ यह है कि बिलकुल जायज़ समझती है (हफ्त रोज़ा खतीब २२ मार्च १९१५ पेज १७३-१७४ जिल्द अव्वल देहली)। मौसूफ़ ने मौलाना अहमद रजा खान पर शिद्दत बरतने का आरोप तो लगा दिया यह भी नहीं सोचा कि खुद देवबंदी मसलक की बुनियाद व असास तकफीरुल मुस्लेमीन और तशद्दुद पर कायम है। देवबंद के उलमा अपने मसलक की निस्बत शैख़ मोहम्मद बिन अब्दुल वहाब नज्दी की तरफ करते हैं। शैख़ मोहम्मद बिन अब्दुल वहाब के शौके तकफीर का यह आलम था कि अपने अलावा दुनिया में किसी को मुसलमान तस्लीम करने के लिए तैयार नहीं होते थे, यह लोग नज्द से निकले थे और मक्का व मदीना शरीफ पर हमला आवर हो गए, यह अपने को हम्बली मज़हब की तरफ मंसूब करते थे लेकिन उनका अकीदा यह था कि केवल हम ही मुसलमान हैं और जो हमारे अकीदे के खिलाफ है वह मुशरिक है (रद्दुल मोहतार जिल्द शशुम बाब अल बगात पेज ३१७ नाशिर दारुल किताब देवबंद)। शैख़ मोहम्मद बिन अब्दुल वहाब ख़ास जज़ीरतुल अरब के मुसलमानों तक को काफिर मुशरिक व बुत परस्त ख्याल करते थे, बसरा के मुसलमानों को बड़ी कतइयत से मुशरेकीन ताबीर किया है (अब्दुल वहाब नज्दीअज अली तंतावी जौहरी पेज १९) शैख़ नज्दी ही के अनुयाई उलमा ए देवबंद हैं जिन्होंने शैख़ की इत्तेबा करते हुए भारत में रह कर बड़ा मसलकी तशद्दुद इख्तियार किया है, शैख़ की तरह उन हजरात ने भी अपना यह अकीदा बना लिया है कि केवल वह ही सच्चे तौहीद परस्त और मुसलमान हैं और उनके अलावा सब मुशरिक व बुतपरस्त हैं। शाह वलीउल्लाह देहली और शाह अब्दुल अज़ीज़ देहलवी के अहदे ज़र्रीं को भारत की इस्लामी तारीख का सबसे तारिक दौर करार देते हुए उस वक्त के मुसलमानाने हिन्द को एक साथ शिर्क व बिदअत में डुबो कर रख दिया, नबियों और वलियों के मजारों को बुतों का दर्जा दे कर उनके अदब व एहतिराम को इबादत व परस्तिश का दर्जा दे दिया और इस तरह सारे के सारे मुसलामानों को मुशरिक व गैरुल्लाह का इबादत गुज़ार बना दिया।

देवबंद के उलमा ने तशद्दुद इख्तियार किया है, इसका एतिराफ खुद देवबंद को भी है। शाह इस्माइल देहलवी कहते हैं कि मैंने खुद तशद्दुद अपनाया है और शिरके खफी को अपनी मर्ज़ी से शिरके जली लिख दिया है। एक मशहूर देवबंदी आलिम की यह लेखनी देखिये हमारे बाद के भाइयों ने शिर्क के मामले में बहुत शिद्दत इख्तियार की और इस्लाम का दायरा तंग कर दिया है और मकरूह या हराम उमूर को शिर्क करार दे दिया है और शैख़ मोहम्मद बिन अब्दुल वहाब है जिन्होंने इन उमूर को शिर्क करार दिया है और मौलाना इस्माइल देहलवी ने तकवियतुल ईमान में अक्सर उमूर में उनकी पैरवी की है (हिदायतुल मेहदी पेज२६, जिल्द अव्वल मयूर प्रेस देहली)। देवबंदी मसलक के लोगों की किताबों में शिर्क को लेकर जो कुफ्र के समानार्थी है और कद्रे तशद्दुद बरता गया है कि कोई सलाम पढ़े तो मुशरिक, फातेहा पढ़े तो मुशरिक, तीजे चालीसवें का खा ले तो मुशरिक, मजार पर चला जाए तो मुशरिक, अंगूठे चूम ले तो मुशरिक, मीलाद मना ले तो मुशरिक, उर्स करे तो मुशरिक, या रसूलल्लाह कह दे तो मुशरिक, अजमेर चला जाए तो मुशरिक, अबदुन्नबी नाम रख ले तो मुशरिक, गुलाम गौस नाम से मौसूम हुए तो मुशरिक, यहाँ तक कि मुसलमानों के हर अमल को शिर्क से ताबीर कर दिया गया है जो हकीकत में इन्तिहाई किस्म का तशद्दुद और भोले भाले मुसलमानों को मुशरिक बनाने की खतरनाक तहरीक है। देवबंद के उलमा आज भी इस तहरीके मुशरिक साजी को बड़े खुलूस के साथ आगे बढ़ाने में लगे हुए हैं।

मशगला उनका है तकफीरे मुसलमानाने हिन्द

मौसूफ़ ने ताज़ा तहरीर में सेवार मस्जिद विवाद (रामपुर) पर भी गुफ्तगू की है। लिखते हैं सेवार में बरेलवियों की अक्सरियत है, एक ही मस्जिद ऐसी थी जिसमें देवबंदियों के इमाम नियुक्त थे, बरेलवियों ने यह भी ज़बरदस्ती उनसे छीन ली, देवबंदियों ने इसका भी विरोध करना चाहा तो उन पर पथराव किया गया, मस्जिद की अजमत और उसका तकद्दुस पामाल किया गया, देवबंदी ही ज़ख्मी हुए और उन्ही के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कराई गई । अफ़सोस! सद अफ़सोस! मौलाना नदीमुल वाजिदी साहब को झूटे बयानिये और दरोगगोई पर ज़रा भी हया नहीं आई, बात शुरू की तो कुल का कुल झूट बोल दिया गया। अभी कल हुए घटना को जिसके ऐन गवाह भी सेवार के लगभग आधे लोग हैं, दरोग गोई से बिलकुल उल्ट दिया गया। मैं मौसूफ़ के ईमान को चैलेंज करता हूँ कि वह सेवार जाकर वहाँ के इन अनगिनत लोगों से याद गोई कर सकते हैं जो घटना के समय मौके पर मौजूद थे, जिन्होंने घंटों तक देवबंदियों को मस्जिद में सेहन में कूदते, छत पर चढ़ते,बुरी तरह उधम मचाते, कभी फायरिंग करते, कभी पथराव करते और कभी पथराव के लिए मस्जिद के दीवारों को बे दर्दी से तोड़ते हुए अपने माथे की आँखों से देखा है, देवबंदियों ने मस्जिद के मेन गेट को अंदर से ताला लगा रखा था। उन लोगों ने दरवाज़े पर मौजूद भीड़ पर ही फायरिंग और पथराव नहीं किया बल्कि जिला इंतेजामिया के तमाम आला अफसरों और अधिक संख्या में पुलिस और पी एस सी पर भी संग बारी की। हद तो यह है कि उनके उपर दस्ती बम से भी हमला किया गया जिससे जिला मजिस्ट्रेट बाल बाल बच गए और जो दुसरे दिन के अक्सर अखबारों के पहले पन्ने की पहली खबर बनी। गर्ज़ यह अपनी तरह की बिलकुल अलग घटना है जिसे किसी मस्जिद पर कब्ज़ा करने की कोशिश में केवल देवबंदीयों ने यक तरफा तौर पर अंजाम दिया। रात के बारह बजे बिजली भी गायब थी और पुरे सेवार में रात का सन्नाटा छाया हुआ था। ऐसे में पचास देवबंदियों का चाकुओं, छुरियों और तमंचों से पुरी तरह लैस हो कर मस्जिद पर कब्ज़ा करने की कोशिश करना पुर्णतः खतरनाक और योजना बद्ध था जिन्हें जिला प्रशासन के आला अफसरों ने पुलिस और पी एस सी की मदद से घंटों बाद काबू में किया। ऐसे में बरेलवियों को यह दोष देना कहाँ तक सहीह है कि उन्होंने देवबंदियों को कैद व गिरफ्तार कराया, हकीकत यह है कि देवबंदी खुद इसके हकदार थे। दुसरे दिन जब कुछ देवबंदी उलमा डी एम के पास यही माज़रत करने गए तो खुद डी एम ने यह कह कर सबको बाहर कर दिया कि उत्पात मचाते हुए तो मैंने उन्हें खुद देखा है। मुझे इस पर किसी गवाह और हवाले की जरूरत नहीं। बरेलवियों पर मस्जिद के छीने जाने का आरोप भी सरासर गलत है। उस मस्जिद के लिए जगह वक्फ करने वाले और मस्जिद का निर्माण करने वाले सब बरेलवी हैं, मस्जिद की कमेटी भी बल्कि बरेलवी ख्यालात के लोगों पर आधारित है और इस सबके दस्तावेजी सुबूत भी मौजूद हैं। हाँ कुछ दिनों के लिए अवश्य यहाँ तकिया करके एक देवबंदी इमाम ने नमाज़ पढ़ाई है। एक बार लोगों कोशक भी हुआ तो इमाम साहब ने मस्जिद में सबके सामने कुरआन पाक हाथों में उठा कर इस बात का हल्फ लिया कि वह देवबंदी नहीं हैं। इसके बाद बाजाब्ता बरेलवी इमाम की नियुक्ति देवबंदी इमाम के लिखित इस्तीफे के बाद अमल में आई। कोई झगड़ा, फसाद कुछ नहीं। देवबंदियों ने अंदर झगड़े का काम यह किया कि पहले से गैर मुसतअफी असली और सक्रीय कमेटी के रहते हुए अपनी तरफ से एक दूसरी नई कमेटी खुफिया तौर पर तशकील दे डाली। खुलासा यह कि सेवार मस्जिद विवाद से संबंधित पिछले और मौजूदा पहलुओं पर नजर डालने के बाद यही साबित होता है कि इस विवाद के जिम्मेदार केवल और केवल देवबंदी हजरात हैं। यहाँ यह कहना भी अवामी हमदर्दियों के हासिल करने की गैर महमूद कोशिश करना है कि सेवार में बरेलवियों की अक्सरियत थी, एक ही मस्जिद ऐसी थी जिसमें देवबंदी मुकर्रर थे, बरेलवियों ने यह भी जबरदस्ती उनसे छीन ली, यह आम लोगों को बेवकूफ बनाना है, सेवार में घास मंडी वाली मस्जिद आज भी देवबंदियों के कब्ज़े में है, देवबंदी इमाम, देवबंदी मोअज़्ज़िन और देवबंदी ही नमाज़ी। हकीकत यह है कि देवबंदियों के जरिये ऐसे क़स्बाकी जामा मस्जिद पर कब्ज़ा और उसमें अपनी मर्जी के इमाम की नियुक्ति की कोशिश निहायत फितना अंगेज़ है जिसकी आबादी का ९० प्रतिशत हिस्सा बरेलवियों पर आधारित है। ऐसी सुरत में लाज़िमन फितना व फसाद पैदा होगा।

लेखक का यह कहना भी केवल एक झूट है कि बरेलवी हजरात हिंसक होते हैं और यह कि बरेलवी उलमा हिंसक तकरीर करते हैं। सच्चाई यह है कि हिंसा का प्रदर्शन दोनों तरफ से बराबर होता है। मौलाना जरजीस और मौलाना ताहिर गयावी साहेबान यह दो ऐसे मकतबे वहाबियत के उपदेशक व प्रचारक हैं कि खुदा मालुम अब तक देश के कितने हिस्सों में देवबंदी बरेलवी झगड़े करा चुके हैं। इन हजरात की तकरीरों का लाज़मी जुज़ बरेलवी उलमा को मुनाजरे का चैलेंज देना है। उनमें से एक मौलाना साहब कई साल पहले बरेली के रिछा हलके के एक जलसे में आए जहां उन्होंने बहुत भड़काऊ तकरीर की और फिर आखिर में उलमा को अरबी ज़बान में मुनाजरे का चैलेंज दे कर सवेरे ही रुखसत हो गए। इसके बाद से जिसकी वजह से बाद में वहाँ कई दिनों तक माहौल में ज़बरदस्त मसलकी तनाव रहा और कई दिनों तक दनों तरफ से अपने अपने मुहल्लों में बैठ कर लाउड स्पीकरों में मुनाजराना बहस चलती रही यही मौलाना एक बार एक जिला आजम गढ़ के कस्बा मुबारकपुर में तकरीर के लिए गए तो वहाँ शैख़ अब्दुल कादिर जिलानी अलैहि रहमा के संबंध में अत्यंत भड़काऊ वाक्य बोल दिए और हालात पुरी तरह खराब हो गए। साल भर पहले बलिया जिले के क़ाज़ी पूरा में देवबंदी उलमा को बुरी तरह मार मार कर ज़ख्मी कर दिया जहां एक इस्लाही जलसा होना था और अभी तिलावत व नात का दौर ही चल रहा था। अमरोहा के हसन पुर के हलके में तबलीगी जमात वालों ने मुझसे एक फ़ाज़िल दोस्त के उस्ताद को पहले मुनाजरे का चैलेंज दिया और फिर बहस के दौरान बुरी तरह मारा पीटा, कुछ साल पहले बस्ती जिले में देवबंदी मदरसे जामिया इस्लामिया ने वहाँ नमाज़ पढ़ रहे एक बरेलवी सूफी मिजाज़ पांच वक्त के नमाज़ी शख्स को इतना मारा कि मार ही डाला और मस्जिद से उनकी लाश उठाई गई, मुंबई में अभी लगभग छः महीने पहले एक जलसा में एक प्रिसद्ध मुनाजिर बरेलवी को मुनाजरे का चैलेंज दे गए जिससे वहाँ के माहौल में खासा मसलकी तनाव पैदा हो गया। देवबंदी हजरात बात चीत में भी बड़ी इश्तेआल अंगेजी करते हैं, मेरे गावं में एक देवबंदी मौलाना का सुसराल है। एक बार गावं की मस्जिद में अज़ान के वक्त उन्होंने कुछ लोगों को मोहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के नाम पर अंगूठा चुमते हुए देख लिया तो कहने लगे कि यह घोड़े की दुम की तरह क्या चुमचुम कर रहे हो, खामोशी से अज़ान सुनों। उन्हीं मौलाना ने एक बार गावं की कुछ औरतों के एक सवाल के जवाब में कहा कि मैं केवल इतना जानता हूँ कि छोटे मज़ार में छोटा कुत्ता और बड़े मज़ार में बड़ा कुत्ता।

गरज इस तरह की कई मिसालें दी जा सकती हैं। खुलासा यह है कि देवबंदियों और बरेलवियों में फर्क केवल इतना है कि देवबंदी हजरात अम्बिया या औलिया की शान में अधिक जसारत करते हैं या कुछ मखसूस मसाइल पर शरारत अंगेज़ तमाम कसते हैं और बरेलवी हजरात खुद देवबंदियों को बुरा भला या वहाबड़ा कहते हैं, गाँव देहात के सादा लौह मुसलमान जब देवबंदी मकतबे फ़िक्र के लोगों से इस तरह की बातें सुनते हैं तो वह पुरी तरह भड़क जाते हैं और फिर आइन्दा ऐसे लोगों से सुनना पसंद नहीं करते। हालांकि शुरू शुरू में उन्हें खालिस नमाज़ व रोजा ही की बातें क्यों ना बताई जाएं। मुस्लिम अवाम या फिर उलमा भी एक लम्हा के लिए अपने उपर तो किसी भी तरह की नाज़ेबा बातें बर्दाश्त कर सकते हैं, कोई उन्हें कबर पुजवा कहे, मजारी कहे, बिदअती कहे, खुराफाती कहे, यह सब तो बर्दाश्त हो सकता है। इसके लिए आवश्यक तौर पर देवबंदियों को अपने उपर कंट्रोल करना पड़ेगा वरना हकीकत यह है कि आए दिन सेवार जैसे घटना पेश आते रहेंगे, मिल्लत बिखरती रहेगी और हम यही सोचते रहेंगे कि यह फूट हमने नहीं आपने पैदा किया है अर्थात हम दुसरे पर आरोप लगाते रहेंगे।

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