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Hindi Section ( 10 May 2012, NewAgeIslam.Com)

Pakistan: Growing Doubts and Religious Preferences पाकिस्तानः बढ़ती हुई कशमकश और मज़हबी क़ूवतें



मुजाहिद हुसैन, न्यु एज इस्लाम

11 मई, 2012

(उर्दू से अनुवाद- समीउर रहमान, न्यु एज इस्लाम)

ताज़ातरीन खबर ये है कि आला सतह की एक विशेष बैठक में ये फैसला किया गया है कि देफाए पाकिस्तान कौंसिल के जलसों के लिए बड़े शहरों में इजाज़त नहीं दी जाएगी क्योंकि देफाए पाकिस्तान कौंसिल के लीडरान पाकिस्तान की विदेशी समस्याओं में इज़ाफे की वजह बन रहे हैं। जमातुद्दावा जो अमली तौर पर देफाए पाकिस्तान कौंसिल के जलसों के तमाम व्यवस्थाओं के लिए जिम्मेदार हैं, इसके अमीर हाफिज़ सईद के तीखे बयानों और बाहरी दुनिया के बारे में हिंसक नज़रिये के कारण पाकिस्तान को विदेशी मोर्चे पर अपमान का सामना करना पड़ रहा है। कुछ लोगों का मानना ​​है कि पाकिस्तानी सत्ता देफाए पाकिस्तान कौंसिल को आंतरिक और बाहरी मोर्चों पर इस्तेमाल कर रही थी और जहां देश में राजनीतिक दलों को इसके द्वारा संदेश दिया जाता था वहीं भारत, अमेरिका और यूरोपीय देशों को भी कौंसिल के ज़रिए सख्त किस्म के संदेश दिए जा रहे थे। शक्तिशाली संगठन नहीं चाहते  हैं कि देफाए पाकिस्तान कौंसिल को निष्क्रिय किया जाये जबकि विदेश मंत्रालय की ओर से स्पष्ट रूप से बता दिया गया है कि अगर देफाए पाकिस्तान कौंसिल इसी तरह हिंसक व्यवहार का प्रदर्शन करती रही तो न सिर्फ पाकिस्तान के विदेशी संबंध बुरी तरह प्रभावित होंगे बल्कि पाकिस्तान के आर्थिक हितों को भी गंभीर आघात पहुंचेगा।

जाहिर है सहमी हुई और घिरी हुई सिविल सरकार एक बार फिर जी.एच.क्यू. की तरफ देखेगी और सैन्य नेतृत्व से विनती भरे स्वर में सवाल किया जाएगा कि देश के धार्मिक संगठनों के इस हिंसक मानी जाने वाली सभा की खुफिया सरपरस्ती से परहेज़ कैसे किया जा सकता है? जवाब में राष्ट्रीय सुरक्षा और सीमाओं की रक्षा के पवित्र दायित्व जैसे पेचदार शब्दों की मदद से ये स्पष्ट करने की कोशिश की जाएगी कि देफाए पाकिस्तान कौंसिल की आवाज़ जनता की आवाज़ है। हालांकि देखा जाए तो जनता की आवाज़ पीपुल्स पार्टी, मुस्लिम लीग नवाज़, मुस्लिम लीग क़ायद, एम.क्यू.एम. और ए.एन.पी. हैं। हमीद गुल, हाफिज़ सईद, मुनव्वर हसन, समीउल हक, शेख रशीद, एसएम ज़फ़र और एजाज़ुल हक़ किसी सूरत भी कौमी नुमाइंदगी का दावा नहीं कर सकते क्योंकि उनमें से ज़्यदातर पिछले कई चुनावों में शर्मनाक हार खा चुके हैं। कई एक ऐसे हैं जिन्होंने पाकिस्तान में इंकलाब लाने का नारा लगाया, अपना अलग राजनीतिक दल बनाया लेकिन सिवाय उनके कोई दूसरा उनकी राजनीतिक पार्टी का सदस्य नहीं बना। मायूस और मोताज़बज़ब इन लोगों की इस जलसे के पास सिवाय इसके कुछ नहीं कि पाकिस्तान को खतरों से दो चार कर दिया जाये। विडंबना ये है कि आज इस सभा को राज्य के कुछ संगठन मदद कर रहे हैं ताकि नागरिक सरकार के लिए रुकावट पैदा की जाये और संभावित चुनाव में अपनी मर्ज़ी के नतीजे हासिल किये जायें। ये इदारे इस बात से बेखबर हैं कि इस तरह के हिंसक खयाल वाले जलसे को अगर खुलकर खेलने का मौका दिया गया तो जोखिम में घिरे राज्य का क्या बनेगा। मज़हबी व मसलकी हिंसा के प्रचारक इन जमातों के हाथों पाकिस्तान की क्या दुर्गत बनेगी और सबसे बढ़कर पाकिस्तान को किस तरह के बाहरी मोर्चों पर उलझना पड़ेगा?

देफाए पाकिस्तान कौंसिल का नेतृत्व अच्छी तरह जानता है कि पाकिस्तान की पारंपरिक चुनावी राजनीति में उसकी जगह नहीं है और वो अपने सशस्त्र और प्रशिक्षित मुजाहिदीन और फिदाईन के ज़रिए आसानी से सत्ता हासिल नहीं कर सकती। देफाए पाकिस्तान कौंसिल के नेतृत्व को अच्छी तरह पता है कि पाकिस्तानी फ़ौज का उच्च नेतृत्व पाकिस्तान में हिंसक धार्मिक इंकलाब से बिदकता है और अब फ़ौज में ऐसे लोगों की संख्या बहुत कम है जो कथित तौर पर हिज़्बुत तहरीर से जुड़े ब्रिगेडियर अली खान जैसा सोचते हैं और अपने सोचे हुए पर अमल करने की कोशिश करते हैं। यही वजह है कि हमें कभी कभी हिंसक दक्षिणपंथी अख़बारों और रसाएल में ऐसे लेख देखने को मिलते हैं जिनमें इस बात पर भरपूर तास्सुफ का इज़हार किया गया होता है कि पाकिस्तान की फौज में मोहम्मद बिन कासिम जैसे लोगों की कमी क्यों है। पाकिस्तानी फ़ौज के नेतृत्व की सामूहिक छवि धर्मनिरपेक्ष क्यों है और पाकिस्तानी फ़ौज आलमे इस्लाम के सैनिक नेतृत्व का पवित्र कर्तव्य क्यों अदा नहीं करती। हालांकि ब्रास टेक नाम के भावनात्मक संस्थान की तरफ से अब ऐसी किताबें भी प्रकाशित होने लगी हैं जिनमें पाकिस्तानी फ़ौज के नेतृत्व को इस बात पर उकसाया जाता है कि अगर पाकिस्तान भारत पर परमाणु हमला कर दे और साथ ही अपने दूर तक मार करने वाली मिसाइलों की मदद से ईरान के साथ गठजोड़ करके धरती पर से शैतानियत के केंद्र इसराइल पर भी एक छोटा परमाणु हथियार दाग दे तो दुनिया में हर तरफ अमन और शांति का दौर दौरा हो जाएगा। इसके बाद पाकिस्तान दुनिया भर के मुस्लिम देशों और जनता की आंख का तारा होगा और दुनिया भर के कुफ़्फ़ार धूल चाटने पर मजबूर हो जाएंगे।

ज्यों ज्यों पाकिस्तान की सिविल सरकारें जनता की आवश्यकताओं और अपेक्षाओं को पूरा करने में नाकाम साबित हो रही हैं, अवामी बेचैनी की सिम्त (दिशा) वही रुख अख्तियार कर रही है जिसका प्रचार पाकिस्तान के मजहबी व मसलकी हिंसक समूह करते आए हैं। शिक्षित और ज़िंदगी का बड़ा हिस्सा पश्चिम में बिताने वाले पूर्व क्रिकेटर इमरान खान सिवाय शरीयत लागू करने के वादे के वो सब कुछ करना चाहते हैं जो पाकिस्तान की हिंसक धार्मिक दलों की इच्छा है। सियासी तौर से मोताज़बज़ब इमरान खान से ये बईद नही कि पीपुल्स पार्टी और मुस्लिम लीग नवाज़ को हराने के लिए खुद पर और अपनी पार्टी पर धार्मिक रंग चढ़ा लें क्योंकि अक्सर उन्हें अपनी दकियानूसी की वज़ाहत करने का दौरे पड़ता है। विडंबना ये है कि अभी तक इमरान खान की राजनीतिक सराहना के पीछे पाकिस्तान के पारंपरिक किंगमेकर खुफिया संस्थाओं की मदद का नाम लिया जा रहा है। अभी तक आशा की स्पष्ट किरण मौलाना फजलुर्रहमान दिखाई देते हैं जो अपनी मसलकी पज़ीराई और पाकिस्तान में मदरसों की बहुमत के दबाव के मद्देनजर सरकार में शामिल रहे हैं और अच्छी तरह जानते हैं कि लोकतांत्रिक सरकारों की मदद से फायदा हासिल किया जा सकता है। वो देफाए पाकिस्तान कौंसिल और इस जैसी मोताज़बज़ब राजनीतिक और धार्मिक ताकतों से अपने को दूर रखने में कामयाब हैं। लेकिन ये कहना मुश्किल है कि कब तक '' दूर''  रहेंगे क्योंकि ज्यों ज्यों अफगानिस्तान से पश्चिमी देशों की फ़ौज की वापसी का वक्त करीब आ रहा है पाकिस्तान के ताकतवर इदारों और मज़हबी कुवतों में टिटेनस के आसार नुमाया होते जा रहे हैं।

हाल ही में लिखी "पंजाबी तालिबान" सहित नौ पुस्तकों के लेखक, मुजाहिद हुसैन अब न्यु एज इस्लाम के लिए एक नियमित स्तंभ लिखेंगेَ। वो लगभग दो दशकों से इंवेस्टिगेटिव जर्नलिस्ट के तौर पर मशहूर अखबारों में लिख रहे हैं। उनके लेख पाकिस्तान के राजनीतिक और सामाजिक अस्तित्व, एक देश के इसकी शुरुआत के कम समय गुजरने के बाद से ही मुश्किल दौर से गुजरने से सम्बंधित क्षेत्र को व्यापक रुप से शामिल करते है। हाल के वर्षों में स्थानीय, क्षेत्रीय और वैश्विक आतंकवाद और सुरक्षा से संबंधित मुद्दे इनके अध्ययन के विशेष क्षेत्र रहे है। मुजाहिद हुसैन के पाकिस्तान और विदेशों के संजीदा हल्कों में काफी पाठक हैं। स्वतंत्र और निष्पक्ष ढंग की सोच में विश्वास रखने वाले लेखक मुजाहिद हुसैन, बड़े पैमाने पर तब्कों, देशों और इंसानियत को पेश चुनौतियों का ईमानदाराना तौर पर विश्लेषण पेश करते हैं।

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