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Who Is Defeated In The Victory Of The Taliban? तालिबान की जीत में किसकी हार हुई है?

मुजाहिद हुसैन

उर्दू से अनुवाद, न्यू एज इस्लाम

15 अगस्त 2021

इसमें कोई शक नहीं कि पाकिस्तान में तालिबान का विरोध करने वालों की अधिक संख्या ठिकानेलगा दी गई है जो बचे खुचे हैं वह गायब हो जाएंगे या उनको ठोकदिया जाएगा। पिछले वर्षों में बजाहिर तालिबान विरोधी नजर आने वालों में शामिल एएनपी, सैंकड़ों मिश्रान, एम्क्यूएम्, पीटीएम, किसी हद तक पीपुल्ज़ पार्टी और इक्का दुक्का सेकुलर लिबरल ठोकदिए गए हैं और अगर कहीं किसी राजनितिक जमात में कोई रमक नजर आती है तो संभावित नजर आने वाली यलगार में वह कसर भी पुरी हो जाएगी। सामाजिक स्तर पर तालिबान विरोधी सोच रखने वाले किसी गिरोह या अफराद को तलाश करने की आवश्यकता नहीं है क्यों कि ऐसा कोई है ही नहीं और अगर सोशल मीडिया की हद तक कोई फुजूल बातें करने की कोशिश करता है तो इसको तसल्ली बख्श जवाब देने वालों की संख्या लाखों में है। गोया यह महाज़ भी साफ़ है। एएनपी और पिपुल्ज़ पार्टी पिछले चुनावों और कई दुसरे मौकों पर अपने लीडरों और कार्यकर्ताओं की सफाईके बाद अच्छी तरह जान चुकी हैं कि इस महाज़ पर हमेशा उन्हें खुली शिकस्त होगी। तालिबान और उनके साथियों के लिए जितनी फिज़ा पाकिस्तान में साज़गार है शायद उतनी अभी अफगानिस्तान में नहीं। वहाँ पर प्रतिरोध का सिलसिला कुछ समय तक जारी है और तालिबान को पुर्णतः सुकून के साथ हुकूमत न करने दी जाए।

एक राज्य के रूप में, हम पूरी तरह से स्थिर स्थिति में हैं क्योंकि हम अभी भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अकेले हैं। यह स्थिति हमारे लिए नई नहीं है क्योंकि हम लंबे समय से इस स्थिति में हैं। यूरोपीय संघ में एक भी देश हमारे साथ नहीं खड़ा है क्योंकि बाहरी दुनिया हम पर विश्वास करने को तैयार नहीं है। संयुक्त राज्य अमेरिका के साथ हमारा रिश्ता एक फोन कॉल की दूरी पर अटका हुआ है, हम यह भी नहीं जानते कि कॉल आने पर क्या करना है और अगर यह नहीं आया तो हम क्या करेंगे। ऐसा लगता है कि हमारा विदेश मंत्रालय ऐसे गीतकारों की तलाश में है जो तालिबान की तारीफ करने में व्यवस्था की मदद कर सकें। मानो या न मानो, 'लिम लेट' शब्द इस स्थिति का वर्णन करने के लिए पर्याप्त नहीं है। इस हतोत्साहित करने वाली स्थिति में अगर हम केवल पाकिस्तान की सीमाओं के भीतर रहने वाले वर्गों को देखें, जिन्हें तालिबानवाद के इस राक्षस का सामना करना पड़ेगा तो रोंगटे खड़े हो जाते हैं कि आगे क्या होगा?

एक बात तो यह लगभग तय है कि जो लोग सोचते हैं कि तालिबान उनकी मातृभूमि में दया के रूप में आएंगे, उनकी बलबलाहट सबसे पहले सुनी जाएगी। संपन्न सरकारी और गैर-सरकारी अधिकारी देश से भागने की कोशिश करने वाले पहले व्यक्ति होंगे, और यह संभावना है कि उनमें से अधिकांश ने इस तरह की व्यवस्था बहुत पहले ही कर ली है, बस आखिरी बिगुल की प्रतीक्षा कर रहे हैं। वे इस बात से अच्छी तरह वाकिफ हैं कि मातृभूमि में उनके शानदार महल उन्हें आश्रय नहीं दे पाएंगे। उन्हें वह सुविधाएं नहीं मिलेंगी, जिनकी उन्हें आदत है। ऐसे में छोड़ देना ही बेहतर है। अगर कोई सोशल मीडिया पर जारी सूचनाओं और आंकड़ों पर विश्वास करता है, तो एक भी पूर्व या वर्तमान शीर्ष अधिकारी को नहीं देखा जा सकता है जिसने ऐसी योजना नहीं बनाई है या अभी तक विदेश में निवेश करने पर विचार नहीं किया है। हालांकि, कुछ समय के लिए कोरोना जैसी महामारी से उनका तत्काल प्रस्थान बाधित हो सकता है क्योंकि अंतरराष्ट्रीय हवाई यात्रा कुछ हद तक प्रतिबंधित है। लेकिन मैं पक्के तौर पर कह सकता हूं कि ये लोग जरूर जाएंगे क्योंकि इन्हें रोकने वाला कोई नहीं होगा।

पीछे छूट जाएगा चरमपंथियों की पसंदीदा 'खाद्य सामग्री', कमजोर और विभिन्न धर्मों और संप्रदायों के लोग। राज्य प्रशासन में स्पष्ट पुरातन कमजोरी के कारण, व्यक्तिगत स्तर पर सशस्त्र पुरुषों की संख्या बहुत अधिक है और यह सबसे खतरनाक कारक है। कुछ हद तक प्रतिस्पर्धा करने के लिए बड़ी संख्या में लोग अपनी पहचान के साथ एकजुट होने का प्रयास करेंगे। इस दौरान उनके अपने 'खातों' का भी भुगतान किया जाएगा और अवमानना के आरोपों के बाद हत्याएं की जाएंगी ताकि संपत्ति आदि को भी जब्त किया जा सके। सामूहिक अराजकता की स्थिति सामने आएगी जिसे राज्य ने रोकने की अपनी क्षमता लगभग खो चुकी है। अल्पसंख्यकों की स्थिति का अंदाजा लगाने के लिए इतना ही काफी है कि कोई भी बहुसंख्यक पूरी तरह सुरक्षित नहीं होगा। सामाजिक रूप से विभाजित और चिह्नित अल्पसंख्यक कब तक प्रतिस्पर्धा कर सकते हैं, इस बारे में ज्यादा सोचने की जरूरत नहीं है, हम अल्पसंख्यकों की सुरक्षा पर अपना रिकॉर्ड पहले ही देख चुके हैं। कई लोग सवाल करेंगे कि अफगान तालिबान हम पर आक्रमण क्यों नहीं करेगा, फिर ऐसा नक्शा क्यों बनाया जा रहा है। उनके लिए जवाब यह है कि अफगान तालिबान ने हमारे 70,000 लोगों को पहले शहीद नहीं किया था, वे "हमारे" ही लोग थे, अपने भाइयों को बंद कर दिया गया था और उस समय स्थानीय स्तर पर उनके समर्थकों की संख्या बहुत कम थी। अब हम आम तौर पर इन स्थानीय तालिबान के पक्ष में हैं। हमारे मीडिया पर कई घंटे उनके कामों की जमकर तारीफ होती है। अब हम हत्यारों के माथे को चूमते हैं और उनके बचाव करने के लिए लाखों की संख्या वाली पार्टियाँ वजूद में आ चुकी हैं। अब तो हम उनके दीवाने हो गए हैं। यह एक तरह की आत्म-यातना है जिससे बाहर निकलना असंभव है। आज जिधर देखो, संरक्षणवादी भावना का ज्वार बह रहा है। राज्य और राज्य संस्थानों की स्थिति किसी से छिपी नहीं है। और अतिवादी और उनके सहयोगी जितने खुश और अधीर हैं, यह स्पष्ट है।

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