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Hindi Section ( 18 March 2014, NewAgeIslam.Com)

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Is Elimination of Terrorism Possible? (Part 2) क्या आतंकवाद का खात्मा सम्भव है? भाग 2

 

 

 

 

मुजाहिद हुसैन, न्यु एज इस्लाम

15 मार्च, 2014

इसमें कोई आशंका नहीं रही कि राज्य पर क़ब्ज़ा करने के इच्छुक आतंकवादियों और उनके समर्थकों का सफ़ाया कठिन लक्ष्यों में शामिल हो चुका है क्योंकि पाकिस्तान में नागरिक और सैन्य सरकारों के खराब प्रदर्शन ने आम लोगों को इतना नाखुश कर दिया है कि वो शिक्षात्मक सज़ा की कल्पना में राहत महसूस करने लगे हैं। धार्मिक लबादा ओढ़े कट्टरपंथियों के बारे में ये भी माना जाता है कि वो दरवेशों के जैसे इंसान हैं और उनका एक सूत्रीय दृष्टिकोण और लक्ष्य ये है कि अल्लाह की ज़मीन पर अल्लाह का क़ानून पूरी ताक़त के साथ लागू कर दिया जाए चाहे इसको हासिल करने के लिए जितने भी इंसानों का क़त्ल किया जाए, कोई हर्ज नहीं।

मिसाल के तौर पर पाकिस्तान में सैन्य तानाशाह परवेज़ मुशर्रफ़ के शासन को शुरूआत में वैधता प्रदान करने वाली अदालत के मुख्य न्यायाधीश इफ्तिखार चौधरी को बाद में सार्वजनिक स्वीकार्यता सिर्फ इसलिए हासिल हुई कि वो  कानूनी रणनीति को अपनाने वाले लोगों और संस्थाओं को उल्टा लटका देंगे। बड़े अधिकारियों को सज़ाए सुनाई जाएंगी और देश में न्याय का बोल बाला होगा, लोगों ने अपने वंचित होन के पटाक्षेप को मुख्य न्यायाधीश के व्यक्तित्व से जोड़ दिया। पूर्व चीफ जस्टिस से बांध ली जाने वाली उम्मीदों और उग्रवादियों की शक्तिशाली संस्थाओं और व्यक्तियों के खिलाफ बेरहम हमलों के द्वारा बदला लेने और सुधार के लिए अनगिनत इच्छा रखने वालों की प्रतिबद्धता एक समझ में आने वाली स्थिति है।

जैसे न्याय की इच्छा रखने वाले अनगिनत लोग पूर्व चीफ जस्टिस के व्यक्तित्व से जुड़ी चमक दमक और विशुद्ध निजी हितों में पिरोई हुई निष्पक्षता से अवगत नहीं थे ऐसे ही वो तालिबानों के सशस्त्र समूहों की कार्यप्रणाली और उनकी महत्वाकांक्षाओं के बारे में बहुत हद तक अनजान हैं। आम लोगों का बताया जाता है कि अफगान मुजाहिदीनों ने पहले लादेन रूसियों को तबाह व बर्बाद कर दिया और अब अमेरिका सहित नाटो की बहुराष्ट्रीय सेना को धूल चाटने पर मजबूर कर दिया है। दुनिया की इतने अधिक शक्तिशाली राष्ट्रों की सेना को हाराने वालों से गायबाना तौर पर ये उम्मीद बंध जाती है कि वो हिंदू भारत की कायर सेना का मिनटों में सफाया कर देंगे और जो काम हमारे पूर्व शासक और ज़बरदस्त सेना सात दशकों में नहीं कर सकीं, वो काम कुछ दिनों में सशस्त्र उग्रवादी कर डालेंगे।

मिसाल के तौर पर पाकिस्तानी मीडिया में कोई इस तरह के निष्पक्ष शोध करने को तैयार नहीं कि पाकिस्तान में हज़ारों लोगों की मौत के ज़िम्मेदार सांप्रदायिक दलों और समूहों की शक्ति का मुख्य केंद्र कहां स्थित है? पाकिस्तान में उग्रवाद के स्रोत कहाँ और कैसे फूटते हैं? पाकिस्तान के राजनीतिक और धार्मिक दलों ने सांप्रदायिकता और उग्रवाद में कैसी भूमिका अदा की है? पाकिस्तान के शक्तिशाली संगठनों ने इस बारे में कैसी भूमिका निभाई है? सबसे बढ़कर आज पाकिस्तान जिस स्थान पर खड़ा है यहाँ से वापसी के लिए उसे किस तरह के कठिन चरणों से गुज़रना होगा? और दुर्भाग्य से अगर ये सफर जारी रहता है तो भविष्य का पाकिस्तान कैसा होगा? बुरी तरह से बँटी हुई और दुविधा से भरी टेलीविजन चर्चाओं में द्विपक्षीय इच्छाओं और एक दूसरे को चित कर देने तक सीमित संवाद से अधिक कुछ नज़र नहीं आ रहा है। नौबत यहां तक ​​पहुंच चुकी है कि बुद्धिजीवी वर्ग दो स्पष्ट गुटों में बंटे हुए हवा में तलवारें चलाते नज़र आते हैं और राज्य तबाही की तरफ बढ़ रहा है।

शायद बहुत कम लोग ये मानने को तैयार हैं कि निर्वाचित सरकार की तरफ से हाल ही में बातचीत की दावत ने उग्रवादियों को न केवल मज़बूत किया है बल्कि राज्य के भीतर उनके हितैषियों की आवाज़ को बल प्रदान किया है।  सरकार स्पष्ट रूप से कट्टरपंथियों के सामने औंधे मुंह लेटी हुई नज़र आती है, जिसकी स्वाभाविक रूप से मजबूत स्थिति की  अपनी अवधारणा धुँधला हो चुकी है और बातचीत की दावत आगे बढ़कर अनुनय विनय का रूप धारण कर चुकी है। स्पष्ट रूप से दिख रहा है कि सेना ने बातचीत में अपने नुमाइंदे की भागीदारी से इंकार करके सरकार की मज़बूत स्थिति की  कल्पना की मरम्मत करने की कोशिश की है। इसमें कोई शक नहीं कि मौजूदा सरकार आज भी कई मामलों में मुशर्रफ दुश्मनी की अपनी पारंपरिक अवधारणा से जान नहीं छुड़ा सकी और इसे तालिबान और अलकायदा सहित साम्प्रदायिक समूह, सिर्फ इसलिए बुरे नहीं लगते कि दोनों ''मुशर्रफ दुश्मनी'' का एक साझा मूल्य रखते हैं। हालांकि कट्टरपंथियों ने आगे बढ़ कर अपने राज्य के दुश्मन की अवधारणा को उजागर कर दिया है और स्पष्ट कर दिया है कि वो अपने लक्ष्यों पूरा करने के लिए हर प्रकार के हथकंडे अपनाने के लिए तैयार हैं।

नवाज़ शरीफ़ को हर समय ये एहसास दिलाया जाता है कि आतंकवादियों का स्पष्ट लक्ष्य वो नहीं बल्कि उनके हर प्रकार के विरोधी लोग हैं, जो पाकिस्तान के धार्मिक आधार के दुश्मन हैं और राज्य को पश्चिम का आश्रित बनाना चाहते हैं। इन्हें बताया जाता है कि अगर उनकी सरकार कबायली क्षेत्रों और पाकिस्तान के बड़े शहरों में जड़ पकड़ चुके चरमपंथियों और सांप्रदायिक ताकतों के खिलाफ खुली जंग छेड़ देगी तो अंतिम नुकसान निर्वाचित सरकार को उठाना पड़ेगा और फिर कोई शक्तिशाली अभियान जो उन्हें आसानी के साथ सत्ता से बाहर फेंक कर देश की न्यायपालिका को अपने साथ कर लेगा और इस प्रकार वो प्रकृति द्वारा प्राप्त शासन का ये लगभग आखिरी मौका भी गंवा देंगे। मियां साहब दरअसल एक ऐसे सहमे हुए व्यक्ति की तरह दिखाई देते हैं जो अनगिनत दुश्मनों की भीड़ में खज़ाना हाथ आ जाने के बाद उसकी सुरक्षा के भय सहित दुश्मनों की छीना झपटी से परेशान होता है। ये एक ऐसी स्थिति है जहां बिना डरे बड़े निर्णय करना हमेशा मुश्किल होता है।

अब देखना ये है कि वर्तमान सरकार तबाही के खतरे का समाना कर रहे राज्य को किस तरह स्थिरता प्रदान करती है।  पड़ोसी अफगानिस्तान से विदेशी सैनिकों की वापसी के बाद संभावित रूप से नज़र आने वाली खतरनाक स्थिति से निपटने के लिए पाकिस्तानी राज्य दो दशक पहले की अपनी लगभग प्राचीन रणनीति पर फिर आगे बढ़ जाती है या दूर रहकर अपने हितों के लिए बेहतर अंदाज़ को अपनाती है। देश में फैले आतंकवाद के नेटवर्क को कमज़ोर करती है या रणनीतिक गहराई की पिटी हुई कल्पना को चमकाने में जुट जाती है? जिसके तहत हम राज्य के कोने कोने में सशस्त्र अभियानों वाले समूहों को पूरी तरह शक्तिशाली बना चुके हैं। ये एक ऐसी दुविधा है जिसके लगभग सभी लक्षण राज्य के अस्तित्व और पाकिस्तानी समाज के विकास के लिए खतरनाक हैं।

दूसरी तरफ कोई एक सशस्त्र गिरोह भी नवाज़ शरीफ़ की सरकार के लिए सद्भावना नहीं रखता। न उन्हें पाकिस्तानी जनता से किसी प्रकार की सहानुभूति है और न ही पाकिस्तान की सेना उनके यहां किसी बेहतर व्यवहार की हक़दार है।  आतंकियों की इस सम्बंध में एकाग्रता पाकिस्तानी राज्य के लिए अधिक परेशानी पैदा कर देती है जब वो राज्य के संविधान और उसके संस्थानों को सिरे से इंकार कर देते हैं। मज़े की बात ये है कि इस तरह के विचार के प्रचार प्रसार के लिए आतंकवादियों को अनगिनत वकील आसानी से उपलब्ध भी हो जाते हैं जो न केवल राज्य के संविधान को खारिज कर देते हैं बल्कि राज्य की जनता और सेना के अनगिनत बलिदानों को भी सिरे से खारिज कर देते हैं। इस प्रकार लोगों का मन बनाना कैसे सम्भव हो सका है और उसका पटाक्षेप कैसे सम्भव है? (क्रमशः)

मुजाहिद हुसैन ब्रसेल्स में न्यु एज इस्लाम के ब्युरो चीफ हैं। वो हाल ही में लिखी "पंजाबी तालिबान" सहित नौ पुस्तकों के लेखक हैं। वो लगभग दो दशकों से इंवेस्टिगेटिव जर्नलिस्ट के तौर पर मशहूर अखबारों में लिख रहे हैं। उनके लेख पाकिस्तान के राजनीतिक और सामाजिक अस्तित्व, और इसके अपने गठन के फौरन बाद से ही मुश्किल दौर से गुजरने से सम्बंधित क्षेत्रों को व्यापक रुप से शामिल करते हैं। हाल के वर्षों में स्थानीय,क्षेत्रीय और वैश्विक आतंकवाद और सुरक्षा से संबंधित मुद्दे इनके अध्ययन के विशेष क्षेत्र रहे है। मुजाहिद हुसैन के पाकिस्तान और विदेशों के संजीदा हल्कों में काफी पाठक हैं। स्वतंत्र और निष्पक्ष ढंग की सोच में विश्वास रखने वाले लेखक मुजाहिद हुसैन, बड़े पैमाने पर तब्कों, देशों और इंसानियत को पेश चुनौतियों का ईमानदाराना तौर पर विश्लेषण पेश करते हैं।

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http://newageislam.com/hindi-section/is-elimination-of-terrorism-possible?-(part-1)-क्या-आतंकवाद-का-खात्मा-सम्भव-है?-(भाग-1)/d/56075

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http://newageislam.com/urdu-section/is-elimination-of-terrorism-possible?-(part-2)--کیا-دہشت-گردی-کا-خاتمہ-ممکن-ہے؟-قسط-دوئم/d/56145

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