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Hindi Section ( 27 Jun 2014, NewAgeIslam.Com)

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Ban On Jamat-Ud-Dawah: Possibilities And Apprehensions जमातुद्दावा पर प्रतिबंधः आशंकाएं और संभावनाएं

 

 

 

 

मुजाहिद हुसैन, न्यु एज इस्लाम

28 जून, 2014

अमेरिकी गृह विभाग ने जमातुद्दावा और इससे जुड़े दूसरे तीन धार्मिक संगठनों को आतंकवादी करार दिया है लेकिन आश्चर्यजनक बात ये है कि पाकिस्तानी मीडिया में ये अहम खबर बिल्कुल गायब है। अमेरिकी सरकार पाकिस्तान पर जमातुद्दावा और और इसके अन्य तीन उपसंगठनों पर प्रतिबंध के लिए पाकिस्तान पर दबाव बढ़ता है कि नहीं इसके बारे में कुछ कहना जल्दबाज़ी होगी, लेकिन ये तो तय है कि अमेरिका की नज़र में जमातुद्दावा भविष्य में एक खतरा बन सकता है। जमातुद्दावा के संस्थापक नेताओं में शामिल नज़ीर अहमद चौधरी और मोहम्मद हुसैन गिल को भी आतंकवादियों में शामिल किया गया है। अमेरिकी स्टेट डिपार्टमेंट का दावा है कि जमातुद्दावा से जुड़े संगठन दरअसल जमातुद्दावा के ही दूसरे नाम हैं, जबकि मूल संगठन जमातुद्दावा है जो इन नामों के पीछे मौजूद है। ये भी खुलासा किया गया है कि जमातुद्दावा अफगानिस्तान के शहर हेरात में भारतीय काउंसेलेट पर हमले में शामिल था।

गौरतलब है कि इससे पहले जमातुद्दावा के प्रमुख हाफिज़ मोहम्मद सईद और अब्दुर्रहमान मक्की को आतंकवादी करार देकर इनके सिर पर इनाम रखा गया था लेकिन हाफिज़ मोहम्मद सईद और अब्दुर्रहमान मक्की जो आपस में क़रीबी रिश्तेदार भी हैं, उन्होंने इस घोषणा को खारिज कर दिया और पाकिस्तान में अपनी संगठनात्मक गतिविधियां जारी रखे हुए हैं। जमातुद्दावा की तरफ से इस अमेरिकी घोषणा को भारत, अमेरिका और इसराइल का गठजोड़ करार दिया है जो इस्लाम के सबसे बड़े दुश्मन हैं और इस्लामी जेहादी और कल्याणकारी संस्थाओं को बर्दाश्त नहीं कर सकते। हाफिज़ मोहम्मद सईद का कहना है कि ताज़ा अमेरिकी कदम वास्तव में भारत के कहने पर उठाया गया है जिसका स्पष्ट कारण भारत का डर है जो पहले लश्कर से डरा हुआ था और अब जमातुद्दावा इसके लिए एक डरावना सपना है।

जमातुद्दावा से जुड़े जिन अन्य तीन संगठनों को आतंकवादी करार दिया गया है उनमें अंफाल ट्रस्ट, तहरीक हुरमते रसूल सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम और तहरीक तहफ़्फ़ुज़ क़िबलए अव्वल शामिल है। पाकिस्तान में सशस्त्र धार्मिक संगठनों के बारे में एक आम धारणा ये है कि इन संगठनों को पाकिस्तानी सेना का समर्थन प्राप्त रहा है। इसमें शक नहीं कि अफगान जिहाद की पहले दौर में देश के अधिकांश हिस्से और खासकर ख़ैबर पख़्तूनख़्वाह भर्ती केंद्र के रूप में काम करते रहे और अमेरिकी संसाधनों से हमारे धार्मिक दलों को इस क़ाबिल बनाया गया है कि वो रूसी सैनिकों का मुकाबला करने के लिए जिहादे अफगानिस्तान की अवधारणा को परवान चढ़ाएं और फिर हमने देखा कि पाकिस्तान के कोने कोने में कैसे जिहादी नर्सरियां उगनी शुरू हुईं। जिहादे अफगानिस्तान उस वक्त था जब रूस ने अफगानिस्तान पर हमला किया या उसके बाद जब जंगी सरदार एक दूसरे के खिलाफ लड़ रहे थे या फिर उस वक्त जब मदरसों में पढ़ने वाले छात्रों ने हथियार उठा लिए और उन्हें तालिबान का कहा गया? या फिर वास्तविक अफगान जिहाद उस वक्त शुरू हुआ जब अमेरिकी और नाटो सेना ने अफगानिस्तान पर हमला किया और उस हमले का मकसद ये बताया गया कि अफगानिस्तान में अलकायदा नामक आतंकवादी संगठन अपने मज़बूत केंद्र स्थापित कर चुका है।

जहां तक जमातुद्दावा की पहचान का कारण बनने वाले जिहादी संगठन लश्करे तैयबा का सम्बंध है, लश्कर को शुरू में कश्मीर जिहाद के लिए ट्रेनिंग दी गई और कश्मीर में जारी तनाव के दौरान लश्कर के हज़ारों मुजाहिदीन ने भारतीय सेना का मुकाबला किया और इससे कश्मीर की संवेदनशीलता और दोनों देशों के बीच विवाद की प्रकृति बहुत हद तक उजागर हुई। पाकिस्तान में लश्कर को विशेष सराहना तब मिली जब लाहौर की इंजीनियरिंग यूनिवर्सिटी के दो शिक्षकों प्रोफेसर हाफिज़ मोहम्मद सईद और प्रोफेसर ज़फ़र इक़बाल ने मरकज़ दावतुल इरशाद के नाम से एक शिक्षा केंद्र बनाने के लिए सऊदी व पाकिस्तानी दान देने वाले लोगों से संपर्क किया।

भारत के साथ तनावपूर्ण सम्बंध भी इस सिलसिले में मददगार साबित हुए और देखते ही देखते एक मज़बूत संगठन और धार्मिक मदरसा अस्तित्व में आ गया। नब्बे के दशक की शुरुआत मरकज़ दावतुल इरशाद के लिए कामयाबियाँ लेकर आया और मुरीदके के करीब नंगल साहिदाँ नाम के गांव में एक विशाल क्षेत्र में ये मरकज़ स्थापित हो गया। गौरतलब है कि हाफिज़ मोहम्मद सईद और उनके पुराने साथी जनाब अमीर हमज़ा ने जिहाद अफगानिस्तान के दिनों में कनड़ और नूरिस्तान में प्रमुख सल्फ़ी मुजाहिद शेख जमीलुर्रहमान के साथ मज़बूत सम्बंध स्थापित कर लिए थे। इस दौरान हालांकि पाकिस्तानी सत्ता की आंखों का तारा हिज़्बुल इस्लामी के गुलबुद्दीन हिकमतयार थे और शेख जमीलुर्रहमान के साथ उनकी लड़ाई जारी थी। लेकिन हाफिज़ मोहम्मद सईद एक मजबूत संस्था स्थापित करने में सफल रहे जो पाकिस्तानी सत्ता को पूरी तरह आकर्षित कर सकता था। आगे चल कर ये संस्था एक जेहादी गुट लश्कर का केंद्र बना जिसकी अपनी प्रकाशित किताबों और पत्रिकाओं के अनुसार लश्कर ने 1999 से लेकर 2008 तक हज़ारों भारतीय सैनिकों को कश्मीर में हत्या की है।

अब लश्कर पाकिस्तान में प्रतिबंधित संगठन की हैसियत रखता है और हाफिज़ सईद मुंबई हमलों के बाद लश्कर से असम्बद्धता का ऐलान कर चुके हैं। वो जमातुद्दावा नाम के संगठन के प्रमुख हैं जिसको पाकिस्तान में सरकार द्वारा प्रतिबंधित करार देने की कोशिश की गई, लेकिन अदालत ने इसके खिलाफ फैसला दिया।

इसके बाद हाफिज़ मोहम्मद सईद और उनके करीबी अब्दुर्रहमान मक्की को अमेरिकी स्टेट डिपार्टमेंट द्वारा आतंकवादी करार देकर उनकी गिरफ्तारी पर ईनाम रखा गया, लेकिन हाफिज सईद और अब्दुर्रहमान मक्की ने अमेरिकी कदम को स्वीकार नहीं किया और साथ ही पाकिस्तान सरकार भी इस कदम से सहमत न हो सकी और इस तरह इस घोषणा के बाद भी हाफिज़ सईद और अब्दुर्रहमान मक्की को गिरफ्तार नहीं किया जा सका।

जमातुद्दावा और उसका नेतृत्व एक बार फिर निशाने पर है और नवीनतम अमेरिकी घोषणा के बाद जमातुद्दावा के नेतृत्व ने इसे भारत के कहने पर उठाया गया कदम करार दिया है। भारत में कट्टरपंथी दल भाजपा की सरकार इस सम्बंध में एक कड़ा रुख रखती है और अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि भविष्य में भारत सरकार कश्मीरी जिहादी संगठनों और खासतौर से प्रतिबंधित लश्कर तैयबा से जुड़े लोगों के बारे में कड़ा रूख अपनायेगी। दूसरी ओर अमेरिकी सरकार भी जमातुद्दावा पर ये ​​आरोप लगा रही है कि वो अफगानिस्तान में अमेरिकी हितों को निशाना बनाने में व्यस्त है। हेरात में भारतीय कउंसलेट पर हुए हमले में लश्कर तैयबा के शामिल होने का आरोप लगाया जा रहा है, जिसका स्पष्ट अर्थ है कि एक बार फिर जमातुद्दावा के पूर्व जेहादी संगठनों के बारे में संवेदनशीलता बढ़ रही है और दक्षिण एशिया में तनाव की सम्भावना स्पष्ट हो रही है। अगर जमातुद्दावा पर ​​प्रतिबंध को लेकर पाकिस्तान सरकार पर अमेरिकी दबाव में वृद्धि होती है तो सम्भावना यही है कि देश के अंदर भी स्थिति तनावपूर्ण हो सकती है जो पहले से ही सामान्य नहीं है। आने वाले दिनों के कठिन होने के बारे में किसी संदेह की गुंजाइश बाकी नहीं रही।

मुजाहिद हुसैन ब्रसेल्स (Brussels) में न्यु एज इस्लाम के ब्युरो चीफ हैं। वो हाल ही में लिखी "पंजाबी तालिबान" सहित नौ पुस्तकों के लेखक हैं। वो लगभग दो दशकों से इंवेस्टिगेटिव जर्नलिस्ट के तौर पर मशहूर अखबारों में लिख रहे हैं। उनके लेख पाकिस्तान के राजनीतिक और सामाजिक अस्तित्व, और इसके अपने गठन के फौरन बाद से ही मुश्किल दौर से गुजरने से सम्बंधित क्षेत्रों को व्यापक रुप से शामिल करते हैं। हाल के वर्षों में स्थानीय,क्षेत्रीय और वैश्विक आतंकवाद और सुरक्षा से संबंधित मुद्दे इनके अध्ययन के विशेष क्षेत्र रहे है। मुजाहिद हुसैन के पाकिस्तान और विदेशों के संजीदा हल्कों में काफी पाठक हैं। स्वतंत्र और निष्पक्ष ढंग की सोच में विश्वास रखने वाले लेखक मुजाहिद हुसैन, बड़े पैमाने पर तब्कों, देशों और इंसानियत को पेश चुनौतियों का ईमानदाराना तौर पर विश्लेषण पेश करते हैं।

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