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Hindi Section ( 10 May 2012, NewAgeIslam.Com)

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Newt Gingrich is not Alone in Castigating the Classical Islamic Law न्यूट गिंगरिच कदीम इस्लामी कानून की सरज़िनश करने वालों में अकेले नहीं हैं


मोहम्मद यूनुस, न्यु एज इस्लाम

 27 दिसंबर, 2011

(अंग्रेजी से अनुवाद- समीउर रहमान, न्यु एज इस्लाम)

मोहम्मद यूनुस, सह लेखक (अशफाक अल्लाह सैय्यद के साथ),  इस्लाम का असल पैग़ाम, आमना पब्लिकेशन, यू.एस.ए. 2009

अमेरिकी राष्ट्रपति पद के रिपब्लिकन उम्मीदवार न्यूट गिंगरिच, ने जुलाई 2010 में अमेरिकन इंटरप्राइज़ेज़ इंस्टीट्यूट ऑफ वाशिंगटन में एक तक़रीर के दौरान कथित तौर पर कहा है कि "मुझे यकीन है अमेरिका और जिस दुनिया को हम जानते हैं उसमें आज़ादी की बक़ा के लिए शरीयत एक फानी (नश्वर) खतरा है"।

हाल ही में प्रकाशित एक लेख, प्राचीन इस्लामी कानून अल्लाह के अलफाज़ नहीं हैं, भी वर्तमान समय के संदर्भ में घोषणा करता है कि ये "इस्लामी तहज़ीब और आलमी अमन के लिए खतरा है।

हवाला (संदर्भ):

http://www.newageislam.com/hindi-section/the-classical-islamic-sharia-law-is-not-a-word-of-god!-(part-1--how-the-qur’anic-message-has-been-subverted)--प्राचीन-इस्लामी-कानून-अल्लाह-के-अल्फाज़-नहीं-हैं-(भाग-1)/d/6272

http://www.newageislam.com/hindi-section/the-classical-islamic-sharia-law-is-not-a-word-of-god!-(part-ii--the-way-forward)--प्राचीन-इस्लामी-कानून-अल्लाह-के-अल्फाज़-नहीं-हैं-(भाग-2)/d/6289

प्राचीन इस्लामी कानून से वर्तमान समय की दुनिया को खतरों से आगाही के बारे में असंबद्ध मन से निकला उपरोक्त बयान अपशगुन के तौर पर समान है। इसलिए सिर्फ भोले भाले लोग ही न्यूट गिंगरिच के इस बयान को एक राजनीतिक बयान कल्पना करेंगे। हवाले में दिए गए लेख में तर्क विस्तार से दिए गए हैं जो इस सख्त रिमार्क (टिप्पणी) का औचित्य पेश करते हैं। ये दो हिस्सों में इसी अक्टूबर में प्रकाशित हुआ और तीन मुस्लिम पाठकों ने इस पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त की। दुनिया में सर्वोच्च राजनीतिक और सैन्य कार्यालय के लिए एक गंभीर प्रतिद्वन्द्वी के बयान को गंभीरता से लिया जाना चाहिए, अमेरिकी मुस्लिम नेताओं को निम्नलिखित टिप्पणी को बहादुरी के साथ स्वीकार करना चाहिए, जो न्यूट गिंगरिच के बयान का पूरक है और जो एक साल पहले एक अंतर्राष्ट्रीय वेबसाइट पर एक मुस्लिम मुफ़स्सिर द्वारा इस वेबसाइट पर डाला गया था। हवाला:

 en.qantara.de/Mohammed-Yunus-12-September-2010/9446c9550i1p708 /

"वक्त आ गया है कि मुस्लिम विद्वान इस्लामी आस्था में, इसकी मूल किताब कुरआन और धार्मिक नियमों (परंपराओं और शरई कानूनों) के बीच तक्सीम पर तवज्जोह दें: इनमें से एक ईमान के मरकज़ के तौर पर इतिहास के एक ज़माने में ज़ाहिर हुआ, और दूसरा इसकी दूसरी सदी के बाद ईमान के प्रारम्भिक इज़ाफे में लहर के तौर पर सामने आया। जिसका ज़िक्र पहले किया गया वो स्थायी, अनन्त और इतिहास से मुक्त है। जिसका ज़िक्र बाद में किया गया वो ऐतिहासिक कारकों से प्रभावित रहा हैः इस्लाम में दाखिल होने वाले लोगों का इस्लाम से पहले का विश्वास, सांस्कृतिक स्थिति, धार्मिक रुझान और उस ज़माने के शैक्षिक तरीके। इस पर ध्यान दिये बग़ैर कि ये खुदा की तरफ से आया या मुहम्मद सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने इसे कायम किया, अगर इस्लाम की उस 'धर्म' से तुलना की जाती है जिसे कुरान का समर्थन हासिल है तो ये वैश्विक, सहिष्णुता, संतुलित, लैंगिक निष्पक्षता, व्यापक, गैर राजनीतिक, बहुलतावादी और लचीला होगा- हालांकि व्यापक सीमा में, न्याय, स्वतंत्रता, समानता, अन्य विश्वव्यापी धर्मनिरपेक्ष मूल्यों का प्रतिनिधि होगा।

लेकिन अगर ये एक धर्म है, और बराये नाम कुरान का ताज पहना है, लेकिन उन धार्मिक संसाधनों के ईर्द गिर्द अपनी तामीर की है जिस पर मध्यकाल के फुकहा औऱ माहिरीने कानून इसरार करते हैं, तो ये कुरानी मॉडल: समय के विशिष्ट , सहिष्णुता, व्यापक, राजनीतिक रुझान वाला, लैंगिक न्याय, स्वतंत्रता और समानता चाहने वाले, से भिन्न और यहाँ तक कि परस्पर विरोधी हो सकता है। अगर मौजूदा फ़िक़्ही रुझान पर आधारित इस्लाम की सियासज़दा मॉडल बरकरार रहता है, तो इसके मुल्ला लोग, मजहबी पेशवा और रूढ़िवादी लोग पूरे तब्के को मध्यकाल के ज़माने का पाबंद रखे रहेंगे और इस्लाम यूरोप और पश्चिम में (वाज़ेह या खामोशी के साथ) बिल्कुल अजनबी और काबिले नफरत बना रहेगा।

लेकिन अगर मुसलमान धार्मिक नेतृत्व धार्मिक आस्था के बुनियादी सिद्धांतों और कुरान के आफाकी इक़दार (सार्वभौम मूल्यों) पर दोबारा ग़ौर करते हैं और इसकी मजहबी गुफ्तुगू को ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में देखते हैं तो इस्लाम के लिए सेकुलराईज़ेशन, ग्लोब्लाइज़ेशन और पश्चिमी समाज के साथ व्यापक मेल जोल का बहुत अच्छा मौका है।

इसलिए, जैसा कि हवाले दिए गए लेख में नतीजा पेश किया गया है, इसे शायद कुछ लोग पढ़ा चुके होंगे: वक्त आ गया है कि मुसलमानों के कुलीन वर्ग और लीडर प्राचीन इस्लामी (शरई) कानून को आधुनिक इस्लामी कानून (शरई) से बदलें जिसमें पश्चिम के सेकुलर मूल्य भी शामिल हों और जो कुरान के व्यापक दायरे के अंदर हो। इस अमल में देरी या कोई रिआयत खालिद अबुल फज़ल की चिंता को बल प्रदान करेगी, ’क्या ये मुमकिन है कि वो दिन आयेगा कि जब हमारा ज़िक्र खत्म हो जाने वाली तहज़ीबों में होगा।

मोहम्मद यूनुस ने आईआईटी से केमिकल इंजीनियरिंग की शिक्षा हासिल की है और कार्पोरेट इक्ज़ीक्युटिव के पद से रिटायर हो चुके हैं और 90 के दशक से क़ुरान का गहराई से अध्ययन और उसके वास्तविक संदेश को समझने की कोशिश कर रहे हैं। इनकी किताब इस्लाम का असल पैग़ामको साल 2000 में अलअज़हर अलशरीफ, काहिरा की मंज़ूरी प्राप्त हो गयी थी और इसे यूसीएलए के डॉ. खालिद अबुल फ़ज़ल का समर्थन भी हासिल है। मोहम्मद यूनुस की किताब इस्लाम का असल पैग़ामको आमना पब्लिकेशन मेरीलैण्ड, अमेरिका ने साल 2009 में प्रकाशित किया।

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