New Age Islam
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Hindi Section ( 21 Jan 2021, NewAgeIslam.Com)

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Use and Misuse of Freedom of Expression on This Islamic Website (New Age Islam) इस्लामी वेबसाईट (न्यू एज इस्लाम) पर अभिव्यक्ति की आजादी का सहीह और गलत प्रयोग, और एक स्पष्ट एजेंडे की आवश्यकता

मोहम्मद युनुस, न्यू एज इस्लाम

(उर्दू से अनुवाद- न्यू एज इस्लाम)

साझा लेखक (अशफाकुल्लाह सैयद), Essential Message Of Islam २००९, USA, Amana Publications

"बोलने की स्वतंत्रता" की सार्वभौमिक अवधारणा, मज़लूम को ज़ालिम के खिलाफ आवाज़ उठाने का हक़ देता है, बादशाह को आरोपी ठहराने का हक़ देता है, किसी मकतबे फ़िक्र के मानने वाले (फिरके, मज़हब, राजनीति आदि) को उसके विरोधियों पर आलोचना और प्रश्न आदि करने की अनुमति देता है, नए क्षितिज की तलाश, और नई उचाईयों तक उठने के ज़राए प्रदान करता है। लेकिन अगर बोलने की आज़ादी १) का प्रयोग योजना बद्ध तरीके से दूसरों के खुदाओं की तौहीन और २) लोगों की एक जमात को बुरा भला कहने के लिए किया जाए, एक वेबसाईट जो कि इस्लाम के शीर्षक से जुड़ी है, उसे ऐसी चीजों को जगह नहीं देनी चाहिए, इसलिए कि कुरआन, जो इस्लाम में मुआमलात में सबसे अधिक इख्तियार वाला है, उपर्युक्त व्यवहारों में से किसी की अनुमति नहीं देता है। (४९:११, ६:१०८)

इसके अलावा, अगर इसका प्रयोग दूसरों के धर्म को बदनाम करने और विरोधी जमात के लोगों का मज़ाक बनाने के लिए किया गया तो यह नाकिस बातचीत का दरवाज़ा खोल सकता है, जो लोगों के बीच दुश्मनी का कारण होगा, बुराई की बीज बोएगा, और वेबसाईट को सरकश बात चीत के एक फोरम में परिवर्तित कर सकता है। हम किसी को तकलीफ पहुंचाने के मतलब के बिना, इस दृष्टिकोण की सफाई के लिए कुछ ताज़ा मिसालों पर ध्यान देते हैं।

केस १: एक लेख में जिसका शीर्षक ऐ मुल्लाओं तुम पर लानत होहै के तहत, उर्दू शायरी से निम्नलिखित तज्मीन नक़ल कर के, बेहयाई के साथ सारे मुल्ला बिरादरी का मज़ाक बनाया गया है।

ऐ मुल्ला: तुम्हारा पेट एक दुखानी जहाज़ की तरह है,

तुम्हारी गर्दन एक गेंडा की तह है।

ओ मुल्ला:

तुम्हारे लिबास और दाढ़ी से खुशबु आती है

लेकिन तुम्हारे जिस्म से जानवर के शेड की तरह बदबू आती है।

ओ मुल्ला:

तुम धोखा और फरेब देने में लगे हो,

अब अपने हैरत अंगेज़ तरीके की प्रशंसा करना बंद करो।

ओ मुल्ला:

हम, निश्चित रूप से तुम्हारे रास्ते के काबिल नहीं हैं,

आगे बढ़ो, हमें अपनी कम्युनिटी से बाहर करो

ओ मुल्ला:

तुम अपने कन्धों पर दीनदारी के साथ कुरआन लाते हो,

लेकिन तुम्हारा दिल जानवरों की गंदगी से भरा हुआ है।

ओ मुल्ला:

हमें तुम्हारी, आसमानी हूरों (कंवारियों) की आवश्यकता नहीं है,

हमारे लिए हमारे वतन ही, सबसे अधिक अनोखी जन्नत है।

इतिहास के एक लम्हे में, जब पश्चिम में मुसलमानों को तहज़ीबी तौर पर कमतर दर्जा दिया जाता था, और मुस्लिम आप्रवासियों को और जौहरी हथियार से लैस, मुस्लिम ज़मीन को निकालने के लिए शब्द हवा में हैं, और कहीं और, यूरोप में मुसलमानों पर बेरहम फातेह का लेबल लगाया जा रहा है और उन्हें तहज़ीबी तौर पर कमतर समझा जा रहा है। अंदरुनी सतह पर उनकी फिरकावाराना तकसीम, ज़ोर डाल रही है और बढती हुई हिंसा, हलाल सरगर्मियों में कामयाबी बहुत कम है, दुख और अभाव व्यापक हैं, और इंसानी अधिकारों के खिलाफवार्जियाँ (महिलाओं पर अत्याचार, अल्पसंख्यकों के खिलाफ घृणा, जबरी परिवर्तन, आदि) आलमी बिरादरी के लिए खतरे की घंटी हैं। लेखक ने इस तज्मीन को निराला पाया, और उन लोगों के बौद्धिक अपमान का एक स्पष्ट इशारा जिन्हें समाज दानिश्वर मुमताज़ समझता है। वह तज्मीन, अगर पश्चिमी इस्लाम विरोधी वेबसाईट पर नक़ल किये जाते, तो उसे, उनके, पूरी मुस्लिम कम्युनिटी की शबीह बिगाड़ने के औचित्य के तौर पर देखा जाता, लेखक ने, एक अमन पसंद इंसान होने की हैसियत से, मज़मून के लेखक से, यह कहा था कि वह एडिटर से उसे हटा लेने के लिए कहें, लेकिन यह अभी तक यहीं है।

लेखक को Percy B. Shelly के प्रसिद्ध रुबाई के चौथे बंद (नुमाया अलफ़ाज़ में) को उनमें शामिल करके जवाब दिया गया:-

हम यहाँ वहाँ देखते रहते हैं- जो चीज नहीं है हम उसकी ख्वाहिश करते हैं।

हमारी मुखलिस हंसी- कुछ दर्द के साथ भरी हुई है

हमारे मधुर नगमे वह हैं- जो हमारे दुखी फ़िक्र को बताते हैं

हमारे पसंदीदा विषय वह हैं- जो मज़हबी ख्यालों को ज़हर देते हैं

एक पर्यवेक्षक इस दावे का बचाव करता है और लिखता है:

पवित्र कुरान में, अल्लाह लोगों को जानवरों, सूअरों, बंदरों, गधों, अंधे, गूंगे और बहरे के रूप में वर्णित करता है।

कोई आश्चर्य नहीं कि आप एक छिपी हुई भाषा में बोल रहे हैं। यह पहले से ही मेरी चिंता थी

पर्यवेक्षक ने एक तीर से दो परिंदों को हलाक कर दिया: मुल्ला की हिज्व और कुरआन का मज़ाक बनाया। एक मुसलमान की हैसियत। हक़ पर एक गवाह (२:१४३) जो अच्छा है उसका आदेश देने वाला और बुराई से रोकने वाला, लेखक ने एक तज्मीन का जवाब तैयार किया है। तथापि, उन्होंने इसे नहीं भेजा (निम्न में उल्लेखित, इफ्तिताही मिसरे के अलावा) इसलिए कि कुरआन ने भी बुराई का बदला अच्छाई से देने का आदेश दिया है।

हँसते हो मुलाओं पर, लेकिन तमीज़ नहीं कर सकते बीवियों, माओं और बहनों में,

पीते हो शराब सुबह तलक और भूल जाते हो किस से क्या रिश्ता है

[यह साहिर लुधियानवी के मकबूल शाइराना तखय्युल से मुस्तेआर है। यहाँ फिर भी आ चुके हैं जवान भी- तन व मंद बीते भी---]

लेखक, एक इंसान होने की हैसियत से अत्यंत पस्ती में जा सकता है, और उपर शाइराना शतरंज की चाल में, बे जायका सतरों का इजाफा कर सकता है, हो सकता है वह कितना ही खाम हो। लेकिन इससे पहले कि वह और कदम बढ़ा सके, उसी के साथी की तरफ से तबसिरे का एक सिलसिला शुरू हो जाएगा और लेखक उस कहावत की मानिंद रह जाएगा। बोलना चांदी है लेकिन खामोशी सोना है।

केस २: संभावित तौर पर एक नेक नियत गैर मुस्लिम टीकाकार यह जानना चाहे कि किस तरह पॉप एक मस्जिद के निर्माण की अनुमति दे सकता है जब कि कुरआनी आयत ५:५१ मुसलमानों को ईसाईयों से दोस्ती नहीं करने को कहती है और यहूदी कलम ज़द नहीं किये गए हैं। एक अच्छे अंदाज़ में एक वास्तविक सवाल पूछ सकता है। एक मुसलमान नाम का (केस१) वही साथी, निरे झूट में आसानी से इस बात की तस्दीक करता है कि आयत ५:५१ कुरआनी पैगाम की रूह की नुमाइंदगी करती है। यह गैर मुस्लिमों को कुरआन और इस्लामी अकीदे का एक अत्यंत नकारात्मक प्रभाव देता है, जिनमें से अक्सर पहले से ही मुसलमानों के दुश्मन हैं। लेखक ने इसे [The Qur’an’s regard for the People of the Book (Christians and Jews) and the believing humanity– a living testimony] अहले किताब (यहूदी और ईसाई) और मोमिन इंसानियत के लिए कुरआन की तवज्जोह एक ज़िंदा गवाही नामक एक लेख में इसकी व्याख्या की है केस३: हाल ही में एक शिक्षित और नेक नियत टिप्पणीकार ने हिन्दू स्थानों (काशी, मथुरा) के ढाए जाने और उनकी जगह मस्जिदों के निर्माण की मिसालों का हवाला देते हुए एक आलिमाना टिप्पणी लिखा है- बिना किसी हुज्जत के, यह स्पष्ट तौर पर कुरआन विरोधी कारनामा है, इसलिए कि कुरआन ने साफ़ साफ़ और स्पष्ट तौर पर एलान किया है कि खुदा का नूर तमाम खालिस इबादतगाहों में है (२४:३६) और खानकाहों, गिरजाघरों, यहूदी इबादतगाहों और मस्जिदों में उसका नाम पुकारा जाता है (२२:४०) वह इस बात पर गौर व फ़िक्र कर रहे हैं कि क्यों किसी मुसलमान ने इस पर आपत्ती नहीं किया और कट्टर बादशाह के उनके खौफ से उसे मंसूब करते हैं।

तथापि, मुस्लिम पाठकों को निर्देश दिया और उपर उल्लेखित लेख (स्पष्ट शब्दों में) के तहत पोस्ट किया हुआ है, इसका औचित्य मुस्लिम टिप्पणीकारों के माध्यम से एक टिप्पणी तलाश करना है। तो यह लेखक बचावके तौर पर काम कर रहा है, वकील मुसलमान आमिरों (सद्दाम हुसैन, टिका खान) की हालिया मिसालें पेश करता है, जो मुस्लिम ज़मीन (ईरान, कुवैत) पर हमला और उसे तबाह करते हैं, बेरहमी के साथ अपने ही लोगों (कुर्दों) को ज़हर दे रहे हैं और उन्हें हालाक कर रहे हैं, और आतंकवाद की हुकूमत को आज़ाद छोड़ रहे हैं (इस समय का पूर्वी पाकिस्तान)। तवज्जोह दिल्ली में, (१७३९) में हुए सबसे अधिक खूंरेज़ नरसंहार की तरफ भी की गई थी जिसमें मुसलमान सिपाहियों के माध्यम से २००००-३०००० मर्द, औरतें और बच्चे छः सात घंटे के वक्त में हलाक किये गए थे। इस लेखक को अकल वाले सवाल करने वालों को समझाना होगा, वह पहले से ही क्या जानते थे, इस बात का विश्वास है कि दुनिया के ज़ालिम व जाबिर और दुनिया के रहनुमाओं के फौजी इकदामात उनकी अना, तारीफ़, शोहरत, तिजारती, राजनीतिक हितों आदि के जज़्बे के तहत मुसल्लत किये हुए हैं। इसलिए मौजूदा दौर के मुसलमान, तमाम मुसलमान आक्रमणकारियों की हैवानियत का जवाब किस तरह पेश कर सकते हैं? क्या फ़ाज़िल टिप्पणीकार की तरह अत्यंत सूझ बुझ का हामिल कोई शख्स आज किसी अमेरिकी पूछ सकता है कि उन्होंने हिरोशिमा और नागासाकी में ऐटम बम क्यों गिराया था? क्या आज कोई भी समझदार इंसान जर्मनी से पूछ सकता है कि क्यों हिटलर ने लाखों यहूदियों को हालाक कर दिया?

दुसरे मिसाली मुआमलात:

मुआमलात-A: बारहा फिरका वारीयत के हामिल उलेमा ए किराम इस्लाम को तालिबानियत, और दुसरे आतंकवादी संगठनों (मिसाल के तौर पर, बोको हराम) के साथ मख्लूत कर रहे हैं और इस्लाम और मुसलमानों की तस्वीर कुशी उनके विचारों के दकियानूसी अवधारणाओं के साथ, और उन हैबत नाक अपराधों के साथ कर रहे हैं जिनका प्रतिबद्ध मुस्लिम अपराधियों की तरफ से किया जा रहा है। यह इज्तिमाई मस्ख की कोशिश के अलावा कुछ भी नहीं है, जैसा कि कबायली दौर में कबीले के एक व्यक्ति की तरफ से किये गए अपराध के लिए पुरे कबीले को जिम्मेदार ठहराया जाता है। लेकिन वह इतिहास के, लगभग जमाने की एक सदी पीछे छुट गए हैं। यह आज के मुसलमानों में, इस सिद्धांत को लागू करने के लिए केवल हास्यास्पद और अनुचित भड़कावा है।

एक मुसलमान जो दुसरे धर्मों की इज्ज़त व एहतिराम के कुरआनी आदेश से वाकिफ नहीं है बिलकुल उसी लहजे में जवाब दे सकता है, इसलिए कि सभी धर्मों की धार्मिक इतिहास में छुपे कंकाल और खून से सने घटनाओं की कोई कमी नहीं है। हाल ही में एक रक्षात्मक पर्यवेक्षकने बुराई की तुलना बुराई के साथ की, और इस वेबसाईट को हिन्दू और मुस्लिम समाज का नेतृत्व करने वाले पर्यवेक्षकों की एक छोटी सी टीम के बीच मैदाने जंग में परिवर्तित कर दिया है।

मुआमलात-B: एक मुस्लिम नाम (ऊपर के केस १ और २) और स्कॉलर शिप के साथ साथी, इस्लाम को उन सभी कमज़ोर हदीसों के साथ मखसूस करता है जिसका हवाला देने से मुसलमानों को रोक दिया गया है: वह झुटा, दृढ़ निश्चयी, वफादार और प्रामाणिक तौर पर उनकी योजना इस तरह करता है जैसे कि इस्लामी अकीदे की हकीकी नुमाइंदगी वही करते हैं। बहुत सारे जामेअ टिप्पड़ियां इस बात को समझाने के लिए पोस्ट किये गए हैं कि कमज़ोर वजूहात तमाम धर्मों में पाए जा सकते हैं इस लिए कि वह एक ज़माने में मुरत्तब किये गए थे जिसे हम आज किस्सा, झूटी कहानी और अजीब व गरीब और खयाली कहानी कहते हैं, जिसने आम लोगों के ज़हनों को मुशतईल कर दिया और इसे उनके नेताओं, औलिया, देवता और खुदा के खौफ और तारीफ़ से भर दिया, और यहाँ तक कि इन ख्यालों ने मुस्लिम मदुनों ने उनके ना काबिले एतिबार प्रकृति की नस्ल को खबरदार किया है कि उन्हें तालीफ़ व तद्वीन में बरकरार रखा गया है। हवाला देने के लिए नहीं बल्कि केवल तकनीकी कारणों की बिना पर।

खुलासा: ईसाई और यहूदी, आज संगठित नरसंहार, धार्मिक युद्धों, और उन महान जंगों के बारे में कभी बात चीत नहीं करते, जो उस ज़माने में (पिछली सदी के मध्य) एक सदी से अधिक तक जारी रहे और इसके माध्यम और इस (एतेहासिक समय में) सीमित, इस उप महाद्वीप में हिन्दू मुस्लिम बात चीत से बहुत अधिक बे हद हैवानियत, मौत और तबाही हुई। वह भी तीन से छः सौ साल पहले के एक ज़माने के दौरान। हमारे तथाकथित बुद्धिजीवी उनसे सबक नहीं ले सकते हैं या वह इस्लाम, मुसलमानों, और भारत के दुश्मन के रूपये दिए जाने वाले एजेंट हैं?

इसके साथ मेरी तजवीज यह है कि वेबसाईट किसी भी दिशा बिना बहने के बजाए निम्नलिखित एजेंडा इख्तियार करे:

इस्लाम में अहम (इज्तेहाद) सोच को बढ़ावा देना

सामाजिक, नैतिक, कुरआनी संदेश की तक्सरियत पर आधारित दिशाओं के संबंध में, मुसलमान के ज़हनों को रौशन करना।

भारतीय मुसलमानों को औकात की जरूरियात के अनुसार, उनके समाज की इस्लाह के लिए धार्मिक आधार पर प्रदान करना। जैसे आलमी तालीम और फन की तमाम शक्लों और कौमी तरक्कीयाती योजनाओं में सक्रीय शिरकत।

मुसलमानों को अपने धर्म की बुनियादी किताब कुरआन, के करीब लाने के लिए। आज दुनिया के शैक्षिक मांग को पूरा करने और महारत हासिल करने के लिए धार्मिक इल्म को माहिरीन से खारिज करना।

तमाम इज्तिमाई, तफरका अंगेज़ और अस्करियत पसंद, मुतास्सिब और मस्ख करने वाले तत्वों का मुकाबला करन।

धर्मों के बीच संबंधों को बढ़ावा देना

एक संयुक्त और एकजुट भारत का निर्माण और पाकिस्तान के साथ संभव सौहार्दपूर्ण और शांतिपूर्ण संबंध की ओर कदम बढ़ना।

वेबसाईट को देशद्रोहियों और दुश्मन एजेंटों के खिलाफ भी रक्षा करनी चाहिए, जो हिंदुओं और मुसलमानों के नाम पर किसी भी स्वस्थ बहस को विफल करते हैं, इस्लाम में किसी भी तरह के सुधार को रोकते हैं, इंटरफेथ दुश्मनी और अतिवाद पैदा करते हैं। , आतंकवादियों और कट्टरपंथियों के हाथों को मजबूत करने के लिए, उनमें से कुछ स्पष्ट रूप से इस्लाम के दुश्मनों और भारत में जरखरीद की सूची में हैं, लेकिन गद्दार और जरखरीद के रूप में, वे किसी भी धर्म में प्रवेश कर सकते हैं। किसी भी नाम को चुन सकते हैं और मान सकते हैं।

इस लेखक ने अपने स्कूल के दिनों में उर्दू कविता की कम से कम एक हजार पंक्तियों को याद किया था, और कुछ हजार पंक्तियों को पढ़ा था। कई कवि ज्यादातर मुस्लिमों के बारे में बताते हैं, जब उन्होंने भगवान के बारे में बात की, इस्लामी प्रार्थनाएं प्राप्त कीं, और उपदेशक, जो अनुचित लग सकता है, जैसा कि मुल्लाओं के बारे में ऊपर उद्धृत किया गया है। लेकिन उन्होंने हिंदू धर्म के किसी भी पहलू को विकृत करने के लिए एक पंक्ति नहीं पढ़ी है। दिलचस्प बात यह है कि अरबी शब्द 'सनम' 'मूर्ति' के लिए है, जिसका उपयोग फ़ारसी और उर्दू में 'सच्चे प्रेमी' से रोमांटिक तरीके से किया जाता है, जिसका अर्थ है 'बाम' और ' उदाहरण के लिए सनम है। - दुर्भाग्य से वित्तीय दबाव, विकास और प्रसिद्धि और इंटरनेट पर मुफ्त प्रकाशन के जुनून ने 'घृणा और अश्लीलता' का एक असीमित, दो-तरफा मुक्त बाजार तैयार किया है। कोई भी किसी के कपड़े (नग्न) के बिना, या पवित्रता (नैतिक धार्मिकता) के वस्त्र के बिना कुरान की आज्ञाओं (7:26) के बिना एक तस्वीर पोस्ट कर सकता है, और लोकप्रियता और आजीविका कमा सकता है। ये ऐसे कीड़े हैं जो इस विकासशील वेबसाइट की नींव को काट रहे हैं, और यदि आवश्यक हो, तो उन्हें बारीकी से निगरानी करने की आवश्यकता है।

लेखक सही होने का दावा नहीं करता है, लेकिन उसके लेख पढ़ने वाले पाठक उसे मूर्ख या कुछ और नहीं, बल्कि मानवता का प्रेमी मान सकते हैं। इसलिए वे जो कहते हैं वह कम से कम कुछ विचार के योग्य है।

14 अक्टूबर 2012

मुहम्मद यूनिस ने आईआईटी में केमिकल इंजीनियरिंग का अध्ययन किया और कॉर्पोरेट कार्यकारी के पद से सेवानिवृत्त हुए और 1990 के बाद से कुरआन का गहराई से अध्ययन करने और इसके वास्तविक संदेश को समझने की कोशिश कर रहे हैं। मूल संदेश को 2002 में अल-अजहर अल-शरीफ, काहिरा द्वारा अनुमोदित किया गया था और इसमें यूसीएलए के डॉक्टर खालिद अबु फज़ल का समर्थन है और मोहम्मद युनुस की किताब इस्लाम का असल पैगाम आमिना पब्लिकेशन, मेरी लैंड, अमेरिका ने, २००९ में प्रकाशित किया।

URL for English article: http://www.newageislam.com/debating-islam/muhammad-yunus,-new-age-islam/use-and-misuse-of-freedom-of-expression-on-this-islamic-website-(new-age-islam)-and-need-for-a-clear-agenda/d/8997

URL for Urdu article: http://www.newageislam.com/urdu-section/muhammad-yunus,-new-age-islam-محمد-یونس/use-and-misuse-of-freedom-of-expression-on-this-islamic-website-(new-age-islam)-اسلامی-ویب-سائٹ-(نیو-ایج--اسلام)-پر-اظہار-رائے-کی-آزادی-کا-صحیح-اور--غلط-استعمال-،-اور--ایک-واضح-ایجنڈا-کی-ضرورت/d/13142

URL: https://www.newageislam.com/hindi-section/use-misuse-freedom-expression-this/d/124119


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