New Age Islam
Fri Mar 13 2026, 07:38 AM

Hindi Section ( 28 Dec 2011, NewAgeIslam.Com)

Comment | Comment

The Qur’an Prescribes Monogamy, the Social Norm for Humanity कुरान सामाजिक मानदंड के रूप में एक निकाह का आदेश देता है


मोहम्मद यूनुस, न्यु एज इस्लाम डाट काम (अंग्रेज़ी से अनुवाद समी उर रहमानस, न्यु एज इस्लाम डाट काम)

(सहलेखकः अशफाक उल्लाह सैय्यद के साथ संयुक्त रूप से) इस्लाम का असल पैगाम, आमना पब्लिकेशन, यूएसए, 2009

एक विशेष अवधि से सम्बंधित ऐलान (4:1) में कुरान ने सभी अहम तहज़ीबों में महिलाओं के लिए खासतौर से इस्तेमाल होने वाले नीचा दिखाने वाले, भेदभावपूर्ण और ज़ालिमाना कानूनों और परम्पराओं व ममनू (निषेध) मानी जाने वाली सभी बातों को एक सिरे से खत्म कर दिया।

लोगों अपने परवरदिगार से डरो जिसने तुमको एक शख्स से पैदा किया (यानि अव्वल) उससे उसका जोड़ा बनाया। फिर दोनों से कसरत से मर्द और औरत (पैदा कर के रूए ज़मीन पर) फैला दिये। और खुदा से जिसके नाम को तुम अपनी हाजत पर आरी का ज़रिआ बनाते हो डरो और (कतअ मौदत) अरहाम से (बचो) । (4:1)

आयत की शुरुआत खुदा से डरने की याद दिलाने से होती है और ये अमले तौलीद (जनन प्रक्रिया) तक पहुँचती है और खत्म अरहाम के आदर और डरने से होती है।

जो स्पष्ट रूप से महिलाओं की ओर संकेत करती है। इसके साथ ही शादी के बारे में इसके स्पष्टीकरण पर आते हैं और इसी सूरे की तीसरी आयत से शुरुआत करते हैं

और अगर तुमको यकीन हो कि यतीम लड़कियों के साथ इंसाफ न कर सकोगे तो उनके सिवा जो औरते तुमको पसंद हों दो दो या तीन तीन या चार चार इनसे निकाह कर लो। अगर इस बात का अंदेशा हो कि (सब औरतो से) यकसां सुलूक न कर सकोगे तो एक औरत (काफी है) या लौण्डी जिसके तुम मालिक हो। इससे तुम बेइंसाफी से बच जाओंगे। (4:3)

इस आयत में एक नाकाबिले तरदीद वजूद का पहलू है। जंग में जानी नुक्सान के सबब बड़ी संख्या में महिलाएं ऐसी थीं जिनका कोई नज़दीकी रिश्तेदार (वालिद, शौहर, भाई) नहीं था। कुरान ने इनमें से ऐसी चार महिलाओं से निकाह करने की इजाज़त दी थी जिनके साथ बराबरी का सुलूक कर सकें। बाद की एक आयत में कुरान ऐलान करता है कि किसी भी मर्द के लिए ये मुमकिन नहीं है कि वो अपनी सभी बीवियों के साथ बराबर मोहब्बत रख सके।

और तुम कितना भी चाहो औरतों में हरगिज़ बराबरी नहीं कर सकोगे। (4:129)

आयत 4:3 और 4:129 के ऐलानात एक साथ जोड़ने पर बताते हैं कि कुरान बुनियादी तौर पर एक निकाह का मशविरा देता है । कुरान इस विचार को पक्का करने के लिए कई मिसालें पेश करता है।

(1) कुरान में जहाँ कहीं भी दूसरे पैगम्बरों की बीवियों का ज़िक्र आया है जैसे हज़रत इब्राहीम अलै. (11:71. 51:29), हज़रत नूह अलै. (66:10) हज़रत लूत अलै. (11:81, 5:60, 29:33, 66:10), हज़रत इमरान अलै. (3:35), हज़रत अय्यूब अलै. (38:44), हज़रत ज़करिया (3:40, 21:90) इन सभी आयात में इशारा मिलता है कि इन सभी पैगम्बरों की सिर्फ एक ही बीवी थी।

(2) कुरान में लफ्ज़ ज़ौजा से मुराद जोड़े से है। विपरीत लिंगों में से हर एक में से एक। इस तरह हज़रत आदम अलै. की ज़ौजा को वाहिद (एक) (2:35, 7:19, 20: 117) शक्ल में पेश किया गया है। और दोनों को एक जोड़े के रूप में पेश किया गया है। (2:36, 7:20-22, 20:121)

(3) कुरान में जिन दूसरे लोगों की बीवियों का ज़िक्र है जैसे फिरऔन (28:9, 66:11) मिस्र के उस शरीफ इंसान के बारे में जिसने हज़रत यूसुफ अलै. (12:21, 12:23-26) को खरीदा था और अबु लहब (111:4) इन सब के ज़िक्र से मालूम होता है कि सभी की सिर्फ एक बीवी थी।

(4) विरासत से सम्बंधित कानून में बेटे और बेटियों (4:11) दो से अधिक बेटियों (4:11), बहनों और भाईयों (4:176), दो बहनों (4:176), दो से ज़्याद बहनों और भाईयों (4:112) के कई हिस्सों के मुकाबले एक शौहर का हिस्सा बीबी के हिस्से (4:12) से बदल करता है।

(5) एक औरत जिसके शौहर का हाल ही में इंतेकाल हुआ हो वो अपने मरहूम शौहर के घर में एक साल तक गुज़ारे का खर्चा और रहने की जगह ले सकती है। कुरान की ये इजाज़त ज़ाहिर करती है कि शौहर ने एक बीवी को अपने पीछे छोड़ा है।

कुरान की ये मिसालें स्पष्ट रूप से बताती हैं कि कुरान सामाजिक मानदंड के रूप में एक निकाह का समर्थन करता है। ये बात इस्लाम की आरम्भिक तीसरी सदी में पेश किया गयी थी और कई नामचीन उलमा यूसुफ अली (1) और अमीर अली (2) ने इसको लोगों को बताया था।

मोहम्मद असद और हुसैन हैकल ने आयत 4:3 की शर्त का हावाल दिया है और कहा है कि इस तरह एक से ज़्यादा शादियों की इजाज़त सिर्फगैर-मामूली हालात में ही दी जाती है।

अगर एक निकाह की इजाज़त दी गयी थी तो क्यों इसकी वज़ाहत (स्पष्टीकरण) पेश नहीं की गयी?

अगर सख्ती से एक निकाह पर अमल किया गया होता तो वही के नाज़िल होने के फौरन बाद और व्यापक ऐतिहासिक दृष्टिकोण से महिलाओं की समस्याओं और उनके शोषण में और इजाफा हो गया होता।

(1)         कुरान के नाज़िल होने को ध्यान में रख कर अगर एक ही झटके में एक निकाह के नियम को लागू कर दिया गया होता तो एक से ज़्यादा शादी करने वाले एक साथ न होकर कई हिस्सों में इस्लाम में दाखिल (स्वीकार) होते। और अगर ऐसा होता तो अच्छी खासी तादाद में महिलाएं पति के सामाजिक संरक्षण के बिना रह जातीं यानि ये महिलाएं बिना किसी कानूनी पहचान के रह जातीं। ये इन महिलाओं की हैसियत, ज़रियए माश (जीवकोपार्जन) और उनके भविष्य और अपने पूर्व पतियों से अलग होने के कारण उनसे पैदा हुए बच्चों की ज़िम्मेदारी और परवरिश से सम्बंधित बड़ी जटिल समस्याएं पैदा हो जाती ।

(2)         ऐतिहासिक संदर्भ में देखें तो केवल मर्द ही कारोबार करते थे और दूसरे सिविल, फौजी और रणनीतिक कामों के कारण अपनी बीवियों को अपने पीछे छोड़ जाते थे क्योंकि उस दौर में इन स्थानों का सफर करना मुश्किल काम था और इसमें काफी समय लगता था। ये मर्द कभी कुछ माह तो कभी सालों भर अपनी बीवियों को छोड़कर जाते थे, ऐसे में इनके शारीरिक, भावनात्मक और जैविक आवश्यकता के मद्देनज़र उन्हें महिलाओं की आवश्यकता होती थी।

ऐसे हालात में अगर एक निकाह पर सख्ती से अमल होता तो इस तरह सफर करने वाले मर्द बिना शादी की कैद के महिलाओं का इस्तेमाल करते जिसके परिणामस्वरूप महिलाओं का शोषण होता और इससे जुड़ी दूसरी सामाजिक बुराईयाँ पैदा होतीं।

(3)         जीवन के एक सार्वभौमिक तथ्य के रुप में अगर एक व्यक्ति की पत्नी बीमारी या किसी हादसे वगैरह के कारण अपंग हो जाये और हमेशा के लिए अपने वैवाहिक कर्तव्य को निभा पाने की स्थिति में आ जाये तो एक निकाह की सख्त कैद के कारण ऐसे व्यक्ति की दूसरी शादी सम्भव नहीं होती, ऐसे में या तो ये व्यक्ति अपनी पहली अपंग बीवी को तलाक दे और फिर दूसरी शादी करे या किसी को दाश्ता रखे जिसके साथ कोई वैवाहिक ज़िम्मेदारी न हो। ऐसी किसी भी स्थिति में महिला नाइंसाफी का शिकार होती और समाज भी प्रभावित होता। और अगर मर्द को दूसरी शादी की इजाज़त होती तो ये ज़्यादा बेहतर होता वो अपनी दूसरी बीवी के साथ ही पहली अपंग हो चुकी पत्नी को भी साथ रख सकता था।

(4)         ताउम्र एक शादी करने का हुक्मे इलाही एक विधवा के लिए बड़ी गंभीर समस्याएं पैदा कर देता जिसकी दुबारा शादी होने की सम्भावना भी खत्म हो जाती, जैसा कि कुछ संस्कृतियों में पिछली सदियों तक होता रहा है, जिसका इन विधवाओं को खतरनाक परिणाम भुगतने पड़ते थे।

निष्कर्षः एक से ज़्यादा निकाह की शर्त से सम्बंधित कुरानी आयत (4:3) इसकी सशर्त इजाज़त और आयत 4:129 और ऊपर की पंक्तियों में दर्ज एक निकाह से सम्बंधित कुरान की मिसालों पर गौर करने के बाद कुरान सामाजिक मानदंड के रूप में एक निकाह का समर्थन करता है, ऐसी व्याख्या की जा सकती है।

आलोचक जो इस्लाम पर ये आरोप लगाते हैं कि इस्लाम एक से ज़्यादा शादियों की इजाज़त देता है और मिसाल के रूप में नबी करीम स.अ.व. को बताते हैं। आप स.अव. ने एक से ज़्यादा निकाह किये थे, लेकिन हकीकत ये है कि नबी करीम स.अ.व. ने अपनी पहली बीवी हजरत खदीजा रज़ि. से उनकी मौत से पहले 25 बरसों तक एक निकाह पर अमल किया और आप स.अ.व के बाद के निकाह गैरमामूली हालात के कारण हुए थे। इसके अलावा कुरान स्पष्ट तौर पर ऐलान करता है कि नबी करीम स.अ.व. को निकाह से सम्बंधित विशेषाधिकार (33:50, 33:52)  है और मुसलमानों के लिए उनकी मिसाल मानदंड नहीं हैं। इसके अलावा अगर मुसलमान उनकी मिसाल पर अमल करना ही चाहते हैं तो उन्हें इस खयाल से डर लगेगा कि वो अपने वैवाहिक जीवन की शुरुआत में अपने से 15 बरस बड़ी विधवा से शादी करने से शुरु करें और पूरी ईमानदारी के साथ अगले 25 बरसों तक एक निकाह में रहें।

ये मुस्लिम माहिरे कानून के लिए वक्त है कि वो अपनी पिदराना (पितृसत्तात्मक) सोच को छोड़कर प्राचीन इस्लामी कानून में संशोधन करें जो मर्द को सिवाय गैरमामूली और कानून ऐतबार से उचित हालात के अलावा दूसरी शादी से रोके, अगर पहली बीवी इजाज़त दे तब भी, क्योंकि एक मुसलमान बिना उचित बुनियादों के कुरान के कानून को तोड़ नहीं सकता है। कानून के जानकार निकाह के करार की प्रकृति पर ज़ोर देते हैं लेकिन निकाह नामें में एक धारा जोड़ कर विवाहित जोड़े के बीच मेहब्बत औऱ रहम के साथ इनमें से किसी को एक निकाह के कुरानी उसूल की हद को पार करने की इजाज़त नहीं दे सकते हैं।

और उसी के निशानात (और तसर्रुफात) में से है कि उसने तुम्हारे लिए तुम्हारी ही जिंस की औरतें पैदा की ताकि उनकी तरफ (माएल होकर) आराम हासिल करो और तुममें मोहब्बत और मेहरबानी पैदा कर दी, जो लोग ग़ौर करते हैं उनके लिए इन बातों में (बहुत सी) निशानियाँ हैं। (30:21)

..........

नोट्सः

अब्दुल्लाह यूसुफ अली, दि होली कुरान, लाहौर 1934, रिप्रिण्ट, मेरी लैण्ड, 1983, नोट-509

सैय्यद अमीर अली, दि स्पिरिट आफ इस्लाम, दिल्ली,1923, रिप्रिण्ट 1990, पृ.229

मोहम्मद असद, मैसेज आफ कुरान, जिब्राल्टर 1980, चैप्टर-4, नोट-4

मोहम्मद हुसैन हैकल, दि लाइफ आफ मोहम्मद, अंग्रेज़ी अनुवाद- इस्माईल रागी, 8वाँ एडिशन, कराची 1989, पृ.293

सकीना लफ्ज़ से मुराद खुदा की नेमतों से है जो गम और मायूसी की हालत में नबी करीम स.अ.व. और उनके सहाबा पर अल्लाह भेजता है।

नबी करीम स.अ.व. और हज़रत अबु बकर मक्का से मदीना के रास्ते में अपने दुश्मनों से बचने के लिए एक गार में छिप रहे थे। (9:40)

उमरा करने के लिए मक्का में दाखिल होने की इजाज़त के इंतेज़ार में नबी करीम स.अ.व. के निहत्थे सहाबा मायूसी और गौर-यकीनी (अनिश्चितता) के हालात में हुदैबिया के मैदान में इंतेज़ार कर रहे थे। (48:4)

हुदैबिया में निहत्थे सहाबा ने नबी करीम स.अ.व. से बैत कर ये कसम खायी थी कि वो मक्का के फौजों के किसी भी हमले की सूरत में आपकी रक्षा करेंगें। (48:18)

जैसे ही मुसलमान मक्का में दाखिल होने लगे तो कुरैश के बीच सबसे ज़्यादा जुनूनी लोगों ने मुसलमानों को रोकने और जंग के लिए उकसाने की कोशिश की। (48:26)

जैसा कि हवाज़ीन ने मार्च कर रही  मुस्लिम फौज पर घात लगाकर हमला किया और उनमें भगदड़ पैदा कर दी। (9:26)

मोहम्मद यूनुस ने आईआईटी से केमिकल इंजीनियरिंग की शिक्षा हासिल की है और कार्पोरेट इक्ज़ीक्युटिव के पद से रिटायर हो चुके हैं और 90 के दशक से क़ुरान का गहराई से अध्ययन और उसके वास्तविक संदेश को समझने की कोशिश कर रहे हैं। इनकी किताब इस्लाम का असल पैग़ाम को साल 2000 में अलअज़हर अलशरीफ, काहिरा की मंज़ूरी प्राप्त हो गयी थी और यूसीएलए के डॉ. खालिद अबुल फ़ज़ल का समर्थन भी हासिल है। मोहम्मद यूनुस की किताब इस्लाम का असल पैग़ाम को आमना पब्लिकेशन मेरीलैण्ड, अमेरिका ने साल 2009 में प्रकाशित किया।

URL for English article:

http://www.newageislam.com/islamic-sharia-laws/the-qur’an-prescribes-monogamy,-the-social-norm-for-humanity/d/6172

URL for Urdu article:

http://www.newageislam.com/urdu-section/the-quran-allows-one-nikah-as-a-social-norm--قرآن-سماجی-معیار-کے-طور-پر-ایک-نکاح-کا-حکم-دیتا-ہے/d/6220

URL for this article: https://newageislam.com/hindi-section/the-qur’an-prescribes-monogamy,-social/d/6241


Loading..

Loading..