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Hindi Section ( 19 Nov 2013, NewAgeIslam.Com)

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Allah: For Muslims Only? क्या अल्लाह सिर्फ मुसलमानों के लिए है?

 

मोहम्मद अलमी मूसा

8 नवम्बर, 2013

पुतराजाया में मलेशियाई कोर्ट ऑफ अपील ने 14 अक्टूबर को ये फैसला दिया है कि शब्द 'अल्लाह' को साप्ताहिक कैथोलिक दी हेराल्ड में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। अदालत ने ये फैसला दिया है कि शब्द 'अल्लाह' ईसाईयत का अनिवार्य हिस्सा नहीं है।

ये समस्या 2009 में उस समय शुरू हुई जब मलेशियाई गृहमंत्री सैयद हामिद अलबर ने दी हेराल्ड को शब्द 'अल्लाह' के इस्तेमाल से रोकने का हुक्म जारी किया। परिणाम स्वरूप क्वालालमपुर के हाईकोर्ट ने न्यायिक समीक्षा के लिए कैथोलिक आर्क डायोसिस की दरख्वास्त को स्वीकार कर लिया और इस पर सरकार की पाबंदी को रद्द कर दिया।

कोर्ट ऑफ अपील की ये ताज़ा तरीन सुनवाई सरकार की इस अपील को सुनने के लिए आयोजित की गई थी जिसे बरकरार रखा गया था। कैथोलिक आर्क डायोसिस ने इस मामले को सुप्रीम कोर्ट ऑफ अपील तक ले जाना चाहा। अंतिम फैसला हो सकता है कि दूरगामी प्रभाव वाला हो, इसलिए कि पूर्वी मलेशिया में ईसाई सदियों से परम्परागत तौर पर शब्द अल्लाह का इस्तेमाल कर रहे हैं, लेकिन इस बात को निश्चित किया गया है कि ये फैसला सिर्फ दी हेराल्ड के मामले में ही लागू किया जाएगा।

खुदा अपनी किताब में ईसाई नहीं है, डेसमण्ड टूटू ने ईसाइयों को बताया कि, ''खुदा सिर्फ ईसाइयों के लिए विशेष नहीं है और वो सभी इंसानों का खुदा है, जिस पर उसने अपनी महानता को प्रकट किया है और सभी इंसानों के लिए जिसका सामना करना और उसके साथ सम्पर्क पैदा करना सम्भव है।''

समय रहते एक नसीहत ये है कि सभी धर्मों के मानने वाले एक दूसरे को स्वीकार करें। इसके अलावा ये कि गॉड या अल्लाह उन लोगों से नफ़रत करता है जो एक दूसरे से नफ़रत करते हैं और दूसरों को अपने से छोटा बताते हैं।

अल्लाह शब्द के इस्तेमाल से सातवीं शताब्दी में इस्लाम के आने का पता चलता है। इस्लाम के आने से बहुत पहले अरबी बोलने वाले ईसाई खुदा के लिए अल्लाह शब्द का ही इस्तेमाल किया करते थे। एक धर्म के रूप में इस्लाम की ये एक व्यक्तिगत विशेषता है कि वो इस्लाम से पहले की संस्कृति और परम्पराओं को अपनाया है बशर्ते वो इस्लामी शिक्षाओं से न टकराती हों। मिसाल के तौर पर कुरान में अल्लाह शब्द का पाया जाना इसकी एक मिसाल है।

कुरान को समझने में आसानी पैदा करने के लिए कुरान में ऐसे शब्दों और शब्दावलियों का प्रयोग किया गया है जो उस समय के अरब समाज में प्रचलित थी और लोगों के लिए समझना आसान था। इसकी एक और मिसाल कुरान में जानवरों का हवाला है। कुरान में उन जानवरों का उल्लेख है जिन्हें अरब अच्छी तरह जानते थे, जैसा कि कुरान में ऊंट और चींटियों का उल्लेख है, लेकिन इसमें शेर का ज़िक्र नहीं है, इसलिए कि अरब में शेर नहीं पाये जाते।

इसके अलावा ये कि इस्लाम से पहले अरबी समाज में शब्द ''अल्लाह'' बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किया जाता रहा है। और उस वक्त ये बात बिल्कुल ही आम था कि लोगों के नाम से अल्लाह शब्द जुड़ा होता था। मिसाल के तौर पर नबी सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम के पिता का नाम अब्दुल्लाह था जिसका मतलब है अल्लाह का बंदा।

लेकिन इस बात का सबसे स्पष्ट इशारा कि अल्लाह मुसलमानों के अलावा दूसरे लोगों का भी खुदा है, ये है कि सूरे अन्कबूत की आयत 46 में अल्लाह मुसलमानों को यहूदियों और ईसाइयों से ये कहने का हुक्म देता है कि 'हमारा और तुम्हारा खुदा एक है और हम उसी को सज्दा करते हैं (इस्लाम में)।''

प्रसिद्ध विद्वान स्वर्गीय असगर अली ने अपनी किताब ''On Developing Theology of Peace in Islam'' में इस विषय पर प्रकाश डाला है। उन्होंने कहा कि चूंकि कुरान का फरमान है कि अल्लाह ने अपने पैग़म्बरों को सभी क़ौमों के लिए भेजा है, इसलिए बहुत से इस्लामी विचारकों, धर्मशास्त्रियों और औलिया और सूफी ये मानते हैं कि गैर अहले किताब  वाले समाज में अल्लाह के पैग़म्बर हैं।

सिख धर्म में भी अल्लाह शब्द का इस्तेमाल किया जाता है। मलेशिया के गुरुद्वारा कौंसिल के अध्यक्ष जागीर सिंह ने कहा कि गुरु ग्रन्थ साहिब में (जो कि उनकी पवित्र किताब है) कई स्थानों पर शब्द 'अल्लाह' पाया जाता है।

इन विवादों का समाधान अदालतों के माध्यम से नहीं

इसलिए डेसमण्ड टूटू की बातों से फायदा हासिल करते हुए कोई ये नतीजा निकाल सकता है कि अल्लाह सिर्फ मुसलमानों के लिए ही खास नहीं है। वो सभी इंसानों का रब है। कानूनी अदालतों के द्वारा इस प्रकार की संवेदनशील धार्मिक समस्या को हल करने से समाज में मतभेद और अराजकता पैदा हो सकती है। दो टूक फैसला देना अदालत का स्वभाव है। और एक समूह हमेशा मौजूद रहेगा जो अदालत के फैसले से आहत रहेगा।

इस प्रकार के धार्मिक मतभेद का हल अदालत से बाहर ही तलाश करना चाहिए। इस समस्या का हल सार्वजनिक क्षेत्र से ऊपर उठ कर उन धार्मिक लीडरों के द्वारा तलाश किया जाना चाहिए जो एक दूसरे की परिस्थितियों को महसूस कर सकें, जिनके पास ये स्वीकार करने की नीति हो कि हो सकता है कि असहमति के कई अवसर सिद्धांत का मसला न हों बल्कि कोई आंशिक धार्मिक समस्या हो।

जब 2009 में अल्लाह शब्द के इस्तेमाल पर मतभेद सामने आए, तो सिंगापुर के लीडरों ने सिंगापुर इस्लामी हब में मिल जुल कर इस मसले पर बातचीत करने के लिए एकजुट हुए। इस सभा में कैथोलिक चर्च के आर्कबिशप, अंगलिकन ड्यूकसे के आर्कबिशप और नेशनल काउंसिल ऑफ चर्चेज़ के अध्यक्ष, सिंगापुर के मुफ्ती और एएमयूआईएस के अध्यक्ष ने ये नतीजा निकाला की सिंगापुर में अल्लाह शब्द के इस्तेमाल पर कोई समस्या नहीं है। उन्होंने इस समस्या को भाईचारे के साथ हल कर लिया और इसे सिंगापुर में फैलने से रोक लिया।

धार्मिक सद्भाव का निर्माण

संभावित धार्मिक मतभेद को खत्म करने और विवादों को हल करने के लिए सिंगापुर की यही परंपरा रही है। सिंगापुर में धार्मिक नेताओं को बड़ा विश्वास हासिल है और वो एक दूसरे से धर्म के एक सेवक की तरह विनम्रता और शालीनता के साथ बात करते हैं और समाज में सद्भाव को बरकरार रखते हैं। आखिरकार धर्म का मकसद समाज को शांतिपूर्ण और सामंजस्यपूर्ण बनाना और धार्मिक नेताओं को भी इस तरह पेश आना चाहिए।

सिंगापुर में जब भी कभी वहाँ धार्मिक नेताओं को विवादपूर्ण स्थिति पैदा हुई उनके अंतरधार्मिक सम्बंधों का यही संकेत रहा है। धार्मिक नेताओं ने वहां की प्रभावित समूह के साथ परस्पर परामर्श में अपनी भूमिका निभाई है। वो अपने सिद्धांत और विचारों से समझौता किए बिना ही समस्याओं को सुलझा लेते हैं। अदालत के हस्तक्षेप के बिना समस्याओं को हल करने का ये तरीका अधिक प्रभावी है।

समाज में विभाजन और भेदभाव को रोकने का ये एक अच्छा तरीका है। सार्वजनिक स्तर पर सद्भावना समितियों, अंतरधार्मिक प्लेटफार्म, विवादों के समाधान की प्रक्रिया और सिंगापुर का ''धार्मिक सद्भाव का ढांचा'' धार्मिक विवादों को हल करने में एक जीतने और दूसरे के हारने वाले नतीजे से बचा सकता है।

मोहम्मद इलमी मूसा, एस. राजारत्नम स्कूल ऑफ इंटरनेशनल स्टडीज, नान्यांग टेक्नोलोजिकल युनिवर्सिटी में स्टडीज़ इन इंटर रिलिजियस रिलेशन इन प्यूरल सोसायटीज़ के प्रमुख हैं।

स्रोत: http://www.upi.com/Top_News/Analysis/Outside-View/2013/11/08/Allah-For-Muslims-only/UPI-82631383887040/?spt=op_l&or=1

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