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Hindi Section ( 15 Dec 2020, NewAgeIslam.Com)

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Identity Crisis and Violent Religious Behaviour शनाख्त का संकट और हिंसक धार्मिक व्यवहार


मोहम्मद अम्मार खान नासिर

सितम्बर २०२०

पेशावर में भरी अदालत में एक मुद्दई ए नबूवत (नबूवत का दावा करने वाला) के क़त्ल जैसे घटनाओं पर निंदा बयानों और शरीअत व कानून के सीमाओं की लगातार स्पष्टिकरण से बात कुछ आगे बढ़ाने की आवश्यकता है। यह व्यक्तिगत घटनाएं नहीं हैं और ना उन्हें अंतिम विश्लेषण में लोगों के व्यवहार समझना सही है, क्योंकि निदान ही दोषपूर्ण हो तो तजवीज का दोषपूर्ण होना निश्चित है। यह पहचान के उस बोहरान की निशानी है जिससे दक्षिण एशियाई इस्लाम पिछले दो सौ साल से दोचार है। 

इस पुरे अरसे में मज़हबी या गैर मज़हबी राजनीतिक शनाख्त की तशकील का अमल हमारे यहाँ बुनियादी तौर पर सकारात्मक सिद्धांतों पर नहीं, बल्की नाकारात्मक सिद्धांतों पर हुआ है जिस में बुनियादी म्हणत किसी दुसरे को अपनी शनाख्त के लिए ख़तरा करार देने और फिर उसके खिलाफ तन मन धन की बाज़ी लगा देने का जज्बा पैदा करने पर की गई है।

तहफ्फुज़े शनाख्त की इस राजनीति की शुरुआत इस्तेमारी दौर से पहले अहले शीयाओं की तकफीर के रूप में हो चुकी थी जिसमें हज़रत मुजद्दिद रहमतुल्लाह जैसी बुलंद कामत शख्सियत नुमाया थी। इस्तेमारी दौर में शनाख्त के हिफाज़त के यही सिद्धांत बरेलवी उलेमा ने बाकी सभी गिरोहों और ख़ास तौर पर देवबंदी उलेमा के खिलाफ किया। नेचरियों, कदियानियों और हदीस के मुनकिरों आदि के ज़हूर ने सारे रिवायती मज़हबी गिरोहों के लिए शनाख्त के हिफाज़त के लिए कुछ और लक्षों का इजाफा कर दिया। बीसवीं शताब्दी के अर्ध में राजनीतिक शनाख्त के लिए मुस्लिम लीग ने भी इसी तरह इस तर्ज़ को इख्तियार किया और पुरी कामयाबी प्राप्त की। इसकी बनाई हुई शनाख्त अपने तमाम तर लावाज़िम के साथ आज भी पाकिस्तान की कौमी रियासत का असासा है।

इस्तेमारी दौर में विभिन्न मज़हबी शनाख्तों के लिए एक दुसरे से भिड़ना इस्तेमारी ताकत की मौजूदगी की वजह से मुमकिन नहीं था, लेकिन वतन हासिल करने के बाद इसमें रुकावट बाकी नहीं रही। इसलिए विभिन्न मरहलों पर पहले कादियानी, फिर इन्किलाब ए इरान के पस मंज़र में शिया, फिर सलमान रुश्दी के वाकए के तनाजुर में स्थानीय मसीही आबादी, फिर सेकुलरिज्म के नुमाइंदे, और आखिर कार खुद रियासत और रियासती इदारे इसका निशाना बने। तौहीन ए मज़हब के आरोप ने एक धार्मिक हथियार की शकल इख्तियार कर ली है जिससे लगता नहीं कि कोई वर्ग बच जाएगा, यहाँ तक कि खुद नामूस ए रिसालत के मुहाफ़िज़ इसकी ज़द में आ चुके हैं। Blasphemy Hunting का एक हेजान है जो समाज में बरपा कर दिया गया है और ऐसा लगता है जैसे सलमान रुश्दी और उस जैसे बद्बख्तों का इंतिकाम मज़हबी जुनूनी खुद अपने ही समाज से लेना चाह रहे हैं। इस्लाम के दुश्मनों की तरफ से मुसलमानों के जज़्बात मजरुह करने की मुहिम के जवाब में कुरआन ने सब्र और तकवा की जो शिक्षा दी थी, ना वह हमारी तवज्जोह की हकदार रही है और ना रसूलुल्लाह का यह तरीका याद रह गया कि मस्जिद के आदाब से अनजान कोई बददु मस्जिद में पेशाब के लिए बैठ जाए तो उसे डांट डपट तक ना की जाए। यह फैसला करना मुश्किल हो गया है कि समाज की मौजूदा कैफियत वाकई इमानी जज़्बात का मज़हर है या कोई इज्तिमाई नफ्सियाती बिमारी हमें लाहिक हो गया है। पहले समय समय पर और अब ज्यादा तेज़ रफ्तारी से सामने आने वाले विभिन्न इन्फिरादी वाकियात का बुनियादी सियाक शनाख्त और उसके तहफ्फुज़ की यही कशमकश है। उनकी कोई और तफ्हीम इसके अलावा संभव नहीं। इनमें अमली अकदाम करने वाले अफ़राद केवल एक आला हैं और उनकी शख्सी सोच या हालात का दखल इसमें केवल जिमनी और सान्वी है। यह सोच कि अपनी वजा कर्दा नही है, उन्हें उन भिन्न शिनाख्ती बयानों से मिली है जो माहौल में मौजूद हैं। शनाख्त के मसले को उसके तारीख़ी सियाक में मौजुअ बनाए बिना वाकियात की कोई तफ्हीम और इस्लाम की कोई तजवीज़ बिलकुल अनर्थ है।

विभिन मज़हबी उनवानात के तहत हिंसा का जहूर, जैसा कि अर्ज़ किया गया, कोई नई पैदा होने वाली निमारी नहीं बल्कि इस्तेमारी दौर में जन्म लेने वाले शनाख्त के बोहरान का तसलसुल और बदलते हुए हालात में इस असुरक्षित होने के अहसास का इज़हार है जो विभिन्न धार्मिक शनाख्तों के यहाँ पाया जाता है और तख्फीफ़ के बाद ज़ाहिरी इशारियों के बर खिलाफ, समाज में मज़हब के सिकुड़ते हुए असर व रसूख के पेशे नज़र असल में शदीद तर होता जा रहा है। यहाँ दो अमल एक समय में हो रहे हैं और अलग अलग ज़ावियों से इस अमल को देखने से बजाहिर दो अलग अलग ताबिरात की गुंजाइश पैदा हो जाती है। मज़हबी शिनाख्तें बिलकुल दुरुस्त तौर पर महसूस करती हैं कि वह ख़तरे में हैं सेकुलराइज़ेशन का दायरा बढ़ता जा रहा है। इसकी प्रतिक्रिया में मज़हबी बयानों में खौफ और असुरक्षा का इज़हार बुलंद आहंग हो जाता है और इससे हिंसा का ज़हनी रवय्या पैदा होता है जैसे, ज़ाहिरी शकल में परिणाम के मर्तबे के हवाले से कुबूल ना करने के बावजूद, मज़हबी बयानिये किसी ना किसी शकल में जवाज़ मुहय्या करने की कोशिश करते हैं, जैसा कि हम सलमान तासीर, मशाल खान और इस तरह के दोसरे वाकियात में मुसलसल देख रहे हैं। अब इस रद्दे अमल को और इसकी शिद्दत को जब सेकुलर वर्ग देखते हैं तो उन्हें लगता है कि यह तो समाज पर मज़हबी वर्गों की गिरफ्त अधिक मजबूत हो रही है और समाज मज़हबी शिद्दत पसंदी का यरगमाल बनता जा रहा है।

इस सारी स्थिति में रियासती ताकत भी एक खिलाड़ी बन जाती है। वह एक तरफ मज़हबी शनाख्तों के साथ मामला करके उन्हें इस्तेमाल करती है, उनके जरिये से अपने राजनीतिक उद्देश्य हासिल करती है, और जरुरत के बक्द्र उन्हें उपर चढ़ा कर बवकते जरूरत उनेहं उठा कर पटख भी देती है, जैसा कि हम जिहादी संगठनों, सिपाह सहाबा और तहरीक लब्बैक इत्यादि की शकल में देख चुके हैं। लेकिन उनके साथ संबंध विक्षेद किसी हाल में नहीं करती बल्कि, एक दरवाज़ा बंद करके कोई दुसरा दरवाज़ा खोल लेती है ताकि मज़हबी शनाख्तों में असुरक्षा या लावारिसी का एहसास इतना संगीन ना हो जाए कि खुद राज्य के लिए ख़तरा बन जाए। इस सारे अमल में रियासत बतदरीज एक और मकसद भी हासिल करती जा रही है, अर्थात मज़हबी इज्हारों पर मुकम्मल रियासती कंट्रोल कायम करने की तरफ पेश कदमी। मज़हबी शिनाख्तें अपने भोले पन की वजह से कुछ चीजों में रियासत को दबावकुबूल करता हुवा देख कर समझती हैं कि वह पेश कदमी कर रही हैं, जब कि हकीकत में वह मज़हब के दायरे में रियासत के दखल को जवाज़ देने में ना केवल आला कार का किरदार अदा कर रही हैं, बल्कि दावत दे कर रियासत को मज़हब में दखील बना रही है।  इस सारे खेल का आखरी नतीजा मज़हब और मज़हबी डिस्कवर के मुकम्मल तौर पर सेकुलराइज़ड हो जाने की सूरत में निकालना नविश्ता दिवार है, और यही वह नुक्ता है जिसका फहम आम जज़्बाती मज़हबी ज़ेहन तो क्या, मज़हबी लीडर शिप को भी हासिल होना कतई तौर पर मशकूक है।

दक्षिण एशियाई इस्लाम को और ख़ास तौर पर मज़हबी गिरोहों को इतिहास और नए राजनीतिक व सामाजिक तथ्यों की एक नै और मारुज़ी तफ्हीम की आवश्यकता है जिसमें विभिन्न मज़हबी शनाख्तों की बका ए बाह्मी को शुउरी तौर पर, ना कि केवल हालात के जब्र के तौर पर, काबिले कुबूल बनाया जा सके। यह मज़हब के सामाजिक किरदार को बाकी रखने और इसे पुर्णतः रियासती कंट्रोल से बचाने की वाहिद संभव जमानत है। हज़ा मा इंदी वल्लाह आलम।

सितम्बर २०२०, बशुक्रिया: माहनामा अल शरिया

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