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Hindi Section ( 10 Jun 2014, NewAgeIslam.Com)

Cultural Narcissism-Part 4 तहज़ीबी नर्गिसियत भाग (4)

 

मुबारक हैदर

विश्वास में बिखराव

विश्वास के वो रूप जो आज के दौर के वैचारिक आंदोलनों से इतने अलग हैं मुस्लिम क़ौम की मानसिकता में अराजकता का कारण बने हैं, क्योंकि वो लोग जिन्हें मदरसों या उलमा तक पहुँच हासिल हो गयी वो तो इन विश्वासों को स्वीकार करके विश्वास के स्तर पर आ गए हैं और अब उन्हें किसी असमंजस या क्षमा की ज़रूरत पेश नहीं आती। लेकिन उनकी साहसिक भावनाओं से उत्पन्न होने वाला अमल उन अनगिनत मुसलमानों को असमंजस और अवसाद में डाल रहा है जो इन विश्वासों को सरसरे अंदाज़ से सुनते और मानते हैं लेकिन व्यावहारिक जीवन में आधुनिक वैचारिक आंदोलनों के अधीन रहते हैं। ये स्थिति उस वक्त तक राष्ट्रीय और मिल्ली ज़िंदगी को कमज़ोर और उसमें बिखराव पैदा करती रहेगी जब तक दोनों तरह के वैचारिक व्यहारों में से एक हार न जाए। वैचारिक और सैद्धांतिक मामलों में मसलहत का स्थान बाहरी का है।  जबकि ईमान की दुनिया में तो मसलहत एक ज़हरे क़ातिल है। ये मामले ईमान और विश्वास के हैं जिनमें संयम वैचारिक खुलापन जैसी पदावलियाँ निरर्थक हैं जब तक वैचारिक और ज्ञान के स्तर पर विश्वास में सुधार न किया जायेगा, मौजूदा अराजकता मुस्लिम उम्मत और इस क्षेत्र का भाग्य रहेगा। कोई लोकतांत्रिक जन आंदोलन, कोई तानाशाही, कोई समृद्धि, फाटा पर एक अरब डॉलर का निवेश, कुछ भी इस बिखराव को रोक नहीं सकता। अगर ये मान भी लिया जाए कि कॉर्पोरेट अमेरिका और ब्रिटेन खुद धर्मों के टकराव के मौजूदा वैश्विक आंदोलन के निर्माता नहीं बल्कि ये आसमान से उतरा हुआ भाग्य है, और ये भी मान लिया जाए कि अमेरिकी एजेंसियाँ ईमानदारी से पाक अफ़ग़ान अराजकता को खत्म करना चाहते हैं, तब भी ये अटल सत्य है कि ये अराजकता तब तक समाधान की ओर नहीं जा सकती जब तक मान्यताओं के मौजूद रूप पर निर्णायक बहस शुरू कर के नतीजे तक न पहुंचा दी जाए।

इस्लाम के पुनरुद्धार आंदोलन के नेतृत्वकर्त्ता तत्व समझते हैं कि मुसलमानों की तकलीफों का समाधान इस्लाम को ज़िंदा करने में है हालांकि ये भी सच है कि इस्लाम तो ज़िंदा मौजूद है। मौलाना मौदूदी और सैयद कुतुब ने शताब्दियों से बढ़ती समस्याओं का कारण ये बताया कि मुसलमान धर्म की मूल भावना से अनजान हो गए हैं। न जाने क्यों इन दोनों चिंतकों ने इस महत्वपूर्ण प्रश्न पर विचार नहीं किया कि पहली पीढ़ी के मुसलमान यानी पैगम्बर सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम से प्रशिक्षण पाने वाले सहाबा और आप सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम के हाथ पर बैअत करने वाले आप सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम के इंतेक़ाल के कुछ दिन बाद विद्रोह, स्वधर्म त्याग और गृहयुद्ध की स्थिति का शिकार क्यों हो गए जबकि उनके धार्मिक स्तर पर संदेह नहीं किया जा सकता फिर कुछ साल और बीत जाने के बाद शहादत उस्मान रज़ियल्लाहू अन्हा और मुसलमानों के स्थायी विभाजन की त्रासदी पैदा हुई, दो इस्लामी केंद्र स्थापित हुए, विरासती बादशाहत आई और रसूलुल्लाह सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम के परिवार का क़त्ले आम हुआ।

ये सब घटनाएं इस्लाम की समझ न रखने के की वजह से हुई, अगर ये महान विचारक अनुसंधान का तरीका अपनाते यानी तथ्यों को तथ्यों की तरह देखते और उन पर अपने लक्ष्यों से ऊपर होकर फैसला देते तो शायद वो स्वीकार करते कि इन दुखद घटनाओं की वजह शायद ये थी कि नए समाज के राजनीतिक संगठन शासन को चलाने के लिए नियम और कानून मौजूद नहीं थे। आज उनके अनुयायी जिन राजनीतिक संस्थाओं को तबाह करने के लिए आंदोलन चला रहे हैं, यही वो राजनीतिक संगठन और क़ानून हैं जो किसी समाज को अराजकता से बचाते हैं। मिसाल के तौर पर चुनाव के माध्यम से स्थापित होने वाले विधायी संस्थान जिन्हें सैयद कुतुब सबसे बुरी जाहिलियत, अल्लाह की संप्रभुता से विद्रोह, और अल्लाह के कानून पर मानवीय क़ानूनों को प्राथमिकता देना कहते हैं, जबकि न मौलाना मौदूदी न सैयद कुतुब, न वर्तमान इस्लाम के प्रभुत्व आंदोलन के नेता ये स्पष्ट करते हैं कि देश की व्यवस्था को चलाने के लिए या सरकार की नियुक्ति के लिए कौन सा तरीका उनकी नज़र में सही है।

अगर छोटा मुँह बड़ी बात न हो तो ऐसा लगता है कि अगर आप सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम के इंतेकाल के समय आप सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम की नियाबत और राज्य को चलाने का कोई सर्वसम्मति तरीका मुसलमानों के पास होता तो शायद वो उलझनें और वो विभाजन इस्लाम के मानने वालों में पैदा न होतीं जो आज तक मुसलमानों के राजनीतिक मामलों को उलझाते चले आ रहे हैं। ज़रूरत तब भी ज्ञान को आम करने और संस्थानों को स्थापित करने की थी और ज़रूरत आज भी यही है। इस्लाम न तो तब कमज़ोर था न अब कमज़ोर है। राजनीतिक व्यवस्था तब भी स्पष्ट नहीं थी और अब भी स्पष्ट नहीं, मुसलमानों में इल्म तब भी कम था और अब भी कम है।

ये और दूसरे बीसियों मामले जो आज भी मुस्लिम समाज को बिखराव और कमज़ोरी की तरफ ले जा रहे हैं माँग करते हैं कि सरकार और अपोज़ीशन के ज़िम्मेदार नेता और चिंतन करने वाले लोग व्यापक पैमाने पर धार्मिक नेताओं, मदरसों के प्रमुखों और उत्तरी इलाकों में तालिबान के प्रतिनिधियों को एक जगह इकट्ठा करें और उनके बुनियादी सवालों पर विस्तृत बातचीत करें कि क्या मुस्लिम समाज की आज़ादी और विकास के लिए वर्तमान रास्ता व्यवहार्य है? और उन विश्वासों की सच्चाई क्या है जिनका उल्लेख ऊपर किया गया है, जिनके कारण मासूम और अच्छे मुसलमान पूरी दुनिया को अपना दुश्मन समझते हैं यहां तक ​​कि मुस्लिम उम्मत के अंदर उन लोगों को भी वाजिबुल क़त्ल (अनिवार्य रूप से क़त्ल किये जाने योग्य) समझते हैं जो उनके पंथ या प्रोग्राम से मतभेद रखते हैं।

वर्तमान समय ज्ञान के पुरुद्धार आंदोलन को शुरू करने की मांग करता है। एक ऐसा आंदोलन जो मस्जिद और मदरसों से जुड़े लोगों को अविश्वास और नफरत के इस रवैये से आज़ाद करा सके जो उन्हें आधुनिक शिक्षा, कला और औद्योगिक युग की संस्कृति से है और ये सम्भव नहीं जब तक आधुनिक चिंतन शैली से जुड़े मुस्लिम विद्वान धार्मिक मुद्दों पर उच्च दर्जे का इल्म हासिल न कर लें। अक्सर बुद्धिजीवियों का रवैया शायद विरक्ति और उदासीनता है। लेकिन सवाल इस समाज के अस्तित्व और सुरक्षा है: पराए मैदान Hostile pitch पर खेलने या न खेलने का चुनाव अब हमारे हाथ से निकल गया है। साठ बरस के दौरान अपने मैदान में खेलने की ज़िद में हमने हर मैदान गंवा दिया है।

कुछ लोगों ने क़ायदे आज़म के पाकिस्तान में आकर जिहालत का खेल शुरू किया तो हमने उनकी जिहालत और आक्रामकता को उजागर करने की बजाय अपने लिए ये खुश फ़हमी चुन ली कि समय और बदलती दुनिया खुद ही लोगों को उनकी जिहालत (अज्ञानता) से विरक्त (बेज़ार) कर देगी। ऐसा नहीं हुआ और आज नतीजे सामने हैं। अगर कोई चमत्कार उत्पन्न होकर हमें इस त्रासदी से बचा ले तो ये अल्लाह का खास करम होगा, वरना धरती के इस भाग पर आने वाली तबाही उलमा और बुद्धीजीवियों की औलादों में भेद न कर सकेगी। एक रास्ता तो वो है जो मौलाना मौदूदी ने मतभेद करने वालों के लिए प्रस्तावित किया था। उन्होंने स्वधर्म त्याग पर अपनी मशहूर पत्रिका में लिखा था कि इस्लामी क्रांति के बाद:

मुसलमान आबादी को नोटिस दे दिया जाए कि जो लोग इस्लाम में विश्वास और व्यवहारिक रूप से इससे फिर चुके हैं, वो एक साल के अंदर अंदर अपने गैर मुस्लिम होने का बाकायदा इज़हार कर के हमारी सामूहिक व्यवस्था से बाहर निकल जाएं। इस अवधि के बाद (यानी अगर वो कहीं न जाएं) सभी इस्लामी क़ानून उन पर लागू किए जाएंगे, धार्मिक कर्तव्यों और अनिवार्य बातों के पालन के लिए उन्हें मजबूर किया जाएगा और फिर जो कोई इस्लाम के दायरे से बाहर क़दम रखेगा उसे क़त्ल कर दिया जाएगा (इस्लामी कानून में मुर्तद की सज़ा पेज 80)

दूसरा रास्ता ज्ञान व समझदारी, मानवतावादी और प्रेम का है जिसका हमारी जानकारी में इस्लाम से कोई टकराव भी नहीं। लेकिन ये रास्ता सिद्धांतों की व्याख्या और गलत विचारधाराओं के सुधार के बिना अर्थहीन है और निष्प्रभावी है। ये रास्ता सुरक्षा और स्वतंत्रता दोनों की गारंटी देता है। ये राष्ट्रवाद और देशभक्ति का रास्ता होते हुए भी निरर्थक लड़ाई  और अव्यवहारिक आंदोलनों को खारिज करता है। ये जापान, जर्मनी और संयुक्त अरब अमीरात का रास्ता है और एक हद तक खुद सऊदी अरब का भी, जहां आज़ादी की गारंटी जंग और संघर्ष से नहीं आई। न ही धार्मिक विद्वानों के वर्चस्व ने इन देशों को सम्मान और इज़्ज़त की गारंटी दी है। इस रास्ते की बुनियादी शर्त ये है कि अपने निर्माण और विकास के लिए नम्रता और सुलह का रवैया अपनाया जाए।

औपनिवेशिक व्यवस्था से मुक्ति के लिए उपमहाद्वीप की मुस्लिम जनता ने कई बार धार्मिक आंदोलनों का सहारा लिया, 1857 ई. की जंगे आज़ादी, खिलाफत आंदोलन, असहयोग आंदोलन इसके उदाहरण हैं। लेकिन सफलता तभी नसीब हुई जब मुस्लिम समुदाय के आधुनिक बुद्धिजीवियों ने आधुनिक राजनीतिक और वैचारिक आंदोलनों को स्वीकार किया। आज भी आधुनिक ज्ञान और विचार ही औपनिवेशवाद का मुकाबला कर सकते हैं।

लेकिन लोगों का एक बहुत बड़ा हिस्सा मान्यताओं और तथ्यों के विरोधाभास में बंट गया है, जिन्हें इस विरोधाभास से निकालना चयनित सरकारों और बुद्धिजीवियों की ज़िम्मेदारी है। जबकि धार्मिक नेतृत्व का एक बहुत बड़ा हिस्सा जो धर्म में ज़बरदस्त आस्था के कारण इस्लाम के प्रभुत्व के वर्तमान आंदोलन से जुड़ा हुआ है, ज्ञान और कौशल से नफरत नहीं रखता और इसकी अधिक उम्मीद है कि अगर मीडिया की वर्तमान ज़रूरतों को स्वीकार किया और 'पराए मैदान' का विचार छोड़ कर के खेल के वास्तविक तथ्यों को स्वीकार किया जाए तो शायद हम और हमारी नस्लें खून खराबे की त्रासदी से बच जाएं।

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