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Hindi Section ( 6 Dec 2013, NewAgeIslam.Com)

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Perceptions about Islam: What Needs to be Done इस्लाम के बारे में धारणाएं: क्या किया जाना चाहिए?

 

 

मौलाना वहीदुद्दीन खान

22 नवम्बर, 2013

बहुत से गैर-मुसलमानों के बीच इस्लाम विरोधी भावनाएं पाए जाने की सबसे बड़ी वजह वो अंदाज़ है जिसमें मुसलमान इस्लाम को समझते हैं, उसकी व्याख्या करते हैं और उसका प्रदर्शन भी करते हैं, जिसकी एक मिसाल उनका सर्वक्षेष्ठतावादी, अत्यधिक कर्मकांडी और कभी कभी हिंसा पर आधारित दृष्टिकोण है। लेकिन ये बात अच्छी तरह समझ लेनी चाहिए कि ये तीनों तथ्य मुस्लिम संस्कृति का हिस्सा हैं इस्लाम का नहीं। मुसलमानों को इनसे बचना चाहिए और इस्लाम की सही शिक्षाओं पर अमल करना चाहिए। इस्लाम सर्वक्षेषठतावाद की नहीं बल्कि समानता की शिक्षा देता है।  इस्लाम रूहानियत पर आधारित धर्म है और आडम्बर की इसमें कोई गुंजाइश नहीं है। इस्लाम मुसलमानों को हिंसक तरीकों के बजाय शांतिपूर्ण प्रक्रियाओं को अपनाने का हुक्म देता है।

गैर-मुसलमानों की धारणाओं के बारे में उपरोक्त मामलों के सम्बंध में कुछ मुसलमान ये राग अलापते हैं कि कुछ गैर-मुस्लिम इस्लाम के प्रति भेदभावपूर्ण मानसिकता रखने वाले हैं। क्योंकि इस तरह वो आरोप लगाते हैं कि इस तरह के लोग सच्चाई और स्वाभाविक ईश्वर के खिलाफ हैं। लेकिन ये इल्ज़ाम पूरी तरह निराधार और गलत है। सिर्फ एक मुस्लिम परिवार में पैदा होने के आधार पर कोई अच्छा नहीं हो सकता। और इसी तरह सिर्फ किसी गैर मुस्लिम खानदान में पैदा होने के आधार पर कोई भी स्वाभाविक रूप से सच्चाई का दुश्मन नहीं हो सकता। इस्लाम मुसलमानों और गैर मुसलमानों दोनों के लिए खोज और चुनाव का मामला है। इसमें विरासत में प्राप्त होने वाली कोई बात नहीं है।

आज दुनिया के कई हिस्सों में जिहाद के नाम पर हिंसक आंदोलन चल रहे हैं। इसमें शक की कोई गुंजाइश नहीं है कि इसने बहुत सारे गैर मुसलमानों के बीच इस्लाम विरोधी भावनाओं और एक हिंसक धर्म के रूप में इस्लाम की गलत छवि को बढ़ावा देने में अहम भूमिका निभाई है। इसलिए इसका क्या समाधान है?

असल समाधान हिंसा में लगे सभी गैर सरकारी संगठनों को क़ाबू में करना है। इस्लाम के अनुसार केवल सरकार को हथियार रखने और सशस्त्र कार्रवाई करने का अधिकार है। गैर सरकारी तत्वों या गैर सरकारी संगठनों को हथियार रखने का कोई अधिकार नहीं है। गैर सरकारी संगठनों को केवल शांतिपूर्ण गतिविधियाँ चलाने का अधिकार है। किसी भी बहाने से गैर सरकारी तत्वों को हथियार उठाना कानूनन जायज़ नहीं हो सकता। इस बात को सुनिश्चित करना मुस्लिम सरकारों की जिम्मेदारी है कि सेना के अलावा हथियारों तक किसी की पहुंच नहीं होनी चाहिए। अत्यधिक प्रभावी तरीके से मुस्लिम सरकारों को इस कानून को लागू करना चाहिए।

कुछ लोग ये दावा करते हैं कि इस्लाम के नाम पर कट्टरता का मुद्दा मुख्य रूप से आर्थिक और राजनीतिक है। और इन समस्याओं को हल करने के बाद ही आतंकवाद का कोई समाधान तलाशा जा सकता है। बल्कि इसका कारण इस्लाम की गलत अवधारणा है जिसका जन्म राजनीतिक इस्लाम के गर्भ से हुआ है। ये इस्लाम की राजनीतिक व्याख्या ही है जो एक इस्लामी व्यवस्था कायम करने के नाम पर सशस्त्र कार्रवाईयों को सही करार देता है। उग्रवाद से मुकाबला करने का सबसे प्रभावी तरीका ये है कि सभी मुस्लिम नेता उग्रवादियों के इस व्यवहार को अस्वीकार कर दें।

इस सम्बंध में सभी उलमा को सर्वसम्मति से एक फतवा जारी करना चाहिए और जोरदार तरीके से ये बयान जारी करना चाहिए कि इस्लाम में आतंकवाद का कोई औचित्य नहीं है। मुस्लिम विचारकों को इस मामले में महत्वपूर्ण भूमिका निभानी होगी। उन्हें सभी प्रकार के आतंकवाद को अस्वीकार करने का ऐलान करना चाहिए और खुले तौर पर इन गतिविधियों के खिलाफ बोलना और लिखना चाहिए। फिलहाल मुसलमानों के बीच ये जिस पैमाने पर होना चाहिए, वो नहीं हो रहा है। शायद इसकी वजह उनके मन में डर है। वो मुस्लिम समाज में रह रहे हैं इसलिए उनके मन में ये डर बैठ गया है कि अगर वो उन्हें अपनी आलोचना का निशाना बनाएंगे तो उनकी बिरादरी के लोग ही उनके साथ अत्याचार का व्यवहार करेंगे।

इस मामले में मुसलमानों को निम्नलिखित आयत में उल्लिखित हुक्म का पालन करना चाहिए। ''और ऐ मोमिनों तुम सबके सब अल्लाह के हुज़ूर में तौबा करो'' (24: 31) इसलिए इस्लाम के नाम पर की जा रही आतंकवादी कार्रवाई की  सभी मुसलमानों के द्वारा सामूहिक रूप से निंदा करनी चाहिए।

मुस्लिम मीडिया को भी इस्लाम के नाम पर आतंकवाद के खिलाफ संघर्ष में अपनी अहम भूमिका निभानी चाहिए।  फिलहाल मुस्लिम मीडिया दूसरों के पाखंड और अत्याचार से परदा उठा रहा है। इस प्रकार की खबरें मुसलमानों को और भी भड़काती हैं। इसलिए मुस्लिम मीडिया को पूरे तौर पर इस तरह की खबरों पर पाबंदी लगा देनी चाहिए।  मिसाल के तौर पर बहुत सारे मुसलमान इराक पर बमबारी के लिए अमेरिका की निंदा करते हैं, लेकिन शायद ही कोई मुसलमान इस तथ्य को स्वीकार करता है कि अमेरिका ने ही आधुनिक दौर में मीडिया का रास्ता दिखाया है। मुसलमान बड़े पैमाने पर पश्चिमी देशों की ईजाद की गयी आधुनिक तकनीक से भरपूर फायदा हासिल करते हैं फिर भी इसे स्वीकार नहीं करते और उनका शुक्रिया भी अदा नहीं करते। इसलिए मुस्लिम मीडिया को नकारात्मक खबरों के प्रकाशन से पूरी तरह बचना चाहिए और इसके बजाय सकारात्मक खबरों को सामने लाने का बीड़ा उठा लेना चाहिए।

जहां तक मुस्लिम जनता की बात है, तो उन्हें राजनीति में बिल्कुल भी हिस्सा नहीं लेना चाहिए और उन्हें केवल अपनी आजीविका हासिल करने पर ध्यान देना चाहिए। जनता को राजनीतिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए।

ये कुछ ऐसे उपाय हैं जिनके पालन से इस्लाम के नाम पर जारी आतंकवाद से मुकाबला किया जा सकता है।

वास्तव में इस्लाम के नाम पर गलत तरीके से आतंकवाद ने कुछ मुसलमानों की चेतना, पहचान और आत्मविश्वास को प्रभावित किया है। कुछ दिन पहले मुझसे एक व्यक्ति ने सवाल किया कि, ''विभिन्न देशों में स्वयंभू इस्लामी जमातों के द्वारा आतंकवाद की बढ़ती घटनाओं के मद्देनज़र कुछ मुसलमान दूसरे धर्मों के मानने वालों के बीच अपनी इस्लामी पहचान को स्पष्ट करने में हिचकिचाते हैं। और गैरमुसलमानों के साथ रहने में वो अपनी मुस्लिम पहचान को छिपाते हैं।  यहां तक ​​कि कुछ लोगों के अंदर खुद से नफरत की भावना भी पैदा हो जाती है। जिनमें से कुछ की तो इस्लाम में दिलचस्पी भी खत्म हो जाती है। ऐसे लोगों के बारे में आपकी क्या राय है?

मैंने उस व्यक्ति को जवाब दिया कि, ''ऐसी स्थिति में इस तरह के मुसलमानों के लिए एक बेहतरीन मौक़ा मौजूद है, और वो ये है कि वो इस मौके पर इस्लाम के नाम पर की गयी आतंकवाद कार्रवाई को पूरी तरह अस्वीकार कर सकते हैं और गैर मुसलमानों की सभाओं में इस्लाम की सही तस्वीर पेश कर सकते हैं। मैं यही काम कर रहा हूँ। उन्हें, लोगों को ये बताना चाहिए कि उन्हें इस्लाम और मुसलमानों के बीच अंतर करना चाहिए और मुसलमानों को इस्लामी शिक्षाओं की रौशनी में परखने की ज़रूरत है और न की इसके विपरीत करना चाहिए। इस प्रकार की स्थिति मुसलमानों के लिए विभिन्न धर्मों के मानने वालों के साथ बातचीत और दावत और धर्म के प्रचार प्रसार को शुरू करने का एक अच्छा मौका साबित हो सकता है, यानि लोगों को खुदा की राह की तरफ बुलाना है। जब लोग नकारात्मक ढंग से भी इस्लाम के बारे में बातें करें तो उन्हें ये समझना चाहिए कि वो इस्लाम की सही तस्वीर पेश करने का मौका प्रदान कर रहे हैं।''

अगर मुसलमान इस्लाम की इन गलत व्याख्याओं पर मूकदर्शक बने रहते हैं जिनका उपयोग आतंकवाद का औचित्य प्रदान करने के लिए किया गया है, (तो इसका मतलब ये है कि) वो गैर मुसलमानों को इस्लाम के बारे में गलत धारणा बनाने  का अवसर प्रदान कर रहे हैं। इसलिए इसके खिलाफ आवाज़ बुलंद करना और इस्लाम की गलत छवि को दुरुस्त करना हमारी ज़िम्मेदारी है।

रूढ़िवादी इस्लाम, इस्लाम के राजनैतिक थ्योरी की पैदावार है। जो लोग इस्लाम की व्याख्या से प्रभावित हैं उनके सामने भी ये व्याख्या पेश करने की ज़रूरत है कि ये इस्लाम की सही व्याख्या नहीं है। एक बार अगर वो संतुष्ट हो गए तो वो उग्रवादी गतिविधियों से अपने आपको खुद बचाएंगे। इस मामले में मेरा व्यक्तिगत अनुभव बड़ा ही सकारात्मक रहा है।

मौलाना वहीदुद्दीन खान दिल्ली स्थित सेंटर फॉर पीस एंड स्पिरिचुआलिटी के प्रमुख हैं।

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