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Khidmat-e-Khalq: A Shining Chapter of Islamic Teachings मखलूक की सेवा: इस्लामी शिक्षाओं का चमकदार अध्याय

मौलाना शमीम अकरम रहमानी

२७ नवंबर २०२०

इस्तेलाहे शरअ में रजाए इलाही के प्राप्ति के लिए जायज मामलों में अल्लाह की मखलूक की मदद करना खिदमते खल्क (मखलूक की सेवा) कहलाता है। आयतों व रिवायतों के अध्ययन से पता चलता है कि खिदमते खल्क ना केवल सभ्य समाज की तशकील का अहम तरीन ज़रिया है बल्कि मोहब्बते इलाही का तकाजा, ईमान की रूह और दुनिया व आख़िरत की सुर्खरुई का वसीला भी है। आम तौर पर लोग केवल माली मदद को ही खिदमते खल्क समझते हैं हालांकि माली इमदाद के अलावा किसी की किफालत करना, इल्म व हुनर सिखाना, मुफीद मशवरों से नवाजना, भटके हुए मुसाफिर को सहीह राह दिखाना, इल्मी सरपरस्ती करना, शैक्षणिक और कल्याणकारी संस्था कायम करना, किसी के दुःख दर्द में शरीक होना और उन जैसे सैकड़ों दुसरे कार्य भी खिदमते खल्क की विभिन्न राहें हैं जिन पर अपनी सलाहियतों के एतेबार से हर इंसान चल सकता है। इसके लाजमी अर्थ यह हुए कि खिदमते खल्क की शाहराह पर चलने के लिए किसी लीडर या तहरीक के बजाए केवल एक मुकद्दस जज़्बे की जरूरत होती है और पवित्र भावना ही वह चीज है जो अल्लाह के नज़दीक किसी भी इंसान को कीमती बना देता है। अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने स्पष्ट तौर पर एक उसूल से उम्मत को रुश्नास कराते हुए इरशाद फरमाया है कि दीन खैर ख्वाही का नाम है। ज़ाहिर है कि खैर ख्वाही भी एक पवित्र जज़्बे के आलावा और कुछ नहीं है। खैरख्वाही जब कमाल के दर्जे को पहुंचता है तो आमाल से इसका इज़हार भिन्न भिन्न रूपों में होने लगता है, जिन्हें लोगों की निगाहें देखती हैं और ज़ुबाने दुआओं से नवाज़ना शुरू कर देती हैं। परिणाम स्वरूप इंसान कभी कभी उस दर्जे पर फाएज हो जाता है जहां दुसरे लोग बरसों की इबादत व रियाज़त के बाद भी नहीं पहुँच सकते हैं। एक बदकार औरत के प्यासे कुत्ते को पानी पिला कर जन्नत में जाने का वाकिया इस हकीकत की अच्छी मिसाल है जिससे हर ख़ास व आम वाकिफ है।

यहाँ यह बात भी काबिले ज़िक्र है कि इस्लाम में खिदमते खल्क जो कि जज़्बा ए खैर ख्वाही का अहम तरीन नतीजा है, अजीमुश्शान इबादत की हैसियत रखता है और कुरआन मजीद में जहां तख्लीके इंसानी का उद्देश्य इबादत को करार दिया गया है, वहाँ इबादत में खिदमते खल्क भी दाखिल है, इसलिए दुसरे इबादतों की तरह यहाँ भी दुनयावी मकासिद पर नज़र रखने के बजाए आख़िरत के मकासिद पर ही नज़र रखने की आवश्यकता है, वरना सखी तरीन शख्स को मुंह के बल घिसत कर जहन्नम में फेंकने की वईद हदीस की प्रमाणिक किताबों में मौजूद है। इसके यह मानी हरगिज़ नहीं कि खिदमते खल्क के नतीजे में हासिल होने वाले दुनयावी हितों को इस्लाम नापसंदीदगी की निगाह से देखता है: इसलिए कि नफ़ा रिसां चीजों के ज़मीन में जैम जाने और मजबूत हो जाने की बात कुरआन मजीद में मौजूद है: जो कुछ लोगों के लिए लाभदायक होता है वह ज़मीन में बाकी रहता है। (सुरह अल राअद:१७)

बात इतनी सी है कि इस्लाम अपने मानने वालों को इस बात का पाबंद बनाता है कि वह हर काम केवल रजाए इलाही के हुसूल के लिए करें; चाहे परिणाम कुछ भी ज़ाहिर हों। इस हकीकत का इज़हार अल्लाह पाक कुरआन में किया है:

आप कह दें कि बेशक मेरी नमाज़, मेरी कुर्बानी, मेरा जीना और मेरा मरना अल्लाह ही के लिए है, जो सारे जहां का पालने वाला है।(सुरह इनआम: १६२)

खिदमते खल्क समाज की आवश्यकता भी है, जिससे राहे फरार इख्तियार करने के नतीजे में समाज मसाइल व मसाइब के दहाने पर खड़ा हो जाता है। इसलिए मेरा खयाल है कि जिस समाज में खिदमते खल्क का रिवाज ना हो वह समाज इस्लामी समाज तो दूर इंसानी समाज कहलाने का हकदार भी नहीं है, संभव है मेरे विचार से किसी को मतभेद हो, लेकिन इंसान का शब्द हमें स्पष्ट तौर पर उसी नतीजे तक पहुँचाता है, इंसान के माद्दे में मोहब्बत व उन्सियत का मफहूम दाखिल है जिन्हें अगर इंसान से अलग कर दिया जाए, तो हकीकी अर्थ में इंसान इंसान नहीं रहता बल्कि चेतना की सबसे निचली साथ पर पहुँच कर इंसानी समाज में पलने वाला एक जानवर बन जाता है, जिसके लिए जायज और नाजायज की हदों को फलांगना कोई मानी नहीं रखता; बल्कि नफ्स की ख्वाहिशों की तकमील के लिए सब कुछ करना आसान हो जाता है। इसी लिए इस्लाम ने सीमाओं व दंड के माध्यम से ऐसी मानसिकता और ऐसे लोगों की हौसला शिकनी की है, जो जाती हितों और नफ्स की इच्छाओं की पूर्ति के लिए दूसरों के हितों और इच्छाओं से खिलवाड़ करने की हिम्मत करते हैं और उन लोगों की हौसला अफजाई की है जो समाज के दुसरे जरुरतमंदों और मोहताजों का दर्द अपने दिलों में समेटने की कुदरत रखते हैं, तंग दस्तों और तहि दस्तों के मसाइल को हल करने की फ़िक्र में रहते हैं, अपने आराम को त्याग कर दूसरों की राहत रिसानी में अपना समय खर्च करते हैं, दुसरे शब्दों में खिदमते खल्क के मैदान में काम करते हैं। लोगों को लाभ पहुँचाने के लिए कार्य करने वाला व्यक्ति इस्लाम की निगाह में बेहतरीन व्यक्ति है, अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने स्पष्ट शब्दों में इरशाद फरमाया कि: लोगों में बेहतरीन व्यक्ति वह है जो दूसरों को लाभ पहुंचाए। (कंज़ुल आमाल)

उल्लेखित रिवायत में लाभ पहुंचाने के लिए काम करने की तरगीब है और बिना किसी कैद के साथ है इसलिए कि केवल मुसलमानों के लिए लाभ पहुंचाने का काम करने वाला ही अल्लाह का महबूब नहीं है बल्कि गैर मुस्लिमों के साथ लाभ पहुंचाने का काम करने वाला भी अल्लाह का महबूब है जिस से बड़ी आसानी से यह परिणाम निकाला जा सकता है कि इस्लाम ने खिदमते खल्क के दायरे कार को केवल मुसलमानों तक सीमित रखने का आदेश नहीं दिया है, बल्कि गैर मुस्लिमों के साथ भी इंसानी हमदर्दी और हुस्ने सुलूक की तरगीब दी है। यही कारण है कि अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने जहां मुसलमानों को एक दुसरे का भाई करार दिया है वहीँ तमाम मखलूक को अल्लाह का कुंबा भी करार दिया है, जिसके नतीजे में इंसानियत की तामीर के लिए आपसी हमदर्दी, आपसी मदद और भाई चारे की ऐसी विस्तृत बुनियाद प्राप्त हुई है जिसकी नज़ीर पेश नहीं की जा सकती। पड़ोसियों के अधिकारों की बात हो, मरीजों की तीमारदारी का मामला हो, गरीबों की इमदाद का मसला हो या इंसानी अधिकारों के दुसरे मरहले हों; इस्लाम ने रंग व नस्ल और मज़हब व मिल्लत की तफरीक के बिना सबके साथ बराबर सुलूक को आवश्यक करार दिया है, हैरत है उन लोगों पर जिन्होंने मजहबे इस्लाम की मन गढ़त तस्वीर पेश करते हुए यहाँ तक कहा है कि इस्लाम में खिदमते खल्क का कोई व्यापक तसव्वुर मौजूद नहीं है, बल्की इस्लाम ने मुसलमानों को इस बात का पाबंद बनाया है कि वह आपस में एक दुसरे के साथ हमदर्दी करें, हालांकि मजहबे इस्लाम ने बुनियादी अकीदों के बाद खिदमते खल्क को सबसे अधिक महत्व दी है, और अपने मानने वालों को सबके लिए अर्थात तमाम आलमे इंसानियत के लिए खैर ख्वाही का पाबंद बनाया है।

तबलीगे दीन के फरीज़े को सर अंजाम देने का हुक्म भी खैर ख्वाही के जज़्बे के तहत ही है, ताकि इंसानियत को जहन्नम के गढ़े में जाने से बचाया जा सके। यहाँ तक कि जब तक गैर मुस्लिमों की तरफ से खुली दुश्मनी का इज़हार ना हो, मुसलमानों की मज़हबी ज़िम्मेदारी है कि वह गैर मुस्लिमों के साथ अच्छा बर्ताव करें। कुरआन मजीद की सुरह निसा में मुशरिक कैदियों को खाना खिलाने वालों की तारीफ़ मौजूद है जिससे इस्लाम के खिदमते खल्क के दायरेकार का अंदाजा लगाया जा सकता है। इल्मे हदीस से वाकिफियत रखने वाले उलेमा जानते हैं कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के फरमान के एक बड़े हिस्से का संबंध हुकुकुल इबाद और खिदमते खल्क से है, लम्बी बयानबाजी से बचने के लिए इन रिवायतों के वर्णन की अनुमति नहीं है, अन्यथा सैकड़ों रिवायतों का उल्लेख किया जा सकता है, लेकिन कुछ प्रसिद्ध हदीसों का उल्लेख करना उचित लगता है।

(१) तुम ज़मीन वालों पर रहम करो आसमान वाला तुम पर रहम करेगा (तिरमिज़ी शरीफ), (२) कौम का सरदार कौम का खादिम होता है (अल जामेउल सगीर लिल सुयूती), (३) अल्लाह अपने बंदे की मदद में उस वक्त तक रहता है जब तक बंदा अपने भाई की मदद करता है (मुस्लिम शरीफ), (४) तुम में से कोई शख्स उस वक्त तक कामिल मोमिन नहीं हो सकता, जब तक कि वह अपने भाई के लिए वही चीज पसंद ना करे जो वह अपने लिए पसंद करता है (मुस्लिम शरीफ), (५) जो रहम नहीं करता है उस पर रहम नहीं किया जाता। (मुस्लिम शरीफ)

ज़िक्र किये गए रिवायतों से आसानी से कोई भी शख्स खिदमते खल्क के सिलसिले में इस्लाम और पैगम्बरे इस्लाम के मिजाज़ का अंदाजा लगा सकता है, फिर यह कि ज़िक्र किये गए शिक्षा केवल जुबान खर्ची नहीं है कि किसी को एतेराज़ का हक़ हासिल हो, बल्कि इस्लाम के पैगम्बर की सीरत के अध्ययन से यह बात दिन की रौशनी की तरह साफ़ हो जाती है कि आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की अमली जिंदगी भी खिदमते खल्क से लबरेज़ है। बेअसत से पहले भी आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम खिदमते खल्क में खूब मशहूर थे, बेअसत के बाद तो खिदमते खल्क के जज़्बे में और इजाफा हो गया था यहाँ तक कि आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने जब मदीना तय्यबा में एक इस्लामी रियासत की बुनियाद रखी तो तरजीही बुनियाद पर समाज में आर्थिक स्थिरता के लिए माल वालों को इन्फाक फिल माल की तलकीन फरमाई।

इसलिए साम्प्रदायिकता और नैतिक संकट के इस दौर में इस बात की आवश्यकता है कि समाज के प्रभावी लोग, संगठन और संस्था खिदमते खल्क के मैदान में आगे आएं और मजबूती के साथ अपने कदम जमाएं, दुनिया को अपने अमल से इस्लाम सिखाएं, लोग इस्लाम को किताबों के बजाए हमारे अख़लाक़ व किरदार से ही समझना चाहते हैं, इस्मने कोई शक नहीं कि हमारे कुछ संस्था बेहतर काम कर रहे हैं, लेकिन और अच्छा करने की आवश्यकता है, निजी स्कूलों और मदरसों के निसाबों में नैतिकता को बुनियादी अहमियत देने के साथ अमली मश्क कराएं, ताकि नई नस्लों में भी खिदमते खल्क का जज़्बा परवान चढ़े। यह सब हमारे करने के काम हैं।

२७ नवंबर २०२० उर्दू से अनुवाद: न्यू एज इस्लाम

Urdu Article: Khidmat-e-Khalq: A Shining Chapter Of Islamic Teachings خدمت خلق :اسلامی تعلیمات کا درخشندہ باب ہے

URL: https://www.newageislam.com/hindi-section/khidmat-e-khalq-shining-chapter/d/126169

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