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Hindi Section ( 24 May 2012, NewAgeIslam.Com)

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Significance of Harmain Sharifain हरमैन की फज़ीलत


मौलाना नदीमुल वाजिदी

21 मई 2012

(उर्दू से अनुवाद- समीउर रहमान, न्यु एज इस्लाम)

हरमे मक्की और हरमे मदनी के बेशुमार फ़ज़ाइल हैं, ये दोनों शहर अल्लाह के नज़दीक बेहद मोकर्रम और अल्लाह के पैग़म्बर सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम की नज़र में बहुत ज़्यादा महबूब हैं, कुरआन में अल्लाह ने मक्का की कसम खाई है जो बज़ाते खुद इसकी अज़मत और तकद्दुस की दलील है, फरमाया, वत्तीन वज़्ज़ैतूने वतूरे सीनीना वहाज़ल बलदिल अमीन(अलतीन 1 से 3)'' क़सम है अंजीर की, जैतून की और तौर सीनीन औऱ बलादिल अमीन की '' यहां बलद अमीन से मक्का शहर मुराद है, एक जगह इरशाद फ़रमाया: अलम यरौ इन्ना जअलना हरामन आमेना (अन्कबूत: 67)'' क्या वो लोग ये नहीं जानते कि हमने (मक्का को) अमन वाला हरम बनाया है '' हरमा आमेनिही शहरे मोकद्दस है, इस शहरे मोकद्दस में अल्लाह का घर है, जो सभी मुसलमानों का क़िबला है, और फरीज़ए हज की अदायगी का मर्कज़ भी, इस शहर के लिए और इस शहर के रहने वालों के लिए अल्लाह के महबूब पैग़म्बर हज़रत इब्राहीम खलीलुल्लाह ने बेशुमार दुआएं मांगी हैः रब्बिज अल हाज़ा बलादन आमेनन (अलबकराः166) '' ऐ अल्लाह! इसको एक पुरअमन शहर बना दीजिए''........ फ़जअल अफएदातम मेनन नासे तहवा एलैहिम वरज़ोकूहुम मेनस्समाराते.....(अलइब्राहीम: 37) '' आप कुछ लोगों के क़ुलूब उनकी तरफ माएल कर दीजिए और उनको फल खानो को दीजिए''

 ये शहर अल्लाह के आखिरी रसूल हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम की जाये पैदाइश भी और मकामे तर्बियत भी है, आप उसी की पुरकैफ और जांफिज़ा वादिंयों में पल कर जवान हुए, इसी शहर में आप सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम पर पहली वही नाज़िल हुई, आप सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम को इस शहर से बेपनाह मुहब्बत थी, जब आप हिजरत के इरादे से पाबा सफर हुए तो मक्का के बाजार में खड़े होकर आप सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने इरशाद फ़रमाया: बखुदा! तू अल्लाह की ज़मीन में सबसे बेहतर जगह है, और अल्लाह को सबसे ज़्यादा महबूब है, अगर मुझे इस सरज़मीन से न निकाला जाता तो हरगिज़ न निकलता (मसनद अहमद इब्ने हंबल: 38/157, रक़मुल हदीस: 17968) आप सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने ये भी इरशाद फ़रमायाः ऐ मक्का तू मेरे लिए किस कदर पाकीज़ा और महबूब शहर है, ख़ुदा की क़सम अगर मेरी क़ौम मुझे न निकालती तो मैं कभी किसी दूसरी जगह क़याम पज़ीर न होता (सुनन अलतिरमिज़ी: 12/435, रक़म: 3861)

 मक्का वो शहर है जिसमें मीकाती को एहराम पहनकर दाखिल होना लाज़िमी है, इस शहर के पेड़ काटना, पत्ते तोड़ना, शिकार करना तक हराम है, हुदूदे हरम में किसी मुशरिक का दाखिल होना हद ये है कि उसकी हुदूद से गुजर जाना भी जायज़ नहीं, इस शहर की अज़मत का क्या ठिकाना दुनिया भर में जहां जहां नमाज़े पढ़ी जाती हैं, मुसलमानों का रुख इसी की तरफ होता है, मुसलमानों के लिए अल्लाह का घर जो इस सरज़मीन पर क़ायम है इस क़दर लायके एहतेराम है कि क़ज़ा ए हाजत के वक्त उसकी तरफ मुंह करके बैठना भी नाजायेज़ है, मस्जिदे हराम में अदा की गई नमाज़ का सवाब एक लाख नमाज़ों के बराबर है, फुकहा अहनाफ, शवाफे, हनाबेलह सबका मुत्तफेका फैसला ये है कि मक्का दुनिया के सभी शहरों से अफज़ल व मोकर्रम है। मदीना आपका मकामे हिजरत भी है, और आखरी आरमगाह भी, जमीन का वो टुकड़ा जो आपके जस्दे अतहर को मस किए हुए है वो अर्शे इलाही से भी अफज़ल बताया गया है, अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम को मदीना बेहद महबूब था, आप इस शहर के लिए दुआ किया करते थे,'' ऐ अल्लाह तेरे खलील, तेरे रसूल और तेरे नबी हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम ने तुझ से अहले मक्का के लिए दुआएं मांगी है, में तेरा बंदा और तेरा रसूल मुहम्मद सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम तुझसे अहले मदीना के लिए वही दुआएं मांगता हूँ जो हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम ने अहले मक्का के लिए मांगी है, हम दुआ करते हैं कि ऐ अल्लाह! अहले मदीना के सा और मुद (दो पैमाने) और फलों में बरकत अता फरमा, ऐ अल्लाह जिस तरह तूने हमारे दिलों में मक्का की मुहब्बत पैदा फ़रमाई है, उसी तरह मदीना की मुहब्बत भी पैदा फरमा, (सुनन इब्ने माजा: 9/259 , रक़मुल हदीस 3104) एक हदीस में है, उस ज़ात की कसम जिसके कब्ज़े में मेरी जान है मदीने में कोई जगह, कोई घाटी कोई खोह ऐसी नहीं है जिस पर हिफाज़त के लिए दो फरिश्ते मामूर न हों'' (मुस्लिम: 7/114 , रक़म: 2439) हज़रत इबादा इब्ने अलसामत रज़ियल्लाहु अन्हु रिवायत करते हैं कि सरकारे दोआलम सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने अहले मदीना पर ज़ुल्म करने वालों के लिए ये बद्दुआ फ़रमाई, ऐ अल्लाह जो शख्स मदीना पर ज़ुल्म करे और उन्हें खौफ में मुब्तेला करे उस पर अल्लाह की, फरिश्तों की और तमाम लोगों की लानत हो'' (अलमोजम अलकबीर अलतिब्रानी: 6/271)

मक्का और मदीना के फ़ज़ाइल में से ये भी काबिले ज़िक्र है कि इन दोनों शहरों के बाज़ इज्ज़ा जन्नत के हिस्से में हैं, हज्रेअस्वद के बारे  में मरवी है कि 'हज्रे अस्वद जन्नत से उतारा गया पत्थर है, ये दूध से भी ज़्यादा सफेद था इंसानों के गुनाहों ने इसका रंग काला कर दिया है'' (सुनन अलतिरमिज़ी: 3/420, रक़म: 803) एक हदीस में है, रुक्न और मकाम दोनों जन्नत के दो मोती हैं, अल्लाह ने उनके नूर को छिपा दिया है, अगर ऐसा न होता तो उनकी रौशनी से पश्चिम और पूर्व रौशन हो जाते'' (सुनन अलतिर मिज़ी: 3/421, रक़म 804) मस्जिदे नब्वी में वाक़े एक कतए अरज़ी के बारे में सरकारे दोआलम सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम का इरशाद मुबारक है।'' मेरे घर और मेरे मिम्बर के दरम्यान जो जगह है वो जन्नत के बागीचों में से एक बागाचा है, और मेरा मिम्बर मेरे हौज़े (कौसर) पर होगा'' (सही अलबुखारी: 4/385)

ये दोनों शहर अहले ईमान के लिए हमेशा से मर्कज़े अकीदत हैं, और हमेशा रहेंगे, इन दोनों शहरों से मुसलमानों का रिश्ता मोहब्बत और इश्क का है, अकीदत व एहतेराम का है, ये रिश्ता कभी कमजोर नहीं पड़ सकता, एक बेअमल मुसलमान का दिल भी मक्का और मदीना का नाम आते ही फर्ते मोहब्बत से धड़कने लगता है, इन दोनों शहरों से मुसलमानों का लाज़वाल ताल्लुक़ सारी दुनिया पर आशकार है, और दुश्मनों के दिलों में ख़ार की तरह खटकता है, अमेरिका से जो खबरें आई हैं उन्हें उसी पहलू से देखने की जरूरत है, अमेरिका क्या, कोई भी इस्लाम दुश्मन मुल्क या क़ौम नहीं चाहती कि मुसलमान इन दोनों शहरों से जुड़े रहें, इसलिए अमेरिका ने अपने नेसाब में इस नापाक मंसूबे को शामिल किया है, ये नेसाब पढ़ाया जा रहा था, और इस मंसूबे पर अमल करने के लिए जहेन साज़ी कब से हो रही थी, और कब से इसकी अमली तर्बियत दी जा रही थी, हर दिन नए नए खुलासे हो रहे हैं, मजमूई तौर पर ये बात वाज़ेह होकर सामने आ गई है कि अमेरिका खुद को रवादारी का पैगाम्बर कहता है मगर दरहकीकत ये उसका ज़ाहिरी चेहरा है, हकीकते हाल इस मंसूबे की तफ्सील से अयाँ हैः

ये नेसाब जो अमेरिकी फौजों को पढ़ाया जा रहा है, अमेरिका की तंगनज़री का गम्माज़ है, इसकी एक स्लाइड में अमेरिकी फौज के एक अफसर कोनल मैथ्यू डोली अपने फौजियों को बतला रहा है कि जब वो मुसलमानों का सामना करें, तो जिनेवा कंवेंशन के तमाम उसूल व ज़वाबित बलाए ताक़ रख दें, इस हिदायत पर किसी तरह अमल हो रहा है, ये बतलाने की जरूरत नहीं है, इसी अफसर ने फौजियों के तर्बियत क्लास के लिए So Want Can we do के नाम से इकतीस पेज पर मुशतिमल जो नेसाब वज़ह किया है इसमें इस्लाम और मुसलमानों के खिलाफ पूरी तरह ज़हर उगला गया है, इस्लाम और मुसलमानों पर ये इल्ज़ाम आयेद करने के बाद कि उन्होंने पश्चिम और बतौरे खास अमेरिका के खिलाफ जंग छेड़ रखी है, ये नतीज़ा ओखज़ किया गया है कि ये हालात इंसानी आबादियों तक जंग का दायेरा वसी करने का दाई है, और जिस तरह ड्रेस्डेन, टोक्यो, हीरोशिमा और नागासाकी में (बमबारी के) वाकेआत रूनुमा हुए इसी तरह के वाक़ेआत मक्का और मदीना में भी होने चाहिए।

इस्लाम के खिलाफ मोकम्मल जंग और मक्का व मदीना पर ऐटमी हमले की तालीम और तर्बियत सिर्फ अमेरिकी फौजियों को ही नहीं दी जा रही है बल्कि एक खास हिकमते अमली के तहेत तमाम सिक्योरिटी फोर्सेज़ को इस तरह की तर्बियत दी जा रही है और ये अमल आज से नहीं बल्कि 1988 से जारी है, अमेरिकी सरकार का ये मंसूबा कोई नई बात नहीं है और न ये कोई बहुत खुफिया प्लान है, 1988 से जारी इस मंसूबे को न सिर्फ पेंटागन ने बाकायदा मंज़ूरी दी बल्कि उस वक्त के सदर के दस्तखत से इस काम का आगाज़ हुआ, लेकिन होमलैण्ड सिक्योरिटी, मेट्रो पोलिटिन पुलिस, एफबीआई और दूसरे अदारों में इस्लाम मुखालिफ तर्बियत और ज़हेन साज़ी का अमल 9/11 के बाद शुरू किया गया और इस मकसद की खातिर अमेरिका बाकायेदा तंज़ीमें और थिंक टैंक भी बनाए गए जिनमें इजरायल और अमेरिका की दोहरी शहरियत रखने वालों को बतौरे खास इसमें शामिल किया गया, ये बात ढकी छुपी नहीं रही कि पेंटागन, अमेरिकी वेज़ारते देफा, व्हाइट हाउस और सीआईए 1988 से ही इस मंसूबे के साथ मुंसलिक हैं औऱ अब तफ्सीलात सामने आ जाने के बाद पेंटागन खुद को इससे बचाने की कोशिश कर रहा है, हालांकि अब ये पायए सुबूत को पहुँच चुकी है कि अमेरिकी एजेंसी कुरान, मक्का और मदीना से मुसलमानों का ताल्लुक खत्म करने के मंसूबे पर अर्सा दराज़ से काम कर रहे हैं। एक मारूफ अमेरिकी थिंक टैंक से जुड़े रहने वाले शख्स ने हाल ही में खुलासा किया है कि अमेरिकी थिंक टैंक में ये अमर मुस्तकिल बहस का उन्वान है कि मुसलमानों का रिश्ता कुरान और शरीयत से खैसे खत्म किया जाये, इस शख्स के बक़ौल दुनिया भर में जारी तौहीने कुरान और तौहीने रिसालत की मुहिम भी अमेरिकी जंगी हिकमत अमली से अलग नहीं बल्कि इसी थिंक टैंक की रिसर्च के नतीजे पर शुरु किया गया नफसियाती हरबा है ताकि बार बार की तौहीन से मुसलमानों को हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम और कुरान की तौहीन बर्दाश्त करने का आदी बना दिया जाए और इससे अगले मरहले में हरमैन को नऊज़ो बिल्लाह खत्म करके पूरी दुनिया से इस्लाम को मिटा दिया जाए (बहवाला रोज़नामा उम्मत कराची, इतवार 13 / मई 2012)

काबा मशरफा के खिलाफ ईसाइयों के नापाक अज़ायम का सर हमें चौदह सौ साल पहले के वाक़ेआत में तलाश करना चाहिए, जब अभी इस्लाम का आगाज़ भी नहीं हुआ था, ये वो चिंगारी है जो वक्त के साथ साथ ईसाइयों के दिलों में शोलए आतिश बनकर भड़क रही है, हज़रत मौलाना हिफ़ज़ुर्रहमान सियोहारवी रहिमतुल्लाह ने अबरहा के वाक़ए पर तब्सिरा करते हुए लिखा है'' इस वाक़ए में इस जानिब इशारा मालूम होता है कि दुनिया के सभी मुल्कों में सबसे ज़्यादा ईसाइयों को ही बैतुल्लाह'' काबा ' के साथ अदावत रहेगी, और अपने गैर मोतमद्दन हर ज़माने में इसके खिलाफ अपनी अदावत का इज़हार करते रहेंगे, और हमेशा इस मर्कज़े तौहीद की दर पे रहेंगे, चुनांचे तारीखे माज़ी इसकी शाहिद है कि जब कभी नसारा को इसका मौका मयस्सर आया, उन्होंने अमलन अपनी अदावत का इज़हार किये बग़ैर न छोड़ा और हालांकि ख़ुदा तआला ने इस सिलसिले में हमेशा उनके इरादों को नाकाम रखा लेकिन वो बहरहाल अपने क़ल्बी बुग़्ज़ व हसद का सबूत दिए बगैर नहीं रहे (कससुल कुरान: 3 / 397)

गोया खानए काबा के खिलाफ ये पुरानी दुश्मनी है, जिसका आगाज़ सरकारे दोआलम सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम की तशरीफ आवरी से ठीक चालीस या पचास दिन पहले पेश आया, कुरान ने इस वाकिये की जुज़ियात तो बयान नहीं की लेकिन इस वाकिए का जो अहम हिस्सा है वो एक मुख्तसर सूरत में इस तरह बयान फ़रमा दिया कि खानए काबा की हिफाजत का पूरा वाकिआ निगाहों के सामने आ जाता है, इस सूरत का नाम ''अल्फ़ील'' है अरबी में फील हाथी को कहते हैं, क्योंकि इस वाकिआ में हाथी का बड़ा किरदार है इसलिए इसको उन्वान बनाया गया, इस सूरत में पांच छोटी छोटी आयतें हैं जिनका तर्जुमा ये है:'' क्या तू ने नहीं देखा कि तेरे रब ने हाथी वालों के साथ क्या मामला किया, क्या उनके फरेब को नकारा नहीं बना दिया, और उन पर परिंदों के झुंड के झुंड भेज दिए, वो उन पर संगरेज़े फेंकते थे, फिर उन्होंने उन्हें खाए हुए भूसे की तरह कर दिया'' (सूरह अल्फ़ील: 1 से 5) पूरी तफ्सील हदीस, सीरत और तारीख की किताबों में मिलती है, उलेमा ने इस वाकिआ को भी रसूल अल्लाह सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम का एक किस्म का मोजेज़ा क़रार दिया है, दावाए नबूवत से पहले बल्कि नबी की विलादत से भी पहले हक़ ताला बाज़ औक़ात दुनिया में ऐसी वाकेआत और निशानियाँ ज़ाहिर फरमाते हैं ख़रके आदत होने में मोजेज़ात की तरह होते हैं, बक़ौल हजरत मौलाना हिफज़ुर्रहमान सियोहारवी रहिमतुल्लाह अलैह '' नबी अकरम सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम की विलादत बासआदत से पहले जो निशान ज़हूर में आए और सुबह सआदत के लिए आसार व अलामतों के बतौर दिखलाए गए इन्हीं में से असहाब फील का वाकेआ भी एक ज़बरदस्त निशान और अज़ीमुल मर्तबत अलामत है (कससुल कुरान: 3/394)

अरबों में वाकेआ फील इस दर्जे अहमियत का हामिल था कि उस साल का नाम जिसमें ये वाकेआ पेश आया उन्होंने आम अल्फ़ील (हाथियों वाला साल) रख दिया, इसी हवाले से वो लोग अपने तारीखी वाकेआत का ज़िक्र करते थे, जिस वक्त मक्का में ये सूरत नाज़िल हुई तो मुशरकीने मक्का ने यहूद और नसारा हालांकि आप सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम की तकज़ीब में एक दूसरे के हम नवा थे मगर किसी को भी इस वाकिआ की तर्दीद या तकज़ीब की जुर्रत न हुई, क्योंकि उस वक्त भी हजारों लोग इस वाकिआ के चश्मदीद गवाह के तौर पर ज़िंदा थे। इस वाकिए का असल किरदार अबरहा नामी शख्स है जो 525 ईस्वी के आस पास यमन का बादशाह था, अबरहा इब्राहीम का हब्शी तलफ्फुज़ है, ये शख्स ईसाईयत की तब्लीग़ में बहुत पुर जोश था, इस शख्स ने पूरे मुल्क में बेशुमार गिरजाघर तामीर कराए और जगह जगह मोबल्लिगीन और पादरियों की तकर्रुरी की, एक बहुत बड़ा गिरजाघर यमन के दारुल सल्तनत सना में बनाया, इतिहासकार लिखते हैं कि ये कलीसा फने तामीर के लिहाज़ से अपनी नज़ीर में आप था, इस तामीर से फारिग़ होने के बाद अबरहा ने नज्जाशी को लिखा कि मैंने ऐसा शानदार कलीसा तामीर कराया है कि इससे पहले इतिहास में ऐसा कलीसा किसी ने न देखा होगा, अब मेरी तमन्ना है कि जो अरब मक्का में काबा का हज करने के लिए जमा होते हैं, उन सबका रुख़ कलीसा की तरफ फेर दूँ और तमाम अरबों के लिए ही कलीसा मकामे हज बन जाए, इस ऐलान से अरबों में ग़म व गुस्सा फैल गया, और ये गुस्सा कलीसा से नफरत में बदल गया, सना में मोक़ीम किसी हेजाज़ी नस्ल शख्स ने अपनी किसी हरकत से कलीसा का तकद्दुस पामाल किया तो अबरहा गुस्से से पागल हो गया और उसने तय किया कि वो काबे इब्राहीमी को तबाह व बर्बाद किये बग़ैर चैन से नहीं बैठेगा, अपने इस नापाक इरादे पर अमल करने के लिए अबरहा एक बड़े लश्कर और हाथियों की एक बड़ी तादाद के साथ मक्का का रुख किया, ये खबर सभी अरब कबाएल पर बिजली बनकर गिरी, इसलिए काबा तमाम अरब के नज़दीक वाजिबुल एहतेराम था, इसलिए यमन से ही अबरहा की मुखालिफत शुरू हो गई, सबसे पहले यमन के ही एक अमीर ज़ोनज़र ने मुख्तलिफफ क़बाएल के साथ मिलकर अबरहा के लश्कर से मज़ाहिमत की मगर नाकामी हाथ लगी, इसके बाद क़बीला बनी खशअम के साथ मुकाबला हुआ, उसको भी शिकस्त का सामना करना पड़ा, मुख्तलिफ मज़हिमतों का सामना करता हुआ अबरहा अपने लश्कर के साथ मक्का के बाहर वादिये मोगम्मस में फर्दे कुश हो गया, वहां से उसने अपने अफसरों को छापा मारी के लिए मक्का की तरफ भेजा, मक्का के लोग या तो बेखबर थे या फिर हद दर्जा मुतमइन, जिस वक्त ये फौज मक्का के करीब पहुंची तो क़ुरैश मक्का के ऊँट और बकरें चारागाहों में चर रहे थे, उन लोगों ने अहले मक्का को दहशतज़दह करने के लिए सारे जानवर पकड़ लिए और अपनी क़यामगाह तक ले गये। उस ज़माने में सरकारे दोआलम सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम के दादा हज़रत अब्दुल मुत्तलिब क़ुरैश के सरदार थे, अबरहा का एक क़ासिद उनसे मुलाकात के लिए आया और उन तक अपने सरदार का ये पैग़ाम पहुंचाया कि हमारा इरादा आप लोगों को नुकसान पहुंचाने का नहीं है और न हम आपसे जंग करना चाहते हैं हम तो इस घर (बैतुल्लाह) को ढाने के लिए आए हैं अगर आपका इरादा मुकाबला करने का है तो आप जानें लेकिन अगर आपका इरादा जंग का नहीं है तो हमारा बादशाह आपसे मुलाकात करना चाहता है, अब्दुल मुत्तलिब ने जवाब दिया '' हमारा इरादा जंग करने का नहीं है, न हम उसकी ताकत रखते हैं, ये अल्लाह का घर है और बुर्गज़ीदा नबी हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम की यादगार है, अगर अल्लाह उसकी हिफाज़त करना चाहेगा तो वो करेगा और न करना चाहे तो हममें उसकी बिल्कुल ताकत नहीं है'' इस बातचीत के बाद अब्दुल मुत्तलिब अबरहा से मिलने उसके लश्कर पहुंचे क्योंकि हज़रत अब्दुल मुत्तलिब पुरकशिश शख्सियत के हामिल थे, अबरहा उन्हें देखकर मरऊब हुआ, उन्हें अपने पास बिठलाया उनकी बातचीत से बेहद मुतास्सिर हुआ, अबरहा का मानना ​​था कि अब्दुल मुत्तलिब उससे वापसी की दरख्वास्त करेंगे, और बैतुल्लाह को ढाने से बाज़ रहने के लिए मालो ज़र की पेशकश करेंगे, इसके बजाय अब्दुल मुत्तलिब ने उन ऊँटों और बकरियों की बात की जो अबरहा के लोग ज़बरदस्ती उठा लाए थे, ये सुनकर अबरहा हैरान रह गया, उसने कहा भी कि मैं तो सख्त ताज्जुब में हूँ कि, तुम्हें मालूम है कि मैं इस काबे को ढहाने के लिए आया हूँ जो तुम्हारी नज़र में सबसे ज़्यादा महबूब औऱ मोकद्दस है, लेकिन आपने इसके बारे में एक लफ्ज़ तक न कहा और ऊँटों की बात लेकर बैठ गए जो खानए काबा के मुकाबले में बहुत मामूली और हकीर है, हज़रत अब्दुल मुत्तलिब ने जवाब दिया कि काबा मेरा घर नहीं है खुदा का घर है, वो खुद उसकी हिफाज़त करेगा, मैं कौन हूँ जो इसकी सिफारिश करूँ, लेकिन ऊँट मेरे हैं, अबरहा ने गुरूर के नशे में चूर होकर कहा कि इस घर को अब मेरे हाथ से कोई नहीं बचा सकता, अब्दुल मुत्तलिब ने कहा तुम जानो और काबे वाला जाने, ये कहकर अब्दुल मुत्तलिब वापस चले आए और अहले मक्का को किसी महफूज़ पहाड़ी पर चले जाना चाहिए ताकि इस मंज़र को अपनी आंखों से न देख सकें, रवायतों में आता है कि अब्दुल मुत्तलिब अपने लोगों के साथ मक्का से निकल कर किसी पहाड़ी की तरफ जाने लगे तो काबतुल्लाह में हाज़िर हुए और उन्होंने जंजीर दरे काबा पकड़ कर ये अल्फाज़ कहे '' ऐ अल्लाह! जब हम अपने साज़ो सामान की हिफाज़त न कर सके तो तेरे घर की हिफाज़त कैसे करते, तुझे अपने घर की हिफाज़त खुद करनी है, तेरी तदबीर पर न सलीब की ताकत ग़ालिब आ सकती है और न अहले सलीब की कोई तदबीर, हां अगर तू ही चाहता है कि वो तेरे मोकद्दस को बर्बाद कर दें तो फिर तेरा जो जी चाहे कर''  ये कहकर अब्दुल मुत्तलिब काबा से निकल आए।

उधर अबरहा ने अपना लश्कर मक्का की तरफ बढ़ाया, आगे काले बादलों की तरह हाथियों के दल थे और उनके पीछे पैदल और घुड़सवार फौजी, अब ये लश्कर मक्का तक पहुंचा था कि अचानक समंदर की तरफ से परिंदों के गोल के गोल नमुदार हुए और लश्कर के ऊपर छा गये, उनकी चौंचों और पंजों में संगरेजे दबे हुए थे, परिंदों ने ये संगरेज़े लश्कर पर फेंकने शुरू किए, जिस शख्स के भी और जिस हाथी के भी ये संगरेज़े लगते थे बदन फोड़ कर बाहर निकल आते, उसके अज़ा गलने शुरू हो जाते और गल सड़ कर गिरने लग जाते, नतीजा ये निकला कि थोड़ी देर में सारा लश्कर फ़ना के घाट उतर गया, कुछ लोग जिनमें अबरहा भी था, मकामे इबरत बनने के लिए ज़िंदा बच गए जो इस हाल में यमन पहुंचे कि उनके अज़ा जिस्म से कट कट कर गिर रहे थे, सबके सब इसी हाल में मर गए, (तारीख इब्ने कसीर बहवाला मआरिफुल क़ुरान 8/817, कससुल  कुरान: 3/345 मुलखसा) इस वाकिआ की तफ्सील बयान करने के बाद हज़रत मौलाना हिफज़ुर्रहमान सेयोहारवी रहिमतुल्लाह अलैह ने जो कुछ लिखा है वही इस वाकिए की असरी मानवियत है, वो लिखते हैं '' आज न असहाब अल्फ़ील का नामो निशान बाकी है, और न अलकीस सना का और न वो क़ुरैश मक्का ही बाकी जिनकी आंखों ने वो मंज़र देखा था, लेकिन क़िबलए तौहीद और मर्कज़े सदाक़त काबातुल्लाह उसी तरह अपनी अज़मत व जलालत के साथ क़ायम व दायम है और आज भी कुरान उसी की रिफअते शान का ये नांगे दहल ये ऐलान कर रहा हैः इन्नमा अव्वला बैते वोदेआ लिन्नासे लल्लज़ी बेबक्कता मुबारका वहोदल लिलआलिमीन (अल-इमरान: 96) '' बेशक सबसे कदीम वो घर जो इंसान की खुदा परस्ती के लिए बनाया गया यकीनन वो है जो मक्का में है जो सरतासर मुबारक और जहानों के लिए मर्कज़े हिदायत है'' (कससुल कुरान: 3/392)

हमें पूरा यकीन है कि नए दौर का अबरहा भी इसी बदतरीन अंजाम से दोचार होगा जिससे उस दौर का अबरहा दोचार हुआ था, अगर उसने अपने इरादों को (खाकम बा दीन) अमली जामा पहनाने की कोशिश की, ये अल्लाह का घर है वही घर है जो पहले था, वही खुदा है जो पहले था, वही बेदस्तो पा और बेबस अहले ईमान हैं जो पहले थे, वही सरकश और मोतकब्बर इंसानों की फौज है जो पहले थी, उनका अंजाम भी वही होना चाहिए जो पहले हुआ, इसी यक़ीन और एतेमाद के साथ हमें अमेरिकी मंसूबा बंदियों पर नज़र रखनी है, सूरे फ़ील का यही पैग़ाम है।

21 मई 2012 स्रोतछ: हिंदुस्तान एक्सप्रेस, नई दिल्ली

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