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Hindi Section ( 20 Jun 2012, NewAgeIslam.Com)

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Skies Tremble from the Rise of Human Being उरूजे आदमे ख़ाकी से अंजुम सहमे जाते हैं


मौलाना नदीमुल वाजिदी

18 जून, 2012

(उर्दू से तर्जुमा- समीउर रहमान, न्यु एज इस्लाम)

सरा और मेराज ये दो लफ़्ज़ एक हैरतअंगेज़ वाक़ए की तरफ़ इशारा करते हैं जो बअस्ते नब्वी सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम के ग्यारहवीं साल में पेश आया, क़ुराने करीम में इस वाक़ए का ज़िक्र इस आयते करीमा में किया गया है: पाक है वो ज़ात जो अपने बंदे (मोहम्मद सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम को) रात के वक़्त मस्जिदे हराम से मस्जिद अक़्सा तक ले गया (बनी इसराईलः 1)

इस आयत में एक ऐसा मुहैय्यरुल उकूल वाक़ेआ बयान किया गया है जो तारीख़े इंसानी में ना पहले कभी पेश आया और ना आइन्दा कभी पेश आएगा, सीरते नब्वी सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम से मामूली वाक़फ़ियत रखने वाले लोग भी जानते हैं कि आप सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम की मक्की ज़िंदगी सख़्त मसाइब व आलाम में गुज़री है, कोई ज़ुल्म ऐसा ना था जो मुशरिकीन मक्का ने आप सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम पर और आप के जाँनिसार सहाबा रज़ियल्लाहू अन्हा पर ना ढाया हो, अख़ीर में जब कोई बस ना चला तो उन मुशरिकीन ने बनू हाशिम और बनू अब्दुल मुत्तलिब के ख़िलाफ़ आपस में ये मुआहिदा कर लिया कि इन क़बीलों से उस वक़्त तक किसी किस्म का कोई ताल्लुक़, कोई राबिता, कोई मुआमला नहीं रखा जाय जब तक कि वो सरकारे दो आलम सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम को क़त्ल करके हमारे हवाले नहीं करेंगे। इस मुआहिदे के नतीजे में इन दोनों क़बीलों के तमाम अफ़राद (अबूलहब के अलावा कि वो मुशरिकीन के साथ था) शोएब अबी तालिब में महसूर होकर रह गए, हालात इंतेहाई ना गुफ़्ता बा थे, इस मुआहिदे के नतीजे में सामान ख़ुर्दो नोश की आमद मुअत्तल हो गई, लोग पत्ते और चमड़े के टुकड़े खाने पर मजबूर हो गए, भूक से बिलबिलाते हुए बच्चों और औरतों की आवाज़ें घाटी से बाहर तक सुनाई देती थीं, ये मुआमला पूरे तीन साल तक चला, नबुव्वत के दसवें साल ये मुआहिदा जो ख़ानए काबा की दीवार पर आवेज़ां था अल्लाह के हुक्म के मुताबिक़ कीड़ों के ज़रीये साफ़ कर दिया गया, क़ुरैश के बाज़ दूसरे क़बीलों के सरकरदा अफ़राद ने भी इस ज़ुल्म से तौबा कर ली और उनके दिल भी महसूरीन के लिए नरम पड़ गए, इस तरह सरकारे दो आलम सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम और आपके घर वाले, दोस्त अहबाब जाँनिसार सहाबा रज़ियल्लाहू अन्हा और अज़ीज़ अका़रिब शोएब अबी तालिब से बाहर आए, इस वाक़ेआ के छः माह बाद आप के चचा अबू तालिब वफ़ात पा गए, जिनसे आप सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम को कारे अदावत में बड़ी तक़वियत हासिल थी, इस हादसे के चंद रोज़ बाद उम्मुल मोमिनीन हज़रत ख़दीजा अलकुबरा रज़ियल्लाहू अन्हुमा वफ़ात पा गईं जो आप सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम की बड़ी ग़मगुसार थीं,  इन मुसलसल हवादिस ने आप को निढाल कर दिया, मगर आप सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम इन हालात में भी दावते दीन की ज़िम्मेदारी अदा करते रहे। मुशरिकीन मक्का से मायूस होकर आप सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने ताइफ का रुख किया, ये शहर मक्का मुकर्रमा से साठ मील की मुसाफ़त पर वाक़े है, आप सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने इस सफ़र के दौरान हर क़बीले को दावते इस्लाम दी, लेकिन किसी ने भी आप सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम की ये दावत क़ुबूल ना की, इसके बजाय उन लोगों ने आप सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम को शहर से बाहर निकालने के लिए आवारा लड़कों को पीछे लगा दिया, ये बदनसीब लड़के आप पर आवाज़े कसते और पत्थर बरसाते पीछे पीछे चल रहे थे, यहां तक कि आप सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम के दोनों जूते जिस्म के ख़ून से रंगीन हो गए थे।

ये थे वो हालात जिन के बाद 11 नबुव्वत में वाक़ेआ मेराज पेश आया, मशहूर क़ौल ये है कि उस दिन रजबुल मोरज्जब की सत्ताईसवीं तारीख़ थी, सीरत निगारों ने लिखा है कि एक तरफ़ आपको अज़ीज़ चचा और महबूब बीवी की जुदाई का दोहरा सदमा था, दूसरी तरफ़ अपने ही हम वतनों की तरफ़ से मुसलसल इंकार की अज़ीयत थी, बात सिर्फ इंकार ही की नहीं थी बल्कि आप को तरह तरह की अज़ीयतें भी पहुंचाई जा रही थीं, एक रोज़ आप सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने ग़मों से निढाल होकर अपने रब के आगे हाथ फैला कर ये दुआ की या अल्लाह! मैं तुझ ही से अपने ज़ोफ़ का, अपनी बेबसी और बेकसी का और लोगों के दिलों में अपनी नाक़द्री का शिकवा करता हूँ,  ए अल्लाह! तू कमज़ोरों का रब है और तू ही मेरा रब है, तूने मुझे किसके हवाले कर दिया है? क्या किसी अजनबी बेगाने के जो मेरे साथ तुर्श रवी से पेश आए या किसी दुश्मन के जिस को तूने मेरा मालिक बना दिया है, अगर ये हालात तेरे ग़ैज़ व ग़ज़ब का नतीजा नहीं हैं तब मुझे कोई परवाह नहीं, लेकिन तेरी गाहे आफ़ियत मेरे लिए ज़्यादा कुशादा और वसीअ है। यही वो लम्हा था जब रहमते हक़ को जोश आया और उसने तय किया कि जिस क़दर मेरे बंदे को इस राह में ज़लील व रुस्वा किया गया है मैं उसे उतनी ही इज़्ज़त और सरबुलन्दी अता करूंगा और उसके सर पर अज़मों का ताज रखूंगा, चुनांचे आपको इसरा व मेराज की इज़्ज़त से सरफ़राज़ किया गया और ऐसे मोक़ामात की सैर कराई गई जो मुंतहाए कायनात हैं और इस क़दर अर्फ़ा व आला हैं कि मलाइका के सरदार हज़रत जिब्रईल अलैहिस्सलाम की रेसाई भी वहां तक नहीं है।

रवायात में है कि एक रात सरकारे दो आलम सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम हज़रत उम्मे हानि रज़ियल्लाहू अन्हा के घर में आराम फ़रमा रहे थे, नीम ख़्वाबी की सी कैफ़ीयत थी कि अचानक कमरे की छत में शिगाफ़ हुआ और इस शिगाफ़ से हज़रत जिब्रईल अमीन अलैहिस्सलाम चंद फ़रिश्तों के साथ उतरे, आप सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम को उठाया और मस्जिदे हराम की तरफ़ ले गए, वहां आप सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम के सीनाए मुबारक को शक़ किया गया और आप सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम के क़ल्बे मुबारक को ज़मज़म के पानी से धोकर सीने में रख दिया गया और उसे बराबर करके दोनों शानों के दरमियान मोहरे नबूवत लगा दी गई। ये मोहर ख़त्मे नबुव्वत की महसूस की जाने वाली और ज़ाहिर में नज़र आने वाली एक अलामत थी, इसके बाद आप को सफ़ेद रंग के बुर्राक़ पर सवार किया गया, आप सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम के पीछे हज़रत जिब्रइल अमीन अलैहिस्सलाम तशरीफ़ फ़रमा थे, रास्ते में मुख़्तलिफ़ मुक़ामात से गुज़र हुआ, मुतअद्दिद जगहों पर उतर कर आप सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने नवाफ़िल भी पढ़ी, यसरिब (मदीना) वादीएसीना, मदाइन, बैतुल्लहम इन तमाम मुक़ामात की निस्बत अंबिया किराम अलैहिस्सलाम की तरफ़ है, आप सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम इन जगहों पर कुछ देर ठहरे और नफ़िल नमाज़ पढ़ कर आगे के सफ़र पर रवाना हुए, इन मुक़ामात के अलावा कुछ अफ़राद व अशख़ास के पास से भी ये बर्क़ रफ़्तार सवारी गुज़री, रास्ते में एक बुढ़िया मिली, उसने सरकारे दो आलम सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम को आवाज़ भी दी, हज़रते जिब्रईल अलैहिस्सलाम ने अर्ज़ किया आप सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम उसकी तरफ़ तवज्जो ना दें, ये दुनिया है, बूढ़ी औरत उस की सूरत मिसालिया है जिससे ये बतलाना मक़सूद है कि दुनिया की उम्र बस इतनी रह गई है जितनी उस बूढ़ी औरत की उम्र, इसी तरह एक बूढ़ा शैतान भी नज़र आया, उसने भी आवाज़ दी, हज़रत जिब्रईल अलैहि अस्सलाम ने उसके मुताल्लिक़ भी यही कहा और बतलाया कि ये शैतान है, इन दोनों का मक़सद आप को अपनी तरफ़ मुतवज्जा करना और इस सफ़र से रोकना है, रास्ते में कुछ लोग खड़े हुए मिले जिन्होंने आप को सलाम किया, उनके बारे में बतलाया गया कि ये लोग जिन्होंने आप सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम को सलाम किया है हज़रत इब्राहीम, हज़रत मूसा और हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम हैं।

इस मुक़ामात पर ठहरती हुई और उन अश्ख़ास के पास से गुज़रती हुई आप सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम की ये आसमानी सवारी बैतुल मोक़द्दस पहुंची और उस जगह पर उसको बांध दिया गया जहां इससे पहले अंबिया इकराम अलैहिस्सलाम की सवारियां बांधी जाती थीं, इसके बाद आप सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम मस्जिदे अक़्सा के अंदर तशरीफ़ ले गए और तहैय्यतुल मस्जिद अदा फ़रमाई, यहां आप सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम के इस्तक़बाल के लिए अंबिया इकराम अलैहिस्सलाम पहले से सरापा इंतेज़ार और दीदार के लिए सरापा शौक़ बने हुए थे, मुअज़्ज़िन ने अज़ान दी, इक़ामत कही गई, सफ़ें तर्तीब दी गईं, जिब्रईल अमीन अलैहिस्सलाम ने सरकारे दो आलम सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम का दस्ते मुबारक पकड़ा और नमाज़ पढ़ाने के लिए आगे कर दिया, आप सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने इन तमाम अंबिया की इमामत की जो इससे पहले माबोस हो चुके थे, इस नमाज़ में शिरकत के लिए आस्मान से फ़रिश्ते भी नाज़िल हुए, जिब्रईल अमीन अलैहिस्सलाम ने हाज़िरीन से सरकारे दो आलम सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम का तआर्रुफ़ कराते हुए कहा कि ये मोहम्मद रसूलल्लाह ख़ातिमुन नबीयीन सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम हैं,  इसके बाद आप सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने अंबिया किराम अलैहिस्सलाम से मुलाक़ात की, इन हज़रात ने अल्लाह की हम्दो सना बयान की, आख़िर में सरकारे दो आलम सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने अल्लाह की हम्द की, आप सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम का ख़ुत्बए हम्द सुन कर जो निहायत जामे और पुर असर था हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम ने बाक़ी अंबिया अलैहिमुस्सलाम को मुख़ातिब करते हुए कहा इन्ही फ़ज़ाइल व कमालात की वजह से मोहम्मद सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम आपसे आगे बढ़ गए हैं, नमाज़ से फ़राग़त के बाद आप सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम मस्जिदे अक़्सा से बाहर तशरीफ़ लाए, उस वक़्त आप सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम की ख़िदमत में तीन और एक रिवायत के मुताबिक़ चार प्याले पेश किए गए एक दूध का, दूसरा शराब का, तीसरा पानी और चौथा शहद का, आप ने दूध का प्याला पसंद किया। हज़रत जिब्रईल अलैहिस्सलाम ने फ़रमाया कि आप सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने दीने फ़ित्रत इख़्तियार किया है, अगर आप सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम शराब का प्याला पसंद फ़रमाते तो आप सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम की उम्मत गुमराह हो जाती, मस्जिदे हराम से मस्जिदे अक़्सा तक के इस सफ़र को सीरत की इस्तेलाह में इस्रा कहा जाता है, मस्जिदे अक़्सा से जो सफ़र आसमानों की तरफ़ हुआ उसे मेराज कहते हैं।

इस्रा का ज़िक्र सूरे बनी-इसराईल की पहली आयत में मौजूद है और मेराज का ज़िक्र सूरे अल-नजम की आयात में है, क़ुराने करीम में इस्रा और मेराज का ज़िक्र इख़्तेसार के साथ है, रवायात में जो तवातिर के साथ सहाबा रज़ियल्लाहू अन्हा से मनक़ूल हैं उनकी मुकम्मल तफ़सीलात मिलती हैं, दोनों वाक़ेआत एक ही रात में मुख़्तसर वक़्फ़े के अंदर ब-हालते बेदारी पेश आए बल्कि अगर कहा जाय कि ये एक ही वाक़ेआ है तो ग़लत ना होगा, मस्जिदे अक़्सा में क़यामे सफ़र के दौरान किसी मंज़िल पर कुछ देर रुक कर आराम करने का वक़्फ़ा था, यहां से ये क़ाफ़िला आगे बढ़ा, बाज़ रवायात से मालूम होता है कि अगले सफ़र में भी आप सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम बुर्राक़ पर तशरीफ़ फ़रमा हुए और बाज़ से मालूम होता है कि मस्जिदे अक़्सा से बाहर तशरीफ़ लाने के बाद आपके लिए ज़बर जद और ज़मरद की एक सीढ़ी लटकाई गई जिसके ज़रीये आप सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम आसमानों पर तशरीफ़ ले गए और बुर्राक़ वहीं मस्जिदे अक़्सा के पास बंधा रहा।

सरकारे दो आलम सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम जब पहले आसमान पर पहुंचे तो हज़रत जिब्रईल अलैहिस्सलाम ने दरवाज़ा खुलवाया आप सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम के लिए फ़रिश्तों ने मरहबा कह कर दरवाज़ा खोल दिया, आप सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम अंदर दाख़िल हुए वहां आप सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम की मुलाक़ात हज़रत आदम अलैहिस्सलाम से हुई, आप सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने उन्हें सलाम किया, उन्होंने आप सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम के सलाम का जवाब दिया, मरहबा कहा और दुआ दी, उस वक़्त आप सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने देखा कि जब हज़रत आदम अलैहिस्सलाम दाएं जानिब देखते हैं तो ख़ुश होते हैं और बाएं जानिब देखते हैं तो रोते हैं, मालूम हुआ कि दाएं जानिब सआदतमंद और बाएं जानिब बदबख़्त रूहें हैं, दूसरे आसमान पर आप सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम की मुलाक़ात हज़रत यहया, हज़रत ज़करिया और हज़रत ईसा इब्ने मरियम अलैहिमुस्सलाम से हुई, आपने इन तीनों को सलाम किया, उन्होंने जवाब दिया और मरहबा कहा, तीसरे आसमान पर हज़रत यूसुफ़ अलैहिस्सलाम से, चौथे पर हज़रत इदरीस अलैहिस्सलाम से, पांचवीं पर हज़रत हारून अलैहिस्सलाम से, छटे पर हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम से और सातवें पर आप सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम की मुलाक़ात हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम से हुई, तमाम अंबिया किराम अलैहिस्सलाम ने आप को मरहबा कहा, ख़त्मे नबुव्वत की मुबारकबाद दी और दुआएं दीं।

अंबिया किराम अलैहिस्सलाम से आसमानों पर मुलाक़ात के बाद आप सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम को सिदरतुल मुन्तहा तक ले जाया गया, ये सातवें आसमान पर बेरी का एक दरख़्त है, इसका ज़िक्र क़ुराने करीम में भी मौजूद है, उसे सिदरतुल मुन्तहा इसलिए कहा जाता है कि ज़मीन से जो चीज़ें ऊपर जाती हैं वो सिदरतुल मुन्तहा पर जाकर ठहर जाती हैं, फिर वहां से ऊपर उठाई जाती हैं, इसी तरह जो चीज़ ऊपर से नीचे आती है वो भी सिदरतुल मुन्तहा पर आकर रुक जाती है, फिर नीचे उतरती है,  इसी आसमान पर आप सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम के सामने बैते मामूर ज़ाहिर किया गया,  इसका ज़िक्र भी क़ुराने करीम में है, बैते मामूर फ़रिश्तों का क़िबला और काबा है, ठीक ख़ानए काबा के ऊपर वाक़े है,  फ़रिश्ते हर दिन इसका तवाफ़ करते हैं, सिदरतुल मुन्तहा के क़रीब आप सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने हज़रत जिब्रईल अमीन अलैहिस्सलाम को उनकी असल सूरत में देखा। जन्नत सिदरतुल मुन्तहा के क़रीब है, जैसा कि क़ुराने करीम में हैः सिदरतुल मुन्तहा के क़रीब इसके क़रीब जन्नतुल मावा है (अल-नजमः 14, 15)

यहां से आपको जन्नत की ज़ेयारत कराई गई और इसके बाद जहन्नुम का मुशाहिदा कराया गया, इसके बाद आप सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम को उस जगह ले जाया गया जहां सरीफ़ अलक़लाम की आवाज़ सुनी जा रही थी, यानी वो आवाज़ जो क़लम से लिखने के वक़्त पैदा होती है, गोया ये जगह वो थी जहां फ़रिश्ते क़ज़ा व क़दर के ख़ुदाई फ़ैसले लौहे महफ़ूज़ पर लिखने में मसरूफ़ थे, सरीफ़ अलक़लाम से गुज़र कर आप तजल्लियात का मुशाहिदा करते हुए बारगाहे रब्बे ज़ुलजलाल में पहुंचे और इतने क़रीब हुए कि अल्लाह के और आप सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम के दरमयान सिर्फ दो कमान का फ़ासला रह गया, उसी को क़ुराने करीम में इस तरह ताबीर किया गया है:

फिर नज़दीक हुआ और लटक आया फिर रह गया फ़र्क़ दो कमान के बराबर या इससे भी नज़दीक (अल-नजमः 8, 9)

ये तफ़सीर सहाबा किराम रज़ियल्लाहू अन्हा में हज़रत अनस और हज़रत इब्ने अब्बास रज़ियल्लाहू अन्हुमा से मनक़ूल है, तफ़सीर मज़हरी में भी इसी को अख़्तियार किया गया है, (मआरिफ़ुल क़ुरान 195/8) जब आप सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम अल्लाह ताला के दरबार में पहुंचे तो बेइख़्तयार सरबा सुजूद हो गए, उस वक़्त आप सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने हिजाबे किबरियाई के वास्ते से रब्बे कायनात के हुस्ने बेमिसाल का यानी नूरे आज़म का मुशाहिदा किया और बराहे रास्त कलाम इलाही के सामे और मुख़ातिब बनेः फिर अल्लाह ने अपने बंदे पर वही नाज़िल फ़रमाई जो कुछ कि नाज़िल फ़रमाई (अल-नजमः 10)

इस वक़्त अल्लाह ताला ने आप सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम पर और आप सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम की उम्मत पर पच्चास नमाज़ें फ़र्ज़ फ़रमाईं, वापसी के सफ़र में हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम से मुलाक़ात के बाद ये नमाज़ें कम होते होते पाँच पर रह गईं, इस मौक़ा पर आप सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम को सूरे बक़रा की आख़िरी आयात का तोहफ़ा भी अता किया गया, इन आयात में अल्लाह ताला ने कमाल रअफ़त व रहमत, लुत्फ़ व एनायत, अफ़ू व मग़फ़िरत और फ़तेह व नुसरत का ज़िक्र फ़रमाया है, ये आयात ब-शक्ल दुआ उम्मत को इस तलक़ीन के साथ अता की गई हैं कि तुम हमसे इस तरह मांगो हम तुम्हें अता करेंगे।

इस सफ़र में आप सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने दज्जाल को भी देखा और दारोगए जहन्नुम को भी देखा जिस का नाम मालिक है, आप सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम का गुज़र ऐसे लोगों पर भी हुआ जिनके नाख़ुन ताँबे के बने हुए थे और जो इन नाखुनों के ज़रीए अपने चेहरों और सीनों का गोश्त खुरच रहे थे, हज़रत जिब्रईल अलैहिस्सलाम ने आप सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम को बतलाया कि ये वो लोग हैं जो इंसानों का गोश्त खाते हैं यानी उनकी ग़ीबत करते हैं, एक शख़्स को देखा कि जो नहर में तैर रहा है और पत्थर को लुक़्मा बना बना कर खा रहा है, मालूम हुआ कि ये सूदखोर है, ऐसे लोग भी मिले जो एक ही दिन में बीज भी बो लेते हैं और फ़सल भी काट लेते हैं, इसके बाद उन की खेती फिर सरसब्ज़ व शादाब हो जाती है, हज़रत जिब्रईल अमीन अलैहिस्सलाम ने बतलाया कि ये लोग राहे हक़ के मुजाहिदीन हैं, उनके एक अमल का सवाब सात सौ गुना होता है, कुछ लोगों के सर पत्थरों से कुचले जा रहे थे, इस अमल के बाद उनके सर फिर जूं के तूं हो जाते, ये सिलसिला इसी तरह चल रहा था, मालूम हुआ कि ये फ़र्ज़ नमाज़ों की अदायगी में सुस्ती करने वाले हैं, कुछ लोगों की शर्मगाहों पर आगे और पीछे चीथड़े लिप्टे हुए थे और वो जानवरों की तरह जहन्नुम के कांटे खा रहे थे और पत्थर चबा रहे थे, बतलाया गया कि ये लोग ज़कात ना देने वाले हैं, कुछ लोगों के पास पका हुआ गोश्त भी था और कच्चा सड़ा हुआ भी, मगर वो लोग पका हुआ गोश्त खाने के बजाय कच्चा और सड़ा हुआ गोश्त खा रहे थे, ये वो लोग थे जो अपनी अफ़ीफ़ा और मनकूहा औरतों के बजाय बदकार औरतों के साथ रात गुज़ारते हैं, एक लकड़ी देखी जो क़रीब से गुज़रने वाली हर चीज़ को रोक कर उसे फाड़ डालती थी, ये उम्मत के उन अफ़राद की सूरत मिसालिया थी जो रहज़नी करते हैं और रास्तों में बैठ कर आने जाने वालों को लूटते हैं, कुछ लोग सरों पर भारी पत्थर उठाए हुए मिले, इनमें उठाने की ताक़त नहीं थी, इसके बावजूद वो उस गट्ठर में लकड़ियां ठूंस रहे थे, ये वो लोग थे जिन पर दूसरे के हुक़ूक़ हैं, उनके पास दूसरों की अमानतें हैं, ना वो हुक़ूक़ अदा करते हैं और ना अमानतें वापिस करते हैं, कुछ ऐसे लोग भी मिले जिनकी ज़बानें और होंठ लोहे की क़ैंचियों से तराशे जा रहे थे जब ये कट जाते फिर अपनी हालत पर वापिस आ जाते, हज़रत जिब्रईल अलैहिअस्सलाम ने बतलाया कि ये आप सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम की उम्मत के ख़तीब और वाइज़ हैं जो लोगों को वाज़ व नसीहत तो ख़ूब करते हैं मगर ख़ुद अमल नहीं करते, जो लोग यतीमों का माल ज़ुल्म व तादी से खा जाते हैं, उनके होंठ ऊंट के होंठो की तरह थे और वो अपने मुंह में पत्थरों से बड़े अंगारे ठूंस रहे थे जो पाख़ाने के रास्ते से बाहर निकल रहे थे।

जिस शान और एज़ाज़ के साथ आप सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम आसमानों पर तशरीफ़ ले गए, इसी तरह वापिस तशरीफ़ लाए, मस्जिदे अक़्सा से बुर्राक़ पर सवार होकर मक्का मोकर्रमा पहुंचे अगली सुबह जब सरकारे दो आलम सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने मुशरिकीने मक्का को अपने सफ़र मस्जिदे अक़्सा और सफ़रे आसमान की इत्तेला दी तो वो हँसने लगे, उन्होंने कहा कि ऐसा मुम्किन नहीं है, जो लोग बैतुल मोक़द्दस का सफ़र कर चुके थे उन्होंने आज़माईश के तौर पर वहां की निशानियां दरयाफ़्त कीं, अल्लाह ताला ने तमाम हिजाबात उठा दिए और बैतुल मोक़द्दस निगाहों के सामने आ गया, जो बात भी उन्होंने मालूम की आप सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने बतला दी, वो हैरान ज़रूर थे, मगर उनके दिलों पर मोहर लग चुकी थी, इसलिए उन्होंने इस वाक़ए की तसदीक़ नहीं की बल्कि आख़िर तक तक़ज़ीब करते रहे और मुज़हका उड़ाते रहे, सफ़र के दौरान आते जाते आप सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने मक्का मोकर्रमा के एक तिजारती क़ाफ़िले को भी देखा था जो शाम से वापिस आरहा था, आप सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने बतलाया कि इस क़ाफ़िले का एक ऊंट गुम हो गया था अब मिल गया है, तीन दिन के बाद उस क़ाफ़िले के लोग सरज़मीने मक्का पर क़दम रखेंगे और भूरे रंग का ऊंट क़ाफ़िले में सबसे आगे होगा, ऐसा ही हुआ, लेकिन मुशरिकीन को तसदीक़ करनी ही नहीं थी सो उन्होंने नहीं की हालाँकि सदाक़त की तमाम निशानियां मौजूद थीं।

मेराज का अज़ीमुश्शान वाक़ेआ सरकारे दो आलम सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम का एक ख़ुसूसी एज़ाज़ और इमतेयाज़ी मोजिज़ा है, क़ुराने करीम और अहादीसे नबविया सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम से साबित होता है कि बारगाह एज़दी में एक बंदे का ये उरूज रुहानी ही नहीं बल्कि जिस्मानी भी था, ठीक उसी तरह जिस तरह आम इंसान सफ़र करते हैं आप सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने बैतुल मोक़द्दस का सफ़र किया और आसमानों की सैर की, अगर ये सिर्फ़ ख़्वाब का सफ़र होता तो इसका ज़िक्र इतने एहतेमाम के साथ क्यों किया जाता, इसलिए कि ख़्वाब तो हर इंसान देखता है और इससे भी ज़्यादा मुहैय्यरुल अक़ूल चीज़ें देखता है, मुशरिकीन मक्का ने तो अल-सादिक़ अल-मसदूक़ के बयान की तक़ज़ीब की, लेकिन रुम के बादशाह हरक़ल के दरबार में जब इस वाक़ए का ज़िक्र अबु सुफ़ियान ने इसलिए किया कि बादशाह ये वाक़ेआ सुन कर मज़ाक़ उड़ाएगा, हो सकता है बदज़न भी हो जाए और आप सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम के पैग़ाम को वापिस कर दे, इस मौक़ा पर शाह रुम के क़रीब बैतुल मोक़द्दस का सबसे बड़ा आलिम मौजूद था, उसने कहा कि मैं इस रात से वाक़िफ़ हूँ, मेरी आदत ये थी कि मैं रात को बैतुल मोक़द्दस के तमाम दरवाज़े बंद करने के बाद घर वापिस जाता था, इस रात भी मैंने तमाम दरवाज़े बंद कर दिए, एक दरवाज़ा बंद ना हो सका, बड़ी कोशिश की नाकाम रहा, माहिरीन को बुलाया उन्होंने भी तमाम तदबीरें अख़्तियार कीं, मगर दरवाज़ा टस से मस ना हुआ, हम इसी तरह छोड़कर चले गए, सुबह को आए, ज़रा सी जुंबिश से दरवाज़ा बंद हो गया, मैंने दरवाज़े के क़रीब एक चट्टान पर देखा कि इस पर एक ताज़ा सूराख़ बना हुआ है जैसे किसी जानवर को कील गाड़ कर बांधा गया हो, मैंने अपने साथियों से कहा कि आज अल्लाह ने इस दरवाज़े को इसलिए बंद होने रोका है कि कोई नबी यहां आने वाले थे।

मेराज की हिक्मत क्या है? इस का जवाब ख़ुद क़ुराने करीम ने बहुत इख़्तेसार के साथ निहायत जामे तरीक़े पर इन अलफ़ाज़ में दिया है: ताकि हम आपको अपनी कुछ निशानियां दिखला दें( बनी-इसराईलः 1)

चुनांचे इस सफ़र में जो मोजिज़ाती तौर पर रात के एक मुख़्तसर हिस्से में वाक़े हुआ अल्लाह ताला ने अपने महबूब व मोक़र्रब बंदे पर वो राज़हाय सरबसता मुनकशिफ़ कर दिए जो अब तक पर्दए हिजाबात में थे, ये अल्लाह ताला की तक़्वीनी सुन्नत है कि वो अंबिया किराम अलैहिस्सलाम को कायनात के इसरार पर मतला करता है ताकि वो यक़ीन व ईमान की इंतेहाई बुलंदियों पर पहुंच जाएं, हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम के बारे में इरशाद है:

और इसी तरह हम ने इब्राहीम अलैहिस्सलाम को आसमानों और ज़मीन की मख़लूक़ात दिखलाईं ताकि वो यक़ीन करने वालों में से हों (अल-अनामः 76)

हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम ने इरशाद फ़रमायाः ताकि हम तुम्हें अपनी कुछ बड़ी निशानियां दिखलाएं (ताहाः 23)

मुशरिकीने मक्का के ज़हन व फ़िक्र की नुमाइंदगी करने वाले आज भी मौजूद हैं जो मेराज के इस सफ़र को ख़्वाबों का सफ़र कह कर उसकी तक़ज़ीब या तावील करते हैं, हालाँकि क़ुराने करीम और अहादीस से बिलकुल वाज़ेह है कि ये सफ़र बेदारी की हालत में पेश आया, किसी वाक़ए का हैरतअंगेज़ या नाक़ाबिले यक़ीन होना इस अदम वक़ूअ की दलील नहीं है, मोजिज़ा कहते ही उस वाक़ए को हैं जो नाक़ाबिले यक़ीन हद तक हैरतअंगेज़ हो, ये भी एक मोजिज़ा था जिसकी हक़ीक़त तक इंसान की अक़्ले नारेसा नहीं पहुंच सकती, रात के मुख़्तसर वक़्फ़े में इस तवील तरीन सफ़र को नाक़ाबिले यक़ीन समझने वाले दौरे हाज़िर के तेज़ रफ़्तार राकेट और ख़लाई गाड़ियों को सामने रखें जो मिनटों सेकेंडों में इंतेहाई बुलंदी पर पहुंच कर सैंकड़ों मील की मुसाफ़त तय कर लेती हैं, साईंसदाँ आसमान को नहीं मानते, मगर किसी चीज़ को ना मानना इसके ना होने की दलील नहीं बन सकती, साईंसी इंकेशाफ़ात और तजुर्बात का सफ़र जारी है, दूसरी हक़ीक़तों की तरह इस पर कभी ना कभी आसमानों के वजूद की हक़ीक़त भी मुनकशिफ़ होगी, हम महदूद अक़्ल रखने वाले साईंसदानों की बात कैसे मान लें जब ला महिदूद अक़्ल, इल्म और क़ुदरत रखने वाली ज़ात ने अपनी किताबे अज़ीम में जगह जगह आसमानों का ज़िक्र किया है, अगर कुछ लोग उसे तस्लीम नहीं करते तो ये उनकी कोताह अक़्ली है क़ुराने करीम की हक़्क़ानियत पर इससे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता और ना इससे मेराज की सदाक़त मुतास्सिर होती है।

18 जून, 2012 बशुक्रियाः रोज़नामा सहाफ़त, नई दिल्ली

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