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Hindi Section ( 13 May 2012, NewAgeIslam.Com)

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Islamic Fundamentalist View: In Defence of Triple Talaq and Male-Supremacism मुस्लिम समाज में तलाक का बढ़ता हुआ रुझान


मौलाना नदीमुल वाजिदी

14 मई 2012

(उर्दू से अनुवाद- समीउर रहमान, न्यु एज इस्लाम)

मुस्लिम समाज में तलाक की घटनाएं बढ़ती जा रही हैं, ये एक चिंताजनक स्थिति है, निकाह इसलिए नहीं किया जाता कि तलाक के ज़रिए इसको खत्म कर दिया जाये, शरीयत की निगाह में ये एक अहम मामला है, जिसमें दवाम और इस्तमरार मतलूब है, इसलिए निकाह को महज एक अक़्द या मामला ही नहीं रखा गया बल्कि इसको सुन्नते अंबिया करार देकर इबादत का दर्जा भी दिया गया, दूसरी तरफ बाज़ नागुज़ीर हालात में तलाक की इजाज़त तो दी गई लेकिन उसे अबगज़ अलमोबोहात (जायेज़ चीज़ों में सबसे ज़्यादा नापसंदीदा चीज़) करार देकर ये भी वाज़े कर दिया गया कि अल्लाह को तलाक बिल्कुल पसंद नहीं है, लेकिन अगर हालात ऐसे पैदा हो जायें कि तलाक के बिना चारा न रहे तब बिला शक तलाक का हक़ इस्तेमाल किया जाये, बात बेबात तलाक देना गजबे इलाही को दावत देने के मोतरादिफ है, हदीस शरीफ में है कि'' निकाह करो, तलाक न दो, इसलिए कि तलाक देने से अर्शे इलाही लरज़ उठता है।'' (तफ्सीर अलकर्तबी: 149/8)

 तलाक की बढ़ती हुए घटनाओं पर दीन पसंद हज़रात की चिंता अपनी जगह सही है, उलेमा की जिम्मेदारी बनती है कि वो इस रुझान पर अपना ध्यान आकर्षित करें, लोगों को बतलाएं कि इस्लाम में रिश्तए अज्दवाज की किस कदर अहमियत है, और रिश्ते को मुनकता करने से खानदान और समाज पर कितना खराब प्रभाव पड़ता है, अफसोस की बात ये है कि इस्लामी समाज बड़ी तेजी के साथ अपने मूल्यों और परंपराओं से मुन्हरिफ होता जा रहा है, पश्चिमी सभ्यता की नक़ल ने हमारे समाज की स्थिति खराब कर रखी है, सह-शिक्षा, मर्दों और औरतों का आज़ादाना तौर पर मिलना जुलना, बेदीनी का माहौल, आर्थिक समस्याएं, फ़ोवाहिश की कसरत, टीवी और इंटरनेट का गलत इस्तेमाल, इन सब चीज़ों ने मिलकर एक ऐसा माहौल पैदा कर दिया है जहां निकाह जैसे पाकीज़ा रिश्तों की अहमियत का एहसास मफकूद होता जा रहा है, आश्चर्यजनक बात ये है कि अब लड़कियां खुद तलाक की मांग करने लगी हैं, कभी कभी इस मांग के पीछे कोई ठोस और मज़बूत आधार नहीं होता, सिर्फ इसलिए तलाक मांगी जाती है, या ख़ुला किया जाता है कि निकाह का रिश्ता स्वतंत्र जीवन शैली में रुकावट बन रहा था।

 कुछ मर्द हज़रात भी पुरानी बीवी को महज इसलिए तलाक देते हैं कि अब उनके लिए उसमें कोई दिलचस्पी और कशिश बाकी नहीं रही,  जिंसी लज़्ज़त के लिए उन्हें दाश्ता या मनकूहा की सूरत में दूसरी औरत बासहूलत दस्तेयाब है। मआशी नाहमवारियां भी तलाक के मिनजुमलह असबाब में से एक सबब है, कभी औरत मआशी तंगी से परेशान होकर मर्द से छुटकारा पाना चाहती है और कभी मर्द अपनी ज़िम्मेदारियों से राहे फरार अख्तियार करने में ही आफियत महसूस करता है, कुल मिलाकर समाज का सुकून दरहम बरहम है, हमारे निजी और सामूहिक जीवन में बेइत्मिनानी का मुज़ाहिरा औलूमे बल्वी की शक्ल अख्तियार करता जा रहा है। ईर्ष्या, लोभ, लालच, और क्रोध यह सब रज़ाइल तेजी के साथ बढ़ रहे हैं , कभी इन रज़ाइल की इंतेहा जराएम के इर्तेकाब पर होती है और कभी ये चीजें अज्दवाजी, सामाजी और खानदानी ज़िंदगी को तबाह व बर्बाद करके छोड़ती हैं।

इस सूरते हाल पर काबू पाना बेहद ज़रूरी है, वर्ना आने वाले दिनों में वैवाहिक जीवन के रास्ते और अधिक कठिन हो सकते हैं, अभी हाल ही में पश्चिमी उत्तर प्रदेश के एक नामी कस्बे में तलाक की एक घटना हुई, किसी ने अपनी पत्नी को गुस्से की हालत में तीन तलाकें दे दीं, इलाके के उलेमा हज़रात समाज सुधार की अपनी ज़िम्मेदारियों पूरा किस तरह करते हैं इसका एक अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि उन्होंने अखबारी बयानों के ज़रिए दारूल उलूम देवबंद और ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल ला बोर्ड जैसे संस्थानों से ये मांग शुरू कर दिया है कि वो तीन तलाकों को एक मानने का फतवा जारी करें, चाहिए तो ये था कि इंसानों उलेमा हज़रात अपने अपने इलाकों में फैल जाते और लोगों को शरीयत के मुताबिक ज़िंदगी जीने की हिदायत करते, इसके बजाय वो तलाक का फतवा बदलने की मांग करने लगे, मुस्लिम पर्सनल ला बोर्ड तो शरई एहकाम की हिफाज़त के लिए बनाया है अगर उससे ही ये मांग की जाने लगे कि शरई एहकाम में तब्दीली कर दी जाए तो इससे सितम ज़रीफ़ी और क्या होगी, ये तो ऐसा ही है जैसे ज़िना औऱ शराब पीने और चोरी डकैती जैसे अपराधों की ज़्यादती को आधार बनाकर सरकार से ये मांग की जाने लगे कि अपराध की सज़ा कम कर दी जाए, या बिल्कुल ही माफ कर दिया जाए क्योंकि लोगों को अपने नफ़्स पर काबू नहीं रहा है और वो कुछ ज़्यादा ही जुर्म  करने लगे हैं।

 अगर आम लोग ये मांग करते तब तो शायद हैरत नहीं होती लेकिन ताज्जुब वाली बात ये है कि ये मांग कुछ अहले इल्म ने की है। ज़ेरे बहस मसला तलाक पर गुफ़्तगू करने से पहले ये बेहतर मालूम होता है कि इस्लाम के नेज़ामे निकाह व तलाक़ और इन दोनों मामलों के मसलों व मकसद पर नज़र डाली जाए, इस्लाम एक उदार और प्राकृतिक धर्म है, इस्लाम की बेशुमार विशेषताओं में से सबसे बड़ी विशेषता ये है कि सभी शिक्षाओं में उदारता का तत्व पूरी तरह शामिल है। इसी तरह इसका हर हुक्म इंसान की प्रकृति के मुताबिक है, अब जिंसी तलज़्ज़ज़को ही लीजिए, इस्लाम ने उसे मकसदे हयात क़रार नहीं दिया और न इस बारे में अपने मानने वालों को इस तरह आज़ाद छोड़ा कि वो तलज़्ज़ज़पाने के लिए जो रास्ता चाहें अख्तियार करें, और न इस फितरी तकाज़े को नज़र अंदाज़ किया, बल्कि इसको हासिल करने के लिए एक ऐसा जामे नेज़ाम कायम करके इंसान को अता किया जिसके ज़रिए वो जिंसी तलज़्ज़ज़ भी हासिल कर सकता है और इंसानी समाज की तरक्की में अपना तामीरी रोल भी अदा करने के साथ साथ खुद अपनी घरेलू ज़िंदगी को भी सुधार सकता है, और अपने दिल को भी सुकून के साथ हमकिनार कर सकता है।

निकाह के इस मकसद की एक झलक हमें कुरान की आयत में दिखती है, फरमया: '' और उसकी निशानियों में से ये भी है कि उसने तुम्हारे लिए तुम्हारी ही जिंस से बीवियाँ बनाईं ताकि तुम उनसे सुकून हासिल करो, और उसने तुम्हारे दरम्यान मोहब्बत औऱ रहमत (हमदर्दी) पैदा कर दी '' (अल-रूम: 21)

जाहिर है जिंसी ख्वाहिश को हासिल करने के दूसरे स्रोत भी हो सकते हैं, इस्लाम ने ऐसे सभी ज़रीओं पर पाबंदी लगा दी और सिर्फ एक ज़रिया निकाह को बाकी रखा, न सिर्फ बाकी रखा बल्कि इसकी तर्ग़ीब भी दी,निकाह के ज़रिये जो रिश्ता वजूद में आता है उसपर मोहब्बत और रहमत का रंग चढ़ाया। मोफस्सिरीन ने लिखा है कि मोहब्बत का ताल्लुक अहदे जवानी से है और रहमत और हमदर्दी का ताल्लुक़ इल्म परवरी से है, निकाह के अलावा कोई दूसरा रिश्ता ऐसा नहीं हो सकता जो शारीरिक और आध्यात्मिक शांति के साथ साथ पहले प्यार में और फिर राफ़्त व रहमत से औलाद मुराद ली है। (देखेः तफ्सीर फतेह अलकदीर: 464/5) इसलिए हदीस शरीफ में कहा गया: '' दो प्यार करने वालों के लिए निकाह जैसी कोई चीज नहीं देखी गई।'' (सुनन इब्ने माजा : 440/5, रक़मुल हदीस: 1837)

निकाह के बारे में इस्लामी शिक्षाओं पर नज़र डालने से पता चलता है कि निकाह से शरीयत की नज़र में सिर्फ जज़्बए जिंस की तस्कीन ही नहीं बल्कि इसके ज़रिए अल्लाह मर्द व ज़न दोनों को किरदार की पाकीज़गी भी अता करना चाहता है, इंसानी नस्ल की बक़ा और अफ्ज़ाइश भी निकाह के मकसदों में से एक अहम मकसद है। आपसी उल्फत व मोहब्बत के ज़रिए दिलों में सुकून भी पैदा करना मकसूद है ताकि इंसान इस दुनिया में अपनी मफ़वूज़ा ज़िम्मेदारियों को ज़्यादा बेहतर तरीके पर अदा कर सके।

 अल्लामा शामी ने मकसदे निकाह की बहस में लिखा है, '' अल्लाह ने कई मसालेह, मुनाफा और हुक्म के पेशेनज़र निकाह का रिश्ता तख्लीक़ फरमाया है। इनमें से एक हिकमत और मसलहेत ये है कि इस कायनात में इंसान, इस्लाहे अर्ज़ और इक़ामत शराए के लिए अल्लाह का नायब बनकर उस वक्त तक बाकी रहे जब तक ये कायनात बाक़ी है। ये मसलहेतें और हिकमतें उस वक्त मोहक़्क़िक़ हो सकती हैं जब उनकी बुनियाद मजबूत सुतून पर क़ायम हो औऱ वो मज़बूत सुतून रिश्तए निकाह है (फतावा शामी: 4 / किताब अलनिकाह) इस्लाम ने निकाह की जिस कदर तर्ग़ीब दी है शायद ही किसी दूसरे मज़हब में इसका तसव्वुर मिलता हो, कुरान में इरशाद फ़रमाया गया:'' जो औरतें तुम्हें पसंद आएं तुम उनसे निकाह करो'' (अलनिसा: 3)

शाह बुखारी हाफ़िज़ इब्ने हजर अस्कलाई ने लिखा है कि इस आयत में सेग़ा अमर लाया गया है जिससे वजूब मकसूद है (फतेह अलबारी: 14/289) इसलिए फुकहा हज़रात ने कुछ मामलों में निकाह को फर्ज़ औऱ वाजिब भी क़रार दिया है ( तफ्सील के लिए देखें, अलफिक़ह अलइस्लामी वादलता: 7/32) जहाँ तक इसके मुस्तहब और मसनून होने का मामला है इसमें तो किसी तरह के शक की गुंजाइश ही नहीं है, बेशुमार रवायात में निकाह की तर्ग़ीब दी गई है, एक हदीस में है कि सरकारे दोआलम सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने नौजवानों के एक समूह को संबोधित करते हुए कहा,''  नौजवानों! तुम में से जो शख्स निकाह की अहलियत रखता हो वो निकाह जरूर करे, क्योंकि इससे निगाह और शर्मगाह दोनों की हिफाज़त होती है'' (सही अलबुखारी: 15/498, रक़मुल हदी: 4678) एक हदीस में इरशाद फ़रमाया गया- अन्निकाह मिन सुन्नति अंबिया- निकाह अंबिया की सुन्नत है (तफ्सीरुल अक़म जब्दी: 2/42) एक और  हदीस में है, '' निकाह मेरी सुन्नत है जिसने मेरी सुन्नत से एतराज़ किया वो मेरे तरीके पर नहीं है।''  ( मओता इमाम मुहम्मद: 2/427, रक़मुल हदीस: 523) इस तरह की रवायत से से निकाह की अहमियत का पता चलता है, इसलिए इस्लाम में निकाह का एक मोकम्मल ज़ाब्तए नेज़ाम है, ये नहीं कि अगर निकाह की इजाज़त दे दी गई या उसका हुक्म दे दिया गया तो जिस तरह जी चाहे करो, जिससे जी चाहे करो, जब जी चाहे करो, ऐसा नहीं है बल्कि इसका एक पूरा नेज़ाम है, जिसमें निकाह के सभी आदाब व शराएत खोल खोल कर बयान कर दिए गये हैं, हालांकि मामलात औऱ भी हैं, मगर जिस कदर तफ्सीलात निकाह के बाब में मिलती है और जितनी शराएत व क़यूद निकाह के बारे में लगाई गई हैं उनसे स्पष्ट होता है कि कोई मोहतमिम बिलशान मामला है।

जो मामला इतना अहम हो, जिस रिश्ते को वजूद में लाने के लिए इतना तर्ग़ीब दी गई हो, ज़ाहिर है वो मामला खत्म करने के लिए नहीं होता और न ऐसा रिश्ता तोड़ने के लिए होता है, इस्लाम का असल रुख तो यही है कि समझौता निकाह जीवन की अंतिम सांस तक बरकरार रहे, इसके लिए शरीयत ने ज़ौजैन को कदम कदम पर हिदायते दी हैं, एक दूसरे के हुक़ूक और फराएज़ से आगाह किया है, उन्हें एक दूसरे की हक़ तल्फी से डराया है, औलाद के बाब में भी उनके फराएज़ वाज़ेह कर दिए हैं, खानदानों को एकजुट रखने में जो भूमिका मियां बीवी दोनों मिलकर अदा कर सकते हैं से भी आगाह कर दिया है, इन सब चीज़ों पर अमल उसी सूरत में मुमकिन है जब मर्द व ज़न दोनों उस रिश्ते को मज़बूत और बरक़रार रखने में कामयाब हों। इसके बावजूद कभी कभी ऐसे हालात पेश आते हैं जब यह रिश्ता बनाए रखना मुश्किल हो जाता है, ऐसे में भी इस्लाम की रहनुमाई मौजूद, जैसा कि अर्ज़ किया गया कि इस्लाम दीने फितरत है, और राहे एतेदाल है, ये नहीं कि एक बार इस रिश्ते में बंध गए तो कोई सूरत इससे अलग होने की नहीं हो सकती, चाहे कैसी ही मुश्किल पेश आएं, मियां बीवी में कितना ही अदम तवाफ़ुक़ हो, हर हाल में इस रिश्ते को निभाना ज़रूरी है, ऐसा नहीं है, जिन मजहबों में शादी को हर हाल में दायमी मामला समझा गया है वहां कभी कभी ज़ौजैन में से कोई एक या दोनों मज़हबी कैद व बंद से बग़ावत पर आमादा हो जाते हैं, जिनमें बग़ावत का हौसला नहीं होता वो घर से बाहर जिस्मानी और कल्बी सुकून तलाश करते फिरते हैं, कभी कभी ये मामला मियां बीवी से किसी एक की आप्राकृतिक मौत (कत्ल वगैरह) पर भी मुन्तनिज होता है, इस्लाम ने तलाक की इजाज़त दे कर ये सभी रास्ते बंद कर दिये हैं।

तलाक की तफ्सीलात में जाने से पहले ये वाज़ेह कर देना ज़रूरी है कि तलाक सिर्फ नागुज़ीर (अपरिहार्य) हालात में ही शुरु की गयी, सका इस्तेमाल गज़बे इलाही को दावत देने के के मोतरादिफ है, जो लोग इस अख्तियार का गलत इस्तेमाल करते हैं, वो दुनया में भी इसका ख़ामियाज़ा भुगततें हैं और आखिरत में भी इसकी सजा पाएंगे। तलाक के लिए सबसे अहम बात ये है कि कोई भी फैसला जल्दबाज़ी में या जज़्बात में आकर नहीं करना चाहिए, बल्कि बहुत सोच समझ कर, ठंडे दिलो दिमाग से किसी नतीजे पर पहुंचना चाहिए, इसलिए इस्लाम ने तलाक का हक़ सिर्फ मर्द को दिया है, खुला की सूरत में भी तलाक देने की जिम्मेदारी मर्द पर ही होती है, अल्लामा शामी ने लिखा है'' तलाक का एक अच्छा पहलू ये भी है कि शरीयत ने तलाक का अख्तियार सिर्फ मर्द को दिया है, क्योंकि औरत के मुकाबले में उसकी अक्ल ज़्यादा होती है, कोई भी कदम उठाने से पहले वो इसके नताएज व अक़ाएब पर अच्छी तरह ग़ौर कर लेता है, जबकि औरत में अक्ल व दीन के नुक्सान के बाएस ये सलाहियत कम होती है, वो जज़्बात से मगलूब  हो जाती है''  (रदअलमोहतार: 4/316) मर्द को अख्तियार देने के बाद भी इस्लाम ने तलाक के मामले को शरई ज़ाब्ते का पाबंद बना दिया, इस ज़ाब्ते की पाबंदी में दी गई तलाक को तलाक बिदई करार देकर आगाह कर दिया गया कि तलाक देनी ही है तो तलाक अहसन या तलाक हसन दो, तलाक बिदई न दो, मुफ़स्सिर कुरान हज़रत मौलाना मुफ्ती मोहम्मद शफी उस्मानी रहमतुल्लाह अलैह तहरीर फरमाते हैं, 'शरीयत ने मोआहेदा निकाह को तोड़ने और फस्ख करने का वो तरीका नहीं रखा जो आम खरीद व फरोख्त के मामलात और मोआहेदात का है कि एक बार मोआहेदा फस्ख कर दिया तो उसी वक्त उसी मिनट फरीकैन आज़ाद हो गए और पहला मामला बिल्कुल खत्म हो गया और हर एक को अख्तियार हो गया कि दूसरे से मोआहेदा कर ले, बल्कि मोआहेदए निकाह को बिल्कुल खत्म करने के लिए पहले तो तीन दर्जे तलाकों की सूरते में रखे गए, फिर उस पर इद्दत की पाबंदी लगा दी गयी'' (तफ्सीर मआरिफुल कुरान: 1/557)

अफसोस मुसलमानों ने तलाक को खिलौना बना लिया है, कुछ शौहर ज़र ज़रा सी बात पर तलाक की धमकी देते हैं, सिर्फ देते ही नहीं है बल्कि इस धमकी पर अमल भी कर बैठते हैं, हालांकि अगर तलाक देना ही है तो पहले अहले इल्म से इशकी तफ्सीलात मालूम करें, इसकी तरीकए कार समझें, इसके बाद ये कदम उठाएं, मियां बीवी में एख्तेलाफ पैदा हो सकता है, कभी कभी ये एख्तेलाफ बढ़ भी जाता है, इस सूरत में कोशिश यही करनी चाहिए कि आपस में ही मामले हल कर लिए जाएं, बीवी की गल्ती हो तो उसे ज़जर व तौबीख भी की जा सकती है उसका बिस्तर भी अलग किया जा सकता है, ससे भी काम न चले तो दोनों खानदानों के साहबे राय लोग जमा होकर मामले को सुलझाने की कोशिश करें, ये कोशिश भी कारगर न हो तो अब तलाक दी जा सकती है, लेकिन इस हक़ के इस्तेमाल में भी मर्द को ये हिदायत है कि वो अपनी बीवी को ऐसे तहेर की हालत में जिसमें हमबिस्तरी न की गई हो, एक तलाक देकर रुक जाए, दूसरी या तीसरी तलाक न दे, इद्दत पूरी होने पर ये रिश्तए निकाह खुद बखुद खत्म हो जाएगा, यही तलाके अहसन है जो शरीयत में मतलूब है, से तलाक रुजई कहते हैं, यानी अगर शौहर चाहे तो वो इद्दत के अंदर अंदर रुजू करने के लिए दोबारा निकाह करने की जरूरत जिन्हें है, न औरत की रज़ामन्दी शर्त है, इद्दत गुज़रने के बाद अगर अब दोनों दोबारा मिलना चाहें तो सिर्फ निकाह काफी होगा, हलाले की जरूरत नहीं है, अब अगर किसी वजह से दूसरी और तीसरी तलाक देना ही है तो दूसरी तहेर में दूसरी और तीसरे तहेर में तीसरी तलाक दे,  दो तलाक तक तो इद्दत के अंदर रुजू और इद्दत गुज़रने के बाद बिला हलाला तज्दीदे निकाह की गुंजाइश है, तीसरी तलाक में ये गुंजाइश बाकी नहीं रहती (गायतः अलअवतार: 2/108)

मुस्लिम समाज में आमतौर पर ये गलतफहमी पाई जाती है कि रिश्तए निकाह खत्म करने के लिए तीन तलाकें देना जरूरी है, अगर तीन तलाकें नहीं दी गई तो ये रिश्ता ख़त्म नहीं होगा, ये गलतफहमी इसलिए फैली हुई है कि लोगों को दीन का सही इल्म नहीं है, तलाक का बेहतरीन शरई तरीका वही है जो ज़िक्र किया गया,  एक वक्त में तीन तलाकें देने से भी तलाक हो जाती है, मगर इस तलाक को तलाक बिदअत कहा जाता है, इस तरह तलाक देने से आदमी गुनहगार होता है , इससे बचना चाहिए, तीन तलाकें देने की सूरत में वो बीवी उसके लिए हराम हो जाएगी, न उससे इद्दत के अंदर रुजू कर सकता है, न इद्दत गुज़रने के बाद उसके साथ निकाह की तज्दीद हो सकती है, अगर बच्चों की खातिर, या अपने किए पर पछतावे के कारण कोई शख्स दोबारा उसी सूरत में निकाह कर सकता है जिसका ज़िक्र कुरआन में किया गया है, '' अगर उसने औरत को (तीसरी) तलाक दे दी तो अब उसके लिए वो औरत जायेज़ नहीं होगी जब तक इस औरत का निकाह दूसरे शख्स से न हो जाए '' (लबकरह: 230) फुकहा ने इसकी तफ्सीलात तय कर दी हैं कि ये औरत पहले इद्दत गुजारेगी, फिर किसी दूसरे शख्स से निकाह कर उसके साथ वक्त गुज़ारेगी , दोनों मियां बीवी की तरह रहेंगे, अगर ये शौहर अपनी मर्ज़ी से तलाक देगा, तब फिर इद्दत गुजारेगी, अब पहले शौहर से निकाह हो सकता है जिसे हलाला कहते हैं, इसी शर्मनाक सूरते हाल से बचने के लिए तलाके अहसन और तलाक हसन मशरू है। कम इल्मी के बाएस मुसलमान मर्द ग़ैज़ व गज़ब से मगलूब होकर एकदम तीन तलाक दे बैठते हैं, जो बसाअवकात सख्त परेशानी का कारण बनती है, इसलिए कुछ हल्कों से ये मांग किया जाता रहा है कि एक वक्त में दी जाने वाली तीन तलाकों को एक ही तलाक क़रार दिया जाए, जैसा कि गैर मोकल्लिदीन हज़रात की राय है, हालांकि तीन अलग अलग तहेर में दी गई तीन तलाकों को वो भी तीन तलाकें ही मानते हैं, एख्तेलाफ सिर्फ एक वक्त में दी जाने वाली तीन तलाकों में है, इस बारे में तफ्सीलात तो बहुत हैं, मख्तसेरन इतना अर्ज़ है कि एक मजलिस में तीन तलाकें दी जाएं तो जम्हूरे उलेमा की राय के मुताबिक तीन ही तलाकें वाक़े होंगी, फुकहा सहाबा कराम रज़ियल्लाहु अन्हु में हज़रत उमर फ़ारूक़ रज़ियल्लाहु अन्हु, हज़रत उस्मान गनी रज़ियल्लाहु अन्हु, हज़रत अली रज़ियल्लाहु अन्हु, हज़रत अब्दुल्लाह इब्ने अब्बास रज़ियल्लाहु अन्हु, हज़रत अब्दुल्लाह इब्ने उमर रज़ियल्लाहु अन्हु, हज़रत अब्दुल्लाह इब्ने मसूद रज़ियल्लाहु अन्हु जैसे कबार सहाबा हज़रात रज़ियल्लाहु अन्हु की राय यही थी कि तीन तलाकें वाक़े होंगी, आइम्मा अरबआ यानि हज़रत इमाम अबू हनीफ रहिमतुल्लाह अलैह व, इमाम मालिक रहिमतुल्लाह अलैह व, इमाम शाफ़ेई रहिमतुल्लाह अलैह और इमाम अहमद बिन हंबल रहिमतुल्लाह अलैह का मुत्तफिका मसलक भी यही है, इसलिए जो लोग इमाम मालिक रहिमतुल्लाह अलैह की तरफ ये क़ौल मंसूब कर रहे हैं कि वो एक तलाक के कायल थे, गलत है, चौदह सौ साल से इसी पर फतवा दिया जा रहा है और इसी पर अमल हो रहा है, हज़रत उमर फ़ारूक़ रज़ियल्लाहु अन्हु के जमाने में कई घटनाओं जिनमें एक मजलिस में तीन तलाकों के मामले पेश आए, सभी सहाबा रज़ियल्लाहु अन्हु ने मिलकर तीन तलाक ही का फैसला किया, किसी एक सहाबी का कोई एख्तेलाफ किसी रवायत से साबित नहीं है हाफ़िज़ इब्ने अबु बकर हसास रहिमतुल्लाह अलैह ने एहामुल क़ुरान में लिखा है'' किताब व सुन्नत और इजमाए उम्मत से ये साबित है कि एक मजलिस में दी गई तीन तलाकें तीन ही वाक़े होंगी, हालांकि ये अमल मासियत है (एहकामुल कुरान : 1/459)

1393 हिजरी में ये मसला सऊदी अरब की बेअतः कबारुल उल्मा में भी ज़ेरे बहस आया, इस मजलिस में सऊदी अरब के लगभग सत्रह बड़े उलेमा और फुकहा शरीक थे, इन सभी हज़रात ने कुरान व हदीस की रौशनी में यही फैसला किया कि एक वक्त में दी गईं तीन तलाकें तीन शुमार होंगी, ये पूरी बहस मोजल्ला अलजूस अलइस्लामिया (शुमारा 1397 हिजरी) में छप चुकी है जो लगभग डेढ़ हज़ार सफ्हात पर फैली हुई है।आखिर में सिर्फ इतनी गुज़ारिश है कि उलेमा कराम मुसलमानों को सही मसाएल से वाकिफ कायें, अखबारी बयानबाजी करके अवाम को गलतफहमी में मुब्तेला न करें, जनता को भी चाहिए कि अखबारी बयानों पर यकीन न करें, बल्कि दारुल उलूम देवबंद और दूसरे बड़े मदरसों में मुफ़्तियान हज़रात से सही जानकारी हासिल करें, तलाक को बाजीचए एत्फाल न बनाएं, तलाक देना ही है तो शरीअत के मुताबिक दें, वरना सब्र व तहम्मुल के साथ अज़्दवाजी ज़िंदगी की तलखियों को बर्दाश्त करके अज्र व सवाब के मुस्तहिक़ हों।

स्रोतः अखबारे मशरिक, नई दिल्ली

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