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Hindi Section ( 8 May 2017, NewAgeIslam.Com)

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Recent Elections and the Muslim Ummah मौजूदा चुनाव और मुस्लिम उम्मत




मौलाना सैयद जलालुद्दीन उमरी

12 अप्रैल, 2017

विधानसभाओं के चुनाव आमतौर पर होते ही रहते हैं लेकिन इस बार जो चुनाव हुए उसने पूरे देश को आकर्षित किया है l और ऐसा लग रहा था, खासकर यूपी के चुनाव में यह एक राज्य नहीं बल्कि पूरे देश का चुनाव है और पूरा देश परिणाम का इंतजार कर रहा है। यह कहना शायद गलत न होगा कि देश से बाहर भी परिणाम का इंतजार था। बहरहाल चुनाव हुआ, और देश की जो बड़ी पार्टियां हैं सबने अपनी ऊर्जा लगा दी। खासकर देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी साहब ने यूपी में एक तरह से डेरा डाल दिया और पूरी ताकत और ऊर्जा पार्टी को सफल बनाने में लगा दी। अन्य दलों ने भी अपनी ताकत झोंकी, लेकिन जो परिणाम आए, वह बहुत ही आश्चर्यजनक थे। परिणाम के बाद जो स्थिति बनी है वह भी आश्चर्यजनक और सभी के लिए विचारणीय है। उत्तर प्रदेश में पहले तो सोचा कि शायद हंग (त्रिशंकु) विधानसभा बनेगी लेकिन यह नहीं हुआ। कुछ लोगों का यह भी मानना था कि भाजपा बड़ी पार्टी तो होगी लेकिन उसे बहुमत प्राप्त नहीं होगी। यह सब अटकलें गलत साबित हुईं और भाजपा को यूपी में चार सौ तीन (403) से तीन सौ बारह (312) सीटें मिलीं। उसकी शायद ही भाजपा को भी उम्मीद नहीं थी।

इसके साथ उत्तराखंड में भी चुनाव हुआ। वहाँ भाजपा सबसे बड़ी पार्टी के तौर पर सामने आई। वे सत्तर (70) में से (56) सीटों पर सफल हुई। इनका मुख्यमंत्री भी तय हो गया। गोवा में विधानसभा की चालीस (40) सीटें कांग्रेस पार्टी बड़ी पार्टी के तौर पर उभर कर सामने आई। इस को सत्रह (17) सीटें मिलीं और भाजपा को तेरह (13) लेकिन वहाँ राज्यपाल के सामने भाजपा ने दावा किया कि बहुमत उस के साथ है और उसने इसे साबित भी कर दिया। कांग्रेस अपना बहुमत साबित करने में नाकाम रही कांग्रेस में मतभेद भी उत्पन्न हो गए, कुछ लोगों ने इस्तीफा दे दिया। पंजाब में कांग्रेस सरकार बनाने में सफल हो गई, मणिपुर में भाजपा अल्पसंख्यक थी वहां साठ (60) में से इक्कीस (21) सीटों पर सफल हुई और कांग्रेस ने अट्ठाईस (28) सीटें प्राप्त कीं लेकिन राज्यपाल ने सरकार बनाने का न्योता भाजपा को दिया, उसने अपना बहुमत साबित कर दिया। इसकी वजह यह है कि यूपी चुनाव के बाद पूरे देश में हवा चली, कि लोगों ने समझा कि अब सत्ता इस भाजपा के हाथ में है। एक पूरा माहौल सा बन गया और लोग टूटकर उधर जाने लगे और जो राज्यपाल हैं, आप जानते हैं कि वह भी भाजपा के समर्थन में हैं। इन परिणामों के बाद कई बातें कही जा रही हैं, कहा जा रहा है कि चुनाव उचित नहीं हुआ, कभी कहा जाता है कि यूपी में जो इतना अंतराल दिया गया यह जोड़ तोड़ के लिए था, उतने समय की जरूरत नहीं थी, उसी तरह एक बात यह भी कही जाती है कि ईवीएम की जो मशीनें हैं वह भाजपा के पक्ष में ही राएँ रिकॉर्ड करती थीं। लेकिन चुनाव आयोग ने इन बातों का खंडन कर दिया है। वह इसे मानने के लिए तैयार नहीं है। उसने कहा है कि अगर ऐसी कोई बात है तो इसका सबूत दीजिए उन स्थानों पर जहां इन मशीनों का उपयोग नहीं किया गया है, विरोधी दलों का प्रदर्शन अच्छा नहीं था, जहां इन मशीनों का उपयोग नहीं किया गया है उसकी संख्या भी उसने बताई है कि वहाँ इन मशीनों का उपयोग नहीं हुआ था, लेकिन रिजल्ट आपके पक्ष में नहीं भाजपा के पक्ष में रहा, हालांकि चुनाव आयोग ने किसी भी आपत्ति को स्वीकार नहीं किया। अब हमें यह मान लेना चाहिए कि भाजपा सत्ता में आ गई है। विभिन्न राज्यों में जो चुनाव हुए हैं और जहां अल्पसंख्यक थी वहाँ भी उसने अपने आप को बहुमत में बदल लिया है। यह स्थिति देश के धर्मनिरपेक्ष ताकतों खासकर मुसलमानों के लिये चिंता की है।

इसका एक पहलू यह भी है कि S.P के अखिलेश और कांग्रेस का जो गठबंधन हुआ था, जाहिर तौर पर ऐसा लगता है कि मुसलमानों का रुजहान उसकी ओर था, इसी तरह कई लोगों को विश्वास था कि भाजपा सबसे बड़ी पार्टी होगी। इसलिए एक साहब जिनका बसपा से संबंध था और यूपी की समीक्षा लेकर आए थे उन्होंने कहा कि हमें तो शत-प्रतिशत विश्वास था कि बसपा आएगी। लेकिन परिणाम देखने के बाद हिम्मत नहीं हो रही है कि जनता का कैसे सामना करें। खास बात यह है कि मुसलमानों की कुछ मुख्य शख्सियतें बसपा के समर्थन का बहुत पहले से घोषणा करते रहे। मुसलमानों की एक संस्था ने तो इस चुनाव की सीमा तक अपने आप को भाजपा सपा में विलय कर दिया। उसने अपने कैनडीडेटस को हटा लिया। अंतिम समय तक विभिन्न संगठनें बसपा का समर्थन करती रहीं। लेकिन इसके बावजूद बसपा सफल नहीं हुई और बहुत कम सीटें उसे मिली। इसका दुर्भाग्यपूर्ण पहलू यह है कि इससे पता चलता है कि मुसलमानों का और उनकी की मुख्य हस्तियों का कितना वजन है? वे सब मिलकर एक पार्टी का समर्थन कर रहे हैं लेकिन इसका कोई असर नहीं हो रहा है।

एक बात यह भी कही जाती है कि मुसलमान निर्णायक स्थिति में हैं। खासकर पश्चिमी यूपी में अगर किसी पार्टी के पक्ष में उनका वोट होगा तो वह पार्टी सफल हो जाएगी। यानी मुसलमान अपने दम पर तो सफल नहीं हो सकते, किसी पार्टी का समर्थन करें तो वे पार्टी सफल हो जाएगी। इस चुनाव के बाद भाजपा के लोगों ने कहा कि यह धारणा अब समाप्त हो गया कि मुसलमान झुकेगा वह पार्टी सफल हो जाएगी। अब मालूम हो गया कि मुसलमानों का इतना वजन नहीं है। इसकी एक वजह यह भी है कि (इन क्षेत्रों का उल्लेख नहीं कर रहा हूँ जहाँ मुसलमान विशाल बहुमत में हैं जैसे असम, बंगाल या केरल में मालापोरम, इस समय यूपी का उल्लेख हो रहा है मुसलमान यूपी में जनगणना के हिसाब से अठारह बीस प्रतिशत हैं) इसमें शक नहीं अगर मुसलमान एकजुट हों तो वह चुनाव परिणाम को प्रभावित कर सकते हैं। वह जिसका समर्थन करेंगे उसकी सफलता की संभावना हैं। लेकिन यह एक घटना है कि मुसलमानों के बीच एकता नहीं है। वह विभिन्न राजनीतिक दलों से जुड़े हैं और खुद उनकी भी राजनीतिक दल हैं। इसलिए उनका गठबंधन प्रक्रिया में नहीं आता। यह बात राजनीतिक पार्टियाँ भी जानती हैं इसलिए वे उन्हें अधिक महत्व नहीं देतीं। यहाँ तक यह बात भी मद्देनजर रहनी चाहिए कि मुसलमान एकजुट होंगे तो दूसरे भी एकजुट होंगे। आप विचार नहीं कर सकते कि आप एकजुट हो जाएं और दूसरे एकजुट न हों, और यह मुसलमानों के पक्ष में हानिकारक हो सकता है। बहुत सरल सा उदाहरण देता हूँ कि आप बीस प्रतिशत हैं, विरोधी पक्ष या दुसरा पक्ष अस्सी प्रतिशत है। आप अगर एकजुट हो गए (मुसलमानों की इस समय जो स्थिति है उसमें संभावना नहीं है कि सभी एक हो जाएं और एक कैंडिडेट पर सभी मुसलमान सहमत हो जाएं) तो दूसरी तरफ जो अस्सी प्रतिशत हैं उनमें से अगर आधे भी एकजुट हो गए तो हरा देंगे। आप बीस प्रतिशत होंगे वह चालीस प्रतिशत होंगे। इसलिए यह सोचना और भाषणों में कहना कि हम बादशाह बनाने वाले हैं, हम जिसे चाहें सिंहासन पर बिठाएंगे। और जिसे चाहे सिंहासन से नीचे उतारें, यह सब हवाई बातें हैं। इसका मतलब यह है कि हमनें न समस्याओं को समझा है न सोचा है कि इस मुद्दे पर कैसे विचार करना चाहिए। यह जो स्थिति है जाहिर है कि बहुत चिंताजनक है। इसीलिए जितनी पार्टियां हैं सब बहुमत ही देखती हैं कि उनके वोट किधर जा रहे हैं?

इस चुनाव में आपने देखा होगा कि केवल मायावती ने बार बार मुसलमानों का नाम लिया। और अठानवे (98) लोगों को अपनी पार्टी का कैंडिडेट बना दिया, यही बात उनके गले की फांस बन गई। वे कहती रहीं कि मुसलमान और बसपा के जो समर्थक समूह हैं मिलकर सरकार बना लेंगे लेकिन इसका उल्टा ही असर हुआ। इसके अलावा किसी पार्टी ने मुसलमानों के नाम तक लेना पसंद नहीं किया। पूरे चुनाव में अखिलेश और राहुल ने यह कहीं नहीं कहा कि यह मुसलमानों का मुद्दा है इसे हल होना चाहिए। इसका कारण यही है कि वे सोचते हैं कि ऐसा करने से बहुमत के वोट खो देंगे। इन समस्याओं का उल्लेख करेंगे तो लोग समझेंगे कि हम उनके समर्थक हैं। आपके पक्ष में कोई अच्छी बात भी कहता है तो लोग समझते हैं कि वह मुसलमानों का समर्थक है। अभी चुनाव हुआ, अगर यह सब पार्टियां एक हो जाती तो जाहिर है कि चुनाव का रिजल्ट दूसरा होता। यानी इस बात को यूं समझिए कि भाजपा को यूपी में चालीस प्रतिशत वोट मिले हैं और साठ प्रतिशत इन पार्टियों को मिले हैं लेकिन चूंकि यह बिखरे हुए थे, इसलिए रिजल्ट दूसरा आया। यानी चालीस प्रतिशत के आधार पर वह सरकार चला रही है और साठ प्रतिशत में से कुछ सपा के पक्ष में गए कुछ बसपा के पक्ष में और कुछ कांग्रेस के पक्ष में गए। कुछ अन्य दलों के खाते में गए, इससे मालूम होता है कि मुसलमान इस चुनाव में पूरी तरह नजरअंदाज किए गए। जहां तक भाजपा का सवाल है तो उसनें कहीं मुसलमानों का जिक्र नहीं किया। वह अभी भी नहीं करती, जब भी कहा जाता है तो मौजूदा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी साहब कहते हैं कि किसी समूह या वर्ग की बात नहीं करता। मैं तो एक सौ तीस करोड़ मानव की बात करता हूँ, किसी भी समस्या में, वह मुसलमानों के हवाले से कुछ कहने के लिए तैयार नहीं होते। बहरहाल आपको यह मानना होगा कि एक बड़ी शक्ति के रूप में भाजपा मौजूद है। यूपी में भी है और कुछ अन्य राज्यों में भी। मुसलमानों की चिंता बिल्कुल स्वाभाविक है। जो समझते हैं कि भाजपा हमारे व्यक्तित्व, हमारी सभ्यताओं रहमारे संस्कृति को खत्म करना चाहती है। उसका अपना एक दर्शन है, उसके आधार पर वे इस देश का निर्माण चाहती है, इसमें हमारे लिए कोई जगह नहीं है। इसलिए हमें सोचना होगा कि इस स्थिति में हमें करना क्या है?

एक बात तो यह देखिए कि आज भाजपा जो सत्ता में है तो यह उसकी सत्तर अस्सी (70-80) वर्ष के प्रयासों का परिणाम है। लगातार वे अपने विचारों को बढ़ावा देने और आम करनें में लगी रही। उलटफेर उस पर भी आते रहे। इंदिरा गांधी के आपातकाल के दौर में उनकी गिरफ्तारी हुई और बाद में इंदिरा गांधी से संबंध भी उसने बढ़ाए। यह सब कुछ होता रहा। इसके बावजूद उसने अपने उद्देश्य और लक्ष्य प्राप्त करने के लिए लगातार कोशिश की। इस दुनिया का नियम है कि जो व्यक्ति भी कोशिश करता है वह सफल होता है। मोदी साहब ने इस पहलू से अपना परिचय दिया कि वह देश के सभी वर्गों को लेकर आगे बढ़ेंगे और सब ही का विकास उनके मद्देनजर है। उन्होंने विशेष रूप से कमजोर वर्गों को साथ लेने की कोशिश की। उन्होंने कहा कि मैं भी एक गरीब आदमी हूँ, मेरा संबंध भी निचले तबके से है, तुमनें बसपा का परीक्षण किया, अब मेरा भी अनुभव करो। आपको सुनकर हैरत होगी कि इसका असर हुआ यानी यूपी में जो कमजोर वर्गों के लिए आरक्षित सीटें हैं वह अड़सठ (68) के आस-पास हैं। इनमें सभी बसपा के बजाय भाजपा के पक्ष में गए और किसी ने बसपा की ओर ध्यान नहीं दिया।

हम मुसलमानों का हाल यह है कि किसी विशेष उद्देश्य के तहत हमारे प्रयास नहीं होतीं। जब चुनाव का मौका आता है तो हम बात कर रहे हैं कि किस पार्टी का साथ दिया जाए। लेकिन शायद गंभीरता के साथ विचार नहीं करते कि लोकतांत्रिक देश में सफलता का क्या तरीका है और हम कैसे यहाँ प्रभावी हो सकते हैं? उम्मत के एकता की बात होती है, इस सिलसिले में विभिन्न संगठनों और दलों के बीच विमर्श भी होता रहा लेकिन कोई विशेष परिणाम नहीं निकला। ऐसे अवसर पर यह एहसास भी होता है कि हम सब की यह कमजोरी है कि हर व्यक्ति देखता है कि नेतृत्व किसके हाथ में रहेगी? जाहिर है कि जब नेतृत्व की चिंता होगी तो बलिदान नहीं दे सकते। आपको हर समय यह चिंता होगी कि नेतृत्व हमारे हाथ में रहे? इस कमजोरी की वजह से हम उस पर बहुत ज्यादा ध्यान नहीं पाते। अभी चुनाव परिणाम नहीं आए थे, मैंनें कुछ मित्रों से कहा: चुनाव के जो भी परिणाम आए मुसलमानों के जिम्मेदार लोगों को बैठना और सोचना चाहिए कि हमारी राजनीतिक रणनीति यहाँ क्या होगी? अनुमान यह है कि राजनीतिक परिणाम जो भी आएं, वह हमारे पक्ष में नहीं होगे। हर पार्टी बहुमत को ही देखती है। इसलिए आप का नाम तक नहीं लेती। बिहार में मुसलमानों ने एकता का प्रदर्शन किया, एक हो गए, परिणाम बहुत अच्छा निकला, वहाँ भी हम से यह कहा जाता था कि आप हमारा समर्थन कीजिये लेकिन सामने न आइए। हर पार्टी यही कहती है, अपने वोट दीजिए लेकिन आप सामने आएंगे तो हमारे लिए समस्या खड़ी हो जाएगी। अगर खुलकर आप सामने आएंगे तो दूसरी पार्टी इससे लाभ उठाएगी। इसलिए वहाँ मुसलमानों ने यही रणनीति अपनाई और वह सामने नहीं आए, आपका सामने आना किसी को भी गवारा नहीं है। और यहाँ भी यही स्थिति है कि कोई भी पार्टी नहीं चाहती कि आप सामने आएं और अपने मुद्दों पर खुलकर बात करें।

इस चुनाव के बाद यह विचार हो रहा है और मुसलमान भी यह सोचते हैं कि अब भाजपा को हो सकता है कि राज्यसभा में भी बहुमत हासिल हो। लोक सभा में तो उसे बहुमत प्राप्त ही है। राज्यसभा में भी बहुमत हो जाएगा तो वह कोई भी कानून पेश कर सकती है और उसे पारित करा सकती है। संविधान में भी बदलाव कर सकती है। मैं इस चर्चा में नहीं पड़ता कि संविधान में मौलिक परिवर्तन होगी या नहीं, इसकी वजह यह है कि देश का संविधान ही है जो विभिन्न क्षेत्रों को जोड़े हुए है। बहरहाल मुसलमान यह समझते हैं कि यह हमारे खिलाफ कोई कानून पास करा सकती है। यह चिंता स्वाभाविक है। आपके पर्सनल लॉ बोर्ड बदलाव करा दें, आपकी और चीजों पर प्रतिबंध लगा दें, इन सब बातों की वजह से मुसलमानों की चिंता सही है।

एक बात तो यह है कि बहरहाल हमें यह कोशिश करनी होगी कि मुसलमानों में जो अराजकता है जिस हद तक संभव है कम हो, जब किसी भी पार्टी को पता होगा कि आप एकजुट हैं तो आपको वह महत्व देगी और आपका बहरहाल ख्याल करेगी। लेकिन आप अराजकता पीड़ित हों तो वे यही समझेंगे कि आपके पास कोई शक्ति नहीं है। इसलिए अपने हितों को छोड़ कर मुसलमान जिस हद तक भी एकजुट होंगे उम्मीद है कि इसका असर होगा और विभिन्न पार्टियां मुसलमानों को महत्व भी देंगी।

एक बात यह है कि अब इसका समय नहीं है कि हम एक दूसरे की आलोचना करें, कि अमुक व्यक्ति ने गलती की, अमुक पार्टी से यह कमी हुई और इस वजह से मुसलमानों के वोट बंट गए और फलां ने जो यह बात कही इस कारण लोग भाजपा की ओर चले गए, इस तरह की बातों का अब कोई लाभ नहीं है। जो कुछ होना था वह हो चुका। हमें इन बातों को नजरअंदाज करके अपनी शक्तियों को एकत्र करना होगा।

आप जानते हैं कि जंगे उहद में मुसलमानों से गलती हुई, तो जीती हुई बाजी हार में बदल गई, जाहिर है कि जिन लोगों की कोताही के कारण हार हुई उनसे शिकायत भी होगी और लोगों के अंदर कठोर भावनाएं भी रहे होंगे लेकिन नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को निर्देशित किया गया (देखिए कितनी बड़ी बात कही गई! कहा गया कि उनसे जो गलती हुई उसे माफ कर दीजिए(आले इमरान: 159) आगे इससे बड़ी बात कही गई उनके लिए माफी तलब कीजिये अल्लाह से कहिए कि ऐ अल्लाह! मेरे इन साथियों से गलती हो गई है, तू उन्हें छमा कर दे! यह कितनी बड़ी बात है! जिनसे गलती हुई, उन्हें माफ कर देना आसान है, लेकिन उनके पक्ष में प्रार्थना करना इतना आसान नहीं है। इससे बड़ी बात कही गई कि समझ कर कि यह गलत कार और ना समझ लोग हैं, उन्हें अलग मत कीजिए बल्कि मामलों में उनसे सलाह कीजिये। वह यह न समझें कि हमें काट दिया गया, हमें अलग कर दिया गया। बात कहां से चली है और कहा जा रहा है कि उनसे सलाह करो, उन्होंने गलती की , लेकिन उनकी गलती इज्तेहादी गलती थी, जानबूझकर नहीं की। हालांकि उसका इतना बड़ा नुकसान हुआ कि सत्तर मुसलमान शहीद हो गए। उस ज़माने में सत्तर मुसलमानों का शहीद हो जाना बहुत बड़ी बात थी। कहा गया इन स्थितियों में भी तुम्हें उनसे संबंध रखना चाहिए। बहरहाल अब हमें यह कोशिश करनी होगी कि कैसे सबको एकजुट किया जाए क्यों कि हर किसी का अपना अलग क्षेत्र है उसके प्रभाव हैं। हर पार्टी का एक प्रभाव है। इन सभी को एकत्र करने से ही हमारी ताकत बढ़ सकती है।

एक बात यह है कि भाजपा मुसलमानों को एक प्रतिद्वंद्वी शक्ति के रूप में देखती है। ऐसा लगता है कि उसका पूरा दर्शन ही इस पर आधारित है कि यहाँ मुसलमान हैं। और उनका अस्तित्व देश के लिए उपयोगी नहीं है बल्कि शायद वे यह भी कहते हैं कि देश के लिए वह हानिकारक हैं। अगर वह रहें भी तो हमारे कल्चर में एकीकृत हो जाएं। एक साहब ने बहुत पहले लिखा था कि '' शायद दुनिया में भारत ही वह देश है जहां अल्पसंख्यक से बहुमत डरती और कि यह हमारे लिए खतरा हैं ''। इसके कारण चाहे जो भी हो बहरहाल वह आपको एक प्रतिद्वंद्वी कौम के रूप में देखते हैं। आप को यह बताना होगा कि आप उनके प्रतिद्वंद्वी नहीं हैं, न उनके दुश्मन हैं, न इस देश के दुश्मन हैं। एक बात यह भी है कि आप उपयोगिता उन्हें इस देश में समझ में नहीं आता। आप इस देश में हैं कोई भी पार्टी यह नहीं कहती कि मुसलमान अगर यहां से हट गए या समाप्त हो गए या चले गए तो इतने साइंटिस्ट चले जाएंगे, इतने फलासफर चले जाएंगे, इतने इंजीनियर चले जाएंगे, इस देश का नेजाम कैसे चलेगा, पत्रकारिता में इतने सक्षम लोग मौजूद हैं फिर ऐसे लोग पत्रकारिता में कहां मिलेंगे। कोई समूह आपकी उपयोगिता महसूस नहीं करता। केवल भाजपा ही नहीं कोई वर्ग आपकी उपयोगिता महसूस नहीं करता। जो आपका समर्थन करते हैं वे कहते हैं कि मुसलमान यहां के निवासी हैं उन्हें यहाँ रहने का दस्तूर ने अधिकार दिया है, इसलिए विदेशी समझकर उनसे बात नहीं किया जा सकता। कोई यह नहीं कहता कि उनके न रहने से देश का बड़ा नुकसान होगा। आपनें किसी भी कारण से यह स्थान प्राप्त नहीं किया। इसके कारण हैं, गौर कीजिए। हम सरकारों पर आरोप लगाते हैं, क्या अपने आप की भी हमें समीक्षा लेनी चाहिए। आप इस स्थिति में नहीं है कि देश यह समझे कि उनके जाने से क्या होगा? दो प्रतिशत यहूदियों के बारे में अमेरिका सोचता है लेकिन पंद्रह प्रतिशत आबादी के बारे में कोई नहीं सोचता है कि उनके जाने से हम सक्षम और गुणवान व्यक्तियों खो को देंगे? इस स्थिति में आप किसी से क्या बात करेंगे! जाहिर है कि यह एक लंबी योजना है जिसमें आप को सोचना होगा कि कैसे आप इस स्थिति में आएंगे कि लोग आपकी उपयोगिता महसूस करें। कभी कभी देश निर्माण और विकास में हम पहले के मुसलमानों की असाधारण कारनामों का उल्लेख करते हैं। कई तटस्थ लोग इससे सहमत भी व्यक्त करते हैं। लेकिन इस समय हमारा इतिहास चर्चा का विषय नहीं है। इससे हम मौजूदा दौर में अपनी उपयोगिता साबित नहीं कर सकते।

प्रत्येक मामले में हम जो भावुकता दिखाते हैं, यह सही नहीं है। बल्कि बहुत गंभीरता के साथ हमें अपने ऊपर विचार करना चाहिए। और अपनें आप को देश के लिए और पूरी दुनिया के लिए अच्छा इंसान साबित करना होगा।

एक बात यह निवेदन करना है कि हालात हर तरह के आते हैं। पहले भी आते रहे हैं, आगे भी आ सकते हैं, लेकिन नाजुक से नाजुक स्थिति में भी आप साहस और हिम्मत का प्रदर्शन करना होगा। यदि आप साहस और हिम्मत खो दी तो आप सफल नहीं हो सकते। साहस और हिम्मत से ही आप परिस्थितियों का मुकाबला कर सकते हैं। जंगे उहद में मुसलमानों की हार हुई, इसके बावजूद कुरआन ने कहा यानी दिल टूटे न हो कमजोरी न दिखाओ और गम न करो। तुम ही सरबुलंद रहोगे।(आले इमरान: 139) कुरआन नें उनकी कमज़ोरी को भी बताया जिसे आप सूरे आले इमरान में देखेंगे, लेकिन इसके साथ कहा कि हार से हिम्मत हारने और बद्दिल होने की जरूरत नहीं तुम ही सरबुलंद रहोगे अगर तुम्हारे अंदर इमान है, अगर खुदा में विश्वास है, उसकी ज़ात पर भरोसा है तो तुमहें कोई दबा नहीं सकता। तुम्हें हरा नहीं सकता। तुम सरबुलंद रहने के लिए आए हो और सरबुलंद रहोगे। कुरआन ने इस सिलसिले में कहा: यानी कि तुम्हारे विरोधी भी इससे पहले तुम्हारे हाथों (जंगे बद्र में) हार चुके हैं फिर भी वह हिम्मत हारकर नहीं बैठ गए और तुम्हारे विरुद्ध लामबंद हो गएl फिर तुम क्यों हिम्मत हार रहे हो और तरह तरह की चिंताओं से पीड़ित हो। इसका अर्थ यह है कि स्थिति का मुकाबला साहस और हिम्मत से ही करना होगा। अपने अंदर हौसला पैदा कीजिए कि हम इन परिस्थितियों में भी अपने विचार पर और अपने सिद्धांत पर कायम रहेंगे और दीन के जिस हिस्से का पालन कर सकते हैं उस पर अवश्य पालन कीजिये। आपको स्वतंत्रता है कि आप अल्लाह की बंदगी करें, नमाज़, रोज़ा, हज और ज़कात का एहतेमाम करें। यह इबादत आपको अल्लाह से करीब करती हैं, कठिनाइयों में अल्लाह के दीन पर दृढ़ता की भावना पैदा करती हैं। पर्सनल ला का चर्चा करते हैं उस पर अमल कीजिए। इसके खिलाफ कोई कानून मौजूद है, तो कानून उस पर काम करेगा जब कोई व्यक्ति इसका कार्यान्वयन चाहे। फर्ज़ कीजिए निकाह, तलाक, महर, खुला, विरासत और नान व नुफ़्क़ा के अहकाम पर आप अमल करते हैं तो कोई उस पर प्रतिबंध नहीं लगा सकता। बहरहाल दीन के जिस हिस्से पर आप अमल कर रहे हैं उस पर अमल कीजिए। और अल्लाह तआला से दुआ कीजिए कि जो बाधाएं हैं वे दूर हों। ऐ अल्लाह जिस हिस्से पर हम पालन कर सकते हैं, कर रहे हैं और जिस हिस्से पर हम अमल नहीं कर पा रहे हैं, इसमें तू हमारी मदद फ़रमा।

अब तो भाजपा के कई राज्यों में सरकार है। हमने देखा कि कर्नाटक में भाजपा की भी सरकार रही और इस समय कांग्रेस की सरकार है। कर्नाटक के मुसलमानों ने भाजपा के दौर में भी अपनी मिल्ली और दीनी सेवाएं जारी रखीं। हम यह सबक ले सकते हैं कि जो स्वतंत्रता आपको प्राप्त है इसमें आप रास्ते निकाल सकते हैं। दूसरी बात यह है कि अनुभव बताता है कि आप भाजपा से संपर्क स्थापित करें, उनसे बात करें और आपके कार्यों की उपयोगिता वे महसूस करें कि जो काम आप कर रहे हैं वह देश की भलाई का है तो उनके विरोध में कमी आएगी। इसका बड़ा अच्छा अनुभव महाराष्ट्र में जमाअत को हुआ है। आप जानते ही हैं वहाँ शिव सेना और भाजपा की सरकार है। शिव सेना तो भाजपा से अधिक कठोर है। लेकिन अमीर हल्का महाराष्ट्र का अनुभव है कि: '' जब हमनें बताया कि हमारे यह यह कार्यक्रम हैं उन्होंने इसकी उपयोगिता महसूस इसका समर्थन किया। कुछ कार्यक्रमों में उनकी भागीदारी भी रही। '' बजाय हम उनसे बिल्कुल अलग-थलग रहते हैं, उनसे बातचीत करें। यह बात भी आपके ध्यान में ताजा रहे कि इस देश में अपनी स्थिति दाई (दावत देने वाला) की है। आप एक दाई उम्मत हैं। इससे मुराद ये है कि आप अल्लाह के दीन की दावत देने वाले हैं। आपकी यह स्थिति बहरहाल बाकी रहनी चाहिए। दुश्मन हो या दोस्त सब तक अल्लाह का संदेश पहुंचाने की कोशिश कीजिये। इसके लिए रास्ते निकालिये। यह बताइए कि यह अल्लाह का धर्म है, हम उस पर अमल कर रहे हैं, आप भी इस पर गौर कीजिए। यह दुनिया और आखिरत की भलाई का स्रोत है, अन्यथा जाहिर है आप इस मामले में कोताह होंगे।

अंतिम बात यह है कि कुरआन से पता चलता है कि विषम परिस्थितियों में इंसान को अल्लाह से रुजुअ करना चाहिए। यह मोमिन की पहचान है। खेद है कि हम भौतिक उपाय के बारे में तो विचार करते हैं। इसमें हमारा मन खूब काम करता है। जब हम बात करते हैं तो राजनितिक दलों की तरह करते हैं। यह बात हमारे मन में नहीं आता कि जीवन के हर नाजुक चरण में अल्लाह की ओर जाना चाहिए। अल्लाह के बन्दों की पहचान यह बताई गई: '' यह अल्लाह के वे बंदे हैं कि जब उन्हें चोट पहुंचती है तो कहते हैं कि हम अल्लाह के हैं। हम अल्लाह की तरफ रुजुअ करते हैं। ''(अलबक़राः 156) यह बात हमारे जीवन में भी आनी चाहिए।

तुन्दी ए बड़े मुखालिफ से न घबरा ऐ उकाब

यह तो चलती है तुझे उंचा उड़ाने के लिए

विरोधी हवा चल ही रही है लेकिन हमें समझना चाहिए कि यह हमें उपर उठाएगी। अल्लाह से दुआ है कि वह मदद करे। और हमारे हालात में सुधार करे और हमारे अंदर सहमति व एकता उत्पन्न करे, और हमें एक मजबूत शक्ति बनने की तौफ़ीक़ अता फरमाए।

12 अप्रैल, 2017 स्रोत: रोज़नामा खबरें, नई दिल्ली

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