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Hindi Section ( 21 Jul 2017, NewAgeIslam.Com)

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Sufism and Humanity सूफीवाद और मानवता

 

मौलाना फ़य्याज़ अहमद मिस्बाही

5 दिसंबर, 2016

ऑल इंडिया उलेमा व  मशाईख बोर्ड के ज़रिये आयोजित '' सूफीवाद और मानवता '' सेमिनार अपनी तरह का पहला सेमिनार है जो डुबती हुई मानवता की नाव को बचाने के लिए सूफीवाद की शिक्षाओं और निर्देश को पेश कर रहा है ताकि मौजूदा दौर में सूफ़ी हज़रात की शिक्षाओं और उनके कार्यों की रोशनी में एक इंसान दूसरे इंसान को पहचान सके और वैश्विक संकट का अंत हो सके हम बोर्ड के सभी सदस्यों को सबसे पहले मुबारकबाद प्रदान करते हैं!

प्रिय दर्शकों! मोहसिने इंसानियत पैगंबर हज़रत मोहम्मद मुस्तफा सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की सीरत-ए-तैयबा के वो चमकदार पहलू जिनका ज्यादातर संबंध आपके अख़लाक़ व किरदार और आत्म शुद्धि व दिल की सफाई है उन्हीं को ही उपकार और व्यवहार और तसव्वुफ़ व तरीक़त कहा जाता है और नबी सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम के साथियों के बीच जिन के प्रथम नमूना असहाबे सुफ्फा थे, जिन्होंने कई दुनयवी चीजों से बेनियाज़ होकर मस्जिद नबवी के एक विशिष्ट भाग में ईबादत व रियाज़यत में व्यस्त होकर अपने दिन और रात गुज़ारने को ही अपना परिप्रेक्ष्य बना लिया था यूं तो सभी सहाबा रज़िअल्लाहु अन्हुम प्रत्येक दृष्टि से सीरते नबवी के पवित्र आत्मा और पवित्र ह्रदय और व्यापक शरीअत व सुन्नत थे और हर जीवन क्षेत्र में उनकी यह सारी व्यस्तताएं थीं, जबकि असहाबे सुफ्फा हर तरफ से कट कर मस्जिदे नबवी में खिलवत गुज़ीं हो गए थे तसव्वुफ़ व तरीकत का मुख्य उद्देश्य आत्म अनुभूति के साथ परमात्मा की अनुभूति है, उस खुदा की अनुभूति और पहचान के लिये ज्ञान के रूप में किताबे ईलाही और कर्म के रूप में जाते नबवी यह दो एसे प्रकाश हैं जिनके मार्गदर्शन में ही सीधे पथ पर गामज़न होकर अल्लाह पाक की बारगारह तक पहुंच हो सकती है और उसकी निकटता प्राप्त की जा सकती है।

 इस्लामी सुफीवाद का इम्तियाज यह है कि इस दुनिया में रहकर दुनिया से बे नियाज़ी का हुक्म देता है अहलो अयाल से रिश्ता ए उखुवत व मुहब्बत क़ायम रखते हुवे उनके अधिकार को अदा करनें का आदेश देता है उसी तरह हासिल करने की विशेष रूप से ताकीद करता है और आय प्राप्त करना व रिज्के हलाल व हलाल खाने और सिद्के मक़ाल की हेदायत देता है इन सारी स्थितियों में हुक्म इलाही की तकमील और रजाए इलाही की मांग इसका मुख्य उद्देश्य होता, यही कारण है कि इस्लामी सुफीवाद के धारक खुदा के बन्दों के बीच रहते हुए भी उनसे बेनियाज़ और अख्लाक़े आलम की ओर आकर्षित और उसके के फजल व एहसान के तालिब होते हैं। शरीर के दिखनें वाले कामों के बारे में कुरआन और सुन्नत से व्युत्पन्न गहरे ज्ञान को शब्दावली में ''न्यायशास्त्र (फ़िक्ह) '' कहते हैं और दिल छुपे हुवे कार्यों के बारे में कुरआन और सुन्नत से माखुज़ गहरे ज्ञान को शब्दावली में '' तसव्वुफ़ (सूफीवाद) '' कहते हैं। सूफीवाद के बारे में हदीसों, किताबुर्रेकाक़, किताबुल अखलाक़ में इन अध्यायों के तहत मिलती है: अलकिब्र, अस्सिवाउज्जन , अज्ज़ुल्म, अलबुख्ल, अलहिर्स, अत्तहरीर वात्तकल्लुफ़, अलहसद, अर्रियाअ आदि बुरे अखलाक़ हैं। और अल इखलास, अस्सिद्क़,अस्सब्र, अश्शुक्र, अल रज़ाउल केनाअ , हुस्नुल खल्क, अलहया,अल तवाजोउल हिल्म  , अल खौफ,अल फिरास आदि अच्छे आचरण हैं।

 लेकिन सूफियों की शब्दावली में इसका अर्थ है: अपने अंदर का शुद्धि करना, यानी अपनें नफ्स को नफ्सानी गंदगियों और ज़ाइल अखलाक़ से पाक व साफ करना और फज़ाईले अखलाक़ से सुरुचिपूर्ण करना और सूफ़ी ऐसे लोगों को कहा जाता है जो अपने ज़ाहिर (दिखनें वाले) से अधिक अपने बातिन (अंदर की) सफ़ाई पर ध्यान देते हैं और दूसरों को उसी की दावत (आमंत्रित करना) देते हैं और शब्द सूफ़ीया ऐसे लोगों के लिए इस्तेमाल होता है जो अपने अन्दर के शुद्धिकरण पर ध्यान देते हैं और अब यह शब्द ऐसे ही लोगों के लिये उपनाम का रूप साध चुका है लेकिन कहा जाता है कि शुरुआत में ऐसे लोगों का अक्सर वस्त्र सूफ यानी ऊन ही होता था इसलिए उन पर यह नाम पड़ गया हालांकि बाद में उनका यह वस्त्र नहीं रहा हदीस शरीफ की किताबों में एक हदीस '' हदीस जिब्रईल '' के नाम से प्रसिद्ध है, यह है कि एक दिन जिब्रईल अलैहिस्सलाम मनुष्य के रूप में नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की ख़िदमत में हाज़िर हुए और कुछ सवाल किए, उनमें से एक सवाल यह था कि: एहसान क्या है? आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने उत्तर इरशाद फ़रमाया कि एहसान है कि तुम अल्लाह पाक की पूजा इस तरह करो कि मानो तुम अल्लाह को देख रहे हो और अगर ऐसी स्थिति पैदा न हो कि तुम अल्लाह को नहीं देख पा रहे हो तो कम से कम यह विश्वास कर लो कि वह देख रहा है और बंदे के मन में इसी एहसान की स्थिति उत्पन्न करनें का सूफ़ीया की भाषा में दूसरा नाम तसव्वुफ़ (सूफीवाद) या सुलूक (व्यवहार) है।

सूफीवाद दरअसल बंदे के दिल में यही विश्वास और इख़लास पैदा करता हैl तसव्वुफ़ धर्म से अलग कोई चीज़ नहीं, बल्कि धर्म की आत्मा है। जिस तरह शरीर आत्मा के बिना मृत शरीर है, उसी तरह अल्लाह की पूजा बिना इख़लास के बेकदर व कीमत है। तसव्वुफ़ बंदे के दिल में अल्लाह तआला की जात की मुहब्बत पैदा करता है। और खुदा का प्रेम बंदे को मजबूर करता है कि वह खुदा की बनाई हुई चीजों के साथ प्यार करे, क्योंकि सूफी की नज़र में खुदा की रचना , खुदा का अयाल है। और किसी के अयाल के साथ भलाई अयाल दार के साथ भलाई गिनी जाती है ईश्वर का प्रेम बंदे को खुदा की अवज्ञा से रोकती है और बंदगाने खुदा का प्रेम बंदे को उनके अधिकार छीनने से रोकती है। इसलिए सूफ़ी हज़रात का जीवन अल्लाह और उसके बन्दों के अधिकार पूरी तरह निभाते हुए गुज़रती है ज़ाहिर है कि जो चीज़ इंसान को अल्लाह पाक का आज्ञाकारी बनाए और उस के बंदों का हितैषी बनाए इसके महत्व से इंकार नहीं किया जा सकता लोग आमतौर पर जब तसव्वुफ़ और सुफीइज्म पर बात करते हैं तो उन के मद्देनजर कुछ सूफ़ी और बुजुर्ग होते है जो अपनी जाति में बहुत नेक, खुदा तरस और मुत्तक़ी (अल्लाह से डरने वाले) होते हैं, खालिक़ (निर्माता) की याद में संलग्न रहने वाले और प्राणियों के लिये सरासर दयावान उन बुजुर्गों के बारे में लोग आमतौर पर प्यार और हुस्नें जन का संबंध रखते हैं इसलिए जब हम ईल्मे तसव्वुफ़ के बारे में कोई बात करते हैं तो हमारे मद्देनजर यह बुजुर्ग नहीं होते, बल्कि तसव्वुफ़ की वह परंपरा होती है जिसे कुरआन व सुन्नत के प्रकाश में परखना बहर हाल हमारी जिम्मेदारी है।

सूफीवादी मनुष्य की चेतना हर दौर में इस सवाल का जवाब खोजता रहा है कि इस ब्रह्मांड और इसके बनाने वाले से क्या संबंध है? इस सवाल का एक पूरा जवाब अल्लाह ने पहले ही दिन से इस रूप में मनुष्यों को दे दिया था कि उनके पिता और पहले इंसान हज़रत आदम अलैहिस्सलाम को एक नबी बनाकर भेजा गया और अल्लाह पाक की की प्रदत्त इस रहनुमाई की याद दिलाने के लिये प्रत्येक कौम और हर ज़माने में नबी और रसूल आते रहे। इस रहनुमाई में अल्लाह की ज़ात, गुण और उनसे संबंध की सही प्रकृति को पूरी तरह खोल कर बयान किया गया था ताकि समय बीतनें के साथ-साथ इंसान अंबिया ए किराम अलैहिमुस्सलाम की इस रहनुमाई को भूलता गया फरामोशी और लापरवाही के इस माहौल में आदमी ने अपने तौर पर इन सवालों का पता लगाना शुरू कर दिया जिन के उत्तर के लिए यह मार्गदर्शन प्रदान की गई इस खोज का एक रूप दार्शनिक विचारधारा के रूप में प्रकट हुआ। उन दार्शनिक विचारों ने विभिन्न रूप धारण कीं उनमें एक शक्ल वो थी जो धर्म से बहुत अधिक प्रभावित थी और इसमें तथ्यों की खोज बुद्धि के बजाए भीतर की आवाज और अंतर्ज्ञान के आधार पर की जाती थी। बुद्धि और वही (रहस्योद्घाटन) के बजाए भीतरी अनुभव, आध्यात्मिकता और अंतर्ज्ञान के आधार पर खुदा से सम्बन्ध का यह आंदोलन दुनिया के कमोबेश सभी धर्मों में उपस्थित रहा है। कुछ धर्मों मसलन बौद्ध मत का आधार ही आंतरिक अनुभव और अंतर्ज्ञान पर आधारित इस वैश्विक आंदोलन पर रखी गई है जब कि कुछ धर्मों में जो यहूदीयत और मसीहीयत जैसे ईब्राहीमी धर्म शामिल हैं इसकी एक स्थायी परंपरा मौजूद रही है इस्लाम जब अरब से निकलकर अजम पहुंचा तो नये मुस्लिमों के इस्लाम स्वीकार करनें के साथ-साथ यह विश्व परंपरा, मुस्लिम समाज में चुपचाप सराईत होने लगा था तो उस समय मशाईख उज्जाम, उलेमा और सूफ़ी हज़रात इस परंपरा को सूफीवाद या सूफीइज्म में प्रवेश होने से बचाया विवरण से यह स्पष्ट है कि सूफीवाद इस्लामी अवधारणा है और एक वैश्विक आंदोलन है जो इस्लाम और मुसलमानों की भलाई के साथ-साथ पूरी दुनिया के इंसानों की भलाई के बारे में पूरी तरह प्रयासरत रहती है और इस्लाम की उपस्थिति के बाद जब अन्य धर्मों के लोगों की बड़ी संख्या मुसलमान हुई तो उनके साथ सुफीवाद का यह आंदोलन मुसलमानों का क्षेत्र और विस्तृत होता गया और मुसलमानों के बड़े-बड़े उलेमा इससे प्रभावित हुए और उसे कुरान और हदीस से सुरुचिपूर्ण किए हालांकि यह बात अपनी जगह वास्तविकता पर आधारित है कि अइम्मा ए अहले तसव्वुफ़ जब शुद्ध ज्ञान शैली में अपने विचार बयान करना शुरू करते हैं तो साफ मालूम हो जाता है कि इन विचारों का नाता इस्लाम से पूरी तरह से है, सूफ़ी हज़रात अपनी शिक्षाओं में सबसे जिस पर ज़ोर देते हैं वह इश्क व मोहब्बते खुदावंदी है, क्योंकि प्रेम ही एक ऐसी चीज़ है जो प्रेमी को अपने प्रेमी की आज्ञाकारिता पर मजबूर करती है और उसकि अवज्ञा से रोकती है और मुहिब (प्रेम करने वाला) के दिल में महबूब (जिससे प्रेम किया जाए) की खुशी की खातिर हर मुसीबत और असुविधा ख़न्दा पेशानी (आसानी) से सहन करने की शक्ति और क्षमता पैदा करता है, और प्यार ही वह चीज है जो मुहिब (प्रेमी) को मजबूर करती है कि वह ऐसा काम करे जिससे महबूब राज़ी हो और हर प्रक्रिया और चरित्र से बाज़ रहे जिससे महबूब नाराज हो, तो सोफिया सज्जनों अगर ज़ाहिद, शील, पूजा, साधना और मुजाहेदे (तकलीफ सहन करना) करते हैं तो उनका उद्देश्य केवल और केवल अल्लाह की खुशी प्राप्त करना होता है।

वह स्वर्ग की लालच या नरक के भय से खुदाई उपासना नहीं करते तो हज़रत राबिया बसरिया अपनी एक प्रार्थना में फरमाती हैं: '' खुदाया! अगर मैं तेरी बंदगी स्वर्ग के लिये करती हूँ तो मुझे इससे वंचित रखना, अगर मैं नरक के भय से तेरी पूजा करती हूँ तो मुझे इसमें झोंक देना, लेकिन अगर मैं तेरी बंदगी तुझे पाने के लिए करती हूं तो मुझे स्वयं से वंचित न रखना '' (मकालाते औलिया) शेख शिबली तो यहां तक कहते हैं: ''(कशफ़ुल महजूब) सूफी दोनों दुनिया में अल्लाह तआला की हस्ती के अलावा और कुछ नहीं देखा' 'इमाम रब्बानी कहते हैं '' मुक़र्रबीनें बारगाहे इलाही यानी सूफ़ी हज़रात अगर स्वर्ग चाहते हैं तो इसलिए नहीं कि उनका उद्देश्य नफस की लज्ज़त है, बल्कि इसलिए कि वह अल्लाह के खुशी की जगह है, अगर वे आग से पनाह मांगते हैं तो इसलिए नहीं कि इसमें दुख और अलम है, बल्कि इसलिए कि वह अल्लाह के नाराज़गी की जगह है, अन्यथा उनके लिए पुरस्कार और रंज व अलम दोनों बराबर हैं। उनका मूल गंतव्य खुदा की राजा है, सूफ़ी हज़रात के नज़दीक पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का पालन और आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के उसवा ए हस्ना का पालन किए बिना अल्लाह की पहचान और मोक्ष की प्राप्ति असंभव है। इसलिए इमामे रब्बानी शेख अहमद सर हिंदी एक पत्र में लिखते हैं: '' इस नेअमते उज्मां अर्थात खुदा की पहचान तक पहुंचना सैय्यदुल अव्वलीन वल अखेरीन के अनुसरण से जुड़ा है, आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का अनुसरण किए बिना सफलता तथा मुक्ति असंभव है ' '

'ऐ सादी! यह असंभव है कि आँ हज़रत सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का पालन किए बिना खुदा की पहचान और दिल की सफाई प्राप्त हो सके। (''शेख अहमद सरहिन्दी: मकतुबात, मक्तूब 78, जिल्द अव्वल, पृष्ठ 279)  यही बात कुरान में अल्लाह तआला इस तरह इरशाद फरमाता है। अनुवाद: आप उन्हें बता दिजिए कि अगर तुम अल्लाह से प्यार करते हो तो मेरा पालन करो, परिणाम स्वरूप अल्लाह तुम्हें प्यार करेगा इसलिए अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का पालन करना ही अल्लाह का पालन है, इसलिए इरशाद बारी तआला है। अनुवाद '' जिस व्यक्ति ने खुदा के रसूल (दूत) का पालन किया उसने अल्लाह की आज्ञा का पालन किया। ''

 क्योंकि पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम जो कुछ बोलते हैं वह अल्लाह का बयान ही होता है, इसलिए इरशाद बारी है। अनुवाद '' अल्लाह के पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम अपनी इच्छाओं से नहीं बोलते, जो कुछ तुम्हें धर्म के बारे में दे रहे हैं वह वही ए इलाही (परमेश्वर वाणी) है, जो आपकी तरफ भेजी जाती है। '' इसलिए एक और आयत में इरशाद फ़रमाया अनुवाद '' जो कुछ अल्लाह के पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम तुम्हें दें वह ले लो और जिस से रोकें रुक जाओ। ' आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के इरशादात से मालूम होता है कि किसी व्यक्ति का तब तक ईमाने कामिल(अल्लाह पर पूर्ण विश्वास ) नहीं हो सकता जब तक वे अल्लाह के पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के साथ सब कुछ से अधिक प्यार न करे और अपनी सारी इच्छाएं पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के फरमान के अधीन न बना देl आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का इरशाद ग्रामी है। तुममें से कोई भी व्यक्ति तब तक मोमिन नहीं हो सकता जब तक कि वह अपने माता पिता बच्चों और सभी लोगों से अधिक मुझे महबूब न रखे। '' तुममें से कोई व्यक्ति तब तक मोमिन नहीं हो सकता जब तक कि उस की इच्छा मेरे लाए हुए दीन के अनुसार न हों '' सूफ़ी हज़रात जितने योद्धा, रियाज़ात और ईबादत करते हैं या उनका अपने मोअतकेदीन को शिक्षा देते हैं उनका मूल उद्देश्य नफ्स की शुद्धी और पवित्रता है तो एक सूफी संत फरमाते हैं कि हे मित्र! चाहे एक अक्षर 'अलिफ़' 'ही पढ़ लो, लेकिन अपने भीतर को शुद्ध व साफ कर लो, अगर अंदर का यह शुद्ध निस्पंदन नहीं करे तो अधिक पढ़ने और पन्नी संयुग्मन करने का कोई फायदा नहीं अब हम देखते हैं कि कुरान और सुन्नत क्या कहते हैं?

अल्लाह ने कुरान में हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम की एक प्रार्थना नकल की है। अनुवाद " ऐ हमारे रब! मेरी औलाद में से ही एक दूत भेजा, जो उन्हें तेरी आयतें पढ़कर सुनाए और उन्हें किताब और हिकमत की शिक्षा दे और उनके अंदर को शुद्ध करे। '' इब्राहीम अलैहिस्सलाम की दुआ से साफ़ है कि किसी नबी की बेसत तिलावते आयात और किताब की शिक्षा और ज्ञान का मूल उद्देश्य लोगों के अंदर शुद्धिकरण है। विचार किया जाए तो स्पष्ट होगा कि नबी ए पाक सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की बेसत का उद्देश्य शुद्धिकरण ही था क्योंकि तिलावते आयात व किताब की शिक्षा और ज्ञान का मूल उद्देश्य शुद्धिकरण ही है, क्योंकि अगर शिक्षा से दिल की सफाई और आत्मा की पवित्रता प्राप्त न हो तो पठन पाठन,अध्धयन व अध्यापन सब व्यर्थ है एक और स्थान पर इरशाद बारी है। अनुवाद: "दरअसल वह व्यक्ति सफल रहा जिसने अपने नफ्स को शुद्ध किया और वह असफल और नामुराद हो गया जिसने अपने नफ्स को मिट्टी आलूद कर दिया। '' सुफीवाद जिन गंदे अखलाक़ से अपने भीतर को शुद्ध करने की शिक्षा देता है। वे यह हैं। बद नियती, कृतघ्न, झूठ, वादा खिलाफी, विश्वासघात, बद्द्यानती, गीबत व चुगली, बोहतान, बदगोई और बदगुमानी, खुशामद और चापलूसी, कंजूसी और लालच, क्रूरता, गर्व, दिखावा व नमो नुमूद व हराम खोरी आदि। और जिन चीजों से अपने भीतर को संवारने की शिक्षा देता है, वे हैं: ईमानदारी वरअ व तक़वा, दयानत व अमानत, ईफ्फत व अस्मत, दया व करम, न्याय,मुआफ करना, नम्रता व विवेक, तवाज़ोअ व खाकसारी, उदारता और त्याग, खुश कलामी और स्वाभिमान, दृढ़ता और  इस्तेगना आदि जैसा कि हज़रत अबूल कासिम कशीरी की पुस्तक रिसाला ए  कशीरियह और शेख अली हजूरी की किताब कशफ़ुल महजूब और अबू नस्र की किताब किताबुल्लमअ से जाहिर है इसमें कोई शक नहीं कि कुरान व सुन्नत का ज्यादातर हिस्सा इन्हीं बुरे अखलाक़ से बचने और अच्छे अखलाक़ से अपने को सुरुचिपूर्ण करने की शिक्षा देता है और अगर केवल अरकानें अरबा चार महत्वपूर्ण पूजा, नमाज़, रोज़ा, ज़कात, और हज पर विचार किया जाए तो पता चलेगा कि कुरआन और सुन्नत ने उनका उद्देश्य आत्म शुद्धि व दिल की सफाई बताया है।

जिसका सूफ़ीया शिक्षा देते हैं और सूफ़ीया ए कराम का यह सिद्धांत है कि वह अपने और पराए, नेक और बुरे, अनुकूल और विरोधी सब के साथ सहन, सहिष्णुता और अच्छे आचरण का भाव रखते हैं और अपने मुअतकेदीन को भी इसी बात का शिक्षण दीते हैं, तो हज़रत बसरी के बारे में उल्लेख मिलता है कि: '' उन्हें कुछ लोगों ने बताया कि अमुक व्यक्ति आपका दोष निकाल रहा है, तो आपनें बजाय उस पर गुस्सा करने या बदला लेने के बतौर उपहार ताजा खजूरें भेजीं ''। जो लोग नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के खिलाफ षड्यंत्र करते थे और जाहिलाना व्यवहार से पेश आते थे अल्लाह ने आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को उनके साथ नर्मी करने, दरगुज़र करने, सहिष्णुता से पेश आने का आदेश देते हुए कहा। अनुवाद '' अफ़ो व दरगुज़र से काम लो, अच्छाई का आदेश देते रहो और उनकी जाहिलाना बातों से रुगार्दानीं करते रहो। ' सुल्ताने मशाईख हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया अलैहिर्रहमा फरमाते हैं कि: '' क़यामत के बाजार में कोई असबाब इतना मूल्यवान ना होगा जितना दिलों को राहत पहुंचाना। ' और इन हज़रात के यहां खल्क़ आज़ारी से बढ़कर कोई अपराध नहीं। आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने मानवजाति की सेवा पर उभारने के लिए विभिन्न तरीकों से प्रोत्साहित करते हुए एक मौके पर कहा: विधवाओं और अनाथों की मदद करने वाला अल्लाह के यहां ऐसा है जैसे अल्लाह के रास्ते में लड़ने वाला और यह भी कहा कि उसको वह इनाम मिलेगा जो सारी रात जाग कर इबादत करता हो और जो हमेशा रोज़े रखता हो। '' उक्त चर्चा से अंदाजा लगाया जा सकता है कि सूफीवाद और सूफ़ी हज़रात की शिक्षा दरअसल कुरआन और सुन्नत का सार और उसकी व्यावहारिक सूरत है और मानवता के लिए गारंटर है।

5 दिसंबर, 2016 सौजन्य: इंकलाब, नई दिल्ली

URL for Urdu article: http://newageislam.com/urdu-section/maulana-faiyyaz-ahmad-misbahi/sufism-and-humanity--صوفی-ازم-اور-انسانیت/d/109278

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