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Deobandi Barelvi Reconciliation: Need of the Time देवबंदी बरेलवी सुलह: समय की आवश्यकता

मौलाना डॉक्टर वारिस मजहरी

११ फरवरी, २०२१

इत्तेहादे उम्मत के हवाले से जहां वाज़ व नसीहत आवश्यक है, वहीँ गहरे विश्लेषण के साथ अमली तजावीज़ की अहमियत भी है। यह लेख उपमहाद्वीप के मुसलमानों की एक बड़ी और मुश्किल किस्म की गिरोह बंदी से संबंधित है, इसके कुछ बिंदु से मतभेद की गुंजाइश अवश्य है, तथापि इस रुख पर गौर और फ़िक्र और बहस की जरुरत से इनकार नहीं किया जा सकता। (इदारा)

उप महाद्वीप भारत के मुसलमानों को इस समय जो अहम चुनौती दरपेश हैं, उनमें मसलकी और नज़रीयाती मतभेद भी शामिल हैं, जिन्होंने इस्लामी इज्तेमाईयत को टुकड़ों मे बाँट दिया है। यहाँ के गंभीर इल्म व फ़िक्र वालों पर आधारित एक जमात हमेशा इसके लिए प्रयासरत रही है कि किसी भी तरह इन मतभेदों की शिद्दत को कम करने की कोशिश की जाए।

इस विषय के ताल्लुक से गौर व फ़िक्र का एक शीर्षक यह है कि क्या देवबंदी और बरेली के बीच पैदा होने वाले फासलों को कम करने की कोशिश की जा सकती है? इन दो जमातों को एक दुसरे से करीब किया जा सकता है? ऐसे समय में जब कि मुसलमान और गैर मुस्लिम, इस्लाम और मगरिब मुकालमे का गलगला है। सवाल यह है कि खुद अपने घर को दुरुस्त करने के लिए इस बात पर कोशिश क्यों नहीं की जा सकती? मेरे खयाल में ऐसी कोई भी मजबूत कोशिश हालिया इतिहास में भारत में नहीं की गई। दोनों जमातों के शिद्दत पसंद और तंग नज़र लोग ऐसी फ़िक्र व कोशिश को गैर इस्लामी करार देते हैं। क्योंकि ऐसे लोगों की निगाह में इन दोनों जमातों के बीच हक़ व बातिल का मतभेद है और ज़ाहिर है हक़ और बातिल में एकता संभव नहीं।

लेकिन हकीकत में यह एक पाकीज़ा उद्देश्य है जिसको बरुएकार लाने के लिए हर संभव कोशिश की जानी चाहिए। ऐसे दर्दमंद जमातों में मौजूद हैं जो सच्चे दिल से यह ख्वाहिश रखते हैं। पाकिस्तान में देवबंदी हलके के बड़े आली मौलाना रफ़ीअ उस्मानी (मुफ़्ती तकी उस्मानी साहब के भाई) और अहले सुन्नत की अहम शख्सियत मौलाना शफीअ ओकाणवी (मौलाना कोकब नुरानी साहब के मरहूम वालिद) ने इस ताल्लुक से अस्सी की दहाई में इस हवाले से साझा कोशिशों को आगे बढ़ाया था लेकिन मौलाना ओकाणवी की अचानक मृत्यु (१९८४) से यह कोशिश किसी नतीजे तक नहीं पहुँच सकी। मशहूर आलिमे दीन मौलाना अख़लाक़ हुसैन कासमी देहलवी (मृत्यु: २००९) ने अपनी मृत्यु से कुछ पहले एक रिसाला देवबंदी बरेलवी सुलह पर कलमबंद किया था और उसका एक नुस्खा मुझे भी भिजवाया था कि इस पर कुछ लिखो। इसमें उन्होंने दोनों जमातों के बीच मतभेद की खलीज को पाटने की पूरी नज्रियाती कोशिश की थी। लेकिन पुस्तिका की तश्हीर नहीं हो सकी या लोगों ने इसमें दिलचस्पी नहीं दिखाई।

इसमें कोई शक नहीं कि दोनों जमातों के बीच पाए जाने वाले कुछ मतभेद अहम और गैर मामूली प्रकृति के हैं, जैसे रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की बशरीयत, इल्मे गैब और रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के हाज़िर व नाज़िर होने के मसाइल। इसी तरह बुजुर्गों से इस्तिम्दाद (मदद मांगने) और तवस्सुल का मसला आदि। लेकिन हकीकत यह है कि अवाम के ज़हनों में इन मसाइल का जो तसव्वुर है, उसका उलेमा ए अहले सुन्नत (इस लेख में अहले सुन्नत से मुराद बरेलवी हैं, क्योंकि वह इसी नाम से प्रसिद्ध हैं) का तसव्वुर इसके उलट है। वह जिस तरह इन मसाइल की तशरीह करते हैं, उनके तनाजुर में मतभेद की प्रकृति इतनी शदीद नहीं रह जाती, जिसकी बुनियाद पर आपस में सफ आराई और एक दुसरे की तजलील व तफ्सीक की कोशिश की जाए। जैसे मौलाना अहमद रज़ा खान रहमतुल्लाह अलैह कहते हैं कि जो रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को बशर तसव्वुर ना करे वह मुसलमान नहीं। इस तरह उनकी नज़र में आपका बशर होना तो मुहक्कक है अलबत्ता उनकी नज़र में आप की बशरीयत आम बशरीयत से थोड़ा अलग है। इस तरह आप के नूर होने का तसव्वुर भी नुरे मुहम्मदी के उस तसव्वुर से लिया गया है जो मध्य युग से ले कर अब तक उलेमा व सुफिया की एक जमात के बीच मकबूल रहा है। कुछ रिवायात भी सुफिया के बीच इस बारे में मशहूर रही हैं।

तवस्सुल (वसीले) के मसले में खुद उलेमा ए देवबंद और सलफी उलेमा के बीच मतभेद है। मजमउल मलिक फहद, सऊदी अरब से मौलाना महमूद हसन देवबंदी रहमतुल्लाह अलैहि के तर्जुमे की इशाअत पर पाबंदी की बुनियादी वजूह में एक अहम वजह गालिबन यह भी रही है। इसी तरह देवबंदी अकाबिर की जो कुछ काबिले एतिराज़ इबारात हैं जिनमें मौलाना अशरफ अली थानवी की हिफजुल ईमान, मौलाना कासिम नानौतवी की तह्जीरुन्नास, मौलाना रशीद अहमद गंगोही की फतावा रशीदियाऔर मौलाना इस्माइल शहीद की तक्वियतुल ईमानकी इबारतें सबसे उपर हैं। या उनके मुकाबले में मौलाना अहमद रज़ा खान रहमतुल्लाह अलैह की फतावा रिजवियाकी इबारतें। इन इबारतों को उन बुजुर्गों के साथ ख़ास समझना चाहिए। यह क्या आवश्यक है कि हम उनसे सौ प्रतिशत इत्तेफाक ही कर लें। ऐसे किसी भी मामले में उन बुजुर्गों से मतभेद करना उनके सम्मान और अज़मते शान को कम नहीं करता। उनके बाद उर्स, कयाम, मिलाद आदि जैसे मसाइल आते हैं जो अब अहले सुन्नत (बरेलवी) की पहचान बन चुके हैं लेकिन ना तो उनकी शुरुआत अहले सुन्नत के दम से हुई और ना ही वह उनके साथ ख़ास हैं। अवाम और तसव्वुफ़ के रिवायती हलकों में उनकी रिवायत सदियों से चली आ रही है जो देबंदी और बरेलवी दोनों उलेमा की साझा संपत्ति रहे हैं। 19 वें सदी के अंत तक इन दोनों जमातों की बा जाब्ता नजरियाती तशकील से पहले उर्स व मिलाद की महफ़िलें आम थीं। तसव्वुफ़ की बुलंद शख्सियात का उन पर अमल था। खुद देवबंद के संस्थापकों के मुर्शिद और देवबंद के मर्जा व मुक्तदा जिन्हें बजा तौर पर सैयदुल ताइफा अर्थात सर गिरोहे उलेमा ए देवबंद कहा और समझा जाता है: हाजी इमदादुल्लाह मुहाजिर मक्की, वह ना केवल उर्स, कयाम और मिलाद आदि को रूहानियत के हुसूल का ज़रिया समझते थे बल्कि वह खुद भी ऐसा करते थे और उनके नजरियाती वकील भी थे। इन मसाइल पर उन्होंने फैसला हफ्त मसलालिखा। इसी तरह देवबंद के पहले मुहरिक आबिद हुसैन साहब भी ऐसे ही खुश अकीदा मुसलमानों में थे जो अहले सुन्नत के साथ मखसूस समझे जाने वाले आमाल अंजाम देते थे। इस बुनियाद पर अहले देवबंद में से कौन उन्हें बिदअती करार देने के लिए तैयार हो सकता है? खुद मौलाना थानवी रहमतुल्लाह अलैह उर्स के जवाज़ के कायल थे। उनका यह कौल उनकी किताब बवादर अल नूरमें मौजूद है।

मीलादुन्नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के जवाज़ के कायल उलेमा ए असलाफ में सब बड़ी बड़ी शख्सियात रही हैं और खुद उनके कलम से दर्जनों किताबें मौजूद हैं जैसे: इब्ने जौज़ी, जलालुद्दीन सयूती, हाफ़िज़ समसुद्दीन दमिश्की, मुल्ला अली कारी और इब्ने कसीर वगैरा) (यहाँ केवल कुछ मसाइल की तरफ मामूली इशारा मकसूद है। कोई बहस मकसूद नहीं है।)

असल में इन आमाल व नज़रियात के बजाए देवबंदियत व बरेलवियत की तशकील में अहम आमिल दूर रहे हैं। एक तक्वियतुल ईमानजिसमें कुछ अवामी नज़रियात और मज़ारों और खानकाहों के कुछ आमाल व मज़ाहिर के खिलाफ शदीद तरीन रवय्या इख्तियार किया गया है और तदरीज के उसूलों को नज़रंदाज़ करते हुए उन्हें बा जाब्ता शिर्क (शिर्के जली) करार दिया गया है। शाह वलीउल्लाह के यहाँ जो तौसीअ है और उनके वारिस उलेमा ए देवबंद जिस लचक के कायल हैं, हकीकत यह है कि हज़रत इस्माइल शहीद रहमतुल्लाह अलैह की जलालत कद्र के तमाम तर एहतिराम व एतेराफ के बावजूद हज़रत शहीद की यह शिद्दत और गैर मसलेहत बीनी इससे मेल नहीं खाती। इसका एहसास कुछ उलेमा ए देवबंद को भी रहा है जिनमें सरे फेहरिस्त अल्लामा अनवर शाह कश्मीरी और मौलाना हुसैन अहमद मदनी रहमतुल्लाह अलैह हैं। मौलाना कश्मीरी की फैजुल बारीमें उनका यह नुक्ता सामने आता है कि: तक्वियतुल ईमान में शिद्दत पसंदी का रवय्या किये जाने की वजह से इससे लोगों को अधिक फायदा नहीं पहुच सका। (फैजुल बारी, जिल्द १ पृष्ठ २५२ मकतबा देवबंद, २०१७) इसी क़बील की कौल मौलाना हुसैन अहमद मदनी से भी मनकुल है।

दुसरा अहम आमिल मौलाना अहमद रज़ा खान फाज़िले बरेलवी की तरफ से उलेमा ए देवबंद और नदवा के उलेमा के खिलाफ बिल तरतीब हुसामुल हरमैनऔर फतावा अल हरमैन बर्जफ़ नदवतुल मीनका लिखा जाना है। ख़ास तौर पर पहली किताब मौलाना कासिम नानौतवी, मौलाना रशीद अहमद गंगोही, मौलाना खलील अहमद सहारनपुरी और मौलाना अशरफ अली थानवी जैसे फाज़ेलीन व अबाकरा रोज़गार उलेमा की तकफीर के लिए लिखी गई, जिसकी तस्दीक के लिए उलेमा ए हरमैन की मदद भी हासिल की गई। फाज़िले बरेलवी का यह इकदाम ऐसा ही था कि उस पर वावेला हो। चीख पुकार मचे। ज़ाहिर है हरमैन की तलवार से उन अकाबिर शख्सियात का बे रहमी के साथ क़त्ल नागहानी ठंढे पेटों कौन बर्दाश्त कर सकता था? तथापि अब इस घटना पर एक सदी से अधिक का अरसा गुज़र चुका है। अब मुर्गे किबला नुमा के आशियाने में तड़पने का कुछ भी हासिल नहीं है। फाज़िले बरेलवी के ताल्लुक से यह वाकिया अहम है कि उन्होंने हज़रत इस्माइल शहीद रहमतुल्लाह अलैह में सत्तर वजुहे कुफ्र की निशानदही की लेकिन उन्हें बाजाब्ता काफिर नहीं ठहराया। लेकिन उलेमा ए देवबंद के ताल्लुक से यह एहतियात ना बरती जा सकी, जिसकी वजह से गालिबन दीनी से ज़्यादा सियासी थी और इसमें मुआसराना चश्मक को भी दखल था।

मसाइल व नज़रियात से हट कर अब यह शिनाख्त का मसला बन चुका है। मन व तू की तफरीकी शिनाख्त को बरकरार रखने की दो तरफा कोशिशों ने इसमें वह शिद्दत पैदा कर दी है कि आपसी इत्तेहाद व सुलह की कोशिशें जुए शेर लाने की तरह महसूस होती हैं।

बहर हाल अतीत के बुजुर्गों के अपने इज्तिहाद और अपनी फ़िक्र थी। जरूरी नहीं कि हम उनकी फ़िक्र व इज्तिहाद की हर शक पर ईमान लाएं और उसे अपने ईमान की असासात और जुज़ियात करार दें। उन हज़रात की फ़िक्र व नज़र की तशकील में दूसरी चीजों के अलावा मुख्तलिफ ज़मानी व मकानी अवामिल थे। जिसका मुताला उषा सानियाल की किताब: Devotional Islam and Politics in British India: Ahmad Riza Khan Barelwi and His Movements ,1870-1920 by Usha Sanyal, में किया जा सकता है। (इसका अनुवाद मेरी कलम से: बरतानवी हिन्दुस्तान में अकीदत पर मबनी इस्लाम और सियासत: आला हज़रात मौलाना अहमद रज़ा खान और उनकी तहरीक १८७०-१९२०, के शीर्षक से प्रकाशित हो चुका है। नाशिर, ग्लोबल मीडिया पब्लिकेशन्स, नई दिल्ली) वरना ऐसे ही नज़रियात व मज़ाहिर दुनिया के दुसरे क्षेत्रों में भी पाए जाते हैं और अब भी मौजूद हैं लेकिन इस बुनियाद पर वहाँ मिल्लत की ऐसी मस्लकी व जमाती तकसीम अमल में नहीं आई। बुजुर्गों के मतभेद को उनके इज्तिहादात का नतीजा समझते हुए नई नस्ल को आगे बढ़ कर वहदते मिल्ली के लिए कोशां होना चाहिए और इसकी दिवार में माज़ी में पड़ने वाले शिगाफों को भरने की कोशिश करनी चाहिए। प्रश्न यह है कि हम कब तक केवल लफ्ज़ी साथ पर अल्लाह की रस्सी को मजबूत पकड़ने और बुन्यानुन मरसूस (मजबूत असास) बनने का कौम से मुतालबा करते रहेंगे। जब कि हम खुद एक कदम उस राह पर चलने के लिए तैयार ना हों।

ज़रा गौर कीजिये कहा जाता है कि जिस वक्त शाह बाबुल बख्त नसर ने इस्राइल पर हमला कर के उसकी इंट से इंट बजा दी और यहूदी कौम को तह व बाला कर दिया उस वक्त इस कौम के फुकहा (फरिसीन) के यहाँ इस तरह के विषयों पर मुनाजरे हो रहे थे कि दाढ़ी की फ़ज़ीलत के ताल्लुक से एक दाढ़ी के एक बाल पर कितने फरिश्ते बैठ सकते हैं? जब मोहम्मद अल फातेह ने कुस्तुन्तुनिया पर हमला किया तो उस वक्त ईसाईयों के बीच मुनाजरे की मजलिस ऐसी बहसों से गर्म थीं कि हज़रत मसीह ने इशा ए रब्बानी में जो रोटी खाई थी वह खमीरी थी या फितरी? और 19 सदी में अंग्रेजी इस्तेमार मुस्लिम हुकूमत के मलबे पर अपनी हुकूमत कायम कर रहा था तो उस वक्त इम्काने किज्ब (खुदा झूट बोल सकता है या नहीं?) और इम्काने नजीर (खुदा मोहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम जैसी दूसरी शख्सियत को पैदा कर सकता है या नहीं) जैसी गैर जरूरी और ला हासिल बहसों पर हमारे फ़ाज़िल उलेमा सर धुन रहे थे। हम समझ सकते हैं कि ऐन मिल्लत की तामीर और दिफ़ाअ के वक्त में हम ने किस तरह बेतीशा ही अपनी मिल्ली व इज्तिमाई दिवार को ढाने की कोशिश की।

अहम सवाल यह है कि हमें किस तरह इस आपसी सुलह के अमल को आगे बढ़ाने की कोशिश करनी चाहिए? इसके लिए हमें कौन सा तरीका इख्तियार करने की जरूरत है? पहली बात तो यह है कि सबसे पहले हम एक दुसरे को विशेष रूप से काफिर और बिदअती करार देने से बाज़ आएं। एक शख्स का बिदअती करार दिया जाना तो उतना खतरनाक नहीं है क्योंकि बहर हाल वह ऐसे शख्स की निगाह में एक गुनाहगार मुसलमान तो रहता ही है। निहायत खतरे और अफ़सोस की बात यह है कि किसी फर्द या जमात को काफिर करार दे कर सिरे से उसे इस्लाम के दायरे से ही खारिज करार दे दिया जाए। दुसरे मसलक के किसी फर्द का जनाज़ा पढ़ा देने या पढ़ देने की बिना पर संबंधित शख्स को गैर मुस्लिम करार दे कर उनके निकाह को बातिल और उनकी बीवी को उन पर हराम करार दिया जाए। अगर बात यहाँ तक पहुच जाए तो बेशक इससे बहुत बड़े फितने का दरवाज़ा खुल जाता है।

दूसरी अहम बात यह है कि इफ्हाम व तफ्हीम  और संजीदा इल्मी बहस के दरवाजों को खुला रखने के साथ यह आवश्यक है कि रद्द व तन्कीस के मुनाजराना अमल के दरवाजों को बिलकुल बंद करने की जानिबैन की तरफ से कोशिश की जाएं। फरीकैन के कायदाना रोल रखने वाले अहले इल्म व फ़िक्र इसमें अहम किरदार निभा सकते हैं।

क्या ही बेहतर हो अगर इस मकसद के लिए बाजाब्ता एक फोरम या किसी इस्लामी तंजीम की तरफ से कोई प्रोग्राम वजूद में आए जिसमें दोनों जमातों के संजीदा अहले फ़िक्र शामिल हों और इसका एक मुस्तकिल लाए अमल तैयार किया जाए। मैं सुन्नी जमात के ऐसे कई उलेमा से वाकिफ हूँ जो इसकी शदीद ख्वाहिश रखते हैं। भारत के मौजूदा हालात, ख़ास तौर पर, इन्तिहाई शिद्दत के साथ इसके मुतकाज़ी हैं। इस प्रोग्राम के तहत मुनाज़ेराना के बजाए मुफाहेमाना लिट्रेचर की इशाअत अमल में आए। इस सिलसिले में  अहम किरदार मुल्क की बड़ी खानकाहों की अहम शख्सियात अदा कर सकती हैं। यह बीच की कड़ी बन सकती हैं। क्योंकि हकीकत में उनमें से बड़ी संख्या किसी एक मसलक से जुड़े और विशिष्ट नहीं है।

यह कुछ बातें दिले दर्दमंद और फिकरे अरजुमंद रखने वाले असहाबे इल्म व अमल को इस विषय की तरफ मुतवज्जो करने के लिए लिखी गई हैं। इसका उद्देश्य किसी नज़रियाती बहस का आगाज़ करना नहीं है। इसीलिए नज़रियात पर कोई बात नहीं की गई है। दोनों हलकों की तरफ से इस मौजुअ पर इतनी किताबें लिखी जा चुकी हैं और इसका इतना बड़ा जखीरा तैयार हो चुका है कि मेरे खयाल में अब नज़रियाती बहस के हवाले से उनमें कोई इज़ाफा नहीं किया जा सकता। अल्लाह से दुआ है कि वह हमारी इत्तेहादे उम्मत की कोशिशों को कुबूल फरमाए। आमीन।

११ फरवरी, २०२१, बशुक्रिया: न्यूज़ डॉट नेट दावत

URL for Urdu article: https://www.newageislam.com/urdu-section/maulana-dr-waris-mazhari/deobandi-barelvi-reconciliation-need-of-the-time-دیوبندی-بریلوی-مفاہمت-وقت-کا-اہم-تقاضا/d/124271

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