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Hindi Section ( 8 Feb 2017, NewAgeIslam.Com)

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Every Good Deed is Valued near Allah हर अच्छा काम अल्लाह के नजदीक मूल्यवान है




मौलाना असरारुल हक कासमी

5 जनवरी, 2017

कुरआन और हदीस में फ़राइज़ और वाजिबात के अलावा बहुत सारे उन मामलों की पहचान की गई है जो अच्छे कर्म हैं और उनके लिए अल्लाह तबारक व तआला इनाम से सम्मानित करता है। लेकिन इस बारे में एक बात ध्यान में रखनी चाहिए कि कुरआन एक नियम पुस्तिका है और उसमें अधिकतर नियम बताए गए हैं, इसलिए विभिन्न स्थानों पर इरशाद हुआ है कि '' तुम जो भी माल (अल्लाह के रास्ते में) ख़र्च करोगे अल्लाह को उस का ज्ञान है। '' (सुरह अल बक़रा) या यह कि '' अगर किसी ने तनिक भी ख़ैर का काम किया होगा तो वह उसे देखेगा '' (सुरह अल ज़िल्ज़ाल ) अर्थात उसे उसका बदला दिया जाएगा। या यह कि '' अगर किसी ने अच्छा कर्म किया तो उसने अपने लिए और जो कोई बुरा कर्म किया तो उसने अपने लिए किया '' (सुरह फुस्सिलत) अल्लामा इब्ने कसीर रहमतुल्लाह अलैहि इसकी व्याख्या करते हुए लिखते हैं: अर्थात जिसने कोई अच्छा काम किया तो उसका लाभ उसी को होगा, जबकि अगर किसी ने बुरा काम किया तो उसका वबाल भी उसी को होगा। इसी आयत में आगे अल्लाह तआला फरमाता है '' और तेरा रब बन्दों पर ज़ुल्म करने वाला नहीं है। '' इसका मतलब यह है कि अल्लाह किसी भी बंदे को बेवजह सजा या अज़ाब नहीं देगा, इसी तरह इसका मतलब यह भी है कि अल्लाह किसी बंदे की भलाई दूसरे के खाते में नहीं डालेगा, जो कर्म जिसने किया उसी का उसको बदला मिलेगा। इन पवित्र आयतों से सैद्धांतिक रूप से जो बातें मालूम होती हैं वो ये हैं कि अच्छाई का काम कोई एक नहीं है इसकी कई शाखाएं और जेहतें हैं, इस के अलावा यह भी पता होता है कि बड़ा से बड़ा और छोटा से छोटा हर तरह का नेक कर्म अल्लाह के यहाँ इनाम के दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है और हर बंदे को उसके किए हुए कर्म का इनाम पूरा पूरा मिलेगा।

इस्लाम ने अपने मानने वालों का प्रशिक्षण ऐसा किया है कि वह अच्छे कर्मों के खुद भी आदी हो जाएं और समाज में इसे फैलाने का भी कारण बनें। यही कारण है कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम अपने साथियों को ऐसे कामों पर उभारने के लिए खुद भी इन कार्यों में बढ़ चढ़ कर हिस्सा लेते थे और उन्हें हिदायत करते थे। कभी कभी उन्हें रग़बत के लिए पिछले कौमों के नेक लोगों के किस्से भी सुनाते थे। सहाबा रज़िअल्लाहु अन्हुम भी समय समय पर आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से पूछा करते थे कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम! कौन सा कर्म अल्लाह के नज़दीक इनाम वाला और अच्छा है और अवसर के हिसाब से प्यारे पैगम्बर उन्हें अलग जवाब दिया करते थे। इसलिए एक मुत्तफक अलैह हदीस में हज़रत अबुज़र रजिअल्लाहू अन्हु से रिवायत है, वह कहते हैं कि मैंनें पैगम्बरे इस्लाम सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से पूछा '' ऐ अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम! कौन सा कर्म बेहतर है? '' तो आपने जवाब दिया: '' अल्लाह पर ईमान लाना और उसके रास्ते में जिहाद करना''। हम लोग चूँकि मुस्लिम परिवार में पैदा हुए और इस्लाम हमें मानो विरासत में मिला है इसलिए उसकी महत्व इतनी अच्छी तरह हमें समझ नहीं आएगी। लेकिन गौर कीजिए कि एक ऐसा समाज है जहाँ सभी लोग अल्लाह की एकता का इनकार करते हों और इस के साथ कई अन्य चीजों को साझा करते हों और वहाँ एक देवता को मानने की कोई कल्पना भी न हो, तो ऐसे समाज में रहते हुए पहले तो ईमान के महत्व का एहसास करने के लिए और फिर एक खुदा को मानना और उस की घोषणा करना कितना कठिनाई भरा काम होगा।

इस संबंध में हमारे लिये पहली सदी के मुसलमानों के उदाहरण काफी होने चाहियें कि इस्लाम के शुरुआती दौर में जब अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने इस्लाम की दावत देना शुरू किया और जब सहाबा रज़ि अल्लाहू अन्हुम ने आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की रिसालत पर ईमान लाने का फैसला किया तो उन्हें कितनी जोखिम उठानी पड़ी, वह अपने ही घर, समाज और शहर में अजनबी बना दिए गए, उन्हें तरह तरह की तकलीफें दी गईं और नौबत यहां तक पहुंच गई कि उन्हें अपना प्रिय मातृभूमि तक छोड़ना पड़ा। ऐसे माहौल में यकीनन ईमान लाना बेहतरीन कर्म होगा। इसके कुछ नमूने तो हमारे ज़माने में भी सामने आते रहते हैं, हम देखते हैं या समाचार के माध्यम से पता चलता है कि जब कोई नेक बख्त इंसान अल्लाह की तौफ़ीक़ से इस्लाम के दामन में पनाह लेता है तो उसके लिए भारी परेशानियां खड़ी हो जाती हैं। सबसे पहले तो उसे अपने घर और परिवार से अलग होना पड़ता है, इस स्तर से निकलने के बाद तो आज के दौर में कई कानूनी परेशानियां आती हैं, लेकिन जो लोग पूरे होश के साथ और इस्लाम के महत्व व सत्यता को समझ कर उसके आगोश में शरण लेते हैं वे इन सभी परिस्थितियों का मुकाबला करते हुए अपने धर्म पर कायम हैं, ऐसे में यकीनन ईमान लाना बेहतर कार्यों की सूची में नंबर एक पर होना चाहिए। हदीसे पाक में दूसरा बेहतर कर्म अल्लाह के रास्ते में जिहाद को बतला दिया गया है। यह इस्लाम के प्रथम ज़माने के अनुसार किताल का अर्थ है कि उस समय मुसलमानों के खिलाफ मक्का के काफिर न केवल आंतरिक और बाहरी षड्यंत्र में व्यस्त थे बल्की इसके साथ ही वे इस कोशिश में रहते थे कि अगर मुसलमान अपनी आदत से बाज नहीं आऐ तो उन्हें तलवार के जोर पर पसत किया जाए और इस्लाम को (नऊज़ोबिल्लाह) खत्म कर दिया जाए। ऐसे माहौल में लोगों में दृढ़ता की भावना पैदा करने के लिए कहना आवश्यक था कि अल्लाह के रास्ते में लड़ना भी एक बेहतर कर्म है। फिर हालात और अवसरों के हिसाब से यह अमल क़यामत तक के विभिन्न अवधियों में बेहतर होगा।

 अगर मुसलमानों के साथ दुनिया के किसी भी क्षेत्र में ऐसी स्थिति पैदा हो जाए कि इस्लाम असत्य की चपेट में हो और इस्लाम दुश्मन ताकतें मुसलमानों को मिटाने के लिए जंग पर उतारू हों तो उस समय उनसे मुकाबला करना बेहतर कर्म होगा। जिहाद का एक और मतलब जो हदीसों से ही साबित हो रहा है, यह है कि हम अपने नफ्स और आत्मा की बुराइयों से लड़ें और अपने आप को इस्लाम के आदेशों व शिष्टाचार का आदी बनाने की कोशिश करें। बल्कि एक हदीस में तो अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने स्वयं से लड़ने [यानी खुद को बुरे से दूर रखने] को जिहादे अकबर करार दिया है यानी यह सबसे बड़ा जिहाद है कि आदमी खुद को काबू में रखे और मार्ग से न भटकने दे। आगे हज़रत अबुज़र रज़िअल्लाहु अन्हु हुजुर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से पूछते हैं, '' कौन सा गुलाम मुक्त करना बेहतर है? '' तो इसके उत्तर में अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम फरमाते हैं '' जो ग़ुलाम अपने स्वामी की दृष्टि में सबसे अधिक परिष्कृत हो और जो मूल्य में भी सबसे अधिक हो '' इससे यह शिक्षा दी गई कि अल्लाह के रास्ते में उत्कृष्ट और परिष्कृत और कीमती चीज़ खर्च करनी चाहिये, जैसा कि एक मौके पर अल्लाह तआला फरमाता है कि '' तुम भलाई को नहीं पा सकते जब तक कि तुम अपनी पसंदीदा चीज खर्च ना करो'' (सुरह आले इमरान) लेकिन हर आदमी की तो इतनी सामर्थ्य नहीं कि वह एक उत्कृष्ट, परिष्कृत और कीमती गुलाम खरीद कर मुक्त कर सके हज़रत अबुज़र रज़िअल्लाहु अन्हु के मन में भी यह ख्याल आया तो उन्होंने पूछा '' यदि मैं ऐसा न कर सकूं तो? '' तो आपने फ़रमाया फिर किसी काम करने वाले इंसान की मदद करो या किसी लाचार के लिए काम करो '' इसमें दो बातें बयान की गई हैं। एक तो यह कि कोई व्यक्ति अपने बाल बच्चों और घर परिवार के लिए मेहनत करके रोजी कमाने की कोशिश कर रहा हो लेकिन वह इसके लिए पर्याप्त नहीं हो रहा तो उसका हाथ बटाइये, इसके काम में आप मदद कीजिये ताकि वह इतना कमा सके कि उसका घर बार चल सके।

दूसरी बात यह है कि एक व्यक्ति ऐसा है जो कोई काम नहीं जानता या वे किसी ऐसे शारीरिक परेशानी से दो चार हैं जिसकी वजह से उससे कोई काम नहीं हो पा रहा है, तो आप अपनी तरफ से मेहनत करके या मॉल के माध्यम से उसके लिए रोज़ी का प्रबंधन दीजिए। इसके बाद भी हज़रत अबुज़र राज़िअल्लाहु अन्हु ने एक सवाल किया, पूछा ''अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम! अगर कोई काम न कर सकूँ तो? '' तो आपने जवाब दिया '' फिर तुम अपनी ओर से किसी को चोट न पहुंचने दो, यह तुम्हारे लिए अपने आप पर दान है।''  इस हिस्से में अच्छाई और नेकी की अंतिम सीमा बता दी गई है कि अगर आपके अंदर इतनी भी ताकत नहीं है कि किसी जरूरत वाले की जरूरत में काम आ सकें तो फिर कम से कम अपने आप को ऐसा बनाइए कि किसी को आपसे तकलीफ न पहुंचे, कोई ऐसा काम मत कीजिए जो किसी की तकलीफ का कारण हो और आप की इस अमल को भी अल्लाह के यहाँ सदके की सूची में लिखा जाएगा।

इस हदीस पाक से पता चला कि इस्लाम ने अच्छे काम का दायरा सीमित नहीं रखा है बल्कि वह स्थिति और मानव शक्ति और सामर्थ्य के हिसाब से फैला हुवा है और जो भी उनमें से कोई कर्म करेगा तो वह अल्लाह के यहाँ पुरस्कृत होगा। इससे एक बात और समझ में आती है कि हम अगर कोई बड़ा और महत्वपूर्ण काम कर रहे हैं और अन्य लोग नहीं कर रहे हैं या वे किसी अन्य अमल से जुड़े हैं तो उनसे घृणा नहीं की जा सकती, यह नहीं कहा जा सकता कि उनके कर्म का कोई महत्व नहीं या कि उसे कोई इनाम नहीं मिलेगा। जैसा कि आजकल देखने में आता है कि अगर कुछ लोग धार्मिक शिक्षा एवं प्रकाशन में संलग्न हैं तो दूसरे क्षेत्र के काम को इतनी अहमियत नहीं देते या कई दावते तबलीग़ के भाई आलिमों और छात्रों को निचले स्तर का मानते हैं या इसी तरह अगर कोई व्यक्ति धनी है और अपने माल के माध्यम से कई लोगों और संस्थाओं की मदद करता है तो वह अन्य लोगों को हिकारत की निगाह से देखता है। इसके अलावा व्यक्तिगत और सामाजिक जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में हम सबसे पहले तो भलाई के कामों से जी चुराते हैं या अगर करते हैं तो साथ ही न करने वालों को ताना देना या उन्हें नीचा समझना भी हमारी आदत हो चुकी है। हमें नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के निर्देश को ध्यान में रखना चाहिए कि आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने कैसे मानव प्रकृति और उसके विस्तार और क्षमता को ध्यान में रखते हुए भरपूर गुंजाइश रखी और यहां तक कहा कि यदि कोई बड़ा या छोटा अच्छा काम कर सकने की स्थिति में नहीं हैं, तो कम से कम खुद से किसी को चोट न पहुंचनें दें और इसे भी दान बताया। तो साबित हुआ कि अल्लाह के पास कोई भी अमल तुच्छ और छोटा नहीं है और हमें कोशिश करनी चाहिए कि ईमानदारी और अल्लाह के लिए अपने ताकत के अनुसार अच्छे कर्म करते रहें ताकि दुनिया और आखिरत में हमें उनका अच्छा से अच्छा बदला मिल सके।

5 जनवरी, 2017 सौजन्य: रोजनामा अखबारे मशरिक़, नई दिल्ली

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