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Vivekananda Envisioned The Union Of Vedanta Intellect And Islamic Form For India विवेकानंद वेदांत दिमाग और इस्लामी जिस्म के इत्तेहाद के कायल थे


मौलाना अब्दुल हमीद नोमानी

२२ जनवरी, २०१३

19 वीं सदी ईसवी केवल भारत में ही नहीं, बल्कि आलमी साथ पर महत्वपूर्ण और कई हवाले से एतेहासिक सदी है। इसमें ऐसी शख्सियात पैदा हुईं, जिन्होंने वक्त को सिम्त और रफ़्तार देने और उसके धारे को मोड़ने का काम किया है। विवेकानंद, जो विवेक (अक्ल व शऊर) और आनंद (इत्मीनान व सुरूर) का एक बेहतर नमूना थे, इसी उन्नीसवीं सदी में १८६३ ई० को पैदा हुए थे, उनके आगे पीछे इसी सदी में कई एतेहासिक व इंकलाबी शख्सियात की पैदाइश और तहरीकों का आगाज़ हुआ और अंजाम व इख्तिताम भी। कई ऐसी शख्सियात और उनकी जारी करदा तहरीकात भी जो वजूद में तो १८ वीं सदी में आईं, लेकिन उन्हें शिनाख्त 19 वीं सदी में मिली।

और उनके उरूज ज़वाल की सदी भी यही 19 वीं सदी है। एक नज़र निम्न शख्सियात, इदारे और तहरीक पर डालें: हज़रात शाह अब्दुल अज़ीज़ १७४६-१८२४, शाह मोहम्मद इसहाक १७८२-१८४६, बहादुर शाह ज़फर १७७५-१८६२, सैयद अहमद बरेलवी १७८६ ई०, शाह इस्माइल शहीद १७७९-१८३१, फज़ल हक़ खैराबादी १७९७-१८६१, सर सैयद १८१७-१८९८,इमाम मोहम्मद कासिम नानौतवी १८३२-१८८०, इमाम रशीद अहमद गंगोही १८२९-१९०५, मज़हर नानौतवी १८८५-१८२१, मौलाना सैयद नजीर हुसैन १९०२-१८०५, मौलाना रहमतुल्लाह कैरानवी १८१३-१८९१, हाजी इमदादुल्लाह १८१८-१८९९, शैखुल हिन्द मौलाना महमूद हसन १८५१-१९२०, मौलाना अहमद रज़ा १८५६-१९२१, मौलाना शिबली १८५७-१९१४, हकीमुल उम्मत मौलाना अशरफ अली थानवी १८६३-१९४३, मौलाना उबैदुल्लाह सिंधी १८७४-१९४४, अल्लामा इकबाल १८७७-१९३८, शैखुल इस्लाम मौलाना हुसैन अहमद मदनी १८७९-१९५७, हकीम अजमल खान १८६४-१९२७, नवाब वाकारुल मलिक १८४१-१९१७, मौलाना मोहम्मद अली जौहर १८७८-१९३७, मौलाना आज़ाद १८८८-१९५८, मौलाना बरकतुल्लाह १८६२-१९२७, डॉक्टर मुख्तार अहमद अंसारी १८८०-१९३६, मौलाना अब्दुल बारी फिरंगी महली १८७८-१९२६, मुफ्ती किफायतुल्लाह १८७५-१९५२, मौलाना शौकत अली १८७३-१९३३, डॉक्टर सैफुद्दीन किचलू १८८८-१९६३, मौलाना अबुल मुहासिन सज्जाद बिहारी १८८१-१९४०, अल्लामा सैयद सुलेमान नदवी १८८४-१९५३, अल्लामा शब्बीर अहमद उस्मानी १८८५-१९४९, अल्लामा अनवर शाह कश्मीरी १८७५-१९३३, मौलाना सैयद मोहम्मद अली मुंगेरी नाज़िमे अव्वल नदवतुल उलेमा लखनऊ १८४६-१९२७, मोहम्मद अली जिनाह १८७६-१९४८, ख्वाजा हसन निज़ामी १८७९-१९५५, गांधी जी १८६९-१९४८, सह्बानुल हिन्द मौलाना अहमद सईद देहलवी १८८८-१९५९, मौलाना नुरुद्दीन बिहारी १८९७-१९३२, मौलाना अताउल्लाह शाह बुखारी १८८१-१९६१, शैखुत्तफ्सीर मौलाना अहमद अली लाहौरी १८८६-१९६२, रईसुल अहरार मौलाना हबीबुर्रहमान लुधियानवी १८९२-१९५६,। इदारों के ताल्लुक से देखें तो दारुल उलूम देवबंद, मज़ाहिर उलूम सहारनपुर १८६६ ई०, अलीगढ़ १८७५, दारुल उलूम नदवतुल उलेमा लखनऊ १८९२।

विवेकानंद

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यहाँ तक कि व्यक्तित्व, संस्था, आन्दोलन, हर लिहाज़ से 19 वीं शताब्दी अहम शताब्दी है। स्वामी विवेकानंद की पैदाइश और अमल की सदी भी यही है, उनकी वफात का सन १९०२ है, जो मौलाना सैयद नजीर हुसैन का मृत्यु का साल है, जबकि मौलाना अशरफ अली की पैदाइश का सन और विवेकानंद की पैदाइश का सन एक ही है। यह और बात कि राष्ट्रीय स्तर पर जिस तरह विवेकानंद को याद किया जा रहा है, सरकारी और गैर सरकारी स्तर पर और मीडिया में ध्यान व तवज्जोह मिली, वैसा मजकुरा शख्सियात, इदारों और तहरीकों में से गांधी जी जैसी शख्सियात के अपवाद के साथ किसी को वह तवज्जोह नहीं मिली है।

पिछले कुछ दिनों से अज़ीम बतले हुर्रियत मौलाना महमूद हसन देवबंदी रहमतुल्लाह अलैह और शैखुल इस्लाम मौलाना हुसैन अहमद मदनी रहमतुल्लाह अलैह के नाम पर डाक टिकट जारी कर के मरकज़ी सरकार ने थोड़ी तवज्जोह दे कर तलाफी की कोशिश की है, हालांकि जो तवज्जोह और जगह सरकार एयर मीडिया में स्वामी विवेकानंद को मिली है, वैसी दूसरों को, विशेषतः मुस्लिम व्यक्तियों व तहरीकों और इदारों को नहीं मिली है। इस हवाले से सरकार और मीडिया के ज़हन को पढ़ने और समझने की आवश्यकता है, हमें परेशानी और तकलीफ नहीं है कि तहरीके आज़ादी में कोई ख़ास किरदार ना होने के बावजूद दुसरे सेवाओं के संदर्भ में विवेकानंद को आर एस एस के साथ सरकार भी प्रोग्राम आयोजित कर के याद करेगी।

काबिले एहतिराम सदर जम्हूरिया प्रणब मुखर्जी ने अपने एक बयान में कहा कि विवेकानंद एक अज़ीम देश प्रेमी, मुफक्किर, रूहानी पेशवा, इंसान दोस्त और खल्क को बेदार करने वाले एक अज़ीम संत थे, उनसे संबंधित १५० वीं वर्षीय प्रोग्राम पुरे साल जारी रहे गा 19 वीं सदी की मजकुरा शख्सियात में से कई ऐसे हैं, जिन्होंने आलमी साथ पर अपने इफ्कार व खयालात और काम के असरात व नुकूश सबत किये हैं। ११ जनवरी को शैखुल हिन्द मौलाना महमूद हसन देवबंदी रहमतुल्लाह अलैह की तहरीक रेशमी रुमाल की याद में टिकट का इजरा मोहतरम सदर जम्हूरिया के हाथों अमल में आया, इसी तरह विवेकानंद केनाम पर भी डाक टिकट सदर जम्हूरिया के हाथों अमल में आया, इसी तरह विवेकानंद के नाम पर भी डाक टिकट सदर जम्हूरिया के हाथों जारी किया गया।

यह एतेराफ का सिलसिला अच्छा है। हालांकि विवेकानंद को जिस लगन और जज़्बे के साथ सामने लाया जा रहा है, इससे बखूबी अंदाजा हो जाता है कि स्वामी जू इतने छाए हुए क्यों हैं, १० जनवरी, २०१२ को हमारे मंझले बेटे ने स्वामी विवेकानंद के मुताल्लिक अपना खयाल पेश करते हुए कहा मुझे उन पर अंग्रेजी में तकरीर करना है, आप भी अपने अध्ययन की रौशनी में कुछ ऐसी बातें बताएं, जिनको मिला कर मैं अपनी तकरीर तैयार कर सकूँ, ज़ाहिर है कि उसे विवेकानंद पर बोलने के लिए कहा गया होगा।

कुछ साल पहले प्रगति मैदान में आयोजित होने वाले सालाना आलमी किताब मेले में देखा था कि कई अदबी व इशाअती इदारे और उनसे जुड़े लोग किस तड़प और बेचैनी के साथ विवेकानंद की तहरीरों, बयानों और इफ्कार व खयालात से रुशनास कराने में लगे हुए हैं, हमें बहुत एहतिराम और मोहब्बत के साथ अपने स्टॉल तक ले गए और स्वामी जी की तहरीरों, बयानों और खतों पर आधारित दस जिल्दों की किताब विवेकानंद साहित्य और अलग अलग विषयों के तहत उन पर लिखी दर्जनों किताबों का ढेर लगा दिया, मैं कई किताबों का पहले ही अध्ययन कर चूका था, लेकिन जब देखा कि दस जिल्दों पर आधारित विवेकानंद साहित्य केवल दो ढाई सौ रूपये में मिल रही है, तो इसे खरीदने से खुद को नहीं रोक सका, स्पष्ट रहे कि हर जिल्द साधे चार सौ सफहात से कम पर आधारित नहीं है, किताब हाथ में लिए खडा सोचता रहा कि काश कोई इदारा हम जैसे दरवेशों को किसी भी विषय पर लिखी किताब की इतनी जिल्दें सौ पचास ज़्यादा ही ले कर फराहम कर दे तो हमारे लिए आगही की राह कितनी आसान हो जाए।

हमें यह एतेराफ करने में कोई शक नहीं है कि स्वामी विवेकानंद की शख्सियत और फ़िक्र व अमल में अजमत के साथ रौशनी भी है, इसकी चाप, गांधी जी, जवाहर लाल नेहरु, सुभाष चन्द्र बोस, सी राज गोपालाचारी जैसे आजादी से पहले के राजनीतिक रहनुमाओं की ज़िन्दगी और फ़िक्र पर साफ़ नज़र आती है, और उनसे रहनुमाई लेते दिखाई देते हैं। यह तो हमें स्वीकार करना चाहिए कि देश व कौम की अज़ीम हस्तियाँ तवज्जोह व इल्तेफात से मज़ीद अज़ीम और नुमायाँ हो जाती हैं, विवेकानंद जितने बड़े थे, लोगों की तवज्जोह ने इससे अधिक बड़ा बना दिया, वह बज़ाते खुद तवानाई और खद एतेमादी से पुर थे उन्होंने इससे दोसरों को भी भर जाने पर हद से ज़्यादा ज़ोर दिया और जो लोग खद गरजी और बुज़दिली में मुब्तिला थे, उन्हें इससे झटके दे कर खाली हो कर इंसानों से मोहब्बत और ग़ुरबत नवाज़ी के जज़्बे से भर जाने के लिए अमादा किया.

 जिस विवेकानंद को सौ रूपये की नौकरी नहीं मिल रही थी, वह ऐसी जगह खड़े हो गए कि वह यह कह सकें कि सन्यासी नौकरी नहीं करता, केवल ज्ञान (मारफत) तकसीम करता है, स्वामी ही ने उस वक्त कहा था जब उन्हें हार्वर्ड यूनिवर्सिटी में फलसफे के शोबे का सदर बना देने की तजवीज़ पेश हुई थी, हमें उनसे बहुत सी बातों से दलीलों के साथ मतभेद भी है, लेकिन विवेकानंद की इस हकीकत बयानी की कद्र करी पड़ती है कि गरीबों की अनदेखी और उनका शोषण भारत के ज़वाल और पिछड़ेपन का बुनियादी कारण है, 19 वीं सदी की बड़ी शख्सियात में से विवेकानंद ज़्यादा काबिले तवज्जोह बन जाने में यह बात भी नज़र आती है कि रूहानी पेशवाओं के अलग अंदाज़ में उन्होंने आम आदमी और नज़र अंदाज़ कर दिए गए अफ़राद के हक़ में आवाज़ उठाई।

यह कोई कम बड़ी बात नहीं थी कि अपने समय में विवेकानंद ने देश को आकर्षित किया कि भारत माता की खिदमत का मतलब है उसके नागरिकों की खिदमत और हमारे मसाइल व मसाइब की जड़, गरीबी और जिहालत व निरक्षरता है, और गरीबी का कारण भी जिहालत और निरक्षरता है। जिन जातियों और वर्गों को शिक्षा से महरूम रखा गया है उन्हें शिक्षा दो, वह देश के अवाम की मोहब्बत में माद्दियत से इतने उपर उठ गए थे कि उन्हें अपना हित नज़र नहीं आता था, सारी चाहतें और ख्वाहिशें, समाज के लाभ, देश के हितों और इंसानी मुफाद में बदल गई थीं। मां ने राम कृष्ण की खिदमत में जाने से यह कह कर रोकना चाहा कि वह तुम्हारी तौहीन करते हैं, यहाँ तक कि लात तक मारते हैं, तो विवेकानंद ने जवाब दिया कि मां आदमी की इज्जत क्या और तौहीन क्या, यह तो खाली और महज़ वहम है, आदमी तो मिटटी का पूतला है, तौहीन होती है देश की, मज़हब और तहज़ीब की। इस नजरिये के तहत वह इंसानों में जलती ज्योति को देख लेते थे।

जब अमेरिका के रेलवे स्टेशन पर एक अफ्रीकी काले कुली ने अपना जात भाई समझ कर हाथ मिलाना चाहा तो स्वामी ने उसे गले लगा लिया था, जब दोस्तों ने यह कहा कि आप यह क्यों नहीं बतलाते के मैं अफ़्रीकी नहीं, भारतीय हूँ, तो इसका जवाब विवेकानंद ने यह दिया था कि मैं इस लिए पैदा नहीं हुआ हूँ कि खुद को बड़ा बटा कर दूसरों को कमतर साबित करूँ। ऐसी हालत में पहुंचा आदमी ही यह एलान कर सकता है कि जब तक लाखों लोग भूक और जिहालत में रह रहे हैं तब तक मैं हर उस आदमी को देश विरोधी मानता हूँ, जिसने उनके पैसे से शिक्षा हासिल करने के बावजूद उन पर ध्यान नहीं दिया, अगर गौर से देखा जाए तो स्वामी जी इस हकीकते आला के बिलकुल करीब से गुजर रहे हैं जिसके बिना किसी भी अमल की कीमत और फना को वजूद नहीं मिलता है, इसलिए इंसानी समाज को बनाने में ऐसे इंकलाबी फ़िक्र व अमल के रोल से इनकार नहीं किया जा सकता है।

इंसानी बराबरी से संबंध के मद्देनजर ही उन्होंने यह कहा था कि मेरा तजुर्बा ही कि कभी कोई मज़हब इंसानी बराबरी की मंजिल तक काबिले लिहाज़ तक पहुंचा है तो वह इस्लाम और सिर्फ इस्लाम है, इसलिए मेरा कतई खयाल है कि अमली इस्लाम की मदद के बिना वेदान्तिज्म के नज़रियात चाहे वह कितने ही शानदार हों आम इंसान के लिए बिलकुल बे फायदा है, हमारे मादरे वतन के लिए दो अज़ीम निजामों का मिलाप हिन्दुइज्म और इस्लाम, वेदांत, दिमाग और इस्लामी जिस्म, वाहिद उम्मीद है, मैं दिल की आँखों से देख रहा हूँ कि भविष्य का मेयारी भारत इंतेशार व इफ्तेराक से निकल कर वेदांत दिमाग और इस्लामी जिस्म के जरिये कामयाब और फतह मंद हो रहा है (विवेकानंद साहित्य जिल्द ६ पेज, ४०५ मतबुआ अद्वेत आश्रम कलकत्ता १९८४ ई०)

स्वामी जी ने भारितीय जात पात पर आधारित उंच नीच से जो अत्यधिक दुखी थे, कहीं इसमें इस्लाम की तसव्वुरे मसावात का तो दखल नहीं था, यह हवाला और सवाल इसलिए जरूरी है कि आर एस एस वाले भी विवेकानंद १५० वर्षीय तकरीब मना रहे हैं और मोदी तक उनका नाम बहुत ले रहे हैं, यह लोग क्या स्वामी जी के इस एतिराफ को स्वीकार करेंगे कि इस्लाम आम लोगों के लिए पैगाम की शक्ल में आया, पहला पैगाम था बराबरी का, एक मज़हब है प्रेम, जात, रंग या दुसरे किसी चीज का अब कोई सवाल नहीं, इसे मानों कि इसकी अमली खूबी ने बाज़ी मारी, यह अजीमुश्शान पैगाम सीधा सादा था, एक खुदा में यकीन करो, जो जन्नत और ज़मीन का ख़ालिक है, उसने सबकी तखलीक सफर और अदम से की (विवेकानंद जिल्द ७ पेज, २३२ मतबूआ मजकुर) हालांकि विवेकानंद ने इस्लाम पैगम्बरे इस्लाम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम और मुसलमानों के ताल्लुक से ऐसे खयालात का भी इज़हार किया है, जिन पर आलोचना व मतभेद की पूरी पुरी गुंजाइश है, फिर भी पहले पैरा में उल्लेखित 19 वीं सदी की शख्सियात उनके अफकार व आमाल, तहरीकात और इदारों के हवाले से, विवेकानंद के फ़िक्र व अमल का अध्ययन समय का तकाजा है और जरूरत भी, इसके बिना अख्ज़ व इस्तिफादा का अमल बेहतर तौर से जारी नहीं हो सकता है।

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