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Hindi Section ( 17 Jul 2013, NewAgeIslam.Com)

Madras High Court Order Raises Many Questions मद्रास हाईकोर्ट का फैसला कई सवाल खड़े करता है

 

मौलाना अब्दुल हमीद नोमानी

4 जुलाई, 2013

(उर्दू से अनुवाद- न्यु एज इस्लाम)

मर्द औरत का रिश्ता जब तक उसमें पवित्रता न हो सम्मान के लायक़ नहीं हो सकता। खासकर शारीरिक और यौन सम्बंध और उसके नतीजे में पैदा होने वाली ज़िम्मेदारियों का मामला बहुत नाज़ुक होता है। अगर इस रिश्ते पर धर्म या समाज, किसी भी तरफ से उंगली उठे, या तिरस्कार की नज़र पड़े तो आपसी रिश्ते का मक़सद टूट जाता है। इस सम्बंध में मूल महत्व धर्म या समाज की तरफ से मिलने वाली इजाज़त और आदर व सम्मान है। इसमें कोई भी कानून बहुत बाद में सामने आता है। समाज और मज़हब की अनदेखी कर आज तक कोई भी कानून अपनी महत्ता व उपयोगिता साबित नहीं कर सका है और न ही ये भरोसे लायक़ बेहतर समाज की संरचना कर सका है।

इस सम्बंध में भावुक होने के बजाय पैदा हुई इस समस्या का सामाजिक और आर्थिक रूप से पड़ने वाले प्रभाव की समीक्षा की जानी चाहिए कि इसके क्या सकारात्मक और नकारात्मक प्रभाव पड़ रहे हैं और मज़हब इसमें कहाँ तक मार्गदर्शन करता है। यूरोपीय पश्चिमी सभ्यता और परंपरा और कुछ संदिग्ध और भ्रामक पूर्वी परंपराओं के मद्देनजर समाज के एक हिस्से में धर्म और बेहतर सामाजिक मूल्यों को नज़र अन्दाज़ करना या उनकी आलोचना करना एक फैशन का रूप धारण करता जा रहा है। बिना शादी के दो वयस्क मर्द और औरत के शारीरिक सम्बंध को अपराध की श्रेणी से बाहर रखना या कानूनी वैधता प्रदान करने का मामला इसी श्रंखला में आता है। लेकिन मद्रास उच्च न्यायालय का इसके बारे में फैसला कि यौन सम्बंध, शादी के समानार्थी है, के दूरगामी प्रभाव पड़ेंगे और कई तरह की ऐसे सामाजिक व आर्थिक समस्याएं पैदा होंगी जिनकी चपेट में वो लोग भी आएंगे जो किसी लड़की / औरत के साथ यौन या शारीरिक सम्बंध को महज़ अय्याशी व मनोरंजन समझते रहे हैं।

मद्रास हाईकोर्ट के फैसले पर ऐसे लोग भी आपत्ति कर रहे हैं, उनकी आलोचना के पीछे एक विशेष मानसिकता काम कर रही है। स्वतंत्र यौन सम्बंधों के समर्थक लोगों को लग रहा है कि इस अदालती फैसले से हम बुरी तरह फंस जायेंगे और आवरगी का सुरक्षित रास्ता बंद हो जाएगा कि सिर्फ यौन और शारीरिक सम्बंध ही शादी के समानार्थी है। जो पति पत्नी के रिश्ते को बताने के लिए काफी होगा और संपत्ति में हक़ बन जाएगा। समाज के इस गैरज़िम्मेदार और माँ बाप से आज़ाद इस  वर्ग को दोग़लेपन और यौन आवारगी पर रोक लगाने की और क्या क्या सूरतें हो सकती हैं, जो अमल में शामिल तो होता है लेकिन इसके नतीजे और ज़िम्मेदारियों को स्वीकार करने से भागने को अपनाता है। औरत की आज़ादी,  अधिकार और सम्मान व स्थिति की बात करता है, लेकिन उसे इस्तेमाल की सामयिक वस्तु मानते हुए कुछ दिनों के बाद इस्तेमाल करके समाज के कूड़ेदान में फेंक देता है।

मद्रास हाई कोर्ट का फैसला असल में इसी वर्ग के शादी से परे जाकर मर्द, औरत के बीच स्थापित सेक्स और शारीरिक सम्बंध और उसके नतीजों को लेकर है, और संयोग की बात है कि मर्द औरत दोनों मुसलमान नाम वाले हैं। आयशा बनाम वज़ीर हसन मुकदमा का ये फैसला जहां कई सवालों की दावत देता, वहीं कई सामाजिक एवं संवैधानिक समस्याओं को पैदा करता नज़र आता है। ये मामला सिर्फ धार्मिक संदर्भ में हलाल व हराम से ही सम्बंध नहीं रखता, बल्कि संवैधानिक और सामाजिक रूप से भी मर्द और औरत के रिश्ते की गलत व्याख्या की तरफ भी ले जाता है। इस तरह के फैसले से धर्म व समाज के प्रदान किये गये रास्ते से अलग डगर पर जीवन जीने वाली औरत को बराए नाम आर्थिक और संवैधानिक संरक्षण ज़रूर मिल जाता है, लेकिन इससे शादी ब्याह जैसी वैश्विक संस्था और व्यवस्था को तबाह करने का रास्ता भी साफ होता है और इसकी आवश्यकता और उपयोगिता से इंकार और इसके विध्वंस का रास्ता भी साफ होता है।

हालांकि इस प्रकार की घटनाएं स्वयं ही शादी ब्याह की वैश्विक व्यवस्था के महत्व और ज़रूरत को पूरी तरह साबित कर रहे हैं। धर्म विशेषकर इस्लामी शरीयत के हवाले से यौन और शारीरिक सम्बंध के लिए शादी की ज़रूरत, एक मान्यता प्राप्त बात है। इसमें शादी एक सामाजिक अनुबंध के साथ धार्मिक अमल व इबादत का पहलू भी रखती है। एक मुसलमान होने के नाते समस्या का ये पहलू हमारे लिए सबसे महत्वपूर्ण और ऊपर है। लेकिन मर्द व औरत के सम्बंध सामाजिक पवित्रता और सम्मान के बारे में चर्चा और बातचीत अधिक उपयोगी और धर्म व संप्रदाय के भेदभाव के बिना सबके लिए समझ में आने वाली है। 'लिव-इन रिलेशनशिप' में विश्वास रखने वाले मर्द और औरत, धर्म और हलाल व हराम की उसकी कल्पना पर कहाँ यक़ीन रखते हैं कि इसके हवाले से बातचीत की जाए। लिव-इन रिलेशनशिप के मामले पर वयस्क लड़कियों, औरतों को सोचना चाहिए कि ये रिश्ता उन्हें कहाँ पहुंचा रहा है। धर्म का नाम और संदर्भ के बिना अगर जीवन के महत्व और सम्मान के संदर्भ में शादी से परे जाकर महज़ दो वयस्कों की अपनी मर्ज़ी से यौन सम्बंधों के स्थायित्व और सुरक्षा को देखा जाए तो लिव-इन रिलेशनशिप का वास्तव में वजूद कहां है?

जिस सम्बंध की शुरुआत ही किसी भी समय खत्म हो जाने के खटके व धड़के के साथ हो, उसे प्यार का सम्बंध करार देना सरासर मूर्खता है। शुरुआत में ही अंजाम का डर, आदमी के जीवन को मौत में बदल देता है। इसमें अदालती फैसले सहायक साबित हो रहे हैं। कानूनी उम्र में लड़का, लड़की की प्रसिद्ध शादी के बगैर शारीरिक और यौन सम्बंध को सुप्रीम कोर्ट भी कई बार औचित्य प्रदान कर चुका है। इस सम्बंध में राधा कृष्ण के सम्बंध का हवाला भी सुप्रीम कोर्ट के फैसलों में दिया जाता रहा है। ये तो सबको मालूम है कि राधा कृष्ण की प्रसिद्ध अर्थ में पत्नी नहीं थी, और विशेष सम्बंध के बाद भी पत्नी न उस समय और न आज भी स्वीकार की गई है।

पिछले दिनों 'लिव-इन रिलेशनशिप' के संदर्भ में प्रकाशित रिपोर्ट में दिखाया गया है कि किस तरह सामाजिक और आर्थिक दृष्टि से कमज़ोर वर्ग की औरतों से शारीरिक और यौन सम्बंध बनाने के बाद उनको बच्चों सहित वक्त की तकलीफदेह मार खाने के लिए छोड़ दिया गया है। इन औरतों का सम्बंध कमज़ोर दलित समाज से है। केरल के एस.सी./ एस.टी विभाग ने इस सर्वे में ऐसी 563 दलित औरतों का उल्लेख किया है, जो मर्दों के यौन सम्बंध के बाद दरकिनार कर दिए जाने के बाद अकेले अकेले अपनी और अपने बच्चों की ज़िंदगी की गाड़ी खींच रही हैं। दूसरे सर्वे में भी हालात का जायज़ा पेश करते हुए बताया गया है कि छोड़ दी गयी ऐसी औरतों के बहुमत का सम्बंध दलित और आदिवासी वर्ग से है। इस पृष्ठभूमि में मद्रास हाई कोर्ट के फैसले को देखा जा रहा है। निश्चित रूप से फैसले का ये पहलू बिल्कुल नया है कि बालिग़ मर्द और औरत का मर्ज़ी से शारीरिक सम्बंध और शादी समान है। लेकिन सवाल ये है कि ऐसे मर्दों को सज़ा देने और अपने किए का मज़ा चखाने का और क्या तरीका हो सकता है, जो लड़कियों, औरतों से शारीरिक सम्बंध बनाकर आनंद व सुख प्राप्त करते हैं और फिर औरत और बच्चे को छोड़कर मुंह उठाकर दूसरी ओर चल पड़ते हैं। निश्चित रूप से ऐसे लोग धर्म और समाज के पवित्र वैश्विक मूल्यों और परंपरों को तबाह करने के दोषी हैं। इन दोनों दृष्टिकोणों से उन्हें सज़ा का सामना करना ही होगा। मौजूदा संवैधानिक व्यवस्था के तहत भी वो अपने अमल के नतीजे से खुद को बचा नहीं सकते हैं।

मद्रास हाई कोर्ट के फैसले का विशेष ज़ोर इस पर है कि जब एक बालिग़ मर्द औरत शारीरिक सम्बंध स्थापित कर चुके हैं, और उसका नतीजा भी बच्चे के रूप में आ चुका है तो मर्द महज़ इस बुनियाद पर खुद को ज़िम्मेदारी से बचा नहीं सकता है कि औरत के पास शादी का कोई सुबूत या दस्तावेज़ नहीं है। ऐसी स्थिति इस्लामी शरीयत के अनुसार अंजाम पाने वाली शादी में पैदा नहीं होती है कि इसमें मजलिस, दो गवाह और दूसरे सुबूत होते है। इससे औरतों को अच्छी तरह समझ लेना चाहिए कि धर्म और समाज  की घोषित जारी परंपरा और मूल्य, उनके अधिकार और सम्मान की, तथाकथित सभ्यता से अधिक रक्षक हैं। अगर धर्म और जारी परंपरा के अनुसार आयशा का रिश्ता वज़ीर हसन से स्थापित होता तो उसे अदालत में अपने रिश्ते को साबित करने के लिये इतने पापड़ बेलने की परेशानी न उठानी पड़ती। इस तरह के सामाजिक मुद्दे पर व्यापक बहस और चर्चा की ज़रूरत है कि कौन सी जीवन व्यवस्था इंसान (मर्द, औरत) के लिए अपनाने के लायक़ है और आज और आने वाले दिनों में भी बेहतर जीवन जीने के लिए प्रभावी और उपयोगी है?

मद्रास हाई कोर्ट के फैसले के प्रभाव और नतीजों को लेकर विभिन्न दृष्टिकोणों से बहस और चर्चा हो रही है, लेकिन कई पहलू और सवालात ऐसे भी हैं जो छूट रहे हैं। बहुत सम्भव है कि मद्रास हाईकोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी जाए। कुछ दिनों पहले लेखक के पास हज़रत निज़ामुद्दीन से इरफ़ान मलिक नाम के आदमी का फ़ोन आया कि एक दर्जन से अधिक बच्चों होने पर क्या निकाह पढ़ाना होगा। कोलकाता जैसे बड़े शहर तक में काली दुर्गा की मूर्ति बनाने वालों की बड़ी तादाद मुसलमान नाम वाले हैं। हम कहाँ दावत और तब्लीग़ (प्रचार) का काम कर रहे हैं। मद्रास हाईकोर्ट का फैसला भी समाज के एक अंधेरे पहलू को ज़ाहिर करता है कि हम अभी भी कहाँ खड़े हैं? और कहाँ तक जाने की ज़रूरत है।

4 जुलाई, 2013 स्रोत: इंकलाब, नई दिल्ली

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http://www.newageislam.com/urdu-section/madras-high-court-order-raises-many-questions--مدراس-ہائی-کورٹ-کا-فیصلہ،-کئی-سوالات-کھڑے-کرتا-ہے/d/12610

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