मसूद मकरम, न्यु एज इस्लाम
24 मार्च, 2013
सीरिया में राष्ट्रपति बशर अलअसद के खिलाफ सशस्त्र विद्रोह ने शुक्रवार को उस समय भयानक रूप धारण कर लिया जब एक कट्टर सुन्नी मुस्लिम धार्मिक नेता शेख अलबूती को एक मस्जिद में बम धमाके में मौत हो गयी। लोकतांत्रिक सुधारों के लिए चालीस बरस के असद की तानाशाही के खिलाफ सामाजिक विद्रोह का नेतृत्व अलक़ायदा गुट का संगठन जबहतुल नुस्रा द्वारा किया जा रहा है और जो असद सरकार के खिलाफ लड़ रहा है। सेकुलर, कट्टरपंथी, वामपंथी और आतंकवादियों के जैसे असंगठित लड़ाकू समूहों के मैदान में होने के कारण दिनों दिन वहाँ की राजनीतिक स्थिति जटिल होती जा रही है। सुन्नी आलिम शेख अलबूती सीरिया के शिया अलवी राष्ट्रपति के खिलाफ शक्ति के स्रोत थे और राष्ट्रपति बशर अलअसद के खिलाफ सुन्नी बहुमत लड़ रहा है।
पूर्व सैन्य अधिकारियों और सिपाहियों पर आधारित फ्री सीरियन आर्मी एक ऐसा ग्रुप है जो काफी हद तक सेकुलर है और सीरिया की तानाशाही के खिलाफ लड़ने वाले प्रमुख बलों में से एक है। हालांकि, अलनुस्रा जो अलकायदा का एक गुट है, वो भी एक प्रमुख शक्ति है और जो कि कट्टरपंथी इस्लामी विचारधारा का प्रतिनिधित्व करता है। धमाके में शेख अलबूती की हत्या ने अपने सांप्रदायिक और राजनीतिक विरोधियों को खत्म करने की अलकायदा शैली के आत्मघाती बम धमाकों की शुरुआत के संकेत दिये हैं। सभी विपक्षी समूहों ने बम धमाकों की निंदा की है और ये बताता है कि धमाका अलक़ायदा गुटों के द्वारा किया गया हो सकता है।
वर्तमान में पाकिस्तान का नाम सीरिया में विद्रोह से सम्बंधित जबहतुल नुस्रा की भूमिका से सामने आया है। पिछले महीने अमेरिकी विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन ने ये गंभीर बयान दिया था कि सीरिया में आतंकवादियों को पाकिस्तान में अलकायदा के केंद्रीय नेतृत्व की ओर से 'संदेश' मिल रहे थे। अलनुस्रा मुख्य रुप से अलक़ायदा की इराक़ शाखा से जुड़ा गुट है जो सीरिया में भाड़े के सैनिकों को भेजता है। इसका मतलब ये है कि सीरिया, पाकिस्तान और इराक में स्थित अलक़ायदा नेटवर्क बहुत सक्रिय और शक्तिशाली हो गया है, जो सीरिया के मामलों को बदतर बना सकता है, क्योंकि नेटो आतंकवाद से ग्रस्त सीरिया में सैनिक हस्तक्षेप करने पर विचार कर रहा है। आतंकवाद से प्रभावित देशों में अलक़ायदा की उपस्थिति ने इन देशों में हस्तक्षेप के लिए नाटो को औचित्य प्रदान किया है। अगर अलक़ायदा सीरिया में भी केंद्रीय भूमिका हासिल कर लेता है, तो वहाँ भी नेटो देश हस्तक्षेप करेंगे।
अल्पसंख्यक शिया आबादी इस घटनाक्रम को लेकर चिंतित है, क्योंकि बशर अलअसद को सत्ता से हटाने का मतलब सुन्नी कट्टरपंथियों के द्वारा सत्ता पर क़ब्ज़ा करना होगा, जो न केवल उनके अस्तित्व के लिए बल्कि उनके विश्वासों, संस्कृति और धार्मिक विरासत के लिए भी ख़तरा होगा। इस तरह बशर अलअसद की सरकार के खिलाफ लड़ाई शिया सुन्नी संघर्ष में तब्दील हो गयी है और अलक़ायदा इस सेकुलर और लोकतांत्रिक विद्रोह को वहाबी-सल्फ़ी इस्लाम को स्थापित करने की लड़ाई बनाने पर तुला हुआ है और जिसमें शिया काफिर और हत्या के लायक करार दिए जाते हैं।
अलक़ायदा के हमलों का मुकाबला करने के लिए इराक और पड़ोसी देशों के शिया दमिश्क में हज़रत ज़ैनब के नाम पर बनी मस्जिद को बचाने के लिए सीरिया की यात्रा कर रहे हैं। ये मस्जिद शिया समुदाय के लिए धार्मिक महत्व की है।
सीरिया के सेकुलर विद्रोहियों को मदद पहुँचाकर सीआईए ने मामले को बदतर बना दिया है, लेकिन ये भी खबरें हैं कि विद्रोहियों को की गयी हथियारों की आपूर्ति आतंकवादियों के हाथों में पहुँच रही है। बशर अलअसद का मामला मिस्र, ट्यूनीशिया और लीबिया से अलग है क्योंकि इसे ईरान, रूस और दूसरे देशों का समर्थन हासिल है।
राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी को मारने के लिए दमिश्क की मस्जिद में हुआ बम धमाका पाकिस्तान की मस्जिदों और मज़ारों पर हुए बम धमाकों की याद दिलाते हैं, और ये सीरिया विद्रोह में पाकिस्तान के अनियंत्रित क्षेत्रों में अलकायदा और तालिबान तत्वों के बढ़ते प्रभाव और भागीदारी को रेखांकित करते हैं। हर हालत में सीरिया का भविष्य अंधकारमय लगता है।
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