New Age Islam
Tue Jun 22 2021, 04:00 AM

Hindi Section ( 28 Jan 2015, NewAgeIslam.Com)

Comment | Comment

Inconclusive Battle on the Terror Front आतंक के मोर्चे पर अधूरी लड़ाई


मरियाना बाबर

27 जनवरी 2015

मार्च, 2011 में पाकिस्तान के अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री शहबाज भट्टी की हत्या कर दी गई थी। पिछले सप्ताह इस्लामाबाद हाई कोर्ट के जज शौकत अजीज शिद्दीकी ने इस हत्या के आरोप में 2013 में गिरफ्तार किए गए अब्दुल्लाह उमर अब्बासी के खिलाफ मामले की सुनवाई से इन्कार कर दिया। हाल ही में आतंकवाद निरोधी अदालत के उस जज को बदल दिया गया, जो 2008 के मुंबई हमले के मामले में सात पाकिस्तानी संदिग्धों के खिलाफ सुनवाई कर रहे थे, और मामले को दूसरे कोर्ट में भेज दिया गया। यह आठवीं बार है, जब मामले की सुनवाई कर रहे जज को बदला गया। जिस जज को बदला गया, उनका नाम कौसर अब्बास जैदी है, जिन्होंने मुंबई हमले के मास्टरमाइंड जकीउर रहमान लखवी को जमानत दी थी।

पाकिस्तान में आवाजें उठने लगी हैं कि आतंकवाद निरोधी अदालतों में चल रहे सभी मामलों को नव गठित सैन्य अदालतों में भेज दिया जाए, ताकि सुनवाई तेजी से हो और दोषियों को सजा दी जा सके। पेशावर के आर्मी पब्लिक स्कूल में बर्बर हमले के बाद राजनीतिक और सैन्य नेतृत्व मानो लंबी नींद से जाग उठा और उसने तेजी से आतंकवाद से निपटने के लिए राष्ट्रीय कार्ययोजना तैयार कर ली। सैन्य प्रमुख जनरल राहिल शरीफ ने सभी राजनीतिक दलों को सैन्य अदालतों की स्थापना के लिए राजी किया, ताकि सारे लंबित आतंकी और चरमपंथी मामले तेजी से निपटाए जा सकें।

ये सैन्य अदालतें दो वर्षों के लिए काम करेंगी और उम्मीद है कि तब तक सामान्य अदालतें यह सुनिश्चित करेंगी कि आतंकियों से संबंधित मामले की सुनवाई के लिए उनके पास आधारभूत संरचनाएं उपलब्ध हों। सब देख सकते हैं कि पाकिस्तान की आतंकवाद निरोधी अदालतों में न्यायपालिका किस तरह नाकाम साबित हुई है। गवाहों को कोई सरकारी संरक्षण नहीं मिलता। कई बार तो दबाव के चलते वे पीछे भी हट जाते हैं। इन अदालतों के जजों को भी कोई सुरक्षा नहीं मिलती और जब उन्हें और उनके परिजनों को धमकियां मिलती हैं, तो वे केस छोड़ देते हैं। आतंकी मामलों में सुबूत इकट्ठा करना बेहद तकनीकी काम होता है और सुरक्षा एजेंसियों को उसके लिए प्रशिक्षित नहीं किया जाता और राज्य द्वारा अभियोग भी ठीक से दायर नहीं किया जाता। नतीजतन कई आतंकवादी आसानी से छूट जाते हैं। मुंबई हमले के मामले में तथ्य यह है कि अपराध को भारत में अंजाम दिया गया और दो देशों के बीच विश्वास की कमी और संदेह के चलते मामला गति नहीं पकड़ सका।

दूसरी ओर सैन्य अदालतों के गठन का बहुत ज्यादा विरोध नहीं हुआ। यहां तक कि पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी ने भी संविधान में संशोधन के वक्त संसद में इन अदालतों के पक्ष में वोट दिया, बावजूद इसके कि एक फौजी हुकूमत ने उसके नेता को फांसी पर लटकाया था।

दो तिहाई बहुमत से सरकार बनाने वाले नवाज शरीफ के लिए सैन्य अदालतों का गठन न केवल कड़वी गोली गटकने की तरह था, बल्कि इसका भी सुबूत था कि उनकी सरकार कितनी निष्प्रभावी हो गई है। आज पाकिस्तान की सेना न केवल कश्मीर पर पाकिस्तान की नीतियों को नियंत्रित करती है, बल्कि भारत, अफगानिस्तान, अमेरिका के साथ व्यापार समेत द्विपक्षीय संबंधों और देश की परमाणु नीति को भी नियंत्रित करती है। इस तरह सैन्य अदालतों के प्रति सहमति जताकर लोकतांत्रिक नेतृत्व ने फौज को काफी स्थान दे दिया है।

पाकिस्तान में कट्टरपंथियों की ओर से 'जिन्ना का पाकिस्तान बनाने' की मांग पर बहस हो रही है। मुल्क में सिर्फ सैन्य अदालतें ही गठित नहीं हुई हैं, बल्कि मृत्युदंड की वापसी भी हो गई है और पेशावर हमले के बाद कई चरमपंथियों और आतंकवादियों को फांसी दी गई है।

हालांकि जिन लोगों को फांसी दी गई है, वे सभी सशस्त्र बलों और पूर्व सैन्य प्रमुख परवेज मुशर्रफ पर हमले करने में संलिप्त थे। मुल्क के आम लोग पूछ रहे हैं कि उन पंजाबी जेहादियों के खिलाफ, जो सांप्रदायिक हिंसा, खासकर शिया समुदाय के लोगों व अल्पसंख्यक समूहों की हत्या में शामिल थे, सैन्य अदालतें तेजी से सुनवाई क्यों नहीं कर रही हैं। इन जेहादी गुटों के खिलाफ सुनवाई की मांग सिर्फ भारत ही नहीं कर रहा, बल्कि पाकिस्तान के आम लोग भी आतंकवाद का खात्मा चाहते हैं। पाकिस्तानी सरकार ने जमात उद दावा के बैंक एकाउंट को फ्रीज करने और हाफिज सईद के देश से  बाहर जाने पर पाबंदी लगाई है। यह फैसला अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा की भारत यात्रा से ठीक पहले अमेरिकी विदेश मंत्री के दबाव बनाने पर लगाया गया। लेकिन इतना ही पर्याप्त नहीं है। संयुक्त राष्ट्र ने कुछ वर्ष पहले ही जमात उद दावा पर प्रतिबंध लगा दिया था, इसके बावजूद हाफिज सईद पाकिस्तान में रैली करने, भड़काऊ बयान देने और भारत पर हमले करने की धमकी देने से बाज नहीं आया।

पाकिस्तान के लिए दूसरी चिंता यहां के विभिन्न मदरसों को सऊदी अरब, ईरान और कुछ अन्य खाड़ी देशों से मिलने वाली आर्थिक मदद भी है। इसके पीछे धारणा है कि ये धार्मिक स्कूल लड़ाके तैयार करने में मदद करते है, जो जेहाद में शामिल होते हैं। मदरसे की शिक्षा को शिक्षा व्यवस्था की पटरी पर लाने के लिए एक नियामक तंत्र बनाना होगा। एक केंद्रीय मंत्री अहमद पीरजादा ने भी वहाबी पंथ को बढ़ावा देने के लिए इन धार्मिक चरमपंथियों को आर्थिक मदद करने के कारण सऊदी अरब की आलोचना करते हुए कहा कि यह मुल्क को अस्थिर कर रहा है।

भले ही सेना उत्तरी वजीरिस्तान में हक्कानी नेटवर्क के अफगान तालिबान गुट समेत सभी आतंकियों का सफाया करने के अभियान में जुटी है, पर यह देखना होगा कि जो पंजाबी जेहादी गुट मुल्क के बाहर और भीतर, हिंसक गतिविधियों में शामिल हैं, उन्हें चुप कराया जाएगा या नहीं, और सैन्य अदालतों में उनके खिलाफ मुकदमे चलेंगे या नहीं।

Source: http://www.amarujala.com/news/samachar/reflections/columns/half-hearted-fight-against-terror-hindi/

URL: https://newageislam.com/hindi-section/mariana-baabar/inconclusive-battle-on-the-terror-front--आतंक-के-मोर्चे-पर-अधूरी-लड़ाई/d/101244

 

Loading..

Loading..