
लुई फ़तूही
1 जनवरी 2014
पूरे कुरान में ऐसी कई आयतें हैं जिनसे पैगम्बरे इस्लाम मोहम्मद सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम की नेतृत्व क्षमताओं और गुणों का पता चलता है। उनमें से एक आयत निम्नलिखित है:
''(तुमने तो अपनी दयालुता से उन्हें क्षमा कर दिया) तो अल्लाह की ओर से ही बड़ी दयालुता है जिसके कारण तुम उनके लिए नर्म रहे हो, यदि कहीं तुम स्वभाव के क्रूर और कठोर हृदय होते तो ये सब तुम्हारे पास से छँट जाते। अतः उन्हें क्षमा कर दो और उनके लिए क्षमा की प्रार्थना करो। और मामलों में उनसे परामर्श कर लिया करो। फिर जब तुम्हारे संकल्प किसी सम्मति पर सुदृढ़ हो जाएँ तो अल्लाह पर भरोसा करो। निस्संदेह अल्लाह को वो लोग प्रिय है जो उस पर भरोसा करते है'' (3: 159)
इस आयत में स्पष्ट रूप से उन लोगों की तरफ इशारा है जो कि पैगम्बरे इस्लाम सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम के आसपास रहते थे, जो उन्हें छोड़ सकते थे। जो लोग पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम से भौतिक रूप से करीब रहते थे उन्हें तकनीकी रूप से ''सहाबा'' कहा जाता है। इस आयत में सबसे पहले पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम की दया और नम्रता भरे व्यवहार का उल्लेख किया गया है जिसे आप सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम वे अपने सहाबियों के साथ करते थे। आमतौर पर मोमिनों के लिए पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम की दया और स्नेह का वर्णन किया गया है जहां उनका उल्लेख इस प्रकार किया गया है , ''वो मोमिनों के प्रति अत्यन्त करुणामय, दयावान है'' (9: 128) और और उन लोगों के लिए सर्वथा दयालुता है जो तुममें से ईमान लाए है'' (9: 61) लेकिन पैगम्बरे इस्लाम सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम का ज़िक्र इस तरह भी है कि हमने तुम्हें सिर्फ मोमिनों के लिए ही नहीं बल्कि 'हमने तुम्हें सारे संसार के लिए बस एक सर्वथा दयालुता बनाकर भेजा है'' (21- 107)।
आयत (3: 159) में पैगम्बरे इस्लाम सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम के कठोर होने के बजाए दयालुता और सज्जनता को उनके मिशन की कामयाबी के लिए अत्यधिक महत्वपूर्ण बताया है। इसमें ये बताया गया है कि अगर वो ऐसे नहीं होते तो उनके अपने करीबी सहाबा भी उनका साथ छोड़ देते।
जैसे जैसे कुरान हमें उन संदर्भों के बारे में बताता है जिनमें पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने उनका पालन किया, तो पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम की ये विशेषताएं और अधिक प्रभावी नज़र आती हैं, इसलिए कि इन आयतों में 'उन्हें माफ' करने और 'उनके लिए माफी मांगने' का पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम को हुक्म दिया गया है। इसलिए ये बात स्पष्ट होती है कि पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम को उन स्थितियों में भी दया और स्नेह का व्यवहार करना आवश्यक था, जब उनके कुछ सहाबी अन्याय और दुर्व्यवहार में शामिल थे और जिसके लिए अल्लाह की माफी और पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम की माफी की आवश्यकता हो।
इसके बाद आयत में पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम को ये हुक्म दिया गया है कि जब भी कोई फैसला लेने की ज़रूरत पड़े तो अपने सहाबा से उस पर सलाह लें। ये धर्म की बुनियादी बातों के बारे में फैसले के बारे में नहीं था, जैसा कि क़ुरान में आया है कि इसे अल्लाह खुद निर्धारित करता है, बल्कि ये हुक्म मुस्लिम समाज के अल्पकालिक और दीर्घकालिक समस्याओं और दूसरे समुदायों के साथ मुसलमानों के सम्बंधों के बारे में था। पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम को अपने सहाबा से सलाह करने का हुक्म देने के पीछे दो मकसद थे। पहला तो ये कि समस्या के सम्बंध में विभिन्न राय सामने आ सकें ताकि पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम उनमें से जिसे बेहतर समझे चुन सकें। ये एक वास्तविक परामर्शी प्रक्रिया है जिसमें साथी सहाबा प्रतिभागियों के रूप में और पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम अंतिम निर्णय लेने वाले के रूप में शामिल थे।
नेतृत्व के लिए पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम के सलाह करने के दृष्टिकोण की एक शानदार मिसाल खंदक की लड़ाई में समाने आयी। इस युद्ध का उल्लेख कुरान की सूरे ''अलअहज़ाब'' में है और ये जंग मदीना के मुसलमानों पर अरब और यहूदी क़बीलों की संयुक्त सेना के हमले के बाद हुई थी। पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने ऐसी सेना के खिलाफ की रक्षात्मक विकल्प के बारे में सहाबा से सलाह की जो उनसे संख्या में 3- 4 गुना ज़्यादा थी। इस मामले में सलमान फारसी ने ये सलाह दी कि मदीने के आसपास खंदक (खाई) खोद दी जाए जो दुश्मन के ऊँट और घुड़सवार दस्ते को नाकाम बना देगा। पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने इस योजना से सहमति जताई और आखिरकार ये पूरी तरह कामयाब रही।
इस्लामी नेतृत्व में परामर्श की अनिवार्यता को मोमिनों की सराहनीय विशेषताओं के उल्लेख के साथ क़ुरान में इसकी पुष्टि की गयी हैः
''जो बड़े-बड़े गुनाहों और अश्लील कर्मों से बचते है और जब उन्हे (किसी पर) क्रोध आता है तो वे क्षमा कर देते हैं; '' (42: 37) और जिन्होंने अपने रब का हुक्म माना और नमाज़ क़ायम की, और उनका मामला उनके पारस्परिक परामर्श से चलता है, और जो कुछ हमने उन्हें दिया है उसमें से ख़र्च करते है; ''(42: 38)
पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम का एक और खूबसूरत पहलू दया और नम्रता के साथ सत्ता और शक्ति का संयोजन है। इस संयोजन को हासिल कर पाना बहुत मुश्किल है। ऐसे जो लोग जो दयालू और सज्जन हैं लेकिन दृढ़ता और निर्णय लेने के कौशल की कमी के कारण लीडर बनने में असफल हो सकते हैं। जबकि दूसरी तरफ ऐसे लोग जो नतृत्व करने की स्थिति में हैं, उनके लिए दया और स्नेह से भरा व्यवहार करना मुश्किल है, क्योंकि वो अपनी शक्ति और अधिकार का प्रयोग करते हैं।
ये कहने की ज़रूरत नहीं है कि जिन नेतृत्व क्षमताओं का उल्लेख कुरान ने किया है, वो आज के मुस्लिम राजनीतिक लीडरों में नहीं पायी जाती हैं। परामर्श की जगह तानाशाही ने ले ली है जबकि दया, कृपा और क्षमा की जगह क्रूरता और कठोरता ने ले ली है। इसके अलावा क़ुरान जिस नेतृत्व कौशल को बढ़ावा देता है उसे सिर्फ राजनीति ही नहीं बल्कि काम और घर सहित जीवन के कई क्षेत्रों में लागू किया जा सकता है।
स्रोत: http://www.louayfatoohi.com/2014/01/islam/leadership-qualities-of-prophet-muhammad
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