
खुश्तर नूरानी
13 जून, 2014
इस्लाम शांति व सादगी का धर्म है, इस्लाम का ये सिद्धांत इबादत और सामाजिक जीवन के हर क्षेत्र से सम्बंधित है। इस्लाम हर उस काम की निंदा करता है जिसकी वजह से किसी दूसरे इंसान को तकलीफ पहुँचे, समाज की शांति और सुरक्षा खतरे में पड़ जाए, मानव जीवन के खत्म होने की आशंका हो और धर्म की मूल छवि विकृत होकर रह जाए।
इस्लाम अपने प्रारंभिक दौर से जैसे जैसे दूर होता जा रहा है, आधुनिक संस्कृति और मिले जुले धार्मिक समाज के प्रभाव के कारण इसमें नई नई बिदअत (नवाचार) और खुराफात शामिल होना तेज़ होता जा रहा है। भारत में धार्मिकता के नाम पर ऐसे नवाचार और खुराफात की घटनाएं अक्सर देखने को मिल जाती हैं। शबे बरात क़रीब है, हिंदुस्तान के अधिकांश हिस्सों विशेषकर दिल्ली में मुसलमानों का एक बड़ा तब्का जो इसे मनाता है, वो इस्लाम की धार्मिक, सामाजिक और नैतिक शिक्षा के सरासर खिलाफ है। दीवाली की तरह इस मौक़े पर पटाखे फोड़ना, सड़कों पर खुलेआम सामूहिक रूप से गाड़ियों से रेस लगाना, मोटरसाइकिलों पर स्टंट दिखाना, बेवजह सड़कों पर नारे लगाना, शोर मचाना, नागरिक कानूनों को तोड़ना, सारी रात शहर के विभिन्न क्षेत्रों में गाड़ियों से घूमते फिरना इस्लामी शिक्षाओं का मज़ाक़ उड़ाना है।
हज़रत अली करमल्लाहे तआला वजहुल करीम से रवायत है कि पैगम्बर सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम फरमाते हैं, ''जब शाबान (महीने) की पन्द्रहवीं रात आ जाए तो इस रात को जागो और दिन में रोज़ा रखो कि खुदा सूर्यास्त से आसमाने दुनिया पर विशेष करम फरमाता है कि है कोई माफी चाहने वाला उसे माफी दूँ? कोई रोज़ी मांगने वाला है कि उसे रोज़ी दूँ? है कोई पीड़ित कि उसे राहत दूँ? है कोई ऐसा? कोई ऐसा? और ये उस वक्त तक फरमाता है कि सुबह हो जाए'' (बेहक़ी)
रसूलुल्लाह सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम के ज़रिए शबे बरात का ये खुदा का ईनाम उपरोक्त खुराफात से हासिल नहीं हो सकता। शबे बरात में मुसलमानों को क्या करना चाहिए, इसकी स्पष्ट शिक्षा इस हदीस पाक में लिखित है। रसूलुल्लाह सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम इस मौक़े पर बक़ी (कब्रिस्तान) में जाकर मुर्दों के लिए मग़फेरत (माफी) की दुआ भी करते थे, इसलिए इस सुन्नत पर हम भी अमल कर सकते हैं। धार्मिक इबादत के नाम पर उपरोक्त खुराफात को करना एक तरह से दोहरा जुर्म है। अपने नफ्स और आवारगी के लिए किसी भी तरह के गैर शरई काम का करना तो एक जुर्म है ही, और धार्मिक इबादत के नाम से अगर ये किया जाए तो ये इससे भी बड़ा जुर्म है। इससे मुसलमानों के साथ साथ इस्लाम की शांतिपूर्ण छवि को भी बट्टा लग रहा है।
इन परिस्थितियों में उलमा पर मुस्लिम समाज के धार्मिक सुधार की ज़िम्मेदारी बढ़ जाती है। उलमा को चाहिए कि पंथीय भावना से ऊपर उठकर इस्लाम की मूल छवि के संरक्षण और उसकी शिक्षाओं को आम करने के लिए मुस्लिम समाज में धार्मिक सुधारों का बाकायदा आंदोलन चलाएं। इस धार्मिक सुधार आंदोलन के लिए दो प्रभावी प्लेटफार्म हो सकते हैं: (1) जुमा का खिताब और (2) धार्मिक जलसे।
जुमा को मुस्लिम समाज का लगभग हर खास व आम, शिक्षित और अनपढ़, पँच वक्त का नमाज़ी और बेनमाज़ी, जुमा की नमाज़ के लिए मस्जिद में आता है। और नमाज़ से पहले 15 से 20 मिनट का जो उर्दू में खिताब (भाषण) होता है, उसे ध्यानपूर्वक सुना जाता है। ये धार्मिक सुधार का बहुत प्रभावी और कारगर प्लेटफार्म है। उलमा अगर गंभीरता से इस ओर ध्यान दे दें तो शबे बरात से सम्बंधित ही नहीं किसी भी क्षेत्र से खुराफात का खात्मा हो सकता है। इस काम के लिए अलग से उन्हें वक्त, ताक़त और पैसे खर्च करने की ज़रूरत नहीं, बस उन्हें गंभीरता से मुस्लिम जनता को सही शिक्षाओं से परिचित कराना है। शबे बरात के आगमन से चार जुमा पहले अगर भारत और विशेषकर दिल्ली की हर मस्जिद से मुस्लिम बच्चों को शबे बरात में गैर शरई मामलों से बचने की हिदायत की जाए, उन्हें अल्लाह का ख़ौफ दिलाया जाए, नागरिक कानूनों पर अमल के महत्व को बताया जाए और मुसलमानों के सम्मान और प्रतिष्ठा का उन्हें ध्यान दिलाया जाए तो इन खुराफात में काफी हद तक कमी आ सकती है।
हिंदुस्तान के कोने कोने में होने वाले धार्मिक जलसों से भी यही काम लिया जा सकता है, क्योंकि देश भर में शबे बरात से पहले मदरसों के सालाना दस्तारबंदी के जलसे आयोजित होते हैं। उलमा की ये ज़िम्मेदारी है, इसलिए हर हाल में उन्हें इन मामलों की तरफ ध्यान देना चाहिए। जो लोग बेवजह चीख व पुकार और निरर्थक विषयों पर आधारित तक़रीरों से इन दोनों प्लेटफार्मों को बर्बाद कर रहे हैं। मस्जिद प्रबंधन कमेटी के सदस्यों और जलसा का प्रबंध करने वालों को चाहिए कि उलमा और मस्जिद के इमामों का ध्यान इन मामलों की तरफ दिलवाएं।
13 जून, 2014 स्रोतः इंक़लाब, नई दिल्ली
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