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Hindi Section ( 5 Feb 2014, NewAgeIslam.Com)

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Islamic Economy During Khilafat-e-Rasheda Part 2 ख़िलाफ़ते राशिदा के समय में इस्लामी अर्थव्यवस्था भाग 2

 

खुर्शीद अहमद फ़ारिक़

अबु बकर सिद्दीक़ रज़ियल्लाहू अन्हा की ख़िलाफ़त

अबु बकर सिद्दीक़ रज़ियल्लाहू अन्हा की ख़िलाफ़त को कुछ ही दिन गुज़रे थे कि देश के अधिकांश अरब इस्लाम का इंकार करने वाले  हो गए। यमन, उत्तरी और पश्चिमी नज्द के ताक़तवर क़बीले रसूलुल्लाह सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम की ज़िंदगी के आखरी दिनों में ही इस्लाम और मदीने की अधीनता से मुंह मोड़ चुके थे। अरब के इंकार करने के विभिन्न रूप थे। कुछ कबीलों ने कहा कि अगर मोहम्मद नबी होते तो मरते ही नहीं, इसलिए हम उनके धर्म को सही नहीं मानते। कुछ ने कहा कि मोहम्मद सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम के इंतेक़ाल से नबूवत का अंत हो गया और हम पर उनके उत्तराधिकारी को मानना अनिवार्य नहीं। कुछ ने नमाज़ पढ़ने और ज़कात देने से इंकार कर दिया और कुछ ने नमाज़ बर्दाश्त कर ली लेकिन लगभग सभी ने ज़कात को देने से इंकार किया और इसे मदीने की अधीनता की निशानी समझकर ठुकरा दिया।  मदीने से दूरस्थ क्षेत्रों में जो इस नये विद्रोह में शामिल हुए हज़रे मौत और महरा, पूर्वोत्तर में ओमान और बहरीन विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। नज्द तीन और हेजाज़ के कुछ कबीलों के अलावा जो कुरैश के प्रभाव में थे और मदीना के रेसालों से करीब होने के कारण विद्रोह के अंजाम से डरे भी, बाकी सारे क़बीलों ने मदीने की वफादारी को छोड़ने की घोषणा कर दी। मदीने के पश्चिमी उपनगर यानी रुमा घाटी,1 की चारागाहों में बसने वाले लगभग आधा दर्जन ताक़तवर क़बीलों ने आपसी सहयोग का समझौता करके अबु बकर सिद्दीक़ से मांग की कि उन्हे ज़कात से माफी दी जाए वरना वो विद्रोह कर के मदीना की हुकूमत की बिसाल उलट देंगे।

बिगड़ते हुए हालात से फायदा उठाकर मक्का के कुरैश और ताइफ़ के सक़ीफ़ ने भी इस्लाम से अपना रिश्ता तोड़ने का इरादा कर लिया लेकिन रसूलुल्लाह सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम के समझदार गवर्नरों और कुछ दूसरे सम्माननीय लोगों ने व्यक्तिगत प्रभाव से काम लेकर दोनों सत्ताधारी कबीलों के विद्रोही रुझान को दबाए रखा।

इस गंभीर और चिंताजनक स्थिति में अबु बकर सिद्दीक़ रज़ियल्लाहू अन्हा को इस्लाम की आर्थिक स्थिरता ने सबसे अधिक बल प्रदान किया, जिसकी इमारत रसूलुल्लाह सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम अपने जीवन में मज़बूत बुनियादों पर उठा गए थे। अबु बकर सिद्दीक़ रज़ियल्लाहू अन्हा ने अरबों की चुनौती स्वीकार कर लिया और संकल्प लिया कि विद्रोहियों को तलवार से जवाब देंगे जैसा कि उनके इस प्रसिद्ध कथन से स्पष्ट होता है: बखुदा अगर अरबों ने ज़कात के ऊंट का एक बंधन तक रोका तो मैं उनसे लड़ूँगा।1

अपने संकल्प को पूरा करने के लिए सबसे पहला कदम जो अबु बकर सिद्दीक़ रज़ियल्लाहू अन्हा ने खलीफा बनने के कुछ ही दिन बाद उठाया था ओसामा बिन ज़ैद रज़ियल्लाहू अन्हा की वो मुहिम रवाना कर दी, जिसे रसूलुल्लाह सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने अपनी आखरी बीमारी के दौरान दक्षिण पूर्व फ़िलिस्तीन के अब्ना नामक बस्ती पर बदले की कार्रवाई के लिए तैनात किया था और जो उनकी बिगड़ती हालत के कारण रवाना नहीं हो सकी थी। ये मुहिम रसूलुल्लाह सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने अब्ना को जीतने या अपने अधीन करने के लिए नहीं भेजी थी बल्कि इसका उद्देश्य ओसामा रज़ियल्लाहू अन्हा के पिता और रसूलुल्लाह सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम के चहेते ज़ैद बिन हारसा रज़ियल्लाहू अन्हा  और चचेरे भाई ज़फ़र बिन अबी तालिब का बदला लेना था जो सन् 8 हिजरी में मोता पर सेना की चढ़ाई के दौरान सीरिया के लोगों के हाथों मारे गए थे। अन उनवतः अन ओसामा बिन ज़ैद अन रसूलुल्लाह बासहू एला अब्ना फकाल: इन्तहा सबा हासमन् हर्रक़ा,3 । इस मुहिम को मौजूदा नाज़ुक हालात में जबकि ख़िलाफ़त का केन्द्र कई तरफ से रुमा घाटी के विद्रोही कबीलों से घिरा हुआ था। मदीने के अपनी राय रखने वाले लोग मसलहत के खिलाफ करार दे रहे थे। इसके बावजूद अबु बकर सिद्दीक़ रज़ियल्लाहू अन्हा मुहिम भेजने पर दृढ़ थे। उनकी राय थी कि उसकी दूर और पास हर जगह चर्चा होगी और अरबों को मालूम हो जाएगा कि मदीने में एक संगठित सरकार मौजूद है जो सैन्य दृष्टि से भी उतनी ही ताक़तवर है कि अरबों के विद्रोह पर ध्यान न दे कर कैसर जैसे शक्तिशाली राजा के सीरियाई महलों तक हमला करने की क्षमता रखती है।  उनका मानना ​​था कि इस मुहिम का अवश्य ये परिणाम होगा कि अरबों में मदीने की धाक और सैन्य शक्ति का नए सिरे से ऐसा रोब बैठ जाएगी कि वो अपने बागी इरादों से हट जाएंगे। ओसामा बिन ज़ैद की फौज में तीन हज़ार सैनिकों, बहुत से ऊंट और एक हज़ार घोड़ों,1 शामिल थे। अगर इस्लाम की पोज़ीशन कमज़ोर होती और बागियों से लड़ने के लिए हथियारों और घोड़ों का तोड़ होता तो अबु बकर सिद्दीक़ डिप्लोमैटिक फायदे के बावजूद ये मुहिम भेजकर इस्लाम और ख़िलाफ़त के केन्द्र को जो कई ओर से दुश्मन कबीलों से घिरा हुआ था, खतरे में डालने के लिए तैयार न होते। ओसामा बिन ज़ैद रज़ियल्लाहू अन्हा की मुहिम का भेजना इस बात की स्पष्ट दलील है कि अबु बकर सिद्दीक़ रज़ियल्लाहू अन्हा के तरकश में अभी कई तीर मौजूद थे जिनसे वो विद्रोहियों और हमलावरों का भरपूर मुक़ाबला करने में सक्षम थे। इस मुहिम से बग़ावत पर अमादा अरबों के हौसले पस्त हो गए और उनकी बुरी आकांक्षाओं को ज़बरदस्त चोट पहुँची। ये ओसामा बिन ज़ैद रज़ियल्लाहू अन्हा की मुहिम ही की बरकत थी कि अलक़ुरा घाटी से सीरिया की सीमा तक बसने वाले अरब क़बीले और करीब आधा दर्जन ईसाई और यहूदी इलाक़े विद्रोह का साहस न कर सके और पहले की तरह ज़कात और जज़िया अदा करते रहे।

ओसामा बिन ज़ैद रज़ियल्लाहू अन्हा के बाहर निकलने के कुछ दिन बाद उत्तर पूर्व और मदीना के पश्चिमी उपनगरों के कई प्रमुख क़बीलों ने जो मदीने की अधीनता से मुक्ति पाने के लिए आपसी सहयोग का समझौता कर चुके थे और जिनमें तलीहा का शक्तिशाली कबीला असद भी शामिल था। मदीने को कई ओर से घेर लिया। उनके प्रतिनिधि ये ऐलान करके मदीना में प्रवेश किया कि हम नए खलीफा से ज़कात माफ कराना चाहते हैं लेकिन उनका असल मकसद जासूसी था और ये मालूम करना कि ख़िलाफ़त के केन्द्र में रक्षा का क्या प्रबंध है। कितनी फौज और कितने घोड़े हैं। अबु बकर सिद्दीक रज़ियल्लाहू अन्हा इन पड़ोसी क़बीलों से इतने नाराज़ थे कि उन्होंने उनके प्रतिनिधिमंडल से मुलाकात तक नहीं की और कहला दिया कि ज़कात तो ज़कात अगर आपने ज़कात के ऊंट का बंधन तक देने से इंकार किया तो बुरी तरह खबर ली जाएगी। खलीफा के रूखे व्यवहार पर गुस्सा दिखाते और हमले की धमकियां देता प्रतिनिधिमंडल चला गया और अपने कबीलों को जाकर सूचित किया कि मदीने की सारी सेना ओसामा बिन ज़ैद रज़ियल्लाहू अन्हा के साथ चली गई है और शहर पर हमला कर के लूटने और सरकार की बिसात उलटने का सबसे अच्छा मौका है। उनको नहीं मालूम था कि मदीना की सरकार के हजारों सैनिक घोड़े कुछ मील दूर नक़ी के चारागाह में सुरक्षित थे और मदीने के खज़ाने में न पैसे की कमी थी और न असलहा खाने में हथियारों की।

प्रतिनिधिमंडल की नामुराद वापसी के बाद अबु बकर सिद्दीक रज़ियल्लाहू अन्हा चौकन्ना हो गए और हमले की उम्मीद में उन्होंने शहर आने वाले सभी रास्तों की नाकाबंदी करा दी। तीन दिन बाद बेनील मराम लौटने वाले प्रतिनिधिमंडल के साथ आपसी समझौते वाले क़बीलों ने मदीने पर हमला कर दिया। सिद्दीकी मोर्चों ने उनका मुंहतोड़ जवाब दिया।  समझौता करने वाले क़बीलों का नेतृत्व तोलीहा का जनरल और भतीजा हेबाल कर रहा था। अबु बकर सिद्दीक रज़ियल्लाहू अन्हा के रेसालों ने उसे मार डाला। क़बीले भाग गए और अपने अपने क्षेत्रों में जाकर विरोधी गतिविधि में शामिल हो गए।

अबु बकर सिद्दीक ने बड़े पैमाने पर सैन्य तैयारी शुरू कर दी, घोड़े और ऊंट मदीने के बाहर जमा होने लगे, सेना के लिए खजूर, सत्तू और हथियार का भंडारण किया जाने लगा। सरकार के पश्चिम और उत्तर यानि रुमा घाटी और नज्द के खतरनाक विद्रोहियों को क़ाबू में करने के लिए तो उन्होंने ख़िलाफ़त का ओहदा संभालने के दो तीन सप्ताह के भीतर ही कई सेनाएं रवाना कर दी थीं। दो महीने बाद जब ओसामा बिन ज़ैद रज़ियल्लाहू अन्हा दक्षिण सीरिया की बस्ती उब्ना पर बदले की कार्वाई करके अपनी सेना के साथ सही सलामत वापस आ गए तो अबु बकर सिद्दीक रज़ियल्लाहू अन्हा ने अपने दौर के विद्रोहियों को सज़ा देने के लिए और सैनिक रवाना किया। रिपोर्टर बताते हैं कि उन्होंने अरब प्रायद्वीप में ग्यारह,1 मोर्चा बनाने और हर मोर्चे पर अलग सिपहसालारों की कमान में पैदल सेना और रेसाले रवाना किये गये और उन्हें ज़रूरत के मुताबिक़ बराबर रसद और कुमक भेजते रहे। इतने मोर्चों के लिए घोड़े, हथियार और ऊँट, दौलत के इसी भण्डार से उपलब्ध किए गए जिसका स्रोत रसूलुल्लाह सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम अपनी ज़िंदगी में खोल गये थे।

जैसा कि ऊपर बयान किया गया कि मदीने के दक्षिण में अलक़ुरा घाटी से सीरिया की सीमा तक अरब कबीलों समेत  ईसाई और यहूदी जज़िया देने वाली बस्तियों ने ओसामा बिन ज़ैद की सेना से डर कर कोई आपत्तिजनक हरकत नहीं की थी इसलिए अबु बकर सिद्दीक रज़ियल्लाहू अन्हा के सज़ा देने वाले लश्कर का रुख मदीने के उत्तर, उत्तर-पूर्व, पूर्व और दक्षिण पूर्व की ओर था। इन दिशाओं में स्थित जिन क्षेत्रों में अबु बकर सिद्दीक रज़ियल्लाहू अन्हा की सेनाओं ने जंगे लड़ीं उनमें बुज़ाखा, यमामा, बहरीन, ओमान, महरा, हज़र मौत, यमन और तहामा की लड़ाई मशहूर हैं। अरब विद्रोही संख्या में जितने अधिक और आर्थिक रूप से जितने अधिक शक्तिशाली होते उतना ही सिद्दीकी सेनाओं का मुकाबला उनसे सख्त होता, फिर भी हर मोर्चे पर अंतिम विजय सिद्दीक़ी सेना को ही नसीब होती। कई विद्रोही या विद्रोही प्रवृत्ति के अरब जंग की आग की लपटों में फंसकर लड़ते हुए मारे गए। उनकी एक खासी तादाद को जिनका कुसूर ज़्यादा गंभीर माना गया, आग में डालकर जला दिया गया,1 । जो गिरफ्तार हुए उन्हें क़त्ल कर दिया गया और उनके बाल बच्चे गुलाम बनाए गए। कई मवेशी जिनमें कीमती घोड़े भी शामिल थे साथ ही हथियार, सामान और जो विजेताओं के हाथ आया और उसका ख़ुम्स खलीफा पास मदीने भेज दिया गया। इस तरह लगभग दो साल में देश के कोने कोने से विद्रोह और विरोध का खात्मा कर के अबु बकर सिद्दीक़ के जनरलों ने फिर अरब प्रायद्वीप पर इस्लाम के पैर जमा दिये। अरब कुछ इस बुरी तरह पिटे और उनके सम्माननीयों को ऐसी सबक देने वाली सज़ा दी गई कि इस्लाम के धार्मिक, राजनीतिक और आर्थिक मांगों से बग़ावत का नशा हमेशा के लिए उनके सिर से दूर हो गया।

इन सज़ा देने वाली मुहिम पर मदीना की सरकार का जितना रुपया खर्च हुआ उसकी भरपाई काफी हद तक माले ग़नीमत (लड़ाई के बाद मिला हुआ माल) से हुई। इसके अलावा ज़कात की वो आमदनी खुल गई जो साल डेढ़ साल पहले अरब क़बीलों ने रोक ली थी। इसके साथ ही जज़िये की वो रकमें भी बहाल हो गईं जो ओमान और बहरीन के पारसी, ईसाई और यहूदी अल्पसंख्यकों ने आम अरब विद्रोह से फायदा उठा कर बंद कर दी थीं। सच ये है कि अरब बगावतें भविष्य में इस्लाम के धार्मिक, राजनीतिक और आर्थिक विकास के लिए छिपी हुई बरकत साबित हुईं। इनकी बदौलत हमेशा के लिए अरब इस्लाम के आज्ञाकारी हो गए। उनकी बदौलत उन्होंने मदीने की बिना शर्त वफादारी ही स्वीकार नहीं की बल्कि अपनी गाढ़ी कमाई में मदीना की सरकार को साझीदार बनाया और साथ ही उन्होंने इस्लाम के विस्तार और विकास के लिए अपने हाथों की पूरी ताक़त उनके कदमों में रख दी। अबु बकर सिद्दीक़ ने ताक़त के इस स्रोत से फायदा उठाने की ठान ली।

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