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Have the Taliban Changed? क्या तालिबान बदल गया है?

खुर्शीद नदीम

उर्दू से अनुवाद, न्यू एज इस्लाम

8 सितंबर, 2021

तालिबान बदल गए हैं। तालिबान की नई पीढ़ी पहले से अलग है

तालिबान के समर्थक यह बात कहते और लिखतेसुनाई और दिखाई देते हैं। इन वाक्यों में यह बात निहित है कि तालिबान की पहली नस्ल ने जो कुछ कियावह सब सहीह नहीं था। तालिबान की पहली पीढ़ी ने ऐसा क्या किया था? नई पीढ़ी पहले से अलग कैसे है? उन्हें अलग दिखाई देने की आवश्यकता क्यों महसूस हुई? यह मतभेदनज़र का धोका है या वास्तविक है? आज कोई भी विश्लेषक इन सवालों को नज़रअंदाज़ नहीं कर सकता।

अफगानिस्तान पर तालिबान का शासन है

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तालिबान एक ऐसा प्रतिरोध समूह है जिसने अपने प्रतिरोध को एक विचारधारा के तहत संगठित किया। उसने इसी विचारधारा की रौशनी में अपनी रणनीति तैयार की। जब वह सत्ता में आया, तो उसने इसी विचारधारा के अनुसार शासन किया। जब यह कहा जाता है कि तालिबान बदल गया है, तो क्या इसका मतलब यह है कि उनकी वैचारिक काया कल्प हो गई  है? इस आंदोलन को बिना किसी पूर्वाग्रह के समझा जाना चाहिए। पूर्वाग्रह सही निष्कर्ष पर पहुंचने में एक बड़ी बाधा है ज्ञान की कमी जैसे अन्य कारक हैं लेकिन पूर्वाग्रह सबसे बड़ा हिजाब है।

तालिबान के इस आंदोलन को तीन तरह से समझा जाना चाहिए: एक वैचारिक संरचना। दूसरा है अपनी प्रतिबद्धता का अहसास, तीसरा है रणनीति। वैचारिक रूप से, हम जानते हैं कि तालिबान देवबंद की बौद्धिक परंपरा से ताल्लुक रखते हैं। यह परंपरा हनफ़ी फिकह और सूफ़ीवाद (तसव्वुफ़) का एक मुरक्का है। हालाँकि, इस परंपरा में नए विषय भी जोड़े गए, जैसे मौलाना तकी उस्मानी की आधुनिक वित्तीय प्रणाली और बैंकिंग प्रणाली की पुष्टि। हालांकि देवबंदियों के एक समूह ने ही इससे असहमति व्यक्त किया, लेकिन तकी उस्मानी की समझ को सार्वजनिक स्वीकृति मिली।

पाकिस्तान में देवबंद के लोगों ने भी आधुनिक लोकतांत्रिक व्यवस्था से संबंध बनाए। उन्होंने एक ऐसे संविधान का मसौदा तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई जिसने संसदीय प्रणाली का समर्थन किया और वयस्क मताधिकार के आधार पर चुनावों को मान्यता दी। संविधान, वोट, संसदीय लोकतंत्र, राजनीतिक दलों का गठन, ये सभी अवधारणाएं आधुनिक लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए जिम्मेदार हैं जिन्हें स्वीकार कर लिया गया है। इस्लामी पहचान के लिए, संविधान में एक प्रावधान भी शामिल था कि कुरआन और सुन्नत के खिलाफ कोई कानून नहीं हो सकता। संविधान संसद को कानून बनाने का अधिकार देता है और इसे किसी विशेष फिकही व्याख्या के लिए बाध्य नहीं करता है। दूसरी ओर, भारत में देवबंदी उलमा धर्मनिरपेक्षता को सही मानते हैं और भारत को एक धर्मनिरपेक्ष राज्य के रूप में देखना चाहते हैं।

तालिबान की राज्य की अवधारणा क्या है? क्या वे पाकिस्तानी उलेमा ए देवबंद की व्याख्या से सहमत हैं या भारतीय उलेमा के विचारों से? अतीत में, उन्होंने इस्लामिक अमीरात की बात की थी। राज्य की यह अवधारणा वर्तमान लोकतांत्रिक व्यवस्था को स्वीकार नहीं करती है। उनका चरित्र, जो पहले तालिबान युग के दौरान उभरा, बताता है कि वह वास्तव में एक धार्मिक राज्य के कायल है। एक राज्य जिसमें एक धार्मिक वर्ग होता है और परामर्श की प्रक्रिया भी उस वर्ग तक ही सीमित होती है। समकालीन दुनिया में ईरान इसकी एक उदाहरण है।

क्या तालिबान की आज राज्य के प्रति धारणा बदल गई है? इसका जवाब नहीं है। नए तालिबान ने स्पष्ट कर दिया है कि वे लोकतंत्र में विश्वास नहीं करते हैं। वे उलमा की सलाह का पालन करते हैं। जब आधुनिक तालिबान से महिलाओं और परदे के बारे में पूछा गया तो उनका जवाब था कि यह उलेमा तय करेंगे। इसलिए, वैचारिक रूप से, नए तालिबान पुराने तालिबान के समान ही हैं। यहां सवाल यह है कि क्या आज के उलमा वही हैं या वे बदल गए हैं? इसके लिए हमें उस समय का इंतजार करना होगा जब वे सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक मुद्दों पर रणनीति बनाएंगे। आसार यह है कि उनकी सोच में कोई बदलाव नहीं आया है।

रहा आधुनिक संदर्भ, तो आज तालिबान में व्यावहारिकता प्रमुख है। तालिबान संयुक्त राज्य अमेरिका सहित किसी के साथ दुश्मनी नहीं चाहता है। नए तालिबान को एहसास है कि पूरी दुनिया से एक ही समय में लड़ाई नहीं लड़ी जा सकती है। पहले दौर में भी हालांकि उन्होंने स्वयं को अफगानिस्तान ही तक सीमित रखा मगर वह दुनिया को दारुल इस्लाम और दारुल कुफ्र में बंटा देखते थे। इस बार ऐसा नहीं है। वे दूसरों के अधिकार को भी स्वीकार कर रहे हैं और इसे धार्मिक दृष्टिकोण से नहीं देख रहे हैं। इस अध्याय में असली परीक्षा तब शुरू होगी जब उन्हें दुनिया से निपटना होगा। हर देश संयुक्त राष्ट्र संगठन का सदस्य होने के नाते कई समझौतों  में जकड़ा हुवा है। इनका पालन सदस्य देशों पर अनिवार्य है। इन समझौतों में से कई प्रावधान तालिबान के जीवन की अवधारणा के साथ असंगत हैं। क्या तालिबान यहां भी कोई बदलाव दिखाएगा? हमें प्रश्न के जवाब के लिए इंतजार करना होगा।

अब, रणनीति पर चलते हैं। ऐसे संकेत हैं कि तालिबान की रणनीति भी बदल रही है। पहले दौर में रोमान का बोलबाला था। यह अफगान रिवायात के साथ रोमान ही था जो ओसामा बिन लादेन को अमेरिका के हवाले करने में रुकावट हुआ। तालिबान के सिर्फ एक फैसले ने दुनिया बदल दी। उनकी सरकार का अंत तो हुआ ही। दुनिया एक नई उथल-पुथल में मुब्तिला हुई जिससे वह आज तक बाहर नहीं निकल सकी। अब तालिबान सरकार को खुद अल कायदा और आईएसआईएस जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा। आज के तालिबान को अपने देश को आतंकवाद से सुरक्षित बनाना है। आज अल-कायदा उनका सहयोगी नहीं है, वह उनका प्रतिद्वंदी है।

इस बार तालिबान ने अन्य राजनीतिक समूहों के अस्तित्व को स्वीकार किया है।आज, हालांकि अब्दुल्ला अब्दुल्ला और हामिद करजई की नजरबंदी की खबर है, इस खबर की पुष्टि की जरूरत है। यदि तालिबान एक व्यापक-आधारित सरकार की ओर बढ़ता है, तो गृहयुद्ध की संभावना कम हो जाएगी। प्रश्न यह है कि वह वासीउल बुनियाद सरकार के साथ इस्लामी अमीरात के इस अवधारणा को कैसे हकीकत बना सकेंगे' तालिबान जिसके दाई हैं? यह एक सच्चाई है कि कोई भी दुनिया से कटकर इस धरती पर अपने सपनों का द्वीप नहीं बसा सकता है। अमेरिका ऐसा करने में सक्षम है न ही कोई और। यहां सभी को बदलना होगा। जीवन एक नाजुक शाखा के लचीलेपन की मांग करता है। यह हवा में झूलता है लेकिन तने से जुड़ा रहता है। वह जानती है कि यह एक निश्चित सीमा तक ही हवा का विरोध कर सकती है। अधिक प्रतिरोध उन्हें तने से अलग कर देगा।

तालिबान को अब बिना किसी देरी के व्यवस्था की ओर बढ़ना चाहिए। पहले शांति और फिर व्यवस्था। शांति के लिए सहमति की जरूरत है। व्यवस्था ने व्यक्तियों की भर्ती की। दुनिया ने अभी तक उनकी हुकूमत को स्वीकार नहीं किया इसलिए सरेदस्त किसी अंतरराष्ट्रीय समझौते का कोई सवाल ही नहीं है। दुनिया इसे स्वीकार करेगी लेकिन कुछ गारंटी चाहेगी। क्या तालिबान इसके लिए तैयार होगा?

जीवन की अवधारणा और समकालीन दुनिया की समझ का संयोजन सही रणनीति का आधार बन सकता है। जीवन की अवधारणा, चाहे वह कितनी भी उच्च क्यों न हो, उसकी कोई व्यावहारिक उपयोगिता नहीं है यदि वह अपने समय के अनुरूप नहीं है। मानव अंतर्दृष्टि के लिए परीक्षा यही है कि वह इस बात के समझ के साथ कोई रणनीति बनाता है या इससे बेनियाज़ हो कर। तालिबान को कितना बदलने की जरूरत है यह भी इस बात पर निर्भर करता है। बदलने के अलावा कोई चारा नहीं है। सवाल यह है कि क्या बदलाव के बाद भी वे तालिबान ही रहेंगे?

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