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Hindi Section ( 10 Apr 2013, NewAgeIslam.Com)

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The Salafi Wave in South Asia Episode-2 दक्षिण एशिया में फैलता हुआ सल्फ़ी आंदोलन- क़िस्त 2


 खामा बगोश मदज़िल्लहू, न्यु एज इस्लाम

10 अप्रैल, 2013

पाकिस्तान और भारत में धार्मिक रूप से नए कट्टरपन का प्रदर्शन बहुत आम हो चुका है और सोशल मीडिया से लेकर टेलीविज़न प्रोग्रामों और हर तरह की सामाजिक व्यस्तताओं के साथ साथ राजनीतिक व आर्थिक सुधार भी बदल रहे हैं। मिसाल के तौर पर पाकिस्तान में सल्फ़ियत के प्रभाव के तहत सामाजिक परिवर्तन बहुत स्पष्ट है। सदियों से आम मुसलमानों के रोज़मर्रा के इस्तेमाल का शब्द 'ख़ुदा हाफिज़' तब्दील होकर अल्लाह हाफिज़ बन चुका है। कुछ समय पहले इस सम्बंध में बाकायदा एक मुहिम चलायी गयी कि ख़ुदा हाफ़िज़ में खुदा का शब्द फारसी और हिंदू खुदाओं से सम्बंधित है और खुदा वो होता है जिसका बुत (मूर्ति) बनाया जाता है जबकि इस्लाम का रब अल्लाह है, ख़ुदा नहीं। ख़ुदा का बहुवचन ख़ुदाओं है और हिंदू कथाओं में कई भगवान हैं जबकि इस्लाम में सिर्फ़ एक अल्लाह और अल्लाह शब्द का बहुवचन मौजूद नहीं है।

पाकिस्तान में आप किसी को ख़ुदा हाफ़िज़ कहें तो वो नाराज़ हो जाएगा और अगर आपसे विदा होते समय उसके पास थोड़ा वक्त मौजूद होगा तो वो आपका सुधार ज़रूर करेगा कि अल्लाह हाफिज़ कहो, ख़ुदा हाफ़िज़ कहकर आप गुनाह कर रहे हैं। अगर कोई इसके जवाब में एतराज़ या कोई इल्म की बात पेश करने की कोशिश करे तो हो सकता है कि आपको जान से हाथ धोना पड़े, क्योंकि इस तरह की बहस में तौहीने रिसालत का पहलू भी निकल सकता है जिसके बाद ये भी मुमकिन है कि बहस करने वाले को वहीं पर जज़्बाती (भावुक) मुसलमानों की भीड़ हिंसा के बाद आग लगा दे। ऐसी घटनाओं का उल्लेख अभी कुछ समय के लिए टाल देते हैं। मैं आपके सामने ऐसी दर्जनों घटनाएं पेश करूँगा कि किस तरह मामूली प्रकार की बहस के बाद कई लोगों को जान से हाथ धोना पड़े।

अगर किसी को जमातुद् दावा के केंद्र नंगल साहेदाँ (मुरीदके) जाने का अवसर हो तो वो अपनी आँखों से देखेगा कि मक्का और मदीना कॉलोनी के मुख्य दरवाज़े पर सशस्त्र गार्ड अपने हाथ में बड़े मार्कर लेकर बैठे हुए नज़र आएंगे, जो कालोनियों में दाखिल होने वालों की तलाशी लेते हैं। अगर उनमें से किसी के पास कोई अखबार या मैग्ज़ीन या किताब हो तो वो उसे ध्यान से देखते हैं और अगर कहीं कोई तस्वीर नज़र आ जाए तो उस पर तुरंत स्याही फेर दी जाती है क्योंकि इस्लाम में गैर महरम की तस्वीरें देखना मना है और फोटोग्राफी तो निश्चित रूप से गैर इस्लामी काम है और इसकी गिनती शिर्क जैसे गुनाहों में किया जाता है। लश्करे तैयबा की पत्रिकाओं, मोजल्ला दावा और मोजल्ला अल-हरमैन में कोई तस्वीर छपी नहीं होती, जब किसी भीड़ की तस्वीर छापना आवश्यक हो तो कोशिश करके लोगों के चेहरों को धुँधला कर दिया जाता है। यही हाल टेलीविज़न के हवाले से भी है कि मक्का और मदीना कालोनियों में आप कोई टीवी नहीं देख सकते क्योंकि नवसल्फ़ियत की नज़र में टीवी देखना हराम है। ये अलग बात है कि जमातुद् दावा और लश्करे तैयबा के मुख्य नेता हाफ़िज़ मोहम्मद सईद और मौलाना अमीर हमज़ा जो टीवी के खिलाफ़ अपने फतवे जारी कर चुके हैं अब कोशिश कर के टीवी पर आते हैं और लम्बे भाषण देते हैं। इसके अलावा कोई भी व्यक्ति मक्का और मदीना कालोनियों के अंदर सिगरेट और पान नहीं ले जा सकता क्योंकि लश्करे तैयबा की नज़र में सिगरेट और पान गैर इस्लामी हैं।

पाकिस्तान में सल्फ़ियत के तूफ़ान के कई पहलू देखे जा सकते हैं, जो स्पष्ट रूप से नज़र आ जाते हैं, जो आज से कुछ वक्त पहले मौजूद नहीं थे। मिसाल के तौर पर लश्करे तैयबा ने विशेष अभियान के तहत पंजाब में बसे हिंदुओं को वहां से निकल जाने पर मजबूर कर दिया है। इस जबरन हिजरत (प्रवास) के ख़िलाफ़ पाकिस्तान के मीडिया में एक शब्द भी नहीं छपा, क्योंकि अखबारों और टीवी चैनलों के न्यूज़ रूम में ऐसे लोगों की तादाद बहुत अधिक है जो जिहादी और सल्फ़ी दृष्टिकोण के समर्थक हैं और जिहादी और सल्फ़ी संगठनों की इस तरह की कार्रवाईयों का पूरी तरह समर्थन करते हैं। सियालकोट, गुजरानवाला, गुजरात, शेख़ूपुरा और कई दूसरे ज़िलों में बसे सैकड़ों हिंदुओं को खामोशी के साथ वहां से बेदखल कर दिया गया है। सामान्य प्रक्रिया हिंदू लड़कियों के अपहरण से शुरू होती है जिन्हें बाद में इस्लाम क़ुबूल करने पर मजबूर किया जाता है। अगर वो इस्लाम स्वीकार कर लें तो उनका हिंदू परिवार अपनी बेइज़्ज़ती की वजह से इलाक़ा छोड़ देता है और अगर इस्लाम क़ुबूल न करें तो उन्हें मार दिया जाता है। जिसके बाद हिंदू अपने आपको और अधिक असुरक्षित मानते हुए इलाका छोड़ देने को प्राथमिकता देते हैं केवल पंजाब में पिछले तीन बरसों में ऐसी बाईस घटनाएं हुई हैं जिनमें या तो अग़वा हुई लड़कियों को क़त्ल कर दिया गया या फिर उन्हें जबरन इस्लाम क़ुबूल करने को मजबूर किया गया। सियालकोट के रहने वाले बाबू राम भगत परिवार के साथ पेश आने वाली घटना इस मामले में मिसाल का दर्जा रखती है, कि उसकी दो नवासियों का अपहरण कर लिया गया, एक ने इस्लाम क़ुबूल कर लिया लेकिन दूसरी ने इन्कार किया तो उसे फांसी दे दी गई, जिसके बाद ये परिवार भारत पलायन कर गया और आज दर बदर की ठोकरें खा रहा है, क्योंकि इस परिवार के लोग अपने गांव के लोगों को खत लिखकर अपनी बदहाली से बाखबर रखते हैं।

सल्फ़ियत के प्रसार की घटनाओं में सबसे महत्वपूर्ण पंजाब के गांवों में सूफ़ी संतों के धार्मिक स्थलों पर सदियों से लगने वाले मेलों और समारोहों का लगातार खत्म होना है। आज सत्तर फीसद ऐसे मेले सिर्फ कुरान ख़्वानी तक सीमित हो चुके हैं। जहां पहले बाज़ार लगते थे और क़व्वालों से लेकर लोक गीत गाने वालों तक यहाँ आते थे, अब कव्वाल सीडी रिकॉर्ड करवा के बेचने और सिर्फ टीवी चैनलों पर त्योहारों के मुताबिक़ क़व्वाली करने तक सीमित हैं। पारंपरिक क़व्वालों और लोक कलाकारों की बड़ी संख्या क़व्वाली और गाना छोड़ चुकी है। जबकि अनगिनत ऐसे हैं जो नात ख़्वाँ (नात पढ़ने वाले) बन गए ताकि रोज़ी रोटी से बिल्कुल महरूम न हो जायें। लाहौर में थिएटर और स्टेज के पारंपरिक केंद्रों अल-हुमरा सेन्टर को दिन में दर्जनों धमकी मिलती हैं कि अगर ख़िलाफ़े इस्लाम नाटक और नृत्य बंद न किया गया तो पूरे सेंटर को बम से उड़ा दिया जाएगा। इस सम्बंध में मशहूर कलाकार उस्मान पीरज़ादा प्रेस कांफ्रेंस भी कर चुके हैं।

पाकिस्तानी समाज में सल्फ़ियत के प्रचार प्रसार की स्पष्ट मिसाल 1974 में संसद के द्वारा पास किये गए एक कानून के अंतर्गत काफ़िर करार दिए जाने वाले अहमदियों के बारे में जनता की राय है। कुछ साल पहले जब लाहौर में अहमदियों पर हमले करके सौ से अधिक लोगों की हत्या कर दी गयी तो इस घटना की रिपोर्टिंग करने वाले पत्रकारों ने लाइव रिपोर्टिंग के दौरान अहमदियों के बारे में कहा कि उनकी मस्जिदों पर हमले हुए हैं। तुरंत जिहादी संगठनों के दफ्तरों से टीवी चैनलों पर फोन किये गए कि अहमदियों की इबादतगाहों को मस्जिद न कहा जाए। मीडिया के लिए ये एक खुली धमकी थी, तुरंत सभी टीवी चैनलों ने माफी मांगी और मस्जिद कहने पर पाबंदी लगा दी गई। अब सभी टीवी चैनलों ने उन जगहों को अहमदी इबादतगाह कहना शुरू कर दिया। मिसाल के तौर पर कोई अहमदी किसी मुसलमान को अस्सलामोअलैकुम नहीं कह सकता क्योंकि शब्द अस्सलामोअलैकुम मुसलमानों की मिल्कियत है और उसको कोई गैर मुस्लिम इस्तेमाल नहीं कर सकता। इसलिए जो अहमदी अस्लामोअलैकुम कहेगा उस पर इस्लाम के अपमान का कानून लागू होगा और वो 295 बी के कानून के तहत सज़ा का हक़दार होगा। पाकिस्तान के मानवाधिकार आयोग के द्वारा जारी किये गये आँकड़ों के मुताबिक़ सैकड़ों अहमदी पाकिस्तान की जेलों में सड़ गल रहे हैं जिन्होंने किसी मुसलमान को अस्लामोअलैकुम कहा, किसी मुसलमान के सामने अलहम्दोलिल्लाह या माशाअल्लाह या फिर इंशाअल्लाह जैसे शब्द कहे। कई ऐसे मामले भी पाकिस्तान की निचली अदालतों में चल रहे हैं जिनमें अहमदियों को सज़ाएं हो सकती हैं। क्यों इन अहमदियों ने ऐसे शादी कार्ड छपवाए जिन पर माशाअल्लाह शब्द और बिस्मिल्लाह लिखा हुआ था।

मिसाल के तौर पर इस साल 14 फरवरी को आमतौर पर मनाए जाने वाले वैलेंटाइन डे को पाकिस्तान में 'हया डे' के नाम से मनाया गया। जनवरी से ही सोशल मीडिया और पाकिस्तानी मीडिया में ये बहस शुरू कर दी गई थी कि वैलेंटाइन डे गैर इस्लामी और निर्लज्जता का दिन है, उसे मनाना ग़ैर इस्लामी काम है इसलिए जमाते इस्लामी और जमातुद् दावा के नौजवानों ने पाकिस्तान भर में इस दिन को 'हया डे' के नाम से मनाने का ऐलान किया। मीडिया में हया डे की बहुत अधिक चर्चा की गयी और सभी सशस्त्र हिंसक जिहादी संगठनों ने धमकी जारी की है कि अगर किसी होटल या किसी दूसरी जगह पर किसी ने वेलेंटाइन डे मनाने की कोशिश की तो उसे गंभीर परिणाम भुगतने के लिए तैयार रहना होगा। इसी तरह न्यु इयर समारोहों को पाकिस्तान में गैर इस्लामी करार दे दिया गया और हिंसक जिहादी संगठनों ने इस दिन पर गैर इस्लामी समारोह आयोजित करने वालों के ख़िलाफ़ बाक़ायदा डंडा फोर्स स्थापित की और ऐसी जगहों को निशाना बनाने की धमकी दी, जहां नए साल से जुड़े किसी तरह के समारोह मनाए जाने की संभावना थी। पाकिस्तान में बढ़ावा पा रही सल्फ़ियत को आसानी से देखा जा सकता है और ये संभावना बढ़ रही है कि उसे रोकना मुश्किल से मुश्किल होता जाएगा क्योंकि सामाजिक और राजनीतिक रूप से सल्फ़ी मानसिकता के लोगों की तादाद में तेज़ी के साथ इज़ाफा हो रहा है। अगली क़िस्त में सल्फ़ी साहित्य पर चर्चा होगी कि पाकिस्तान में किस प्रकार सल्फ़ी साहित्य को बढ़ावा मिल रहा है और उसकी स्वीकृति की स्थिति क्या है। (जारी)

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