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Hindi Section ( 6 Apr 2013, NewAgeIslam.Com)

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The Salafi Wave in South Asia Episode-1 दक्षिण एशिया में फैलता हुआ सल्फ़ी आंदोलन- क़िस्त 1


 खामा बगोश मदज़िल्लहू, न्यु एज इस्लाम

1 अप्रैल, 2013

बहुत से लोग इस बात से नाराज़ हैं कि मैंने अपने पिछले लेख में कुछ हदीसों और पाकिस्तान भारत के दो मशहूर उलमा के हवाले के साथ इस्लाम के विशेष हिंसक रुख को उजागर करने की कोशिश क्यों की है। मैं इस बात पर हैरान हूँ कि पाकिस्तान और भारत में आम पढ़े लिखे लोगों की धार्मिक मसलको (पंथो) और समूहों के बारे में जानकारी या तो बिल्कुल वाजिब है या फिर वही है जो उन्हें विरोधी धर्म और मसलकों (पंथों) के उलमा और खतीबों (धार्मिक वक्ता) की तरफ से मुहैय्या की जाती है। मिसाल के तौर पर हर उस गैर शिया धार्मिक और पंथीय गिरोह को वहाबी कह दिया जाता है जो सांप्रदायिक हिंसा और गैर मुस्लिमों के बारे में सख्त रवैय्या रखता है।

लेकिन मज़े की बात ये है कि अब पाकिस्तान में विशेष रूप से शिया लोगों में भी 'वहाबी' समुदाय अस्तित्व में आ चुका है। शिया लोग ऐसे पंथ वाले लोगों को वहाबी कहते हैं, जो बेतहाशा अतिश्योक्ति और पारम्परिक प्रतिष्ठा को तोड़ना चाहते हैं। वहाबी मुख्य रूप से दक्षिण एशिया में कुछ हद तक नापसंद किरदारों को कहा जाता है जो धार्मिक लोगों के प्राचीन पारंपरिक प्रतिष्ठा को स्वीकार करने से इन्कार कर देता है और सदियों की बनी बनाई इन हस्तियों की दिव्य कल्पना को आम स्तर पर लाने की कोशिश करता है। एक दूसरा नाम भी ऐसे शिया लोगों के लिए बहुत प्रसिद्ध हो चुका है और वो है मकसर (घटाने वाला, कम करने वाला) यानी ऐसा व्यक्ति जो अहले बैत की शान में कमी करता है जबकि गैर मकसरीन को 'मलंग' का नाम दिया जाता है। यानी ऐसा वर्ग जो इबादत से ज़्यादा अहले बैत के फ़ज़ाइल बयान करने पर ध्यान देता है। उसका यक़ीन है कि वो आम इस्लामी इबादत के बजाय अहले बैत की मोहब्बत की बुनियाद पर जन्नत का हक़दार होगा।

मिसाल के लिए हम देखते हैं कि एक अहले हदीस या ​​आम ज़बान में वहाबी कहलाने वाला मुसलमान ज़्यादातर मामलों में कट्टरपन का प्रदर्शन करता है और अपने इस रवैय्ये को असलाफ यानी बुज़ुर्गाने दीन (सहाबा सहित) की तस्दीक़ (पुष्टि) के साथ औचित्य पेश करता है। वो बजा तौर पर ये एलान करता है कि पाकिस्तान भारत के आम मुसलमान मुशरिकाना बिदअत और काफिराना रस्मों (संस्कार) रिवाज में उलझ कर इस्लाम की असल आत्मा से दूर हो चुके हैं। मिसाल के तौर पर  नवाब सिद्दीक़ हसन खान से लेकर मौलाना अब्दुल्ला बहावलपुरी, अल्लामा एहसान इलाही ज़हीर, यहां तक ​​कि लश्करे तैयबा के प्रमुख हाफ़िज़ सईद की रचनाएं उठाकर देख लें वो जानबूझ कर ये एलान करते हैं कि हनफ़ी बरेलवी मुसलमान बुत परस्ती (मूर्ति पूजा) में हिन्दुओं के बिल्कुल समान हैं। आज पाकिस्तान के लगभग सभी अहले हदीस (वहाबी) उलमा की इस बात पर सहमति है कि सुन्नी बरेलवी आस्था वाले लोग मुसलमान की परिभाषा पर पूरे नहीं उतरते। वो हनफ़ी सुन्नियों के साथ रिश्तेदारी करना छोड़ चुके हैं और अगर कहीं ऐसा इत्तेफाक़ (संयोग) हो जाये तो उनकी कोशिश होती है कि दूल्हा या दुल्हन अगर मोक़ल्लिद हैं और बरेलवी मकतबे फिक्र (विचारधारा) से संबंधित हैं तो उन्हें तत्काल अहले हदीस बनाया जाए और इस मक़सद के लिए बाक़ायदा अहले हदीस उलमा को ज़िम्मेदारी सौंपी जाती है जो 'भटके' हुए लोगों को सीधे रास्ते पर लाने की कोशिश करते हैं। कुछ समय पहले जब लाहौर के एक मशहूर अहले हदीस रोपड़ी खानदान की एक नौजवान लड़की एक बरेलवी सुन्नी लड़के के साथ मोहब्बत की शादी कर ली, तो पूरे देश के अहले हदीस सकते में आ गए और शादी तोड़ने की अपीलें की जाने लगीं।

मैं आज पाकिस्तान भारत के अहले हदीस पंथ के बारे में आप दोस्तों से कुछ बात करना चाहता हूँ, और कोशिश करूँगा कि उनके घोषित विश्वास जो आमतौर पर जाने पहचाने हैं, उनसे हट कर 'नौ सल्फ़ियत' (नवसल्फीवाद) पर बात की जाए जो खासकर पाकिस्तान में तेज़ी के साथ परवान चढ़ रही है। पाकिस्तान में सल्फ़ियत का बाक़ायदा नारा मरकज़ दावतुल इरशाद से सामने आया जो अब अलग अलग समय में लगायी जाने वाली अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय पाबंदियों के बाद जमातुद दावा बन चुकी है। लश्करे तैयबा इस जमात के सशस्त्र संगठन का पुराना नाम है जिसके बारे में जमातुद दावा के के अमीर हाफ़िज़ सईद जानबूझ कर कहते हैं कि उनका लश्कर के साथ कोई संबंध नहीं। नब्बे के दशक के शुरूआत में लाहौर के इंजीनियरिंग युनिवर्सिटी के दो शिक्षक हाफ़िज़ मोहम्मद सईद और प्रोफेसर मोहम्मद ज़फ़र इक़बाल ने सऊदी अरब के एक शेख अबु अब्दुल अज़ीज़ की माली मदद और अलकायदा के आध्यात्मिक गुरु अब्दुल्ला एज़ाम के नेतृत्व में मरकज़ दावतुल इरशाद स्थापित किया। बाद में यही अबु अब्दुल अज़ीज़ हाफ़िज़ मोहम्मद सईद के हमज़ुल्फ़ (साढ़ू) बने और उन्होंने प्रमुख अहले हदीस आलिम मौलाना अब्दुल्ला बहावलपुरी की बेटी से शादी की। मौलाना बहावलपुरी हाफ़िज़ मोहम्मद सईद के मामू और ससुर थे। उल्लेखनीय है कि पिछले साल अमेरिकी गृह विभाग की ओर से जिन दो लोगों के सिरों कीमत तय की गई उनमें हाफ़िज़ सईद के साथ शामिल मौलाना अब्दुर्रहमान मक्की, उन्हीं मौलाना बहावलपुरी के बेटे और हाफ़िज़ मोहम्मद सईद के बिरादरे निस्बती  (साले) हैं।

हाफ़िज़ सईद और ज़फ़र इक़बाल ने जहां मर्कज़ तैयबा और लश्करे तैयबा स्थापित कर पाकिस्तान में धार्मिक उग्रवाद के माहौल में सल्फ़ी उग्रवाद के पौधे को लगाया है, वहाँ सल्फ़ी वहाबी साहित्य को एक विशेष दिशा दी है। हमारे बहुत से दानिशवर (बुद्धिजीवी) और पाक भारत में आतंकवाद पर विशेषज्ञ के रूप में टिप्पणी करने वाले लोग इन उक्त लोगों के शुरू की गयी पत्रिका दावतुल इरशदा और खासकर इसकी सामग्री के बारे में बहुत कम जानते हैं। दो हज़ार सात में पत्रिका अल-दावह के प्रकाशन पर रोक के बाद मासिक अल-हरमैन और अंग्रेजी ज़बान में वाइस ऑफ इस्लाम नामक पत्रिका के बारे में भी अखबारों और पत्रिकाओं में बहुत कम सामग्री मिलती है। पाकिस्तान में इसकी वजह डर है, जो टिप्पणी करने वालों को इस पत्रिका और इनमें प्रकाशित लेखों पर टिप्पणी करने से रोकती है। मिसाल के लिए पत्रिका अल-दावह में लगातार सात साल तक सिलसिलेवार एक रिपोर्ट प्रकाशित होती रही जिसका शीर्षक था 'टी.वी. मार मुहिम' इस अभियान के तहत देश भर में 'मारे' जाने वाले हज़ारों टीवी सेटों की कहानी प्रकाशित की जाती थी, जिन्हें लश्करे तैयबा के मुजाहिदीन ने सरेआम इबरतनाक अंजाम को पहुँचाया। आप हैरान होंगे कि मैंने टीवी जैसी बेजान चीज के लिए मारे जाने का शब्द क्यों इस्तेमाल किया, पत्रिका अल-दावह में टीवी सेट की तबाही को उसकी मौत करार दिया जाता था। बल्कि लश्करे तैयबा के मुजाहिदीन मरहूम (स्वर्गीय) टीवी की चीख़ें और सिसकियाँ भी सुनते, जब वो अहले ईमान के हाथों अपने अंजाम को पहुंचता।

पत्रिका अल-दावह के उन्नीस सौ सत्तानवे के एक प्रकाशन में इस प्रकार वर्णन है,  'शेख़ूपुरा में अलहमदोलिल्लाह लश्करे तैयबा के शाहीनों की परवाज़ काबिले दीद है (उड़ान देखने योग्य है)। शेख़ूपुरा कचेहरी में पिछले शुक्रवार को नमाज़ के बाद लश्कर के शाहीन एक चौक में इकट्ठे हुए और उन्होंने अबु क़तादा भाई के नेतृत्व में एक टी-स्टाल पर यलग़ार (हमला) किया। उस वक्त टी-स्टाल पर लगे मनहूस टीवी स्क्रीन पर बुतपरस्त हिंदू अदाकारा हेमा मालिनी का शिर्किया गाना चल रहा था और बदअक़ीदा लोगों की एक बड़ी तादाद इसको देख रही थी। जैसे ही लश्कर के शाहीन वहां पहुंचे सब लोग सहम गए और लोगों ने अल्लाहो अकबर का नारा बुलंद किया। मनहूस टीवी को पकड़ कर ज़मीन पर फेंका तो उसकी चीखें निकल गई। लश्कर के फिदाईन इस मनहूस टीवी को लेकर क़रीबी कचेहरी चौक में पहुंच गए और उसे मार मार कर अधमरा कर दिया। इसी बीच में अबु क़तादा भाई आगे बढ़े और मनहूस टीवी पर तेल छिड़क कर आग लगा दी। मनहूस टीवी देखते ही देखते हमेशा के लिए जहन्नम रसीद हो गया। उसके बाद मौके पर मौजूद सात नौजवानों ने लश्करे तैयबा में शामिल होने का एलान किया और दौरए आम्मा के लिए अपने नाम लिखवाए। अलहम्दोलिल्लाह ये है जज़्बए ईमानी औऱ क़ूव्वते रब्बानी'

ये अलग बात है कि इसी लश्करे तैयबा प्रमुख हाफ़िज़ सईद अब अपनी प्रेस कांफ्रेंस के लिए टीवी के नुमाइंदों को विशेष रूप से बुलाते हैं और हर समय टीवी इंटरव्यु के लिए बेताब रहते हैं। इस 'इंकलाबी' तब्दीली पर भी आगे बात होगी। इसके बाद हाफ़िज़ सईद लोकतंत्र की ओर आकर्षित हुए और उन्होंने साफ शब्दों में फतवा दिया कि लोकतंत्र कुफ़्र है और अल्लाह के खिलाफ़ खुली जंग। पाकिस्तान में सल्फ़ियत बाक़ादा एक आंदोलन का रूप ले रही है और लश्करे तैयबा के बेरोजगार मुजाहिदीन से लेकर दुखी परिवारों तक के अनगिनत नौजवान इसमें शामिल हो रहे हैं। मिसाल के लिए तीन छोटी छोटी मिसालों से इसकी तीव्रता के बारे में अंदाज़ा लगाया जा सकता है। मुशर्रफ के राष्ट्रपति काल में बहुत शक्तिशाली माने जाने वाले उनके क़रीबी दोस्त और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार तारिक़ अज़ीज़ के बहुत ही पढ़े लिखे बेटे ने जब सल्फ़ियत को स्वीकार किया और अलकायदा के साथ शामिल हो गया तो अफगानिस्तान में अमेरिकी हमले के वक्त उसको बचाने के लिए सेना का एक विशेष विमान तैयार किया गया जिसमें कमांडो की बड़ी संख्या मौजूद थी। इस जहाज़ ने रात के अंधेरे में अफगानिस्तान के शहर कुन्दूज़ तक उड़ान भरी और तारिक़ अज़ीज़ के बेटे को वहां से निकाल लिया। पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी शुजात हुसैन का बेटा पाकिस्तान का नामी गिरामी सल्फ़ी है, जो चरमपंथी संगठनों को दिल खोलकर आर्थिक सहायता प्रदान करता है। इसी तरह मियाँ नवाज़ शरीफ़ जो तीसरी बार प्रधानमंत्री पद के मज़बूत उम्मीदवार हैं। उनका एक बेटा सल्फ़ी जीवन शैली चुन चुका है और आईएसआई के पूर्व प्रमुख जनरल जावेद नासिर के साथ मिलकर जिहाद में शामिल लोगों की मदद कर रहा है। (जारी)

खामा बग़ोश मदज़िल्लहू का परिचयः दुविधा में पड़ा एक मुसलमान जो ये समझने में असमर्थ है कि मुसलमान की असल परिभाषा क्या है? क्या मुसलमान वास्तव में सलामती के पक्षधर हैं या अपने ही सहधर्मियों की सलामती के दुश्मन? इस्लाम के मूल सिद्धांत, इतिहास, संस्कृति और विश्व की कल्पना क्या है? और क्यों आज मुसलमान न सिर्फ सभी धर्मों बल्कि संस्कृतियों के साथ भी संघर्षरत हैं? क्या इस्लाम की विजय होने वाली है या अपने ही अनुयायियों के हाथों पराजित हो चुका है, मैं इन्हीं विषयों का छात्र हूँ और न्यु एज इस्लाम के पन्नों पर आप दोस्तों के साथ चर्चा करने की कोशिश करूंगा।

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