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Hindi Section ( 28 May 2013, NewAgeIslam.Com)

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The Salafi Wave in South Asia- Episode 6 दक्षिण एशिया में फैलता हुआ सल्फ़ी आंदोलन- क़िस्त 6


 खामा बगोश मदज़िल्लह, न्यु एज इस्लाम 

28 मई, 2013

पाकिस्तान की फौज में बढ़ते सल्फ़ी उग्रवादियों के प्रभुत्व के बारे में हालांकि कुछ विदेशी पत्रकारों और विश्लेषण करने वालों के द्वारा लिखी गई पुस्तकों में कुछ मिसालें मिल जाती हैं, लेकिन खुद पाकिस्तानी लेखकों ने अपने ऊपर लागू किये गये सेंसरशिप के कारण इस विषय पर लिखने से बचते रहे हैं। इसकी वजह सरल और स्पष्ट है कि कोई भी 'ओखली में सिर नहीं देना चाहता'' क्योंकि इस मामले में उसका अनंतिम नुकसान अपरिहार्य है।

सलीम शहज़ाद जो बहुत समय तक अफगानिस्तान और कश्मीर में जारी जेहादी गतिविधियों और उनमें शामिल राज्य व राज्य से बाहर के तत्वों के बारे में लिखते रहे। उन्हें अपने लिखे पर धमकियाँ तो शायद मिली हों, लेकिन उनका जीवन सुरक्षित रहा। जैसे ही किस्मत ने पांसा पलटा और सलीम शहज़ाद ने पाकिस्तान के सबसे बड़े शहर कराची में नौसेना के केंद्र मेहरान बेस पर हुए आतंकवादी हमले और उसके कारणों के बारे में लिखा, सलीम शहज़ाद का मौत ने पीछा करना शुरू कर दिया। आईएसआई के केंद्रीय कार्यालय से अहमद शुजा पाशा की तरफ से सलीम शहज़ाद को सबक सिखाने के लिए बाकायदा आदेश जारी हुआ जिसे शुजा पाशा के दाहिने हाथ कर्नल खालिद राजा ने सलीम शहज़ाद के क़त्ल के रूप में अंतिम नतीजे तक पहुंचा दिया।

बाद में पता चला सलीम शहज़ाद की सिर्फ हड्डियां तोड़ने की हद तक ये आदेश था लेकिन बेचारा सलीम शहज़ाद हड्डियां टूटने की तकलीफ़ बर्दाश्त नहीं कर सका और इस्लामाबाद के पास स्थित आईएसआई के टॉर्चर सेल में इंतेक़ाल कर गया। बाद में ख़ालिद राजा और उसके साथियों ने मंडी बहाउद्दीन में एक सुनसान स्थान पर सलीम शहज़ाद का शव फेंक दिया और इस तरह कहानी अंजाम को पहुंची। सलीम शहज़ाद के क़ातिल कर्नल खालिद राजा ने अहमद शुजा पाशा का पूरा पूरा साथ दिया और यहां तक ​​साथ देने की मिसाल कायम की कि ब्लैक मनी को दुबई ले गया और अहमद शुजा पाशा के लिए उनके एक करीबी सम्बंधी के नाम से एक स्थानीय अरब के साथ मिलकर अस्पताल खोल लिया और इस तरह सिवाए सलीम शहज़ाद के सब कामयाब और सुरक्षित रहे। बाद में सलीम शहज़ाद के हत्या मामले की रिपोर्ट को जारी करने से पहले इस तरह के संशोधन किये गये कि पढ़ने वाला कोशिश के बावजूद कुछ भी नतीजा नहीं निकाल पाता।

सलीम शहज़ाद की असल गलती कराची में अलकायदा और नौसेना के बीच जारी 'बातचीत' के रहस्य को बाहर लाना था। अलकायदा इलियास कश्मीरी के नेतृत्व में स्थापित वार्ता टीम के माध्यम से नौसेना के वरिष्ठ अधिकारियों के साथ बातचीत में व्यस्त थी क्योंकि अलकायदा नौसेना के ऐसे सत्रह कर्मचारियों की रिहाई की मांग कर रही थी जिन्हें खुफिया एजेंसियों ने उसके साथ सम्बंध की बुनियाद पर नौकरी से हटा कर जेल में डाल दिया था। अलक़ायदा उनकी रिहाई की मांग कर रही थी लेकिन नौसेना के अधिकारी इस सम्बंध में किसी मांग को स्वीकार नहीं कर रहे थे। जब मामला विवादास्पद रूप धारण कर गया तो अल क़ायदा ने मेहरान बेस पर हमला कर दिया और पाकिस्तान के सुरक्षा तंत्र को भरपाई न किये जा सकने वाला नुकसान पहुंचाया। सलीम शहज़ाद ने अलकायदा के नेवी में मौजूद साथियों और पाकिस्तानी सेना में कट्टरपंथियों की पहुँच के सम्बंध में आँखें खोल देने वाले खुलासे किए और अपनी मौत के परवाने पर दस्तख़त कर दिए। मूलतः सलीम शहज़ाद की जांच रिपोर्ट से पता चलता है कि पाकिस्तान की सेना में अतिवादियों को किस कदर प्रभुत्व हासिल है और पाकिस्तान के अफगानिस्तान और कश्मीर में जेहादी संगठनों के साथ सम्बंध राज्य के लिए किस प्रकार के जोखिम का कारण बने हैं।

पाकिस्तान में सबसे पहले फौज के इस्लामाइजेशन की बाकायदा शुरुआत ज़ियाउल हक़ के दौर में हुई जब ज़ियाउल हक़ ने देश भर के धार्मिक मदरसों के नौजवान स्नातकों को सरकारी युनिवर्सिटियों के सर्टिफिकेट के समान करार दे दिया। पहले ही वार में हजारों की तादाद में इन छात्रों को सेना में गैर कमीशंड अफसर के रूप में इमाम और खतीब (वक्ता) के तौर पर भर्ती किया गया। चूंकि पाकिस्तान में देवबंदी विचारधारा वाले धार्मिक मदरसों का नियमित संगठन वफाक़ुल मदारिस के नाम से मौजूद था इसलिए शुरू की खेप में इस संगठन से जुड़े मदरसों के छात्रों को फौज में भर्ती किया गया और उनके द्वारा सेना के अंदर एक विशेष विचारधारा के प्रचार का काम शुरू हुआ। फौज के मोटो में 'जिहाद फी सबीलिल्लाह' का नारा शामिल हुआ, और एक ऐसी सेना जो पड़ोसी देश भारत के साथ तीन जंगें लड़ चुकी थी जिनमें उसे बड़े आकार और अधिक संसाधन वाली भारतीय सेना से हार का भी सामना करना पड़ा। एक पेशेवर फौज के बजाय जेहादी फौज में ढलने लगी। पड़ोसी देश अफगानिस्तान में जिहाद का शोर बुलंद हो चुका था और पाकिस्तान में अभियान चलाने वाले फौजी डिक्टेटर ने जिहादी माहौल में पाकिस्तान के सेकुलर बुनियादों पर प्रशिक्षण प्राप्त करने वाली सेना को झोंक दिया।

अगर परवेज़ मुशर्रफ सेना के अंदर बढ़ती हुई चरमपंथियों की संख्या और अपने ऊपर होने वाले आत्मघाती हमलों से परेशान थे तो उनके पूर्ववर्ती जनरल कियानी भी इसी परेशानी के साथ पाकिस्तानी सेना के प्रमुख बने। शुरू में सैन्य प्रमुखों और अन्य शीर्ष नेतृत्व को सेना के अंदर परवान चढ़ने वाले गुस्से के कारणों में से अमेरिका का समर्थन शीर्ष पर नज़र आता था और परवेज़ मुशर्रफ जिसे पाकिस्तान के सभी जिहादी संगठनों ने कारगिल मुहिम के दौरान ज़बरदस्त तारीफ की थी। ग्यारह सितंबर के हमलों के बाद जिहादियों की नज़र में बुरे हो गये और फिर स्थिति यहां तक ​​पहुंच गई कि पूरी सेना के बारे में उग्रवादियों का दृष्टिकोण बदलने लगा। सेना के उच्च अधिकारियों और आम सैन्य कर्मियों पर हमले शुरू हुए। सेना पर योजनाबद्ध तरीके के किए जाने वाले हमलों में सबसे अहम और कामयाब हमला मंगला डैम के करीब स्थित एक फौजी मेस पर हमला था। हालांकि मेहरान बेस और कामरा बेस पर हुए हमलों में पाकिस्तानी सेना को भरपाई न हो सकने वाला नुकसान उठाना पड़ा, लेकिन मंगला मेस हमला इसलिए बहुत विनाशकारी और चिंतनीय था कि इसमें दर्जन से ज़्यादा शीर्ष और उच्च प्रशिक्षित सैनिक कमांडो की बड़ी संख्या को निशाना बनाया गया और विशेष रूप से ऐसे ग्रुप को निशाना बनाया गया जो इस्लामाबाद की लाल मस्जिद में ऑपरेशन में इस्तेमाल हुआ था। आत्मघाती हमलावर इसी ग्रुप का हिस्सा था और उच्च अधिकारी था। इसके बाद जनरल रैंक और ब्रिगेडियर ओहदे के लोग भी निशाना बने और एक ऐसा वक्त भी आया कि सैन्य अधिकारियों को वर्दी में छावनियों से बाहर जाने से रोक दिया गया ताकि चरमपंथियों का निशाना न बन सकें।

पाकिस्तान में तालिबानाईज़ेशन और अलक़ायदा पर लिखने वालों के यहाँ इस तरह के आँकड़े नहीं मिलते कि कितने सेवा में रहते हुए सैनिकों ने आतंकवाद का रास्ता अपनाया और नौकरी छोड़कर चरमपंथियों के साथ जा मिले। इसकी वजह सेना की तरफ से ऐसे मामलों को बहुत खुफिया रखने की रणनीति है। पिछले दिनों अदनान रशीद का एक इंटरव्यु अलक़ायदा व तालिबान के मुखपत्र में प्रकाशित हुआ जिसमें अदनान रशीद ने विस्तार से बताया कि किस तरह पाकिस्तानी सेना विशेषकर वायु सेना में अलक़ायदा समर्थक लोग अपनी गतिविधियां जारी रखे हुए हैं और कैसे उन्हें कुछ उच्च अधिकारी जेहादी प्रशिक्षण के लिए नियमों से हटकर सुविधाएं प्रदान करते रहे। पाकिस्तानी सेना में सल्फ़ियत के इस तीव्रता के साथ बढ़ते रुझान का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि सैन्य मुखपत्र 'हिलाल' में ऐसे लोगों के लेख प्रकाशित किये जाते हैं जो मुख्य रूप से सेना की पेशेवराना गुणवत्ता बढ़ाने की बजाय सैनिकों की इस सम्बंध में मानसिकता को बनाते हैं कि किस तरह भारत के हिंदू और दुनिया भर के यहूदियों और ईसाइयों को हमें जिहाद के द्वारा तबाह व बर्बाद करना है, जो पाकिस्तान को एक इस्लामी परमाणु शक्ति के रूप में नहीं देख सकते। यही दृष्टिकोण उग्रवादियों का भी है लेकिन वो किसी रूप में भी राज्य की सुरक्षा बलों का दर्जा नहीं रखते। मासिक हिलाल पाकिस्तान की परमाणु शक्ति और इस्लामी पहचान के सम्बंध में इतना संवेदनशील है कि कभी कभी किसी जेहादी पत्रिका और पाकिस्तानी सेना की पत्रिका में रत्ती बराबर अंतर नज़र नहीं आता और ऐसा लगता है कि दोनों पत्रिकाएं एक ही कलम और दिमाग की पैदावार हैं। ऐसी बहुत सी जानकारियां आम प्रचलन में रहती हैं कि लश्कर, जैशे मोहम्मद और हिज़बुल मुजाहिदीन के जेहादियों के प्रशिक्षण का सभी काम सेना की सेवा कर रहे  लोगों और रिटायर्ड कमांडोज़ की निगरानी में जारी रहता है और सीमा पार करने के लिए विशेष रूप से तैयार किए गए जेहादियों को वांछित लक्ष्यों की पूरी जानकारी इन्हीं लोगों से प्राप्त होती है। (जारी)

खामा बग़ोश मदज़िल्लह का परिचयः दुविधा में पड़ा एक मुसलमान जो ये समझने में असमर्थ है कि मुसलमान की असल परिभाषा क्या है? क्या मुसलमान वास्तव में सलामती के पक्षधर हैं या अपने ही सहधर्मियों की सलामती के दुश्मन? इस्लाम के मूल सिद्धांत, इतिहास, संस्कृति और विश्व की कल्पना क्या है? और क्यों आज मुसलमान न सिर्फ सभी धर्मों बल्कि संस्कृतियों के साथ भी संघर्षरत हैं? क्या इस्लाम की विजय होने वाली है या अपने ही अनुयायियों के हाथों पराजित हो चुका है, मैं इन्हीं विषयों का छात्र हूँ और न्यु एज इस्लाम के पन्नों पर आप दोस्तों के साथ चर्चा करने की कोशिश करूंगा।

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https://www.newageislam.com/urdu-section/the-salafi-wave-in-south-asia-–-part-6--جنوبی-ایشیاء-میں-پھیلتی-ہوئی-سلفیت-۔--قسط۔6/d/11768

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