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Hindi Section ( 8 Apr 2014, NewAgeIslam.Com)

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Seeking Forgiveness from Allah: The Spirit of Islam अल्लाह से माफी माँगना इस्लाम की मूल भावना है

 

ख़ालिद बेग

4 अप्रैल, 2014

तौबा (पश्चाताप) और अस्तग़फार (अल्लाह से माफी माँगना) मोमिनों के सबसे पसंदीदा और नेक काम हैं। तौबा का मतलब अपने कार्यों या चूकों के लिए पछतावा महसूस करना है। अस्तग़फार का मतलब शब्दों से पश्चाताप करना और अल्लाह से उनके लिए माफी माँगना है। अल्लाह का फरमान है: "निस्संदेह अल्लाह बहुत तौबा करने वालों को पसन्द करता है और वह उन्हें पसन्द करता है जो स्वच्छता को पसन्द करते हैं।" [अलबक़रा 2: 222] हदीस में आया है कि: "ऐ अल्लाह हमें उन लोगों में से बना जो नेक अमल करके, अच्छा महसूस करते हैं और अगर उनसे कोई पाप हो जाए तो माफी माँगते हैं।" [इब्ने माजा]

जिन कामों के लिए हम तौबा या अस्तग़फार करते हैं वो ज़रूरी नहीं है कि पाप या अल्लाह की अवज्ञा के लिए हों, और इसमें हमारी कमियों भी शामिल हैं। जैसा कि हमें इस बात का एहसास होता है कि अल्लाह ने हम पर अपार उपकार किये हैं और इनके लिए हम जितना भी कृतज्ञता और भक्ति भाव दिखाएं सभी स्पष्ट रूप से अपर्याप्त प्रतीत होते हैं। हमें अल्लाह  की भव्यता और शान का एहसास होता है तो उसकी तुलना में हमें हमारी इबादतें, आज्ञाकारिता सभी स्पष्ट रूप से अपर्याप्त लगती हैं। जिस व्यक्ति में तक़वा (परहेज़गारी), धर्मपरायणता और खुदा की चेतना का स्तर जितना अधिक होता है उसमें अपनी कमियों का एहसास उतना ही अधिक होता है। और नतीजतन ऐसा व्यक्ति अधिक से अधिक अस्तग़फार करता है।

यही कारण है कि सभी अंबिया अलैहिमुस्सलाम ने तौबा और अस्तग़फार की शिक्षा दी है और उस पर अमल भी किया।  हमें पारिवारिक या व्यक्तिगत पापों के लिए पश्चाताप की व्याख्या करने के लिए किसी नये पाप की तलाश नहीं करनी चाहिए। दरअसल अल्लाह के सभी नबी पापों से मुक्त थे, क्योंकि अल्लाह ने उन्हें मानवता के लिए रोल मॉडल बनाया था और अल्लाह ने किसी दोषपूर्ण रोल मॉडल को नहीं भेजा।

सभी नबियों के सरदार हज़रत मोहम्मद सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम थे और इस तथ्य के प्रतीक के रूप में हज़रत मोहम्मद सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने इसरा की यात्रा के दौरान यरूशलेम में सभी नबियों की नमाज़ की इमामत की थी। और खुद नबियों के इमाम हर नमाज़ के बाद क्या किया करते थे? हर नमाज़ के बाद आप सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम तीन बार "अस्तग़फिरुल्लाह" (मैं अल्लाह से माफी चाहता हूँ) पढ़ा करते थे! ये वो अस्तग़फार है जो खुदा की चेतना के उच्चतम स्तर पर आती है! उन्होंने हमें पूरी दरियादिली के साथ अस्तग़फार पढ़ना सिखाया है जैसे कि उन्होंने इस पर अमल भी किया है। सहाबियों से रवायत है कि आप सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम दिन में सैकड़ों बार अस्तग़फार पढ़ा करते थे। तौबा और अस्तग़फार अल्लहा के लिए हमारी इबादत और उसके आज्ञापालन का सार है।

अस्तग़फार का मतलब उस चेतना को बढ़ाना और अल्लाह के साथ हमारे सम्बंधों को मज़बूत बनाना भी है। पश्चाताप में हम सिर्फ अल्लाह का रुख करते हैं। हम सिर्फ और सिर्फ अल्लाह के सामने अपनी गलतियों, कमियों, नाकामियों और गुनाहों को स्वीकार करते हैं। (इसके विपरीत ईसाई धर्म ने एक घातक गलती तब की जब उसने पुजारी के सामने पापों की स्वीकरोक्ति की परम्परा को स्थापित किया। जैसा कि मार्टिन लूथर किंग (1537) ने माना है कि, "इस तरह पापों की स्वीकारोक्ति ने जिस कदर हिंसा, धूर्तता और मूर्ति पूजा को जन्म दिया है उसका उल्लेख नहीं किया जा सकता है) "हम अल्लाह से माफी मांगते हैं ये जानते हुए कि वो हमारे सभी कार्यों और विचारों को जानने वाला है और केवल वही हमें माफ कर सकता है और हमारे कार्यों के बुरे परिणामों से केवल वही हमें बचा सकता है। इस तरह अस्तग़फार अल्लाह के साथ सबसे नज़दीकी बातचीत है। और अल्लाह के साथ इस बातचीत के दौरान हमें सबसे विनम्र होना चाहिए। हम ये समझ सकते हैं कि क्यों तौबा और अस्तग़फार अल्लाह की हमारी इबादत और आज्ञापालन का सार है!

हमें अपने दिल को लगातार शुद्ध करने के लिए अस्तग़फार की ज़रूरत है। हम गुनाहों का बोझ लेकर पैदा नहीं हुए लेकिन हम कमज़ोरी के साथ पैदा हुए हैं। हम विभिन्न प्रकार के लालच का शिकार हो जाते हैं जो कि इस जीवन में हमारी परीक्षा के हिस्से हैं। और जब हम इसके शिकार होते हैं और गुनाह करते हैं तो हमारा दिल काला हो जाता है। अबु हुरैरा रज़ियल्लाहू अन्हू से रवायत एक मशहूर हदीस है कि, जब कोई व्यक्ति अपने गुनाह पर अफसोस करता है और अल्लाह से माफी माँगता है तो दिल की वो कालिख दूर हो जाती है। वरना वो काला धब्बा वहीं रहेगा और हर नये गुनाह के साथ  बढ़ता जाएगा। और फिर एक समय ऐसा भी आ सकता है कि पापों से पश्चाताप न करने की वजह से मनुष्य का मन गुनाहों के अंधेरे से भर जाए। जैसे ही कोई व्यक्ति गुनाहों के मामले में आगे बढ़ता जाता है, हम दिल में इस क्रमिक अंधेरे के बढ़ने को समझ सकते हैं। शुरूआत में वो बहुत संकोची होते हैं। वो हिचकिचाते हुए गुनाह करते हैं और ऐसा करने पर बुरा महसूस करते हैं। और अगर वो अपने कामों को वापस मुड़ कर नहीं देखते हैं तो वो इसके आदी हो जाते हैं और वो इसे सामान्य महसूस करने लगते हैं। और फिर ऐसी स्थिति आती है जब बुराई अच्छाई लगती है और अच्छाई बुराई लगने लग जाती है। और फिर वो गुनाहों का बचाव और इसकी वकालत करने लगते हैं और अच्छे कामों से परहेज़ करले लग जाते हैं।

आज दुर्भाग्य से हम अपने चारों तरफ इसकी कई मिसाले पाते हैं। आधुनिकता के बाद के इस दौर में "सब कुछ चलता है" और अब अच्छाई और बुराई का कोई मतलब नहीं रह गया। इसके अलावा भटके हुए मनोवैज्ञानिकों की एक पूरी जमात है जो आपको ये आश्वस्त करने के लिए तैयार हैं कि केवल पहली बार अपराध करने पर गुनाह का एहसास होना चाहिए! क्या ये आश्चर्य की बात नहीं है कि अंग्रेजी भाषा में शब्द (sin) 'पाप' को आज आम तौर पर हर आकर्षक, मस्ती और अत्यधिक वांछित चीजों के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है? दिल के इस अंधेरे को आत्मज्ञान माना जा रहा है जो वास्तविकता के उलट है। लेकिन आशावान लोगों के लिए उम्मीद की किरण अब भी है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि हम अंदर से कितने भ्रष्ट हो चुके हैं बल्कि हम हमेशा यू- टर्न ले सकते हैं। हम पश्चाताप कर सकते हैं और अपने दयालू  और परोपकारी निर्माता से माफी माँग सकते हैं, जो लोग ईमानदारी से उसका रुख करते हैं वो हमेशा उन लोगों को माफ करने के लिए तैयार है। " कह दो, ऐ मेरे बन्दो, जिन्होंने अपने आप पर ज्यादती की है, अल्लाह की दयालुता से निराश न हो। निस्संदेह अल्लाह सारे ही गुनाहों का क्षमा कर देता है। निश्चय ही वह बड़ा क्षमाशील, अत्यन्त दयावान है" [39: 53] एक हदीस में ये घोषणा की गयी है कि: "जब कोई व्यक्ति गुनाहों से तौबा कर लेता है तो वो ऐसा हो जाता है जैसे उसने कभी कोई पाप नहीं किया हो।"

नबी सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने हमें पश्चाताप करने के बहुत सारे शब्द सिखाए हैं और अगर हम उन्हें जानते, समझते और उनका उपयोग करते हैं तो ये अच्छी बात है। इनमें से एक का उल्लेख सैयदुल अस्तग़फार के रूप में किया गया है। एक हदीस में इसके असाधारण महत्व का वर्णन किया गया है: "अगर कोई मोमिन सुबह के वक्त पूर्ण विश्वास और ईमानदारी के साथ अस्तग़फार पढ़ता है और शाम होने से पहले मर जाता है तो जन्नत में जायेगा। और अगर रात के दौरान कोई ये दुआ पढ़ता है और सुबह से पहले मर जाता है तो भी वो जन्नत में जायेगा।" ये शक्तिशाली दुआ अल्लाह के प्रति हमारी निष्ठा की दैनिक प्रतिज्ञा है। हमें इसे अरबी में याद करने की पूरी कोशिश करना चाहिए और कोई भी ऐसा दिन या कोई ऐसी रात नहीं होनी चाहिए जब हम पूरी चेतना के साथ इसे पढ़ न लें: "ऐ अल्लाह तू मेरा रब है। तेरे सिवा कोई इबादत के लायक नहीं। तूने मुझे बनाया और मैं तेरा बंदा हूँ। मैं अपनी पूरी कोशिश के साथ तेरे साथ किए गए अपने वादे की मर्यादा रखूँगा। मैं स्वयं की बनाई बुराई से तेरी शरण चाहता हूँ। मैं तेरी हर नेमतों को कुबूल करता हूँ अपने गुनाहों को स्वीकार करता हूँ।  इसलिए ऐ अल्लाह तू मुझे माफ फरमा इसलिए कि तेरे सिवा कोई भी गुनाह माफ नहीं कर सकता।"

स्रोत: http://pakobserver.net/detailnews.asp?id=238500

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URL for Urdu article: https://newageislam.com/urdu-section/seeking-forgiveness-allah-spirit-islam/d/66439

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