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Hindi Section ( 5 March 2021, NewAgeIslam.Com)

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The Concept of Human Equality in Islam Can Encourage Pluralism इस्लाम में मानवीय समानता की अवधारणा बहुलतावाद को बढ़ावा दे सकती है


कनीज़ फातमा, न्यू एज इस्लाम

२१ जून २०१९

मर्द और औरत मानवता में बराबर तौर पर पैदा किये गए हैं। इस्लाम में लिंग, रंग, जाति, वर्ग और भाषा के आधार पर अलग व्यवहार की सख्ती से मनाही है। समानता का अर्थ यह नहीं है कि सारे लोग बराबर तौर पर एक जैसे हैं क्योंकि कुदरती मतभेद से कोई इनकार नहीं। दोनों लिंग आपस में मिलकर एक दुसरे की पूर्ति करते हैं। अल्लाह पाक कुरआन में फरमाता है:

ऐ लोगों अपने पालने वाले से डरो जिसने तुम सबको (सिर्फ) एक शख्स से पैदा किया और (वह इस तरह कि पहले) उनकी बाकी मिट्टी से उनकी बीवी (हव्वा) को पैदा किया और (सिर्फ़) उन्हीं दो (मियॉ बीवी) से बहुत से मर्द और औरतें दुनिया में फैला दिये और उस ख़ुदा से डरो जिसके वसीले से आपस में एक दूसरे से सवाल करते हो और क़तए रहम से भी डरो बेशक ख़ुदा तुम्हारी देखभाल करने वाला है” (४:१)

और एक दूसरी आयत में अल्लाह पाक फरमाता है:

लोगों हमने तो तुम सबको एक मर्द और एक औरत से पैदा किया और हम ही ने तुम्हारे कबीले और बिरादरियाँ बनायीं ताकि एक दूसरे की शिनाख्त करे इसमें शक़ नहीं कि ख़ुदा के नज़दीक तुम सबमें बड़ा इज्ज़तदार वही है जो बड़ा परहेज़गार हो बेशक ख़ुदा बड़ा वाक़िफ़कार ख़बरदार है” (४९:१३)

रिवायत है कि अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने फरमाया, “अल्लाह तुम्हारे जिस्मों और रंगों को नहीं देखता है बल्कि तुम्हारे अमल और दिलों को देखता है (अर्थात ज़ाहिरी आअमाल और बातिन की नीयतों को) (सहीह मुस्लिम)

यह सभी अहकाम बिना किसी वर्ग, जाति या सामाजिक हैसियत के इम्तियाज़ की बिना पर तमाम इंसानों [पर बराबर तौर पर लागू हैं। अल्लाह पाक फरमाता है,

जिसने अच्छे अच्छे काम किये तो अपने नफे क़े लिए और जो बुरा काम करे उसका वबाल भी उसी पर है और तुम्हारा परवरदिगार तो बन्दों पर (कभी) ज़ुल्म करने वाला नहीं। (४१:४६)

इस्लाम हर तरह की नस्ल परस्ती को नापसंद करता है। जैसे कि अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के एक सहाबी, हज़रत अबू ज़र ने एक बार काले गुलाम से कहा, “ऐ काली औरत के बेटे!यह सुन कर, अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने अबुज़र की तरफ मुखातिब हो कर उनसे फरमाया, “क्या तुम इस शख्स की मां के साथ इसकी तौहीन कर रहे हो? वास्तव में, आप दौरे जाहिलियत (इस्लाम से पहले) की कुछ विशेषता के मालिक हैं। वह वक्त ख़त्म हो चुका है। काली औरत के बेटे पर गोरी औरत के लिए कोई फ़ज़ीलत या काबिलियत नहीं है, सिवाए तकवा और रास्तबाज़ी के, या नेक आअमाल और किरदार के।“ (अहमद १४५:४)

रिवायत है कि हज़रात अबुज़र ने, नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की बातें सुनने के बाद, गुलाम के लिए आजिजी व इन्केसारी में अपने सर को ज़मीन पर रख दिया ताकि गुलाम आए और अपना कदम उनके सर पर रखे और यह उनके नस्लपरस्ताना अलफ़ाज़ का कफ्फारा हो जाए। हालांकि अल्लाह के नबी ने उन्हें ऐसा करने का हुक्म नहीं दिया था, लेकिन हज़रत अबुज़र ने खुद की तसल्ली के लिए ऐसा किया ताकि वह आइन्दा कभी भी इस तरह की तौहीन से भरी बातों का इर्तिकाब ना कर सकें।

और यह कि इस्लाम में, किसी शख्स की कद्र उसके अच्छे कामों और अल्लाह की इताअत से होती है।

मसावात की इस्लामी कद्र निम्नलिखित सिद्धांतों पर आधारित है।

तमाम इंसान एक खुदा के जरिये पैदा किये गए हैं।

तमाम इंसानों के जद्दे अमजद एक ही हैं जो कि हज़रत आदम अलैहिस्सलाम हैं।

अल्लाह अपनी तमाम मख्लुकात के साथ नस्ल, उमर या मज़हब की बिना पर किसी तरफदारी के बिना मुंसफ और मेहरबान है।

तमाम इंसान बराबर तौर पर पैदा हुए हैं, अर्थात उनमें से कोई भी अपने साथ कोई मिलकियत नहीं लाता है, और वह अपने दुनयावी सामान में से वापस कुछ लिए बिना मर जाते हैं।

अल्लाह हर फर्द के लिए उसकी खूबियों और आअमाल की बुनियाद पर फैसला करता है।

अल्लाह ने नबी आदम को, अर्थात सारी इंसानियत को एअजाज़ व वकार से नवाज़ा है।

इन सिद्धांतों का ज़िक्र कुरआन व हदीस में है। मिसाल के तौर पर रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया: ऐ लोगों! तुम्हारा रब एक है। तुम्हारे वालिद एक हैं। तुम सब आदम से संबंध रखते हो। और आदम मिटटी से पैदा किये गए हैं। वाकई, तुम्हारे परवरदिगार की नज़र में सबसे सम्मानित व्यक्ति वह है जो तुम में सबसे अधिक मुत्तकी है। किसी अरबी को गैर अरबी पर फौकियत नहीं है। किसी अरबी को गैर अरबी पर फौकियत नहीं है। किसी गैर अरबी पर अरबी को वरीयता नहीं है। किसी गोर शख्स को किसी सुर्ख शख्स पर कोई वरीयता नहीं है। इसी तरह, किसी सुर्ख (नस्ल) शख्स पर सफेदी की कोई बरतरी नहीं, सिवाए तकवा और खुदा के पहचान के। (मुसनद अहमद हदीस नम्बर: ४११)

खुलासा यह है कि इंसानी मूल्यों की बुनियाद पर इस्लाम तमाम इंसानों को बराबर करार देता है, फिर भी हर शख्स को उसकी खिदमत के अनुसार बदला दिया जाता है जो वह पेश करता है। यह कल्पना अगर प्रतिदिन की जिंदगी में उपयोग हो तो समाज को बहुत लाभ पहुंचाए गा और बहुलतावाद को बढ़ावा दे सकता है। इस तरह पक्षपात, जब्र या अत्याचार की कोई गुंजाइश नहीं होगी।

URL for English article: http://www.newageislam.com/islam-and-pluralism/kaniz-fatma,-new-age-islam/the-concept-of-human-equality-in-islam-can-develop-pluralism/d/118949

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