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Teachings of Moderation and Balance in Islam इस्लाम में मॉडरेशन और तवाजुन की तालीमात

 

कनीज़ फातमा, न्यू एज इस्लाम

31 मार्च 2018

एतेदाल पसंदी ज़िन्दगी के सभी मामलों में दो अंत के बीच एक बीच का रास्ता इख्तियार करना हैl इस्लाम ज़िंदगी के सभी मामलों अर्थात अकीदे, इबादत व आदत, संबंधों, दृष्टिकोण, रुसूम व रिवाज, लेंन देंन, रोजाना की सरगर्मियों और इंसानी ख्वाहिशात में एतेदाल पसंदी और तवाजुन पर जोर देता हैl कुरआन करीम ने स्पष्ट तौर पर एतेदाल पसंदी के अवधारणा को कायम किया हैl

अल्लाह पाक का फरमान है:

“और बात यूँ ही है कि हमने तुम्हें किया सब उम्मतों में अफज़ल” (अनुवाद; कन्जुल ईमान २:१४३)

इस आयत के अन्दर उम्मते मुस्लिमा की तारीफ़ में अरबी शब्द “اُمۃً وَسَطًا” के इस्तेमाल से किया गया हैl शब्द ‘वसतन’ का अनुवाद आम तौर पर एतेदाल किया जाता हैl इसलिए इस उम्मत की खुसूसियत यह है कि यह ज़िन्दगी के सभी पहलुओं में चाहे वह किरदार हो चाहे अमल, एतेदाल पसंदी का रास्ता इख्तियार करती हैl यह ऐसे लोग हैं जो इन्तेहा की तरफ नहीं झुकते हैंl ना तो यह लोग इबादत की अदायगी में गफलत से काम लेते हैं और ना ही इन्तेहा पसंदाना रवय्या इख्तियार करते हैं जो इस दुनिया को तर्क करके पहाड़ों में रहने के लिए चले जाते हैंl

जो विशेषता मुस्लिम उम्मत को दूसरों से मुमताज़ करती है वह उनका (वसतन) एतेदाल पसंद होना हैl शब्द वसतन का अर्थ बताने के लिए आम तौर पर मुफ़स्सेरीन ने अरबी ज़बान में ‘मोतदिल’ का इस्तेमाल किया है, और एतेदाल जिसका अर्थ “बराबर होना“ है, इन दोनों का माद्दा अदल है जिसका अर्थ “बराबर होना या बराबर करना” हैl

इमाम राज़ी आयत २:१४३ की तफसीर में लिखते हैं कि: हकीकत में तवाजुन (वसतन) दो इन्तेहा के बीच का रास्ता हैl इसमें कोई शक नहीं है की बोह्तात और इसराफ के दोनों किनारे तबाह करने वाले हैं, इसलिए, किरदार में एतेदाल पसंद होना उन से दूर होना है, और यही मुंसिफाना और नेक रवय्या हैl (तफसीर कबीर; इमाम राज़ी २:१४३)

अपनी अरबी लुगत में इब्ने मंज़ूर लिखते हैं;

“हर काबिले कद्र खुसूसियत के दो काबिले मुज़म्मत किनारे होते हैंl लेकिन बखीली और इसराफ के बीच का रास्ता इख्तियार करना फराख दिली हैl जुरअत बुजदिली और बे एहतियाती के बीच का रास्ता इख्तियार करने में हैl इंसानों को इस तरह की हर बुरी आदत से बचने का हुक्म दिया गया हैl” (लिसानुल अरब 209/15)

एक यमनी मुसलिम रिवायत पसंद वहाब इब्ने मुनब्बिह लिखते हैं, “बेशक हर चीज के दो पहलु होते हैं और इनमे एक दरमियानी रास्ता होता हैl अगर कोई एक पहलु चुना जाए तो दुसरा अपना संतुलन खो देगाl और अगर दरमियानी रास्ता इख्तियार किया जाए तो दोनों पहलु संतुलित हो जाएँगेl हर चीज में दरमियानी रास्ता चुनना जरुरी हैl (हिलयतुल औलिया 4818)

मरवी है की हज़रत हुज़ैफा रज़ि अल्लाहु अन्हु ने फरमाया, “ऐ लोगों सीधे रास्ते पर चलते रहो तुम्हें बड़ी कामयाबी मिलेगी, लेकिन अगर तुम दाएं या बाएँ हुए तो फिर गुमराह हो जाओगेl” (सहीह बुखारी ६८५३, हदीस सहीह)

हज़रत इब्ने मसउद से मर्वी है की: रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने अपने मुबारक हाथ से एक लकीर खीची और फरमाया, “यह अल्लाह का सीधा रास्ता है” l फिर आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने दाएं और बाएँ लकीर खींची और फरमाया की “यह दुसरे रास्ते हैं और उनके बीच कोइ राह ऐसी राह नहीं है मगर यह की इस पर शैतान बैठा हुआ है और अपनी तरफ दावत दे रहा हैl” फिर नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने कुरआन की यह आयत तिलावत फरमाई और फरमाते हैं कि “यह है मेरा सीधा रास्ता तो इस पर चलो और दूसरे रास्तों पर ना चलो”l (6:153) (मुसनद अहमद 4423, हदीस सहीह)

हमें ज़िन्दगी के हर क्षेत्र में एतेदाल पसंदी और तवाजुन की तालीमात पर अमल करना चाहिए, चाहे इनका संबंध मज़हब के फ़राइज़ से हो चाहे दुनियावी ज़िन्दगी की जिम्मेदारियों से होl

अल्लाह पाक का फरमान है,

“और जो माल तुझे अल्लाह ने दिया है उससे आखिरत का घर तलब कर और दुनिया में अपना हिस्सा ना भूलl” (28:77)

हज़रत हंज़ला अल उसैदी से मरवी है की मैंने कहा’

 ऐ अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम, जब हम आपकी बारगाह में होते हैं और हमें जन्नत और जहन्नम की बाते बताई जाती हैं तो हम यह महसूस करते हैं की हम उन्हें अपनी आँखों से देख रहे हैं, लेकिन जब हम आपको छोड़ कर रुखसत होते हैं और अपनी बीवी, बच्चों, और अपने कारोबार में मशगुल होते हैं तो यह चीज अक्सर हमारे ज़हनों से गायब हो जाती हैंl”

इस पर नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया,

“कसम है उस ज़ात की जिसके कब्ज़े में मेरी जान है, अगर तुम्हारी ज़हनी कैफियत वही रहे जो मेरी मौजूदगी में होती है और तुम्हारे ज़ेहन हमेशा अल्लाह की याद में मशगुल रहे, तो फरिश्ते तुम्हारे बिस्तरों और सड़कों पर तुमसे हाथ मिलाएंl ऐ हंजला इसके बजाए दुसरे कामों में भी समय खर्च करना चाहिएl (सहीह मुस्लिम 2750, हदीस सहीह)

इसलिए इस शिक्षा के अनुसार हमें नमाज़, रोज़ा और यहाँ तक की सदका जैसे आमाल में एतेदाल पसंद रहना चाहिएl जैसे कि हमारी नमाज़ें मोतदिल आवाज़ में होनी चाहिए, ना ही आवाज़ अधिक उंची हो और ना ही अधिक नरम होl

अल्लाह पाक फरमाता है,

“और अपनी नमाज़ ना बहुत आवाज़ से पढ़ो ना बिलकुल आहिस्ता और उन दोनों के बीच में रास्ता चाहो”(17:10)

हज़रत अबू मुसा की सनद से यह रिवायत मरवी है कि उन्होंने कहा, “हम नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के साथ एक सफ़र पर थे, उस दौरान जब लोगों ने बुलंद आवाज़ से अल्लाहु अक्बर पुकारा तो नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया:

“ऐ लोगों, अपने साथ नरमी के साथ काम लो क्योंकि तुम उसे नहीं पुकार रहे हो जो सुनने से माज़ूर है या गैर हाज़िर हैl बल्कि, तुम उसे पुकार रहे हो जो सुनने वाला देखने वाला हैl” (सहीह बुखारी 3910)

हज़रत जाबिर बिन समुरह से मरवी है उनहोंने कहा की,

“मैं अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के साथ नमाज़ अदा कर रहा था, और आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की नमाज़ और आप का खुतबा मोतदिल थेl” (सहीह मुस्लिम 866, हदीस सहीह)

नफ्ली इबादात के सिलसिले में नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम कई मौकों पर अपने सहाबा को उनकी नफ्ली इबादतों को सीमित करने का हुक्म दिया ताकि वह अपने घर वालों के साथ अपने फराइज़ अंजाम दे सकें और अपनी सेहत भी कायम रख सकेंl

मरवी है की हज़रत अब्दुल्लाह बिन अम्र ने कहा, “अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने मुझसे फरमाया, “ऐ अब्दुल्लाह मुझे यह मालुम हुआ है की तुम दिन भर रोज़ा रखते हो और रात भर इबादत करते होl” मैंने कहा, “हाँ या रसूलुल्लाह! “नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया, “ऐसा मत किया करोl कभी रोज़ा रखो और कभी खाओ, रात को नमाज़ अदा करो और सो भी जाया करोl बेशक तुम्हारे जिस्म का तुम पर हक़ है, तुम्हारी आँखों का तुम पर हक़ है और तुम्हारी बीवी का भी तुम पर हक़ हैl” (सहीह बुखारी ४९०३, हदीस सहीह)

हज़रत सलमान फ़ारसी रज़िअल्लाहु अन्हु फरमाते हैं,

“तुम्हारे उपर तुम्हारे रब का हक़ है, तुम्हारे उपर तुम्हारे जिस्म का हक़ है, और तुम्हारे उपर तुम्हारे खानदान का हक़ है, इसलिए तुम हर हक़ वाले का हक़ अदा करोl” (सहीह बुखारी १८६७, हदीस सहीह)

यही पैगाम हमें इस हदीस से भी मिलता है,

“सबसे बेहतर मज़हब सबसे आसान हैl” [अहमद]

नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया,

“जो यह चाहता है की उसकी ज़िंदगी बहुत लंबी हो और उसे अधिक मुराआत अता की जाएं और बुरे खात्मे से महफूज़ हो जाए, तो उसे चाहिए की वह खुदा से डरे और रिश्तेदारों के साथ अच्छे संबंध कायम रखे”l (अल हाकिम]

आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने यह भी फरमाया,

“ऐ लोगों! सलाम फैलाओ, लोगों को खाना खिलाओ, रिश्तेदारों के साथ ताल्लुकात बरकरार रखो और रात को जब लोग सो रहे हों तो नमाज़ पढ़ो तू हिफाज़त के साथ जन्नत में दाखिल हो जाओगेl (अल हाकिम)

इस्लाम मुसलामानों को सदका देने में भी एतेदाल पसंदी की तालीम देता हैl यह मुसलामानों को इतना खर्च करने का हुक्म देता है जितना जरूरत मंद के लिए काफी हो; लेकिन यह इतना माल रखने का भी हुक्म देता है जो उसके खानदान और खुद की देख भाल के लिए काफी होl

अल्लाह पाक फरमाता है:

“और वह कि जब खर्च करते हैं ना हद से बढ़ें और ना तंगी करें और इन दोनों के बीच एतेदाल रहेंl” (25:67)

इसलिए हमें दूसरों के साथ अपने तअल्लुकात में भी एतेदाल पसंद होना चाहिएl हमें लोगों के लिए भी वही पसंद करना चाहिए जो हम अपने लिए पसंद करते हैं लेकिन हमें उनकी मुहब्बत में इस हद से नहीं गुज़रना चाहिए की हम उनकी गलत कार्यों की हिमायत करेंl

हज़रात उमर रज़िअल्लाहु अन्हु ने फरमाया,

“तुम्हारी मुहब्बत शैफ्तगी ना हो जाए और तुम्हारी नफरत तबाही ना हो जाएl” कहा गया “यह कैसै हो सकता है?” हज़रात उमर ने जवाब दिया, “ जब तुम किसी से मुहब्बत करते हो तो इसकी मुहब्बत में बच्चों की तरह फरेफ्ता हो जाते होl और अगर किसी से नफरत करते हो तो तुम अपने साथी के लिए उसकी तबाही चाहते हो” (अल अद्बुल मुफरद १३२२, हदीस सहीह)

इब्ने हिब्बान मुसलामानों को गैर मुस्लिमों के साथ मामले में दरमियानी रास्ता इख्तियार करने की तजवीज पेश करते हुए लिखते हैं, “उनसे कुरबत हासिल करने में हद से आगे ना बढ़ो, और ना ही उनसे दूरी इख्तियार करने में हद से आगे बढ़ोl” (तफ्सीरुल मवार्दी 60:8)

इब्ने हिबान यह कहना चाहते हैं कि मुसलामानों को गैर मुस्लिमों के साथ कुर्बत हासिल करने में इस्लाम की खिलाफवर्जी नहीं करनी चाहिए और इसी तरह ना ही उन्हें उनसे दूरी बनाने में इस हद से गुज़र जाना चाहिए कि उनके अन्दर किसी किस्म की नफरत या असुरक्षा का एहसास पैदा हो जाएl

हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया:

“अल्लाह की कसम वह मोमिन नहीं है, वह मोमिन नहीं है, वह मोमिन नहीं है,” कहा गया, “कौन या रसूलुल्लाह? (आपने फरमाया) जो पड़ोसियों को अमन और सलामती फराहम ना कर सकेl “(सहीह बुखारी, जिल्द 8, नम्बर 45)

इस हदीस के अन्दर शब्द “पड़ोसियों” में मुसलमान और गैर मुस्लिम दोनों में शामिल हैंl

कुछ और हदीसें जिनमें मुसलामानों और गैर मुस्लिमों के साथ अच्छे संबंधों की हौसला अफजाई की गई है, निम्नलिखित हैं-

“क्या तुम्हें मालुम है की सदका, रोज़ा और नमाज़ से बेहतर क्या है? यह लोगों के दरमियान अमन और अच्छे संबंध कायम रखना है, इसलिए की झगड़े और बुरे जज़्बात इंसानों को तबाह कर देते हैंl (अल बुखारी व मुस्लिम)

“ जो कोई लोगों के साथ मेहरबानी करता है अल्लाह उसके साथ मेहरबानी करेगाl इसलिए तुम ज़मीन के उपर इंसानों पर रहम करो और आसमान वाला तुम पर रहम करेगाl” (अबू दाउद और तिरमिज़ी)

खुलासा यह की इस्लाम ने मुसलामानों को अपनी रोजाना की ज़िंदगी के सभी मामलों में मुसलामानों को एतेदाल पसंदी यानी मॉडरेशन की तालीम दि हैl उन्हें शैतान को खुश करने वाली किसी भी किस्म की इन्तेहा पसंदी से बचना चाहिए जो उन्हें सीधी राह से भटका देता हैl एतेदाल पसंदी और तवाजुन की तालीम के साथ मुसलमान इन्तेहा पसंदी की बढ़ती हुई लहरों का मुकाबला कर सकते हैं जिनसे मुसलामानों और गैर मुस्लिमों दोनों को खतरा हैl

अध्ययन स्रोत:

Newageislam.com

अबू अमीना इलियास “‘Moderation and Balance in Islam’’ abuaminaelias.com

तफसीर ए कबीर

मआरिफुल कुरआन

सिहाह सित्ता

URL for English article: https://www.newageislam.com/islamic-society/teachings-moderation-balance-islam/d/114780

URL for Urdu article: https://www.newageislam.com/urdu-section/teachings-moderation-balance-islam-/d/115458

URL: https://www.newageislam.com/hindi-section/teachings-moderation-balance-islam-/d/115802

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