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Hindi Section ( 16 March 2016, NewAgeIslam.Com)

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Ruling on Talking and Remaining Silent during the Juma'ah Sermon जुमा के दिन प्रवचन के दौरान बात करने और खामोश रहने का हुक्म

 

islamqa.info

मैं जुमा की नमाज़ पढ़ने के लिए गया, लेकिन जब भी कोई नमाज़ पढ़ने वाला (मस्जिद में) प्रवेश करता तो सलाम करता और नमाज़ी लोग उसका जवाब देते, यहाँ तक कि जो क़ुरआन पढ़ रहा होता वह भी सलाम का जवाब देता। जब प्रवचन - खुत्बा - शुरू हो गया तो कुछ नमाज़ी प्रवेश किए और सलाम किए, तो इमाम ने धीमी आवाज़ में उत्तर दिया। तो क्या यह जायज़ है?

उत्तर :

हर प्रकार की प्रशंसा और गुणगान केवल अल्लाह के लिए योग्य है।

जुमा में उपस्थित होने वाले पर अनिवार्य है कि जब इमाम खुत्बा दे रहा हो तो उसे ध्यान से सुने, उसके लिए किसी के साथ बात-चीत करना जायज़ नहीं है, भले ही उसका बात करना उसे खामोश कराने के लिए हो। जिसने ऐसा किया उसने अनर्थक कार्य किया। और जिसने अनर्थक किया उसका जुमा नहीं है।

अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु से वर्णित है कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमाया : ''अगर जुमा के दिन इमाम के खुत्बा देने की हालत में तू ने अपने साथी से कहा कि खामोश रहो, तो तू ने अनर्थक कार्य किया।'' इसे बुखारी (हदीस संख्या : 892) और मुस्लिम (हदीस संख्या : 851) ने रिवायत किया है।

इसी तरह यह निषेध किसी धार्मिक प्रश्न का उत्तर देने को भी शामिल है, इसके अलावा जिसका संबंध दुनिया के मामलों से है उसकी तो कोई बात ही नहीं।

अबू दर्दा रज़ियल्लाहु अन्हु से वर्णित है कि उन्हों ने कहा : नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम मिंबर पर बैठे और लोगों को खुत्बा दिया और एक आयत की तिलावत की। मेरे बगल में उबै बिन कअब रज़ियल्लाहु अन्हु बैठे थे। तो मैंने उनसे कहा : हे उबै, यह आयत कब उतरी है? तो उन्हों ने मुझसे बात करने से इनकार कर दिया। मैंने फिर से उनसे पूछा तो उन्हों ने मुझसे बात करने से उपेक्षा किया, यहाँ तक कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम मिंबर से नीचे उतरे तो उबै ने मुझसे कहा : तुम्हारे लिए तुम्हारे जुमा की नमाज़ से केवल वही है जो तू ने अनर्थक किया है। जब अल्लाह के पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम नमाज़ से फारिग हो गए तो मैं आपके पास आया और आपको इसकी सूचना दी तो आप ने फरमाया : ''उबै ने सच कहा है, जब तुम अपने इमाम को भाषण देते सुनो तो खामोश रहो यहाँ तक कि वह फारिग हो जाए।'' इसे अहमद (हदीस संख्या : 20780) और इब्ने माजा (हदीस संख्या : 1111) ने रिवायत किया है।

तथा अल-बोसीरी और अल्बानी ने ''तमामुल मिन्नह'' (पृष्ठ : 338) में इसे सही क़रार दिया है।

यह हदीस जुमा के दिन इमाम के खुत्बा देने की हालत में खामोश रहने की अनिवार्यता और बातचीत करने के निषेध को इंगित करती है।

इब्ने अब्दुल बर्र कहते हैं :

''सभी क्षेत्रों के फुक़हा (धर्मशास्त्रियों) के बीच इस बारे में कोई मतभेद नहीं है कि खुत्बा सुनने वाले पर उसे ध्यान और खामोशी से सुनना अनिवार्य है।''

''अल-इस्तिज़कार'' (5/43).

कुछ लोगों ने इससे अलग थलग मत अपनाते हुए इसकी अनिवार्यता के बारे में मतभेद किया है। हालांकि उनके पास कोई दलील नहीं है जो उस मत की पुष्टि करती हो जिसकी ओर वे गए हैं।

इब्ने रूश्द ने - खुत्बा की हालत में खामोश रहने के हुक्म के बारे में फरमाया :

''जहाँ तक उन लोगों का संबंध है जिन्हों ने इसे अनिवार्य नहीं क़रार दिया है : तो मैं उनका कोई संदेह नहीं जानता हूँ, सिवाय इसके कि वे यह विचार रखते हों कि अल्लाह तआला के कथन :

{ وإذا قرئ القرآن فاستمعوا له وأنصتوا } ''और जब क़ुरआन पढ़ा जाए तो उसे ध्यान से सुनो और खामोश रहो।'' (सूरतुल आराफ 7:204)

में ''दलीलुल-खिताब'' (यानी मफहूम मुख़ालिफ़) इस आदेश का विरोध करता है, अर्थात: क़ुरआन के अलावा के लिए खामोशी से सुनना अनिवार्य नहीं है। हालांकि इस तर्क में कमज़ोरी पाई जाती है, और अल्लाह तआला ही सबसे अधिक ज्ञान रखता है। और अधिक संभावित बात यह है कि उन्हें यह हदीस नहीं पहुँची है।'' अंत हुआ। ''बिदायतुल मुजतहिद'' (1/389). (दलीलुल खिताब या मफहूम मुखालिफ का मतलब हैः इबारत (नस) के अंदर किसी चीज़ का विशेष रूप से उल्लेख किए जाने से  यह दलील पकड़ना कि उसके अलावा पर वह हुक्म लागू नहीं होगा।)

आवश्यकता पड़ने पर या किसी हित के लिए, इमाम के साथ बातचीत करना और इमाम का मुक़्तदियों के साथ बातचीत करना, इस सामान्य हुक्म से अपवाद रखता है।

अनस बिन मालिक रज़ियल्लाहु अन्हु से वर्णित है कि उन्हों ने कहा : नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के युग में लोग अकाल (सूखा) से पीड़ित हो गए। तो इस बीच कि आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम एक जुमा के दिन भाषण दे रहे थे कि एक दीहाती आदमी खड़ा हुआ और कहने लगा: ऐ अल्लाह के पैगंबर! धन-संपत्ति नष्ट हो गए और बच्चे भूखे मर रहे हैं। अतः आप अल्लाह से हमारे लिए दुआ करें। चुनाँचे आप ने (दुआ के लिए) अपने दोनों हाथ उठाए . . .  तो उस दिन और अगले दिन और अगले दिन के बाद वाले दिन और उसके बाद वाले भी दिन यहाँ तक कि दूसरे जुमा तक हम पर बारिश होती रही। फिर वही दीहाती - या कोई दूसरा आदमी - खड़ा हुआ और कहा : ऐ अल्लाह के पैगंबर, घर गिर गए और धन डूब गए, अतः आप अल्लाह से हमारे लिए दुआ करें, तो आप ने (दुआ के लिए) अपने दोनों हाथ उठाए . . . इसे बुखारी (हदीस संख्या : 892) और मुस्लिम (दीस संख्या : 897) ने रिवायत किया है।

जाबिर बिन अब्दुल्लाह रज़ियल्लाहु अन्हु से वर्णित है कि उन्हों ने कहा कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम जुमा के दिन खुत्बा दे रहे थी कि एक आदमी आया। तो आप ने कहा : ऐ फलाँ, क्या तू ने नमाज़ पढ़ ली? उसने कहा : नहीं। आप ने फरमाया : खड़े हो और दो रकअत नमाज़ पढ़ो।'' इसे बुखारी (हदीस संख्या : 888) और मुस्लिम (हदीस संख्या : 8875) ने रिवायत किया है।

जिस व्यक्ति ने इस तरह की हदीसों से नमाज़ियों के आपस में एक दूसरे के साथ बात चीत करने के जायज़ होने और खामोशी अपनाने अनिवार्य न होने पर दलील पकड़ी है, उसकी बात सही नहीं है।

इब्ने क़ुदामा कहते हैं :

''और उन्हों ने जिससे दलील पकड़ी है : उसमें इस बात की संभावना है कि वह उस व्यक्ति के साथ विशिष्ट है जिसने इमाम से बात चीत की या इमाम ने उससे बात चीत की ; क्योंकि वह इसकी वजह से उसका खुत्बा सुनने से गाफिल (व्यस्त) नहीं होता है। इसीलिए नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने पूछा : ''क्या तू ने नमाज़ पढ़ ली?'' तो उसने आपको उत्तर दिया। तथा उमर रज़ियल्लाहु अन्हु ने खुत्बा देते हुए, उसमान रज़ियल्लाहु अन्हु से प्रश्न किया जब वह मस्जिद में प्रवेश किए, तो उन्हों ने उमर रज़ियल्लाहु अन्हु को उत्तर दिया। अतः सभी सूचनाओं के बीच मिलान और सामंजस्य पैदा करते हुए, उनकी सूचनाओं को इसी पर अनुमानित (महमूल) करना निर्धारित हो गया। और उसके अलावा को उस पर क़ियास (अनुमानित) करना सही नहीं है ; क्योंकि इमाम की बातचीत उसके खुत्बा देने की हालत में नहीं होती, जबकि उसके अलावा का मामला इसके विपरीत है।'' अंत हुआ।

''अल-मुग्नी'' (2/85).

जहाँ तक इमाम के खुत्बा देने की हालत में छींकनेवाले के लिए 'यर्हमुकल्लाह' कहने और सलाम का जवाब देने का संबंध है, तो इसके बारे में विद्वानों के बीच मतभेद है।

इमाम तिर्मिज़ी ने अपनी ''सुनन'' में - अबू हुरैरा की हदीस ''यदि तू ने अपने साथी से कहा . . .'' के बाद - फरमाया :

विद्वानों ने सलाम का जवाब देने और छींकनेवाले के लिए 'यर्हमुकल्लाह' कहने के बारे में मतभेद किया है। चुनाँचे कुछ विद्वानों ने इमाम के खुत्बा देने की हालत में सलाम का जवाब देने और छींकनेवाले के लिए 'यर्हमुकल्लाह' कहने के बारे में रूख्सत दी है। यह इमाम अहमद और इसहाक़ का कथन है। जबकि ताबेईन वगैरह में से कुछ विद्वानों ने इसे नापसंद किया है। यह इमाम शाफई का कथन है।''  अंत हुआ।

तथा स्थायी समिति के फतावा (8/242) में आया है :

''विद्वानों के सही कथन के अनुसार इमाम के खुत्बा देने की हालत में छींकनेवाले के लिए 'यर्हमुकल्लाह' कहना तथा सलाम का जवाब देना जायज़ नहीं है, क्योंकि दोनों में से प्रत्येक बातचीत है और वह, हदीस के सामान्य अर्थ के आधार पर, इमाम के खुत्बा देने की हालत में निषिद्ध है।'' अंत हुआ।

तथा उसमें (8/243) यह भी आया है कि :

''जो आदमी जुमा के दिन इमाम के खुत्बा देने की हालत में प्रवेश करे, तो यदि वह खुत्बा सुन रहा है तो उसके लिए मस्जिद में मौजूद लोगों पर सलाम से शुरूआत करना जायज़ नहीं है, तथा जो लोग मस्जिद में उपस्थित हैं उनके लिए इमाम के खुत्बा देने की हालत में उसका जवाब देना भी जायज़ नही है।''

तथा उसमें (8/244) यह भी आया है कि :

''खतीब के खुत्बा देने के दौरान बात चीत करना जायज़ नहीं है सिवाय उस व्यक्ति के जिससे खतीब किसी मामला के पेश आने की वजह से बात करे।'' अंत हुआ।

तथा शैख इब्ने उसैमीन ने फरमाया :

''जुमा के खुत्बा की हालत में सलाम करना हराम (निषिद्ध) है। अत: इन्सान के लिए जायज़ नहीं है कि जब वह इमाम के जुमा का खत्बा देने की हालत में (मस्जिद में) प्रवेश करे तो सलाम करे, और उसका जवाब देना भी हराम (निषिद्ध) है।''  अंत हुआ।

फतावा इब्ने उसैमीन (16/100).

तथा शैख अल्बानी ने फरमाया :

कहनेवाले का यह कहना कि : ''खामोश रहो'', भाषा की दृष्टि से अनर्थक नहीं समझा जाएगा, क्योंकि वह भलाई का आदेश करने और बुराई से रोकने के अध्याय से है, इसके बावजूद नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने उसे अनर्थक की संज्ञा दी है जो जायज़ नहीं है। यह सबसे महत्वपूर्ण चीज़ को (जो कि खतीब के सदुपदेश को खामोशी और ध्यान से सुनना है) महत्वपूर्ण चीज़ पर (जो कि खुत्बा के दौरान भलाई का हुक्म देना है) प्राथमिकता देने के अध्याय से है। जब मामला ऐसा है, तो जो भी चीज़ भलाई का आदेश करने की श्रेणी में है, उसका हुक्म भलाई का आदेश करने का । तो फिर उस समय क्या हुक्म होगा यदि वह श्रेणी (रुत्बा) में उससे कमतर है? इस में कोई संदेह नहीं कि वह ऐसी अवस्था में निषिद्ध होने के अधिक योग्य है, और शरीअत की दृष्टि से वह अनर्थक है।''

''अल-अजविबतुन नाफिअह'' (पृष्ठ 45)

सारांश यह कि :

जुमा में उपस्थित होने वाले के लिए अनिवार्य यह है कि वह इमाम के प्रवचन को खामोशी से सुने, तथा उसके लिए इमाम के खुत्बा देने की हालत में बात चीत करना जायज़ नहीं है, सिवाय उसके जिसे प्रमाण ने अपवाद क़रार दिया है, जैसे कि खतीब के साथ बात करना, या उसका जवाब देना, या जिसकी ज़रूरत पेश आ जाए उदाहरण के तौर पर किसी अंधे आदमी को गिरने से बचाना या इसके समान परिस्थिति।

तथा इमाम पर सलाम करना और उसका सलाम का जवाब देना भी इस निषेध में दाखिल है, क्योंकि इमाम के साथ बात करने की छूट केवल किसी हित (मसलहत) या आवश्यकता के पाए जाने की वजह से है, और सलाम करना और उसका जवाब देना इसमें से नहीं है।

''इमाम के लिए बिना किसी मसलहत (हित) के कोई बात करना जायज़ नहीं है। इसलिए ज़रूरी है वह किसी हित की वजह से हो जो नमाज़ या उसके अलावा से संबंधित हो जिसके बारे में बात करना अच्छा हो, लेकिन यदि इमाम बिना किसी मसलहत के बात करे तो यह जायज़ नहीं है।

और यदि वह (बातचीत) किसी आवश्यकता के लिए है, तो वह प्राथमिकता के साथ जायज़ है। आवश्यकता में से यह है कि श्रोता पर खुत्बा के दौरान किसी वाक्य का अर्थ पोशीदा रह जाए तो वह पूछ ले। आवश्यकता में से यह भी है कि खतीब किसी आयत में कोई ऐसी गल्ती कर बैठे जो अर्थ को परिवर्तित करने वाली हो, उदाहरण के तौर पर आयत का कोई वाक्य गिरा दे या इसके समान कोई त्रुटि।

मसलहत (हित), आवश्यकता से कमतर होती है। हित में से, उदाहरण के तौर पर, यह है कि यदि लाउड स्पीकर की आवाज़ खराब हो जाए, तो इमाम बात कर सकता है और इंजीनियर से कह सकता है कि : लाउड स्पीकर को देख लें कि उसमें क्या खराबी पैदा हो गई है?''  अंत हुआ। 

और अल्लाह तआला ही सबसे अधिक ज्ञान रखता है।

Source: https://islamqa.info/hi/45651

URL: https://newageislam.com/hindi-section/ruling-talking-remaining-silent-during/d/106663

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