इडा लिचर
5 मई 2013
मोटरसाइकिल चलाने की इज़ाज़त क्या सऊदी औरतों के कार चलाने पर लगी पाबंदी को हटाने की दिशा में पहला कदम है? हाल ही में सरकार ने औरतों को पूरे इस्लामी पोशाक पहन रहने की शर्त पर पार्क और मनोरंजन क्षेत्रों में बाइक या बग्घी चलाने की इजाज़त दी है। गाड़ी चलाने वाले अपनी काली पोशाक में उलझ जाएं और गिर पड़ें, ऐसे में उन्हें किसी पुरुष अभिभावक के साथ होना ज़रुरी है और सामाजिक मेल जोल से बचने के लिए ये लोग ऐसे सार्वजनिक जगहों से दूर रहें, जहाँ मर्द अक्सर आते हैं।
वजेहा अलहुवैदर जैसी महिला कार्यकर्ताओं ने ड्राइविंग पर पाबंदी खत्म करने की अर्ज़ी दी है, और बच्चों की शादी और संरक्षण कानूनों के खिलाफ अभियान चलाया है जो महिलाओं को कानूनी प्रक्रिया, शिक्षा, शादी और यात्रा के लिए पुरुष रिश्तेदारों से इजाज़त लेने को मजबूर करते हैं।
वैश्विक आर्थिक, राजनीतिक और धार्मिक प्रभाव के साथ सउदी शाह के द्वारा भेदभाव को खत्म करने के लिए राज्य से समर्थन प्राप्त सुधार पर पश्चिमी देशों में कुछ कम ही रुचि पैदा हो सकती है, अगर ये कदम तेल की दौलत से माला माल देश में पश्चिमी देशों के संभावित प्रभाव के लिए न हो।
सऊदी अरब कई देशों में मस्जिदों और इस्लामिक स्टडीज़ के लिए धन मुहैया कराता है। ये एक मिशन है जिसका आधार 18वीं सदी के मध्य में प्रिंस मोहम्मद इब्ने सऊद और मुस्लिम विद्वान मोहम्मद इब्न अब्दुल वहाब के बीच समझौता है। ये गठबंधन इस्लाम धर्म के बेहद हिंसक रूप वहाबी इस्लाम के प्रचार प्रसार के बदले में ये मक्का और मदीना में पवित्र स्थानों के संरक्षक के रूप में सऊद परिवार को वैधता प्रदान करता है। वहाबियत राज्य के कानून और धार्मिक पुलिस में प्रकट होता है। ईरान के साथ प्रतिद्वंदिता ने सऊदी अरब को और अधिक पवित्र छवि को अपनाने को मजबूर किया है।
सऊदी उलेमा औरतों के बराबरी हक़ के धुर विरोधी हैं और बहुत से उलमा पश्चिमी प्रभाव के रूप में सुधारों से डरते है जो कथित तौर पर इस्लाम में बिगाड़ पैदा कर देगा और मुस्लिम युवाओं को धर्म से दूर कर देगा। ड्राइविंग पर पाबंदी और दूसरे लैंगिक भेदभाव को पलटना लैंगिक अलगाव को खत्म कर देगा जो कि सांस्कृतिक व्यवहार और धर्म का आधार है।
सुधार की कोई भी कोशिश सऊदी अरब के शाह अब्दुल्ला के धार्मिक अधिकारियों के साथ सम्बंध और तनाव पर निर्भर है, जो उनकी सत्ता को बनाए रखते हैं। इसके अलावा पश्चिमी देशों की सरकारें सऊदी अरब की आलोचना करने से बचते हैं क्योंकि दोनों तेल, हथियार और निवेश के बड़े सौदे से जुड़े हुए हैं। सहजीविता के रिश्ते ने सऊदी अरब को औरतों के अधिकारों के उल्लंघन के लिए खुली छूट दे रखी है।
सऊदी शाह ने एक बड़ी संख्या में सुधारों को शुरू किया है। हज़ारों की संख्या में छात्रों और छात्राओं को पश्चिमी देशों की युनिवर्सिटियों में पढ़ाई के लिए के लिए छात्रवृत्ति के द्वारा प्रोत्साहित किया है। केवल महिलाओं के लिए रियाद में एक नयी युनिर्सिटी 50 हज़ार से अधिक छात्राओं को शिक्षा दे रही है। ऐसे देश में जहाँ अदालते लैगिक रूप से अलग थलग हैं और जहाँ एक महिला की गवाही को मर्द की गवाही के आधी मानी जाती है, वहाँ पर मिसाल कायम करते हुए हाल ही में प्रशिक्षित महिला वकीलों ने अदालत में रजिस्ट्रेशन कराया है।
2015 से सऊदी औरतों को मतदान का अधिकार होगा और उन्हें म्युनिसिपल इलेक्शन में प्रत्याशी के रूप में चुनाव लड़ने का अधिकार होगा।
सऊदी औरतों के बेटे और पति जो गैर सऊदी औरतों से शादी करते हैं, अब वो भी सऊदी नागरिक बन सकती हैं।
पिछले साल जनवरी में 89 वर्षीय सऊदी शाह ने शूरा कांसिल में प्रतिनिधित्व के लिए 30 महिलाओं को नियुक्त कर समाज में महिलाओं के योगदान को स्वीकार किया है, शूरा काउंसिल नए कानून के बारे में सऊदी शाह को सलाह देती है। दर्जनों विद्वानों ने शाह के इस कदम का विरोध किया और इल्ज़ाम लगाया कि ये कदम इस्लामी कानून का उल्लंघन करेगा।
हाल ही में सरकार की सुधारों की वजह से निजी क्षेत्र में महिला कर्मचारियों की संख्या कथित तौर पर दोगुनी हो गई है। हालांकि युनिवर्सिटी स्नातकों के 60 फीसद का प्रतिनिधित्व महिलाएं करती हैं लेकिन कामकाजी लोगों में महिलाओं की भागीदारी सिर्फ 16.5 प्रतिशत है। औसतन वो पुरुषों के आधे वेतन के बराबर कमाती हैं, लेकिन सऊदी अरब की मिनिस्ट्री ऑफ लेबर के नियम समान काम के लिए समान वेतन निर्धारित करते हैं।
सबसे पहली सऊदी फीचर फिल्म "वज्दा" और मोटरसाइकिल चलाने को लेकर आशांवित एक लड़की की कहानी को शाही स्वीकृति के बाद बनाया गया। जिसका निर्देशन हैफ़ा अल-मंसूर ने किया है, हैफा ने ऑस्ट्रेलिया के फिल्म स्कूल में पढ़ाई की है, ये फिल्म सऊदी समाज की आलोचना करती है।
कानून, मीडिया और शूरा काउंसिल में शामिल मर्दों के व्यवहार में सांस्कृतिक परिवर्तन दिखाई देता है जो महिलाओं के खिलाफ हिंसा और अपराधियों के लिए हल्की सजा की निंदा करते हैं।
सऊदी युवा सार्वजनिक बहसों में खुलकर और बढ़ चढ़कर आवाज़ बुलंद कर रहे हैं। सऊदी अरब के नौजवान सबसे ज़्यादा यूट्यूब देखते हैं, जिनमें से आधी संख्या महिलाओं की है।
सऊदी अरब के पूर्वी प्रांत में महिलाएं मानवाधिकार को लेकर अधिक सक्रिय हो रही हैं, सऊदी महिलाएं आमतौर पर सफलता प्राप्त कर रही हैं, अपने पसंद की शैक्षिक डिग्रियाँ हासिल कर रही हैं, और पुराने नियमों और परम्पराओं के खिलाफ असंतोष को बढ़ावा देने के लिए इंटरनेट का उपयोग कर रही हैं। युवा, शिक्षित महिला पुरुष के वर्चस्व वाली संस्कृति के बहाने को भांप सकती हैं जो सम्मान और आदर के बदले में आज्ञाकारिता की मांग करता है। कुछ ऐसी महिलाएं जो पश्चिमी देशों से प्रभावित हैं वो लिंग भेद और सुधार की मामूली गति को बर्दाश्त नहीं करेंगी और हो सकता है कि वो बदलाव के लिए अभियान छेड़ें या सऊदी अरब से पलायन कर जाएं।
अरब स्प्रिंग आंदोलन ने क्षेत्र में लैंगिक भेदभाव पर आधारित कानूनी सुधार को बर्खास्त कर दिया है। ये विडंबना ही होगी अगर महिलाओं के अधिकारों की गति मुस्लिम देशों में सबसे दमनकारी देश में इस प्रवृत्ति के खिलाफ चले।
इडा लिचर एम.डी. 'Muslim Women Reformers: Inspiring Voices Against Oppression' की लेखिका हैं
स्रोतः http://www.huffingtonpost.com/ida-lichter-md/saudi-women-edge-toward-equal-rights-reform_b_3116008.html
URL for English article: https://newageislam.com/islam-women-feminism/saudi-women-edge-toward-equal/d/11430
URL for Urdu article: https://newageislam.com/urdu-section/saudi-women-edge-toward-equal/d/11955
URL for this article: https://newageislam.com/hindi-section/saudi-women-edge-toward-equal/d/55978