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Hindi Section ( 23 Jul 2013, NewAgeIslam.Com)

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Taliban's Demand तालिबान की मांग

 

हुसैन अमीर फ़रहाद

जुलाई, 2013

पिछले लेख में हमने बयान किया था कि तालिबान की हीन भावना के एहसास को खत्म कर उन्हें काम के लायक बनाया जा सकता है। हमने अफगानिस्तान में रूस के खिलाफ अमेरिका की मदद की थी, अमेरिका ने तालिबान जो पख्तून थे उनको पराजित करने के लिए उत्तर अफगानी मज़ार शरीफ से लाए, इन्हें हरावल में रखा। उन्होंने तालिबान को बहुत नुकसान पहुंचाया।

तालिबान पश्तून अफ़ग़ानियों के भाई बंधु थे इसलिए हर अफगानी पख्तून पाकिस्तान का दुश्मन बन गया। उत्तरी अफ़ग़ानिस्तान वाले भी हमें दुश्मन समझते हैं इसलिए कि पाकिस्तान ने शुरुआत में तालिबान सरकार की स्थापना में भरपूर मदद दी थी। नतीजा ये कि अफगानिस्तान की धरती पर हमारा कोई हमदर्द नहीं। रोज़ाना हमारी चौकियों पर हमले होते हैं। वो ये दुश्मनी इस तरह निकाल रहे हैं कि पाकिस्तान की लंबी सीमा के करीब हमारे दुश्मन को कौसिल खाना खोलने की इजाज़त दी है। जो तालिबान को वित्तीय सहायता और भारी अस्लहा गोला बारूद अफगानी एजेंटों के माध्यम से सप्लाई करता है।

तो सबसे पहले करने का काम ये है कि सीमाओं पर पहरा बढ़ा दिया जाए। जब हथियार और गोला बारूद की सप्लाई बंद हो जाएगी तो धमाकों का सिलसिला भी बंद हो जाएगा। वो मेजर साहब तो अब रहे नहीं, एक रिटायर्ड मेजर का (टीवी) पर इंटरव्यू आया था। उनकी सफेद दाढ़ी थी। वो तालिबान को बम बनाना सिखाते थे। उन्होंने बताया था कि बम बनाना कोई मुश्किल काम नहीं है। मुझे यूरिया खाद, चीनी और मिट्टी का तेल दे दिया जाए, कुछ और नाम भी उन्होंने बताए थे। कहा, मैं आपके किचन में बैठ कर एक खतरनाक बम बना सकता हूँ और बता रहे थे कि मैं काफी समय तक तालिबान के साथ रहा हूँ। मेरा उन पर एहसान है। वो कुछ दिनों बाद तालिबान से मिलने गए वज़ीरिस्तान, उन्होंने मेजर साहब का काम तमाम कर दिया। ये खबर भी टीवी पर प्रसारित हुई थी। ये सिलसिला भी बंद होना चाहिए, क्योंकि

ये तीर वो है कि जो लौटकर भी आता है

एक और बात जो बड़ी अहम है। वो है तालिबान का लोकतांत्रिक सरकार और उसके संविधान को न मानना। जब इमरान खान का मार्च वज़ीरिस्तान के क़रीब पहुंच गया तो तालिबान ने पैग़ाम दिया था कि हम इमरान खान की सुरक्षा का वादा नहीं कर सकते। ये भी सेकुलर हैं, ये कामयाब होकर लोकतांत्रिक व्यवस्था स्थापित करेगा, इसलिए इमरान खान को वापस होना पड़ा।

ये बात हर एक मानता है कि अल्लामा इक़बाल का पाकिस्तान बनाने में कितना हाथ है। उनके तराने गाए जाते हैं। उनके जन्मदिन और शोक दिवस पर देश के हर भाग में छुट्टी होती है। महत्वपूर्ण स्थानों और पाठ्य पुस्तकों में उनकी तस्वीरें नज़र आती हैं। मज़ार पर नियमित रूप से गार्ड बदलते हैं। आलिम हों या जाहिल, मिस्टर हों या मिनिस्टर हों, हर एक मानता है कि अल्लामा पाकिस्तान के संस्थापकों में से हैं। लेकिन उन्होंने पाकिस्तान के लिए जो व्यवस्था प्रस्तावित की उसे क्यों नहीं माना जाता। लोकतांत्रिक व्यवस्था का दुनिया में हज़रत अल्लामा से बड़ा दुश्मन कोई नहीं। वो फरमाते हैं।

जम्हूरियत एक तर्ज़ें हुकूमत है कि जिस में

बंदों को गिना करते हैं तौला नहीं करते

यानी लोकतंत्र में खोपड़ियाँ गिनी जाती हैं, उनमें दिमाग नहीं परखा जाता। बुद्धि और सूक्ष्म ज्ञान और कौशल नहीं देखा जाता। चीफ जस्टिस का एक वोट और उसके माली का भी एक वोट। जबकि अल्लाह का तराज़ू है। इन्ना अकरमाकुम इंदल्लाहे अतक़ाकुम (49- 13) तुममें अल्लाह के नज़दीक वो साहिबे इकराम व इज़्ज़त है जो परहेज़गार है। ये नहीं कि जिसे बहुमत पसंद करता हो। बहुमत के बारे में तो अल्लाह की निर्णायक आज्ञा है। वइन तोतेआ अक्सरा मन फिल अर्दे योदिल्लूका अन सबीलिल्लाह (6- 116) (ऐ नबी) अगर तुम अक्सरीयत के पीछे चलोगे, तो ज़मीन पर अक्सरीयत तो गुमराह लोगों की होती है, वो तुम्हें भी गुमराह कर देंगे) अल्लामा इकबाल की नज़्म इब्लीस (शैतानों का बादशाह) की मजलिसे शूरा में इब्लीस का सलाहकार कहता है। 

खैर है सुल्तानी जम्हूरी का ग़ोग़ा कि शर

तू जहां के ताज़ा फ़ितनों से नहीं है बाखबर?

हूँ मगर मेरी जहां बीनी बताती है मुझे

जो मलूकियत का इक पर्दा हो क्या उससे ख़तर

हमने खुद शाही को पहनाया है जम्हूरी लिबास

जब ज़रा आदम हव्वा है खुद-शनास व खुद निगर

कारोबारे शहरयारी की हक़ीक़त और है

ये वजूदे मीर व सुल्तान पर नहीं मुन्हसिर

मजलिसे मिल्लत गो या परवेज़ का दरबार हो

है वो सुल्तान गैर की खेती पे हो जिसकी नज़र?

तू ने क्या देखा नहीं मग़रिब का जम्हूरी निज़ाम

चेहरा रौशन अंदरों चंगेज़ से तारीक तर 

इब्लीस (शैतानों का बादशाह) कहता है कि ये लोकतंत्र नहीं है हमने खुद बादशाहत को जम्हूरी लिबास पहनाया है। तुमने उसका रौशन चेहरा देखा है अंदर से, नहीं देखा अंदर से ये चंगेज़ से ज़्यादा भयानक और अंधेरा है। ये है अल्लामा इक़बाल रहमतुल्लाह अलैहि, पाकिस्तान के विचारक की लोकतंत्र के बारे में निर्णायक राय। वो इसे सौगाते इब्लीस कह रहे हैं और हमारे सियासतदानों का आलम ये है कि एक बार बाबर आवान साहब कह रहे थे कि हज़रत अल्लामा लोकतंत्र के ज़बरदस्त समर्थक थे। लेकिन अल्लामा फरमाते हैं। 

है वही साज़ कहेन मगरिब का जम्हूरी निज़ाम

जिसके पर्दों में नहीं गैर अज़ नवाए कैसरी

देव इस्तब्दार जम्हूरी कबा में पाए कोब

तू समझता है ये आज़ादी की नीलम परी

गरमई गुफ़्तार आज़ाए मजालस अमाँ

ये भी एक सरमायादारों की है जंग- जरगिरी!

इस सराबे रंग व बू को गुलिस्तान समझा है तू

आह ऐ नादां कफस को आशियाँ समझा है तू 

अल्लामा इसे देव इस्तब्दार (अजीब देव) कहते हैं जिसने लोकतांत्रिक लिबास पहना है। और लोकतंत्र के प्रेमियों को कहते हैं ये आशियाँ नहीं कफ़स है, ज़न्दान है। ये नीलम परी नहीं। मगर हम अल्लाह का फ़रमान नज़र अंदाज़ करते हैं, अल्लामा क्या हैं। वो तो अल्लाह के बंदे हैं। ये तो इंसाफ न हुआ कि हज़रत अल्लामा का सम्मान तो करते हैं उसे पाकिस्तान का विचारक भी कहते हैं, लेकिन वो अंग्रेजों की उतरन लोकतंत्र से नफ़रत करते हैं और आप वही इब्लीस का तैय्यार किया हुआ सूट पाकिस्तान को पहना रहे हैं। अब जो भी अल्लाह के प्रस्तावित व्यवस्था को छोड़कर इंसानों के तैय्यार की गयी  व्यवस्था को अपनाता है, चाहे वो व्यक्ति हो, लोग हों या सरकार। ये सभी आला दर्जे का शिर्क है और शिर्क के बारे खुदा का फरमान है कि (इन्नल्लाहा ला यग़फ़िरो शिर्का) शिर्क जिसे अल्लाह माफ़ नहीं करेगा। आश्चर्य मुझे धर्म से अनजान लोगों पर नहीं है, ताज्जुब उन पर है जो धर्म के दावेदार हैं। हमारे यहां और तो और मौलाना भी उठते बैठते लोकतंत्र का राग अलाप रहे हैं। ये भी शिर्क है। जो भी लोकतंत्र का उल्लेख करता है। इसको बस इतना काम करना चाहिए कि उपरोक्त आयत को कुरान से मिटा दे। फिर लोकतंत्र के लिए रास्ता साफ हो जाएगा। फिर जो मर्ज़ी में आए करे। इस आयत के होते हुए लोकतंत्र यहां ताक़त नहीं पा सकता, और दाढ़ी मुड़े लोगों को चाहिए कि अल्लामा इकबाल के कलाम में से लोकतंत्र के खिलाफ सभी शेर निकाल बाहर करें। फिर करते रहे जो जी में आए। बड़ी दिलेरी का काम है कि अल्लामा के बारे में कोई कहे कि वो लोकतंत्र समर्थक थे।

उनके एक बयान को देखें।

अल्लामा इकबाल ने एक किस्सा बयान किया है। कि जब महमूद गज़नवी सोमनाथ के बड़े बुत को गर्ज़ मारने लगा तो पुरोहितों ने कहा कि इसको न तोड़िए महाराज, ये हमारी आवश्यकताओं को पूरा करने वाला है और हमारी बातों का जवाब देता है। महमूद ने कहा आवश्यकताओं को पूरा करने वाला तो खुदा है, लेकिन ये बातों का जवाब कैसे देता है? ज़रा हम भी तो सुनें।

पुरोहित ने कहा अभी लो सरकार, कहा, हे भगवान आज कौन सा दिन है? मूर्ति से आवाज़ आई आज मंगलवार है। महमूद हैरान हुआ कि बुत ने कैसे जवाब दिया। मूर्ति दीवार से एक फीट की दूरी पर थी, महमूद समझ गया कि गड़बड़ दीवार ही में है। उसने दीवार को बजा कर देखा तो एक जगह से खोखलेपन की आवाज़ आई, उसने वहीं अपना गर्ज़ मारा, जब प्लास्टर टूटा तो महमूद ने देखा कि दूसरी ओर तीन साधु बैठे चंडू पी रहे हैं। वो एक पाइप के माध्यम से जो मूर्ति से जुड़ा था, बातों का जवाब देते थे। अल्लामा इकबाल कहते हैं कि लोकतंत्र की दीवार पर जब महमूदी गर्ज़ से वार करोगे और प्लास्टर टूटेगा तो दूसरी तरफ कुछ गिने चुने मकरूह और घिनौने चेहरे नज़र आएंगे। वो हर कानून और पालिसी अपने हितों को सामने रखकर बनाते हैं। इस लोकतंत्र में जनता के प्रतिनिधि चुने जाने के बाद जनता की पंक्ति से निकलकर खास लोगों की पंक्ति में जा खड़े होते हैं।

मैं भी एक किस्सा सुनाता हूँ। मिस्र में एक राजा गुज़रा जिसका नाम करे कौश था। सुना है वो लोकतंत्र का बड़ा प्रशंसक था लेकिन लोग उसे मूर्ख समझते थे। एक बार उसके दौर में अकाल पड़ा। लोग शमऊन नाम के यहूदी पास गये जिसके गोदाम में अनाज भरा हुआ था। कहा हम भूखे मर रहे हैं अनाज दो वरना हम तुम्हें जिंदा दफ़न कर देंगे। उसने कहा कि जो चाहो करो, मैं अनाज नहीं देने वाला। भीड़ ने उसे चारपाई पर बांधा और ऊपर चादर डाल दी, कहा हम तुम्हें दफन करने वाले हैं बताओ कोई आखरी इच्छा है? चालाक यहूदी ने कहा, हां मेरी अंतिम इच्छा ये है कि मेरा जनाज़ा राजा के महल के नीचे से गुज़ारा जाए। उन्होंने ऐसा ही किया। राजा बालकनी में खड़ा था, उसने पूछा वमन हाज़ा, ये कौन है जिसके पीछे पूरा काहिरा लगा है, इतने लोग तो हमारे जनाज़े में होने चाहिए थे? लोगों ने कहा कि ये यहूदी शमऊन बिन जब्बार है, बेचारा मर गया है, हम इसे दफनाने ले जा रहे हैं। यहूदी ने मुँह से चादर हटाई और कहा बादशाह सलामत दुहाई है, ये लोग मुझे ज़िंदा दफन करने जा रहे हैं, मुझे बचाइए। राजा ने उसके जनाज़े की भीड़ को देखा, फिर उसकी बात पर विचार किया। फिर कहा देखो शमऊन हम मूर्ख प्रसिद्ध हैं, लेकिन इतने भी नहीं कि हम तुम्हारे कहने पर यक़ीन कर लें कि तू जिंदा है। क्या ये सब लोग झूठ बोल रहे हैं, तुम अकेले सच बोल रहे हो कि तुम ज़िदा हो? भीड़ को आदेश दिया कि दफन कर दो इस झूठे को। ये है लोकतंत्र।

जब हज़रत अल्लामा लोकतंत्र के विरोधी हुए, वो इसे इब्लीसी ड्रामा करार दे रहे हैं और तालिबान भी, तो अल्लामा और तालिबान की राय एक हुई तो अल्लामा इकबाल के समर्थक मोमिन हुए। अगर लोकतंत्र को मानने वाले होते तो अल्लाह के नाफरमान होते। अगर बीच का रास्ता किसी पाठक को पता हो तो मुझे भी कृपा कर के बता दे।

तालिबान अगर शरीयत चाहते हैं तो अल्लाह का हुक्म अल्लाह की ताकीद है कि इस्लामी ज़िंदगी सिर्फ इस्लामी व्यवस्था के अधीन ही सम्भव है। हिजरत के फ़र्ज़ होने का व्यावहारिक रूप से अर्थ ये है कि गैर इस्लामी व्यवस्था में ज़िंदगी बसर करने से गंभीर रूप से मना किया गया है। खुदा का इरशाद है कि, इन्नल्लज़ीना तोवफ्फाहुमुल मलाएकतो ज़ालिमी अन्फोसेहिम क़ालू फीमा कुन्तुम क़ालू कुन्ना मस्तदएफीना फिल अर्दे क़ालू अलम तकुन अर्दुल्लाहे वासेअतः फतोहाजेरूना फीमा फऊलोएका मावाहुम जहन्नमो वसाअत मसीरा (4 - 97)

बेशक जिन लोगों की रूह क़ब्ज़ फरिश्तों ने उस वक्त की कि (वो गैर इस्लामी व्यवस्था में पड़े थे) और अपनी जानों पर ज़ुल्म कर रहे थे तो फरिश्ते रूह क़ब्ज़ करने के बाद हैरत से कहते हैं कि तुम किस हालते ग़फ़लत में थे। या तुम किस हाल में मुब्तेला थे। उन्होंने जवाब दिया कि हम ज़मीन में कमज़ोर और मजबूर थे। तो फरिश्ते कहते हैं कि क्या अल्लाह की ज़मीन विशाल नहीं थी कि तुम इसमें हिजरत कर जाते? ये वो लोग हैं जिनका ठीकाना जहन्नम है और वो बहुत ही बुरा ठिकाना है।

ये भी तो मुमकिन है कि तालिबान इस बुरे ठिकाने से डर कर सेकुलर के बजाय धार्मिक और शरीयत की व्यवस्था के लिए कोशिश कर रहे हों? लेकिन इंडोनेशिया, मलेशिया और अन्य कई देशों ने अंग्रेजी न्याय प्रणाली को नहीं अपनाया, उपयोगी चीजें दूसरों से भी लीं हैं। खाड़ी और सऊदी अरब ने मामलों की जाँच के लिए फिंगर प्रिंट और फोटोग्राफ अंग्रेजों से लिया है। ये इस्लामी कानून में प्रत्यारोपण नहीं है। लेकिन हमने तो पूरी तरह से अंग्रेजी व्यवस्था को अपनाया है। इस्लामी गणराज्य पाकिस्तान के राष्ट्रपति और सभी गवर्नर और सभी मंत्री हर प्रकार के अपराध और सजा से मुक्त हैं, क्या ये इस्लाम में होता है? या पश्चिमी शैली के लोकतंत्र में।

ये हदीस भी चलते चलते देखते जाइए, काम आएगी। रवायत है हज़रत आयशा से कि क़ुरैश को फिक्र हुई एक औरत मखज़ूमिया की जिसने चोरी की थी। सो कहने लगे कौन बात करे, रसूलुल्लाह से इसकी सिफारिश के लिए? सो कहा उन लोगों ने कोई साहस रखता है इस बात की, मगर ओसामा जो ज़ैद के बेटे हैं, दोस्त हैं रसूलुल्लाह सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम के। फिर हिमायत की ओसामा ने हज़रत सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम से, सो फरमाया रसूलुल्लाह सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने! क्या शफाअत करता है तू हद में अल्लाह ताला की हुदूद में से? फिर खड़े हुए रसूलुल्लाह सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम और ख़ुत्बा पढ़ा। फरमाया कि बेशक हलाक (मारे गए) हुए वो लोग जो तुम से पहले थे, जब चोरी करता था उनमें कोई शरीफ (अमीर के अर्थ में) उसको छोड़ देते थे और जब चोरी करता था उनमें कोई गरीब तो सीमा स्थापित करते थे उस पर, और क़सम है अल्लाह की अगर फातिमा, मोहम्मद सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम की बेटी चोरी करे तो बेशक काटो उसका हाथ। (जामे तिर्मिज़ी जिल्द 1, अध्याय 95, हदीस 1430, पेज 518) वोट एक वचन होता है कि हम वोट लेने वाली पार्टी के बनाए हुए घोषणा पत्र और क़ानून का पालन करेंगे, परंतु ''मोमिन'' वो होता है जिसके मुताबिक सिर्फ और सिर्फ अल्लाह की फरमाबरदारी हो सकती है। इसलिए अल्लाह के मुक़ाबले में किसी इंसान या पार्टी की फरमा बरदारी वोट के ज़रिए से करना खुला, जानबूझ कर और स्पष्ट शिर्क है। पश्चिमी शैली के इस लोकतंत्र में बहुमत की राय मानी जाती, प्रतिनिधियों के बनाए हुए कानून को न मानने वाला गद्दार कहलाता है। ब्रिटेन की मिसाल हमारे सामने है ब्रिटेन की पार्लियमेंट ने लौंडाबाज़ी (Sodomy) का कानून पास किया है, कोई इन्कार करके देखे। मतलब ये है कि अक्सरियत के फैसले ग़लत और कुरान के खिलाफ भी हो सकते हैं।

जुलाई, 2013 स्रोतः सौतुल हक़, कराची

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