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Hindi Section ( 25 Sept 2014, NewAgeIslam.Com)

Remember Me in Your Supplications दुआओं में याद रखें!

 

 

 

हुसैन अमीर फ़रहाद

आज कल लगभग हर चैनल पर नून लिग के क़ाबिल मंत्री पानी और बिजली पर बहस करते हुए कहा था कि 'दुआ करें कि अल्लाह मियां पानी बरसाए तो लोडशीडिंग का समस्या हल हो जाएगा।' इस मामूली और बेतूकी बातों पर इतना वावेला नहीं मचाना चाहिए क्योंकि हमारे देश का तो पुरा ढ़ाँचा दुआओं पर चल रहा है। जैसे 3 मई, 2009 को जियो न्यूज़ पर कई बार बाताया गया और समाचार पत्रों में भी उस पर लिखा गया के रेल मंत्री मंगरयू साहब ने बयान दिया कि रेलवे ट्रेक बहुत पुराने हैं, पटरीयाँ पुरानी और खराब हैं किसी भी समय हादसा हो सकता है, और हालात भी खराब है यात्री दरुद शरीफ पढ़ कर यात्रा करें। विचार किजिए क्या दुनिया में हमारे अलावा कोई क़ौम है जो दरुदों पर गाड़ीयाँ, हवाई जहाज़ या बस चला रहें हैं ? या दुर्घटना से बचाव के लिए दरुद इस्तेमाल करते हैं। क्या भारत में भी सवारियों से कहा जाता है कि भगवान का नाम लो, रामायण पढ़ों या वेद पढ़ो। ताकि तुम्हारी यात्रा सफल हो।

जिस क़ौंम के मंत्री का यह हाल हो उस का दुनिया में क्या स्थान होगा? वही स्थान जो आज हमारा है या कोई और। हम ने हज़ार बार लिखा है के मंत्रालय क्या विधानसभा सदस्यता के लिए जो उम्मीदवार खड़ा हो उसे ज़रा सा मानवता के तराजू पर तौला जाए कि इस लायक़ है या दुआओं पर गाड़ीयाँ चलाया करेगा। सुना था कि आज कल विमान अपहरण होने से बचाने के लिए दो तीन कमांडो भी विमान में होते हैं। अब दो तीन मंलग,फक़ीर भी विमान में बिठाने चाहिए सुना है यह बहुत पहुँचे हुए बुजुर्ग होते है, इसी लिए यात्रीयों को भी बहुत जल्द मंजिल पर पहुँचा देते हैं।

जब राज्य के सीमा में एमएमए की सरकार थी उस समय कराची से पेशावर Air Hostess स्त्री थीं पेशावर से कराची के लिए पुरुष मेहमान नवाज़ थे एक कर्मचारी ने बताया कि इस समय पेशावर में इस्लामी सरकार है इस लिए स्त्री Air Hostess भूल जाओ इस्लाम में स्त्री होस्टेस मना है। (पता नहीं यह हुड हरामी हम में कहाँ से आ गई? और यह व्यक्तिगत है या मन हीस अल क़्यूम हम पोसती और हडहराम हैं? और यह हमें कहां तक पहुंचा कर दम लेगी।)

जब किसी मंत्री इत्यादि का इस तरह का बयान सुनता या पढ़ता हूँ तो समझता हूँ कि आवे का आवा बिग़ड़ा हुआ है। यह दुआएं, इस्तख़ारे, दरुदशरीफ, कुरआन की आयात तो हुज़ुर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से ले कर सहाबा किराम को याद था, (फिर कुफ्फार के साथ युद्ध और उन में जलील क़द्र सहाबा का क़त्ल होना और हुज़ुर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने 87 युद्ध में खुद शरिक हुए)।ज़िम्मेदारी से जान छुड़ाने के लिए यह बहुत ही अच्छा नुस्खा है कि पटरीयाँ पुरानी है हादसा कभी भी हो सकता है जान बचानी हो तो दरुद शरीफ पढ़ा करें। अगर रेल गाड़ी में मसीही हों या हिन्दु सिख हों तो उस को भी दरुद सिखाओगें या मरने दोगे?दुसरे मंत्री साहब लोड शेडिंग के लिए दुआ का इलाज बता रहें हैं। रब ने अपनी किताब में कुफ्फार से बचाव के लिए कहा। ''और जो भी तुमसे हो सके, उनके लिए बल और बँधे घोड़े तैयार रखो, ताकि इसके द्वारा अल्लाह के शत्रुओं और अपने शत्रुओं और इनके अतिरिक्त उन दूसरे लोगों को भी भयभीत कर दो जिन्हें तुम नहीं जानते। अल्लाह उनको जानता है और अल्लाह के मार्ग में तुम जो कुछ भी ख़र्च करोगे, वह तुम्हें पूरा-पूरा चुका दिया जाएगा और तुम्हारे साथ कदापि अन्याय न होगा'' (8:60)

रब ने यह नहीं फरमाया के उन्हें बद दुआओं की मीसाइल मारो या दरुद की मार मारो। दरुद तो अरबी शब्द ही नहीं है। पूरे कुरआन में नहीं है। पूरा कुरआन हूज़ूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के सीना मुबारक में था लेकिन उन्हों ने क़ुरआन से या असमाए हुस्ना से यह काम लिया ही नहीं जो काम आज कल हज़रत साहब ले रहे हैं। वजह यह है कि क़ुरआन करीम उन कामों के लिए है ही नहीं। क़ुरआन करीम तो उस सुरत में लाभ दे सकता है कि उसे समझा जाए जो फरमाया गया है उस पर अमल किया जाए। जिन्हों ने दुआओं दरुदों का सहारा लिया उन का किया हाल हुआ, मौलाना अबुल कलाम आज़ाद से सुनिए।

फरमाते है 18 वीं सदी के अंतिम में नेपोलियन बोना पार्ट ने मिस्र पर हमला किया तो मुराद बेग ने जामिया अज़हर के विद्वानों को इकट्ठा करके उन से मशविरा किया था कि अब क्या करना चाहिए ? अज़हर के उलमाओं ने यह राय दी थी कि जामिया अज़हर में सही बुख़ारी का खत्म शुरु कर देना चाहिए कि ऐसी ही किया गया, लेकिन अभी सही बुख़ारी का खत्म पूरा नहीं हुआ था कि अहराम की लड़ाई ने मिस्री सरकार का अंत कर दिया (ग़बार ख़ातिर पृष्ट 161मौलाना अबुल कलाम आज़ाद)

यह भी ध्यान में रख लिजिए के फ्रांसीसी हमलावर जिन्हें मिस्र पर विजय हासिल हुई क्या वह बुखारी शरीफ का खत्म कर के आए थे ? यारों कुछ तो सोचों। एक बार अपने गाँव में बारिश के लिए दुआ के लिए बुलाया गया था बादल छाए हुए थे नमाज़ पढ़ी तो बादल ग़ायब और सुरज अपने दमक से चमक रहा था जैसे कह रहा हो दफा हो जाओ गुनहगारों! अपने किरदार पर नज़र डालो ....... मुझे यह चीनी लड़की याद आ गई जिस ने जावेद एक़बाल (अल्लामा एक़बाल रहमतुल्लाह अलैह के लड़के) से पुछा था कि अगर बरसात नहीं होती तो आप लोग क्या करते है? उन्हों ने जवाब दिया कि हम नमाज़ पड़ते है बरसात के लिए दुआ करते हैं ....... जावेद एक़बाल साहब फरमाते है कि मैं ने उन से पुछा आप लोग क्या करते है? लड़की ने कहा हम कुआं खोद कर पानी निकालते है।

शहर लाहौर के एक बस में एक अमेरिकन लेडी अपनी पाकिस्तानी सहेली के साथ यात्रा कर रही थी, ड्राईवर के सर के क़रीब एक तख़ती लगी थी, उस पर लिखा था।

न इंजन की ख़ुबी न ड्राईवर का कमाल

अल्लाह के सहारे चली जा रही है।

अमेरिकन लेडी ने अपनी सहेली से पूछा, (Pakistani Peoples very Clever) इस ड्राइवर ने जरूर कोई महत्वपूर्ण ज्ञापन तख़ती पर लिखी होगी जैसे Next सेवा या ऑयल चेंज करने की डेट आदि ........ जब पाकिस्तानी सहेली ने बताया कि यह क्या लिखा है। तो उस की सिट्टी गुम हो गई कहा, रोको, रोको इसे ऐसी बस में यात्रा नहीं करूँगी जो अल्लाह के सहारे जा रही हो। अल्लाह तो उन्हीं को सहारा देता है जो अपने हाथों से काम लेते हैं।

बेचारी अमेरिकन लेडी जिसे यह पता नहीं था कि यहां तो सब कुछ अल्लाह के सहारे 1947 से चल रहा है। यहां तक ​​कि पूरी सरकार और सरकार के सभी मशीनरी अल्लाह के सहारे चल रही है। और अब मंत्री पानी व बिजली प्रार्थना के माध्यम से लोड शेडिंग समाप्त कर रहे हैं। अल्लाह उन लोगों को महबूब यानी पंसद करता है जो दुश्मन व अन्य समस्यायों का मुक़ाबला करने के लिए छाती तान कर जैसे शीशा पिलाई हुई दीवार बन जाते हैं। ''अल्लाह तो उन लोगों से प्रेम रखता है जो उसके मार्ग में पंक्तिबद्ध होकर लड़ते है मानो वे शीशा पिलाई हुए दीवार है''(61: 4)

दरुद की मार नहीं मारते। चालीस करोड़ भारतीयों पर जब अंग्रेजों ने विजय पाई वह दरुद का विर्द कर के नहीं आए थे तोप से लैस थे और समुद्री जहाजों में आए थे हमारी ना कामी का इस से बड़ा सबूत और क्या होगा कि मुगलों के शासन काल में भारतीय हाजी और अंग्रेजी जहाजों में हज के लिए जाया करते थे। यानी मुगल एम्पायर के पास अपना कोई जहाज ही नहीं था। अंग्रेजों का मुकाबला कैसे करते? अंग्रेजों ने जब हिंदुस्तान में प्रवेश किया उस समय भारतीय मस्जिदें अज़ानों से गूंज रही थीं, घर घर से कुरान की आवाज़ें आ रही थीं। मस्जिदें नमाज़ीयों से आबाद था, हिन्दू मुस्लिम कोई भी फिरंगी के सामने कोई रुक न सका खस व खाशाक की तरह बह गए, बंदूक का सामना बंदूक से किया जाता है, बुखारी शरीफ या दरुद शरीफ से नहीं।

याद आया कि इब्ने इंशा जापान जा रहे थे घर वालों ने इमाम ज़ामिन बांधा। कहते है पूरे विमान में मेरे अलावा किसी के पास इमाम ज़ामिन नहीं था, कहते है इमिग्रेशन इत्यादि में मेरा इमाम ज़ामिन ढीला पड़ गया जैसे सामने बैठी हुई अमेरिकन लड़की को देख कर मेरा ईमान ढीला पड़ गया था, में उसे एक हाथ और दांतों की मदद से बांधने की नाकाम कोशिश कर रहा था मगर टाईट नहीं हो पा रहा था। परली तरफ जो अमेरिकन लड़की बैठी हुई थी, कहा मैं हेल्फ करुं, मैं ने कहा प्लीज़। खैर इमाम ज़ामिन उस ने कस कर बांध दिया मगर पूछा What is this मैं ने कहा This is Imam zamin यह इमाम ज़ामिन है इमाम ज़ामिन से विमान को कोई दुर्घटना नहीं होता। कहा रियली फिर तुम लोग बहुत स्वार्थी हो अगर यह उपयोगी चीज़ है तो तुम्हें चाहिए कि तमाम हवाई कम्पनियों में बाँट दें ताकि लोग दुर्घटना से सुरक्षित रहते मगर पिछले दिनों आप का भी एक विमान काहिरा एयरपोर्ट पर उतरने में दुर्घटना हो गाया था क्या उन के पास यह बांधने वाली चीज़ नहीं थी? इंशा जी कहते है कि यह काफिर लोग है मैं ने उस से बहस करना अच्छा नहीं समझा।

बेहतर है यह भी कहता चलूं कि खेलों में हमारी हार की क्या वजह है और हार को जीत में बदलने के लिए क्या करना चाहिए? बड़ी वजह हारने की यह है कि वह लोग अपनी हिम्मत, मेहनत और अच्छा प्रदर्शन नहीं करते दुनिया का एकमात्र क़ौम है कि अपने रब को खेल के मैदान में ले आते हैं। अरबी में खेल को लअब कहते हैं खिलाड़ी लाअब और मलअब खेल के मैदान को कहते हैं। कुरआन ने घोषणा किया! ''सांसारिक जीवन तो एक खेल और तमाशे (ग़फलत) के अतिरिक्त कुछ भी नहीं है जबकि आख़िरत का घर उन लोगों के लिए अच्छा है, जो डर रखते है। तो क्या तुम बुद्धि से काम नहीं लेते?'' यह तो हुई एक आयत जो खोलों के खिलाफ है।

सूरह मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम में फरमाया! ''सांसारिक जीवन तो बस एक खेल और तमाशा है। और यदि तुम ईमान लाओ और डर रखो तो वह तुम्हारे कर्मफल तुम्हें प्रदान करेगा और तुमसे धन नही माँगेगा।’’ (47:36) क्या विश्वकप से हासिल किए हुए भत्ता खोरी, रिश्वत खोरी, हत्या व ग़ारतगरी अशांति से मुक्त हो जाएंगें?।हम दुनिया में सर उठा कर चलने के क़ाबिल हो जाएंगें?। अगर नहीं तो ऐसी जीत से किया फायदा। मुझे दुख इस बात का भी है कि इस खेल में पाकिस्तान का नाम क्यों लिया जाता है। भारत कहता है कि 145पर पाकिस्तान ढेर हो गाया, या पाकिस्तान की हार उजागर हो गया, या पाकिस्तान हार गया, पाकिस्तान को मुंह की खानी पड़ी, हम पाकिस्तान को सबक़ सिखा देंगें, हम ने शारजाह में पाकिस्तान का भरकस निकाल दिया इत्यादि। मगर जिन में गैरत न हो वह यह सब सुनते रहते है। कुछ जुवा बाज़ों, मैच फिकसरों के हारने या जीतने पर पाकिस्तान को क्यों बदनाम किया जाता है।इस के बदले यह क्यों नहीं कहते कि हम ने पाकिस्तानी टीम को 145 पर ढेर कर दिया, और हमारी सरकार को भी चाहिए कि उस खेल या खिलाड़ियों की सरपरस्ती न करे। अगर यह विश्वकप भी ले आएं मगर दूसरे दिन हम उन हारे हुए देशों से क़र्ज़ और मदद की भीक मांगने गए तो हमारी जीत हार में बदल जाती है। घटना मैच फिक्सिंग ने घटना बाढ़ को पीछे धकेल दिया था। यह सब मीडिया की मेहरबानी है। उन्हें भी कुछ न कुछ चाहिए।मारगलह में जहाज दुर्घटना में मक्खियों की तरह भनभना रहे थे वह धुंधला पड़ा तो बाढ़ हाथ आया बाढ़ कमजोर हुआ तो क्रिकेट हाथ आया। सच्ची बात तो यह है कि 1947 में अंग्रेज किसी तौर पर जाने के लिए तैयार नहीं था मजबूरन जब उसे जाना पड़ा तो कहा! जातो हम रहे हैं, लेकिन तुम में दो चीज़ें छोड़कर जा रहे हैं। जिसकी वजह से तुम कभी खुशी, सुख का मुंह देखने न पाओगे। एक न्यायपालिका और दूसरा क्रिकेट खेल। देख लीजिए आज आध सदी से बात आगे बढ़ गई मगर सुख का रास्ता और आसार भी नजर नहीं आए।

विश्वकप हो या ट्राफी इत्यादि अगर कारंस पर रखा हुआ हो और घर में अंधेरा हो तो वह किसी मेहमान या दोस्त को भी नज़र नहीं आएगा। हमें ऐसे व्यक्ति की आवश्यकता है कि पाकिस्तान को रौशन कर दे न कि सिर्फ पाकिस्तान के नाम को। हक एक बयान देता है कि क़ौम की दुआएँ हमारे साथ हैं, क्या क़ौम जुवा बाज़ों और मैच फिसिंग वालों के ग़म में घुली जा रही है। पाकिस्तानी क्रिकेट टीम ने दाढ़ीयाँ रख ली है मगर दीन से हर एक नाबल्द है। मेरा मक़सद यह नहीं कि यह लोग किसी मस्जिद में किसी पेश इमाम के मसल्ले को संभालने के लायक़ हों मेरा कहना यह कि किरदार न सही गुफतार तो किसी मुसलमान की तरह हो। अल्लाह की तौहीन तो न करें। रब में और अब्दुल रब में फर्क को तो पहचाने। मुसलमानों के भावनाओं का ख्याल तो रखें। कुड़ा कुरकुट की गंदगी में अल्लाह का नाम न लें। वह तो ज़ुलजलाल वाला किराम जब इंतेक़ाम लेने पर आता है तो फिर हारे हुए खिलाड़ी एयर पोर्ट से कारगो वाले गेट से निकलते हैं। क्योंकि पाकिस्तानी टमाटर और गंदे अंडे लिए प्रतीक्षा में रहते है।

पाकिस्तानी क्रिकेट टीम जमैका जा रही थी तो इंज़मामुल हक ने कहा था कि अल्लाह ने चाहा तो हम विश्वकप ले कर आएंगें। हारने के बाद रविवार की सुबह वह किसी अंग्रेज़ को इंटरव्यू दे रहे थे उन्हों ने हार कि वजह बताई कहा कि God was not on our favour क्रिकेट में अल्लाह को लाना यह एक लादीनी बयान था। उसी दिन बाब ओ अलमर ने बयान दिया, कहा क्रिकेट एक खेल है, खेल में हार जीत तो होती है। यह था एक ईमानदार का बयान। खेल तमाशों में रब को शामिल करने वालों ने अल्लाह की तौहीन की थी। रब ने उन से तौहीन का ऐसा बदला लिया कि (Arrival)से नहीं आए कार्गों के रास्ते आए। मेरी सरकार से इलतेज़ा है कि नाचने, गाने वालों, कलाकारों और खेलाड़ीयों पर पाबंदी लगा दी जाए कि वह लहू व लअब में अल्लाह का नाम न लिया करें। यह अल्लाह की तौहीन है, जो बाज़ न आए उस पर मुक़दमा चलाया जाए। उन्हें सज़ा दी जाए जो रसूल अल्लाह सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम की तौहीन से भी अधिक हो। पाकिस्तानी टीम अगर जीतना चाहे तो एक ही रास्ते है कि खेल में अल्लाह से मदद न माँगें। बल्कि माफि माँगें। कि या अल्लाह हम आप का नाम पसंदीदा अमल करने जा रहें है हमें माफ फरमा।

सितं सितम्बर, 2014 स्रोतः माहनामा सुतुल हक़, कराँची

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