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Hindi Section ( 26 Jun 2014, NewAgeIslam.Com)

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Interview With a Pakistani Politician सियासी लीडर का इंटरव्यु

 

हुसैन अमीर फ़रहाद

हम सियासी लीडर का इंटरव्यू प्रकाशित कर रहे हैं, ताकि आपको पता हो कि किस किस तरह के लोग आप पर हुकूमत कर गये हैं और कर रहे हैं। मैं इसके लिए तैयार नहीं था, लेकिन जब ये पता चला कि एक संस्था ने राजनीतिज्ञों में पैसे बाँटे हैं। लोगों का आग्रह बढ़ा कि राजनेताओं का परिचय होना चाहिए इससे ये भी पता चलेगा कि कौन देशभक्त है कौन  जनता का भक्त है, और कौन मेरी तरह अपनी इच्छा का भक्त है आदि आदि।

तो जनता के बेहद आग्रह पर सिनेमा वाले भी पुरानी फिल्में चला देते हैं हम भी लोगों के आग्रह को महत्व देते हुए नापसंदीदा काम को अंजाम दे रहे हैं। अगर पाठकों को नापसंद हुआ तो ये पहला और आखरी इंटरव्यु होगा। इस इंटरव्यु के लिए मुझे एक लीडर साहब के दफ्तर जाना पड़ा, वो बड़ी गर्मजोशी से मिले।  

कहा आपका फोन मिला तो मैं कहीं नहीं गया हालांकि ये देखिए मैं छड़ी लेकर जनता की सेवा के लिए निकल ही रहा था। फ़रहाद साहब मैं वादे का बड़ा पाबंद हूँ, ये आपके साथ कौन हैं?

मैंने बताया कि ये मेरा सहायक कम बॉडीगार्ड है, नाम तालिबे दीन है, पहले ये तालिबान में से था, उनको प्रशिक्षण देता था, कभी कभी कोई सवाल ये भी पूछ लेता है।

तालिबे दीन ने कहा चालबाज़ खान साहब अभी आपने फरमाया कि मैं वादे का बड़ा पाबंद हूँ, आपको याद होगा कि आपने सभा स्थल पर जनता से ये वादा किया था कि जब हमारा दौर आएगा तो हम मज़दूरों का वेतन दो तोले सोने के बराबर कर देंगे। क्या आपने इस वादे पर अमल किया?

बात ये है कि मैं वादे का पाबंद हूँ लेकिन मेरी मेमोरी पॉवर बड़ी कमज़ोर है। मुझे याद नहीं। चालबाज़ खान साहब सच सच बताइए कि आप अपने पांच भाइयों के मुक़ाबले इतने सुंदर क्यों हैं, हालांकि आपके इलाके के लोग इतने गोरे चिट्टे नहीं होते। आप तो बिलकुल अंग्रेज़ लगते हैं, गोरा रंग, ब्लू आंखें, माशा-अल्लाह।

कहा बात यह है कि हमारे यहां थोड़ी सी ज़मीन थी, आबादी से दूर, हमने रिहाइश भी यहीं रखी। खेती बाड़ी और मवेशी पालना हमारा पेशा था, जब कुछ डाकुओं ने अंग्रेज़ों की छावनी पर चढ़ाई की तो एक अंग्रेज़ घुड़सवार जान बचाने इधर को आ निकला। मेरे अब्बा जान से कहा मुझे पनाह दीजिए डाकू मेरा पीछा कर रहे हैं। मेरे अब्बा जान बड़े बहादुर आदमी थे और उनके दिल में लोगों की सेवा की भावना थी, (मेरी तरह) इधर वर्दी वाले अंग्रेज के कंधों पर सितारों की क़तार अब्बा ने देखी, अंग्रेज़ को पनाह दी कि ये कभी काम आएगा। अंग्रेज़ का कंधा ज़ख्मी था, अब्बा उसे अंदर ले गये, छोटी माँ से कहा इसे घी में हल्दी लगाओ और फिलहाल भूंसे में छिपा दो और अब्बा आकर चारपाई पर बैठ गए अपने हाथ दरांती से ज़ख्मी कर लिया।

डाकू आए अब्बा जान से पूछा कि इधर कोई अंग्रेज़ तो नहीं आया, अब्बा ने कहा, यहां आकर अंग्रेज़ क्या करेगा। अगर यकीन न आए तो घर की तलाशी ले लीजिए। एक डाकू ने खून देखकर अपने सरदार को कहा ये देखिए जनाब खून, वो ज़रूर यहां आया है। अब्बा ने उन्हें घायल हाथ दिखाया कि भैंस के लिए चारा काट रहा था तो मेरा हाथ कट गया। वो संतुष्ट होकर चले गए, अब्बा जान ने भूसे में से अंग्रेज़ को निकाला और उसे सब कुछ बताया कि अब कोई खतरा नहीं है। अंग्रेज़ बहुत खुश हुआ। छोटी माँ घी लगाकर उसके घाव का इलाज करती रहीं, सुना है दस पंद्रह दिन बाद वो ठीक होकर चला गया, फिर वो शनिवार की रात आकर रविवार हमारे यहां गुज़ारता था, उसकी अब्बा से दोस्ती हो गई थी। उन्हीं दिनों छोटी मां यानी मेरी मां को गर्भवती हुई जब मैं पैदा हुआ तो सभी कहते हैं तुम बिलकुल अंग्रेज़ की तरह हो, तुम पर अंग्रेज़ का साया पड़ा है। अब्बा ने कहा ऐसा असर होता है। अंग्रेज़ चला गया वो जाने क्या लिखा कि हमें ये इलाके मिले। अब्बा को राजनीति में उसी ने शामिल किय। अब्बा को कहा कुछ भी हो आपके घर का एक व्यक्ति हर दौर में मंत्री ज़रूर रहेगा, उसका कहना बिलकुल सच साबित हुआ, हम में से एक भाई ज़रूर मंत्री रहता है।

चालबाज़ खान साहब! ये बताइए कि आप सियासत में क्यों आए?

फ़रहाद साहब! एक वजह तो यही है कि उसने कहा था। यानी अब्बा के अंग्रेज़ दोस्त ने। और अब्बा जान ने कहा था कि कमाई के तीन ज़रिये हैं (1) स्कूल खोलना (2) इंडस्ट्री लगाना (3) और सियाह (काले) सत में भाग लेना। मैं काफी समय से सियाह सत में हूँ यही वजह है कि हमारे तीन चीनी के कारखाने और एक आटे की मिल है। एक मेरी बीवी के नाम  है दूसरा मेरी बहन के नाम और तीसरा मेरी बेटी के नाम है। इनमें एक मैं ही गरीब हूँ। मेरे सियाह सत में होने का यही फायदा है कि क़ीमतो का उतार चढ़ाव असेम्बली से होता है, वहाँ मूल्यों का निर्धारण यानी प्रबंधन संभालता हूँ। अल्लाह की कृपा है फ़रहाद साहब! हर साल मैं अपने खर्च पर दो आदमियों को हज पर भेजता हूं, इस सामने वाली मस्जिद में हमने अपनी हलाल कमाई से पंखे लगवाए हैं। फ़रहाद साहब! आखिरत के लिए भी कुछ न कुछ करना चाहिए। ये दुनिया तो नश्वर है और मैंने सुना है आनी जानी है।

इस बार चुनाव में कितना खर्च आया, सरकार ने तो पांच हजार का लक्ष्य दिया था।

फ़रहाद साहब! मेरा भी कुछ इतना ही खर्च आया होगा।

चालबाज़ खान साहब! ये तो सरासर झूठ है। आपके क्षेत्र में 200 पोलिंग स्टेशन थे। जिन पर आपके चार हज़ार वर्कर काम कर रहे थे। सिर्फ दोपहर के खाने पर आपने चार हज़ार लंच बॉक्स बांटे, छह लाख चालीस हज़ार तो ये बनते हैं। आने वाले मतदाताओं का चाय बिस्कुट से स्वागत करना अलग, फिर हर पोलिंग स्टेशन पर मतदाताओं को ढोने के लिए दस हजार सुज़ूकियाँ क्या आपने इंगेज की थीं फिर पोस्टर और पोस्टर लगाने वाले अलग थे। और आप कह रहे हैं पांच हज़ार खर्च आया होगा। कुछ अल्लाह का खौफ कीजिए। सच सच बताइए।

फ़रहाद साहब! मत भूलिए कि प्यार करने वाले वर्कर मुफ्त काम करते हैं खाना भी घर से लाते हैं, ऐसी भी थे जो अपनी जेब से खर्च करते थे क्योंकि उनके दिलों में मेरे लिए प्यार है। दूसरी बात ये है कि जब सरकार ने घोषणा की कि उम्मीदवार इलेक्शन के लिए पांच हज़ार रुपये से अधिक खर्च न करे। तो इन दिनों नहाते हुए मेरे कान में पानी चला गया मुझे कम सुनाई देने लगा था, सरकार ने मुमकिन है पांच हज़ार ही कहा होगा, मेरे कानों में ऐसा लगा कि सरकार ने पचास करोड़ कहा है। इसलिए हो गया खर्चा अब क्या किया जाए। जो हुआ सो हुआ। मिट्टी डालो।

लेकिन चालबाज़ खान साहब! मेरा अंदाज़ा है कि पचास करोड़ से अधिक खर्च हुआ है। भई हुआ होगा, इलेक्शन के दौरान छोटी छोटी बातों पर कौन ध्यान देता है। उस समय तो प्रतिद्वंद्वी से बाज़ी जीतने की धुन लगी रहती है। जेब को नहीं देखा जाता।

चालबाज़ खान साहब! इतना बड़ा खर्च आपने बर्दाश्त कैसे कर लिया? मैं होता तो मर जाता।

फ़रहाद साहब! एक तो ये याद रखिए कि क़ौम की खिदमत की भावना हर चीज़ पर हावी होता और फिर अल्लाह के रास्ते में एक खर्च करो तो सत्तर मिलते हैं। नेक नीयती से खर्च किए थे, अल्लाह ने चीनी के संकट में एक के बदले सत्तर से ज़्यादा लौटाए।

चालबाज़ साहब! रमज़ान में आटा चीनी महंगी कर के क्या आपने लोगों पर अत्याचार नहीं किया? फ़रहाद साहब! हमने  कोई ज़ुल्म नहीं किया, चीनी वो नुकसानदेह चीज़ है जो डायबिटीज़ का कारण बनती है और आदमी घुल घुल कर मर जाता है। हमने इस नुकासनदेह चीज़ को महंगा कर जनता से दूर रखकर जनता को जीवन दिया है। यही कारण है कि इस बेमिसाल नेकी के बदले में अल्लाह ने हमारे परिवार को साढ़े चार अरब का मुनाफा दिया। अगर चीनी महंगी करके हमने गुनाह का काम किया होता तो हमें ये मुनाफा कभी नहीं मिलता।

तालिबे इल्मे दीन ने पूछा कि आपने शुरुआत में कहा था कि, ये देखिए मैं छड़ी लेकर जनता की सेवा के लिए निकल ही रहा था कि आप लोग आ गए। ये बताइए कि छड़ी से जनता की सेवा कैसे की जाती है? अगर छड़ी से सेवा की जाती है तो बंदूक पिस्तौल और क्लाशिन्कोफ से तो और बेहतर सेवा होगी?

चालबाज़ खान साहब ने कहा ऐसी बात नहीं है तालिबान साहब। एक तो छड़ी मेरा चुनाव चिन्ह थी, दूसरे यानि सेवा करना। तो मैं देखता हूं कि जहां नाली में पानी रुका हुआ हो, ये प्लास्टिक के शॉपिंग बैग्ज़ की वजह से अक्सर पानी रुक जाता है तो मैं इस छड़ी से शॉपिंग बैग्ज़ हटाकर पानी को बहने देता हूँ। ये क़ौम की खिदमत नहीं हुई? हुई जनाब हुई।

चालबाज़ खान साहब ये बताइए कि कैरी लोगर बिल के खिलाफ अवाज़ क्यों नहीं उठाई? किस मसलहत के कारण आप खामोश रहे? फ़रहाद साहब! ये बिल्कुल गलत बात है, ये बिल अप्रैल में पेश हुआ, उस समय मैं बोला था, आवाज़ बुलंद की थी, मगर मेरी आवाज़ ज़रा धीमी थी, अचार खाने की वजह से मेरी आवाज़ कमज़ोर थी, आपने सुनी नहीं होगी। ऐसे महत्वपूर्ण विषय पर खामोश कैसे रह सकता हूँ।

यह बताइए कि आप हमेशा सरकार में होते हैं और जनता से सहानुभूति का ढिंढोरा भी पीटते हैं, आपके आठ वर्षीय कार्यकाल में जनता का जीवन स्तर क्यों नहीं बढ़ा, आपने इसके लिए क्या कोशिश की है?

फ़रहाद साहब! मुझे जनता की चिंता है, मैंने व्यक्तिगत रूप से उनका जीवन स्तर काफी ऊंचा किया है (इकबाल की खुदी से ज़्यादा बुलंद) इस समय देश में चौदह करोड़ मोबाइल हैं, ये पहले तो नहीं थे। हर छोटे बड़े, औरत, मर्द और छात्रों के  पास आपको मोबाइल मिलेगा।

आप कितनी भी सफाई पेश करे जनता की नज़रों में आपका चरित्र दाग़दार रहेगा?

फ़रहाद साहब! आप कैसी बातें करते हैं। अगर किसी अच्छे काम में दाग़ लगे तो दाग़ तो अच्छे हुए ना।

(काश ये औरत जो कहती है दाग़ तो फिर अच्छे होते हैं ना)

आप पर ये भी इल्ज़ाम है कि आप अक्सर यूरोप चले जाते हैं, ये क्यों?

मैं बड़ा कमज़ोर दिल का आदमी हूँ, मुझसे लोगों की बदहाली नहीं देखी जाती, इसलिए मैं क़ौम का ग़म भुलाने के लिये यूरोप चला जाता हूँ। सिर्फ मैं ही नहीं राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, दूसरे मंत्री और विपक्ष वाले सभी यूरोप, अमेरिका जाते हैं। कुछ लोग दुबई जाकर ग़म को खाड़ी के पानी में डुबो देते हैं। अपना अपना ग़म है, ग़म की प्रकृति है कि कहां जाकर उससे पीछा छुड़ाया जा सकता है। कुछ लोग बोतल लेकर यहीं अपने ड्राइंग रूम में ग़म से पीछा छुड़ा लेते हैं।

चालबाज़ खान साहब! आप परवेज़ मुशर्रफ़ को सज़ा देने के पक्ष में हैं या नहीं?

फ़रहाद साहब! मैं उन्हें सज़ा देने के पक्ष में हूँ लेकिन पाकिस्तानी पुलिस की तरह नहीं कि अगर कोई एक जुर्म में पकड़ा गया तो जो जुर्म पिछले तीन साल से ट्रेस नहीं हो रहे हैं, वो भी इसके खाते में डाल दिए जाएं। आप इफ्तिखार को तो जानते होंगे, जो बेचारा बोल नहीं सकता, इशारों से बात करता है। इस इस्लामाबाद में ट्रैफिक अफसर ने पकड़ा कि तुमने रेड सिग्नल क्रास किया। जब वो अदालत पहुंचा तो जज बहुत हँसा। एक वकील ने पूछा क्या बात है, सर आपको कभी इस तरह हंसते नहीं देखा?

जज ने कहा पुलिस का क़ायदा है कि अगर किसी को एक मामूली जुर्म में पकड़ ले तो दो तीन जुर्म और भी लिख देते हैं ताकि मामला मज़बूत हो। उसका भी लिखा कि उसने मुझसे बहुत बहस की है। हालांकि वो तो बोल ही नहीं सकता।  

तालिबे दीन ने कहा खान साहब आप किसके लिए काम कर रहे हैं?

कहा मैं सिर्फ गरीब जनता के लिए काम कर रहा हूँ।

लेकिन आपने स्कूल का ठेका जिसको दिया गुल रहमान वो सुना है आपका दामाद है, और आपने जो साइकिलें और सिलाई मशीनें गांव में बाँटी तो एक साइकिल और सिलाई मशीन अपनी बहन को भी दी। साइकिल आपकी बहन के किस काम की?

कुछ भी हो तालिबे दीन मेरी बहन मेरी बहन है और र्बेवा (विधवा) भी है और जनता में से है। और मैं कह चुका हूं कि मैं सिर्फ गरीब जनता के लिए काम कर रहा हूं और करता रहूंगा।  

अच्छा ये बताइए कि आपने पीपुल्स पार्टी को छोड़ा, मुस्लिम लीग में शामिल हो गए। क्या उन्होंने अपने घोषणा पत्र में कोई परिवर्तन किया था जिसकी वजह से आपको पीपुल्स पार्टी छोड़नी पड़ी? फ़रहाद साहब आप भी बहुत सीधे आदमी हैं, मुझे तो ये भी पता नहीं कि घोषणापत्र होती क्या बला है, मेरी नज़र बटुए पर लगी होती थी, राजनीति में आदमी को बिना पेंदे का लोटा बनकर रहना पड़ता है। रोज़ वफादारियाँ, हमदर्दियाँ बदलनी पड़ती हैं। अल्लामा इकबाल ने भी लोगों को यही सबक दिया है।

निशां यही है ज़माने में ज़िंदा क़ौमों का

कि इधर डूबे उधर निकले उधर डूबे इधर निकले

बात हो रही है ज़िंदा क़ौमों की तो फ़रहाद भाई हम तो अल्लाह की कृपा से ज़िंदा हैं ज़रा तुम हाथ बढ़ाकर हमारी नब्ज़ तो देखो। सुना है जब आपको मिलिट्री का ठेका मिला था कि आप हफ्ते में दो दिन मुर्गी का गोश्त सप्लाई करें तो आपने भैंस का गोश्त सप्लाई किया था, ये क्या चक्कर है? फिर आपका कंट्रैक्ट कैंसिल कर दिया गया था। ये छोटी छोटी बातें हैं, इन पर ध्यान न दें, सेहत पर असर पड़ेगा।

मार्च, 2014 स्रोत: मासिक सोतुल हक़, कराची

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