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Hindi Section ( 26 Jul 2013, NewAgeIslam.Com)

The Reality of Hadith and Tasawuf हदीस और सूफीवाद की वास्तविकता

 

हुसैन अमीर फ़रहाद

जुलाई, 2013

प्यारे भाई फ़रहाद साहब एक दीनी पत्रिका में एक लेख पढ़ा, उन्होंने लिखा था कि ये हदीस है बुखारी की। यक़ीन नहीं आया बात अजीब सी लगी, आप सौतुल हक़ में दूसरों के सवालों के जवाब दिया करते हैं तो आपको लिख ​​रहा हूँ। एक तो ये बता दीजिए कि क्या वाक़ई में इस क़िस्म की हदीस बुखारी में है? दूसरी विनती ये है कि ज़रा इसकी भी व्याख्या कर दीजिए कि इस हदीस का मकसद क्या है। समझ में नहीं आ रहा है। हदीस प्रस्तुत है।

हज़रत अबु हुरैरा रज़ियल्लाहू अन्हा ने कहा मैंने आप सल्लल्लाहू अलैहि वसल्म से दो तरह  के इल्म (ज्ञान) हासिल किये, एक को तो मैंने (लोगों में) फैला दिया, और दूसरे को अगर मैं फैलाऊँ तो मेरा गला काट डाला जाएगा। (बुखारी शरीफ)

फ़रहाद साहब! क्या ये सही है? अगर वो इल्म इंसानों के लिए गैरज़रूरी है तो फिर अबु हुरैरा रज़ियल्लाहू अन्हा को ही क्यों बताया गया। वो भी तो इंसान थे, आखिर वो कौन सा इल्म है कि जो अबु हुरैरा रज़ियल्लाहू अन्हा के लिए ज़रूरी है, लेकिन बाकी उम्मत के लिए गैरज़रूरी है?

शम्सुद्दीन क़ुरैशी

121, अल्लामा इक़बाल टाउन, नीलम ब्लॉक, लाहौर

आदरणीय शम्सुद्दीन साहब अस्सलामो अलैकुम। सबसे पहले तो ये बात मन में बिठा लीजिए कि हदीस आमतौर पर उस बात को कहा जाता है जो हुज़ूर सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम की ज़बान मुबारक से एक बात अदा हुई और दूसरे के कानों तक पहुंची। अगर कोई सुनी हुई बात को दुहराए तो हदीस नहीं रवायत कहलाती है। दूसरी बात ये याद रखिए कि आपने कहा कि (दीनी पत्रिका में लेख पढ़ा) दीना न कहें मज़हबी कहें। दीनी पत्रिका पाकिस्तान में सिर्फ दो हैं जिनमें एक मेरा सौतुल हक़ है, बाक़ी सब मज़हबी हैं, और दीन व मज़हब में ज़मीन आसमान का फर्क है। बेशक इस विषय पर रवायत मौजूद है जिसे लोग हदीस कहते हैं। हवाला है। (बुखारी जिल्द एक किताबुल इल्म, अध्याय 84 हदीस संख्या 120 पेज 149)

सहाबा किराम रज़ियल्लाहू अन्हा सबके सब अमीन ''अमानतदार'' थे, ये बात मानने की नहीं है कि हुज़ूर सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने किसी गैर अमीन यानी खाएन (अमानत में खयानत करने वाला) को साथ रखा हो। (अगर तुमने ये और लोगों पर ज़ाहिर कर दिया तो तुम्हारा गला काट दिया जाएगा) लेकिन उन्होंने फिर भी उम्मत को बता दिया, बात हम तक पहुंचा ही दी। इस तरह देखा जाए तो साबित हुआ कि वो गैर अमीन थे, एक राज़ (रहस्य) को राज़ नहीं रख सके। ये बात सही नहीं है।

दुश्मनों ने ये भी साबित किया है कि हज़रत अबु हुरैरा रज़ियल्लाहू अन्हा अपना गला बचाने की खातिर क़ौम को आधे दीन से महरूम कर दिया? हालांकि अल्लाह ने फरमाया, या अय्योहर रसूलो बलग़ा मा उन्ज़ेला अलैका मन रब्बेका ( ऐ मेरे रसूल पहुंचा दो वो पैग़ाम जो तुम पर तुम्हारे रब की तरफ से नाज़िल हुआ) वइन लम तफ्अल फमा बलग़्ता रेसालतः वल्लाहो यासेमोका मेनन नासे इन्नल्लाहा ला यहदिल क़ौमल काफेरीन (5- 67) अगर तुमने ऐसा न किया तो तुमने रिसालत का हक़ अदा न किया। अल्लाह तुमको लोगों के शर (बुराई) से महफूज़ (सुरक्षित) रखेगा। वो तुम्हारे मुक़ाबले में काफिरों को कामयाबी की राह पर गमाज़न (अग्रसर) नहीं करेगा। और ये भी रब का फरमान है।

वलौ तक़व्वला अलैना बादल अक़वील। ला खज़ना मिन्हो बिल-यमीन। सुम्मा लक़ाताना  मिन्हुल वतीन (69- 44, 45, 46) और अगर नबी ने खुद घिरी हुई बात हमारी तरफ मंसूब की हुई तो हम उनका दायाँ हाथ पकड़ कर उनकी गर्दन काट डालते। यहाँ ये भी सवाल पैदा होता है कि दीन के एहकाम (आदेशों) या दीन आमतौर पर हज़रत अबु हुरैरा रज़ियल्लाहू अन्हा फैलाया करते थे? हमें कुरान में या नबी करीम सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम की ज़िंदगी में ऐसा कोई इशारा नहीं मिलता जिससे इस घटना को बल मिलता हो। अगर दीन का मतलब एहकामे इलाही है जो सभी कुरान में मौजूद हैं तो हर मुसलमान का फ़र्झ़ है कि उन्हें फैलाए, दूसरों तक पहुँचाए। अल्लाह ने अपने रसूल सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम से फरमाया कि,

या अय्योहर रसूलो बलग़ा मा उन्ज़ेला एलैका मिन रब्बेका वइन लम तफ्एल फमा बलग़्ता रेसालतः (5- 67) ऐ रसूल पहुँचा दो वो जो आप पर नाज़िल हुआ है अपने रब की जानिब से, अगर तुमने ऐसा नहीं किया तो रिसालत में नाकाम हुए। हुज़ूर सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम के बाद ये ड्यूटी पूरी उम्मत की है कि वो अल्लाह का पैग़ाम दूसरे मुसलमानों तक पहुंचाए। ये आधे दीन और गले की कटाई हुई बात दीन के दुश्मनों की बनाई हुई बात है। हज़रत अबु हुरैरा रज़ियल्लाहू अन्हा का नाम तो कहानी की शोभा के लिए जोड़ दिया ताकि मुसलमानों को यक़ीन आ जाए और बाकी आधे दीन की तलाश में सक्रिय हो जाएं। फिर हम उनके सामने रहस्यवाद या जो कुछ रख देंगे ये उस पर जुगाली कर लेंगे। वही तो हो रहा है, अल्लाह की मंज़िल को छोड़कर ज़्यादातर लोग अल्लाह की गैर मंज़िल पर अमल कर रहे हैं।

जब दीन अपने जज़्बात के साथ उम्मत तक पहुंच गया तो रब ने कह दिया। अलयौमो अकमल्तो लकुम दीनकुम वअत-ममतो अलैकुम नेमती वरदीतो लकुमुल इस्लामा दीना (5- 3) आज मैंने तुम्हारे लिए तुम्हारा दीन मुकम्मल कर दिया और अपनी तमाम नेमतें उस पर न्यौछावर कर दीं और मैं दीन इस्लाम से राज़ी हुआ। और इंसान की रहनुमाई के लिए जो कुछ ज़रूरी था वो बड़ी वज़ाहत (स्पष्टता) से क़ुरान में फरमा दिया।

दीन के पूरा होने के बाद जो कोई ये कहे कि आधा दीन मैंने फैला दिया, और दूसरे को अगर मैं फैलाऊँ तो ये मेरा गला काट डाला जाएगा। ये उम्मत को धोखा देने वाली बात है। उम्मत को इस धोखे में डालना है कि दीन पूरा नहीं है। आप देखिये कि हुज़ूर के बाबरकत (पवित्र) ज़माने में सूफीवाद का नामो निशान नहीं था। सूफीवाद को मोहीयुद्दीन इब्न अरबी शेखुल अकबर ने परिचित कराया। बहरहाल अगर सूफीवाद इंसानों के लिए ज़रूरी होता तो जिस तरह दूसरे मामलों के बारे में अल्लाह ने स्पष्ट रूप से बयान किया है इसके बारे में भी फरमाया होता। मगर कुरान में सूफीवाद का ज़िक्र नहीं है। अल्लामा फरमाते हैं सूफीवाद का इस्लाम से कोई सम्बंध नहीं है, ये अजमी जड़ी बूटी है। सूफीवाद के कम्बल के नीचे उन पराजित तत्वों ने शरण ली है जो हक़ीक़त से आंखें चार नहीं कर सकते।

जुलाई, 2013 स्रोतः सौतुल हक़, कराची

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